हिन्दी कविताएँ : मनोज कुमार यकता

Hindi Poetry : Manoj Kumar Yakta


1. तुम चाहते क्या हो

"तुम चाहते क्या हो - तुम्हें भूल जाएँ । लेकिन कभी सोचा है? दूरियाँ करने से हमीं थोड़े न दूर होंगे तुम भी होंगे इस इश्क के जंजीर से " तुम चाहते क्या हो - हमेशा के लिए नजरअंदाज कर दें ? छोड़ दें तुम्हारे पल्लू अलग हो जाए हमेशा जैसे धरती, चाँद से दूर है जरा सोचो ? कोई बात बिगड़ जाएँ हथेली पे अपने ग़म आ एँ तो क्या होगा? कुछ चेहरे हमारे हैं कुछ चेहरे तुम्हारे हैं पर इतने प्यारे हैं तुम चाहते क्या हो - आखिरी साँस तक तुम्हें न देखें यों ही अलग रहे, बेख़बर रहे न मिलो, न मिले हम काटे सारी उम्र बेफिक्र तन्हाई में लौटें न फिर तुम्हारे शाम तक तुम्हारे सुबह तक तुम्हारे दहलीज तक

2. आजा जी ले जी भर के

आजा जी ले जी भर के रूठ न तू मुझसे ये वक्त भी अपना है नहीं न आएगी ऐसी कोई ख्वाहिशें फिर मिले या ना मिले क्या पता हो ना, फिर मोहब्बतें आजा जी ले जी भर के .. सुनहरी धूप किनारा सुबह में रोशन ये धरती गगन, सुंदर सा नज़ारा कितना प्यारा दूर नहीं हूँ मैं तुझसे आजा जी ले जी भर के .. "कच्ची पक्की जो भी है यार यारी अपनी अच्छी है सब झूठ मूठ बातें है जग में, पर अपनी तो सच्ची है "

3. पर तू नहीं है

फूल है खुशबू है प्यार है रंग है मौसम सारे जवां है, मीठे लफ्ज़ साफ- साफ कोयल करती राग धूप है छांव है पर तू नहीं है _ इतना सुहाना पल है रिमझिम सा बादल है घूमने की फुरसत है मिलने की चाहत है पर तू नहीं है _ ठंडी - ठंडी हवा है तन मन में राहत है सादा सा जीवन है खुशियां है पलकों पे, गगन छूने की ख्वाहिश है दिल की यही फरमाइश है पर तू नहीं है _ अश्क के दाने तेरे दीवाने पर तू न जाने

4. जो होना है तय

जो होना है तय होकर ही रहेगा कोशिशें कुछ भी कर ले खोकर ही रहेगा भीड़ में गुमशुदा की तलाश न कर इतनी जल्दबाजी में दरिया पार न कर जो मिले उसे नसीब समझ पास है तो क़रीब समझ तेरा ही है तो तुझे मिलेगा सब्र कर वही मिलेगा जो सपने देखें तूने कभी सच है वही रहेगा मगर कर मेहनत मुसलसल तू उठ चल छू आसमां गर है आरज़ू सय्यारे तेरे इंतज़ार में है मिलने की जुस्तजू, प्यार में है

5. मेरे अंतःकरण में

मेरे अंतःकरण में प्रेम की अनुभूति मर चुकी है, मैं केवल जीवन में जीने के लिए व्याकुल हूँ वैसा नहीं अब जैसा पहले था, इस संसार के निर्निमेष में _ मैं जागता रहता था दिन - रात कभी चाँद तारो के साथ अब इतना भयभीत हो गया हूँ कि आत्मा में झांक के पूछता हूँ

6. ग्रीष्म ऋतु

ग्रीष्म ऋतु अत्यन्त दुःखदायी मेलमिलाप न हो कभी भाई देख - देख अति दूर से, खड़ा धूप में कुम्हलाई तरबतर पसीना देह से छूटे ले अंगड़ाई हाय! इतनी गर्मी कहाँ से आई? सुबह सहन न दोपहर को निकल रही जान हर पहर को सोने की इच्छा जागे किन्तु जो, रात में पारा बढ़े हाई हाय! इतनी गर्मी कहाँ से आई?

7. जब हम नहीं थे

जब हम नहीं थे, तब ये चाँद भी था सूरज भी था ये नीले आसमाँ, चहकती चिड़ियों का कारवाँ भी था। सुबह की सुनहरी धूप, खिलते महकते हूरों के रूप, चटकती कलियाँ, हँसती गलियाँ, चहल पहल और तारों का रक्स, सब मौजूद थे हमारे न रहने पर जब हम नहीं थे, तब ये लहराती नदियाँ थी मौसम थे और सर्दियाँ थी देखो कुछ भी नहीं बदला, वही घटाएँ है, सावन भी तो वही है, आँगन भी तो वही है। ज़मीं वही है मिट्टी वही है बातें वही है चिट्ठी वही है ताज़्जुब क्यों हो, हम भी वही है तुम भी वही हो

8. चाँद के मिज़ाज से

चाँद मेरी बात पे, नखरे वो करता है क्यूँ कहता हूँ आ जाओ घर, आने से डरता है क्यूँ क्यूँ छुपा है बादलों में, बदली की वो चादरों में क्यूँ रूठा है वो मुझसे अब भी झांकता हूँ जो खिड़कियों से याद में उसके कहीं टकटकी इस आँख से जागकर उस ख़्वाब से मिलता हूँ मैं रात भर क्या है वो जो, है गुरुर मुझसे हर पल रहता दूर बन के खुशबू की उदासी रहता दिल के बाग में सबसे कहता जां है वो, रहता हूँ इस नाज़ से बहकी- बहकी नज़र है उसकी बहके सारे मिजाज़ वो लुका छुपी में दिन बीते आता नहीं मेरे हाथ वो

9. तुम अकेली क्या करोगी

तुम अकेली क्या करोगी मैं जब ना रहूंगा तेरे दर पे तो वीरान ही लगेगें घर तेरे बेड सोफे,और उसपे किताबे भी रखी मिलेगी तन्हा ही, मेरे इस सफर के बहार में, मैं ना आऊंगा जब तेरे इंतज़ार में तेरा सजना संवरना, पायल की सदाएँ माथे की बिंदी, जुल्फों की घटाएं मेरे बिन सब लगेंगे अधूरे, मैं ना रहूंगा साथ तेरे तो सुबह भी चुभन सी लगेगी याद करके देर से उठोगी घबराता रहेगा यूं ही दिल, बेकाबू रहोगी यूं ही कभी मिलता था जो हँस के इक निशां भी नहीं मिलेगी तेरे जुस्तजू मेरे सामने वो तस्सवुर का आलम, खोए से मिलेंगे मेरे जाने से क्या खाए क्या पिए और कौन से कपड़े पहनने है ये सब छूट ही जाएगा जब दूर हो जायेंगे तेरे आंखों के सामने जब मेरी विदाई होगी इस कैद खाना से जब मेरी रिहाई होगी बदलते मौसम के खुशबू बदल जायेगी कोने में पड़ी जिन्दगी रुलाएगी तब मुझको तुम याद करोगी मिलता हैं कौन किस बहार में नई महफ़िल नई बाजार में एक मैं ही तो ठहरा जो सौदा हुआ वरना कौन मिलता है प्यार में

10. खेल खेलें प्यार का

आओ चले खेल खेलें, बात हो मजाक का। मैं कहूँ प्यार है तुझसे, तू कहे हालात का। बाग हो मौसम हो, धूप हो छांव हो, हो उसमें तू ठंडी हवा, मैं हरा पेड़ परिजात का। तेरी बाहें नदिया जैसी, मैं ठंडा पानी हिलोर का तू शरमाए तरसाए , सारे जहाँ में लहराए, पाऊँ तुझमें हर खुशी, तो बात हो साथ का।