हिन्दी कविताएँ : अर्पित सर्वेश

Hindi Poetry : Arpit Sarvesh


1. तकदीर

तकदीर लिख न पाए तो बदल तो सकते हैं, किसी और पर नहीं खुद पर भरोसा कर सकते हैं ये जो भीड़ में लगते हैं सब हमें अपने लोग, इनके बिना भी तो हम आगे बढ़ सकते हैं कामयाबी की सीढ़ी पर चढ़ना तो होगा, जो अभी तक कोई न किया वो करना तो होगा यूँ नहीं कोई रातों रात कामयाब हो जाता है, सालों तक मेहनत एक दिन सफल होने के लिए करना तो होगा सोच तो यहाँ सबकी कुछ करने की है, खुद के सिवा हर किसी से लड़ने की है बैठे हैं कुछ लोग किस्मत के भरोसे, विलाप की नहीं अब, जरूरत पड़ने की है देखते क्यों हो किसी की कमाई को, इंतजार कर रहे मिलने की किसी की बधाई को तुलना करना ही नहीं खुद की किसी से, करना है तो करो आज की महँगाई को हर कोई तुम्हे रोकने की कोशिश करेगा, लोगों के ताने सुनकर ही तू आगे बढ़ेगा बहाने तो तैयार हैं सभी के यहाँ, तेरी मेहनत से ही सब कुछ बदलेगा माता पिता की सेवा में जीवन अर्पित करेगा, दुःख का साया तेरे जीवन से चारों ओर से हटेगा तू बस थोड़ा सा और कोशिश कर ले, तू खुद के हाथ से इतिहास लिखेगा।

2. अधूरा

जब तक खुद पर न बीते तो वो मजाक लगता है, बँटवारे में हर एक चीज़ का हिसाब लगता है कभी कभी इंसानियत से भरोसा उठ जाता, इंसान इंसान नहीं श्मशान लगता है दूसरों का गलत अपना सही खानदान लगता है, दूसरे का बेटा नालायक अपना वरदान लगता है अपनी कमियाँ कोई देखता नहीं, अपने को हर कोई महान लगता है ये झूठी शानो शौकत का कोई काम नहीं, मुझे ये सब बेकाम लगता है खुद को बेहतरीन बनाने की कोशिश करो, सबका यहाँ एक दाम लगता है इस जहाँ में कुछ अधूरा लगता है, अर्पित ही मुझे पूरा लगता है कभी किसी पर भरोसा न करना, यहाँ हर कोई छुरा रखता है।

3. एहसास

मैं उम्र से नहीं बल्कि हादसों से बड़ा हुआ, किताब में आज भी उसके गुलाब जैसा पड़ा हुआ कई लोग मेरे वजह से टिके हुए हैं, मैं कील जैसा दीवार पर गड़ा हुआ उससे आज तक कभी इजहार नहीं कर पाया मैं, उसके चाहने वालों की कतार में मैं सबसे पीछे खड़ा हुआ मेरी ज़िंदगी का अब कोई अर्थ नहीं, जैसा कोई फल होता है सड़ा हुआ उसकी मुस्कुराहट को अभी भी महसूस कर लेता हूँ, आज भी मैं उसको पाने के लिए अड़ा हुआ हिम्मत तो बहुत ही ज्यादा है मुझमें, उसके सामने आते ही बन जाता हूँ डरा हुआ डर से ही उसको चाहता रहूँगा हरदम, जैसे कोई बच्चा अपनी जिद पर अड़ा हुआ जिस दिन उसे मेरे प्यार का एहसास होना बंद हो जाए, तुम समझ जाना अर्पित को मरा हुआ।

4. तेरा है ही क्या

तेरा है ही क्या जिसपर तू गुमान करता है, खुद खुश होकर दूसरे का नुकसान करता है अभी बहुत कुछ देखना बाकी है तुझे, तू क्यों हर चीज़ पाने के लिए लड़ता है कभी तुझे कोई अपना मिला है क्या, इस दुनिया में कोई सच्चा दिखा है क्या सब लोग यहाँ तेरा मजाक बनाते हैं बस, जरूरत पर कोई तेरे साथ टिका है क्या तुझे किसी भी चीज की जरूरत नहीं है, तुझसे सुंदर यहाँ कोई भी सूरत नहीं है एक पल रुककर सोच तू, जितना तू सोचता है ये जहाँ खूबसूरत नहीं है तेरा कुछ भी नहीं था और न ही हो सकता है, तू हर चीज़ हासिल करके खो सकता है ज़िंदगी की सच्चाई को समझ अर्पित, तू मरने के बाद भी रो सकता है।

5. अकेले

हम अकेले ही ठीक थे ये रिश्ते बड़े नुकसान के हैं, ज़ख्म जो मिले मुझे सब मेरे खानदान के हैं अब किसी से जुड़ने की उम्मीद नहीं मुझे, क्योंकि सभी लोग यहाँ जफाकार के हैं मेरी रूह तक को सभी ने तड़पाया है यहाँ, ये इस धरती के नहीं बल्कि श्मशान के हैं थोड़ी सी भी तरस नहीं आई इन्हें, इनकी बातें सिर्फ झूठे बयान के हैं किसी से कोई लगाव अब करना मत तुम, सब लोग तीखी जुबान के हैं ये सब इतना नीचे गिर जाते हैं कि, तोड़ने वाली कसमें खाते भगवान के हैं अकेला रहकर जी लेना तुम ज़िंदगी सारी, सभी के दिल यहाँ चट्टान के हैं तुम्हे खुश रहना होगा अर्पित हरदम, तुम्हारे सपने ऊँची उड़ान के हैं।

6. प्रतियोगी छात्र

सामान सारा लेकर निकल गए शहर की ओर, जहाँ मिलता न कोई ईमानदार मिलते हैं सब चोर घरवालों को छोड़ दिया तुमने, चले आए तुम सुबह की पहली भोर अनजान लोगों के बीच में एक नया सफर शुरू हुआ, जिसकी बात समझ न आती वही तुम्हारा गुरु हुआ किराए के कमरे में करना पड़ रहा गुजारा, अब ये सब तुम्हारे लिए गरु हुआ अलग अलग तरह की परीक्षाओं के फार्म भरते हो, अगर सफलता न मिली इस बात से डरते हो तैयारी की तुमने दिन और रात, तुम क्यों दूसरों की बातों में वक्त जाया करते हो एक न एक दिन तुम्हे कामयाबी मिल ही जाएगी, तुम्हारे वीरान ज़िंदगी में खुशियों के फूल खिल ही जाएगी अभी भी सब कुछ सही कर सकते हो तुम, वरना ज़िंदगी तुम्हारी यूँ ही बीत जाएगी एक असफलता तुम्हारे भविष्य का निर्णय नहीं कर सकती, तुम्हारे पिता और माता कर्जदारों से रोज़ नहीं लड़ सकती खुद पर विश्वास है तुमको अगर, तुम्हारी ये परिस्थिति क्यों नहीं बदल सकती कुछ चीजों को हासिल करने में समय लगता है, हर कोई मंजिल की ओर बढ़ता है तुम्हे अपनी मेहनत जारी रखनी है, कोई इतिहास बनता है कोई इतिहास लिखता है परिवार से दूर रहकर तुम उनके सपनों को सच करने आए हो, कभी पेट भर तो कभी आधा पेट ही खाए हो आँसुओं को बहाकर कई रातें बिताई तुमने, क्यों तुम अपनी प्यारी आँखों को सजाए हो सब कुछ एक दिन अपने आप बदल जाएगा, तेरा नाम हर समाचार पत्र में आएगा अभी थोड़ा सा सब्र और तैयारी कर ले तू, सारी दुनिया में एक दिन तू छाएगा एक दिन तू छाएगा।

7. प्रवासी

कहाँ चला गया तू पूर्वांचल का नौजवान, परदेश में तेरा हुआ न कोई सम्मान महफिलों में तू जाता तो है लेकिन, तेरे बिना सूना पड़ा है सबका जहान मुंबई की चकाचौंध ने तेरा सुकून छीन लिया, ऊँची इमारतों ने तेरा खुला आसमान छीन लिया कभी बेफिक्र से जीते था सबके साथ, आज खुशी है लेकिन उन सबको समय ने छीन लिया तुमने बेची अपनी वो जमीन जिसमें पहचान बसी थी, नुक्कड़ पर लोगों के चेहरे पर लगाव की हँसी थी कुछ पैसों के लिए अपनी जड़ों को काट दिया, अपने गाँव, खेत, माटी से खुद को बाँट दिया परदेस में रोज लड़ता है तू अपनी पहचान बचाने को, कभी गाँव नहीं आता तू त्योहार मनाने को पूरी ज़िंदगी तू लगा देगा लेकिन, हर कोई तैयार है वहाँ तेरा अस्तित्व मिटाने को अभी देर नहीं हुई है वापस अपने गाँव आओ, अपनों के बीच बनी दूरियाँ तुम मिटाओ अगर देखना है एकता तुम्हे तो, अर्पित के प्रतापगढ़ आ जाओ प्रवासी सम्मेलन में हर बिछड़ा मिलेगा, जो दूर गया था वो फिर से जुड़ेगा इस छोटी सी कोशिश से शायद, कोई तो अपने गाँव की तरफ मुड़ेगा न कोई राजनीति का रंग होगा, न ही कोई स्वार्थ की दीवार गाँवों के विकास का सपना, और एकता का सशक्त विचार इस बार जरूर तुम लौट आओ, अपने गाँव को फिर से सजाओ आने वाली पीढ़ी को पलायन का नहीं, एक साथ रहकर आगे बढ़ने का मार्ग दिखाओ जहाँ तुम्हारा जन्म हुआ वही तुम्हारा आसमान है, जहाँ तुम्हारा गाँव वही तुम्हारा असली सम्मान है अर्पित कर दो दुनिया के लिए जीवन कोई मतलब नहीं, सिर्फ माता पिता ही साक्षात भगवान हैं।

8. फाल्गुन

फागुन ने चारो तरफ रंग सजाया है, प्रतापगढ़ की गलियों में खुशियाँ लाया है हर चौपाल, हर आँगन में बिखरी हँसी की टोली, माटी भी मुस्कुराने लगी, आई जब रंगों की होली। केसरिया गुलाबी रंग नहीं, भाव जैसा लगती है, बचपन की शरारतें फिर पलकों पर आ बसती है इन्हीं रंगों के बीच कहीं कलाम ने गीत उकेरा, अर्पित ने शब्दों से रच दिया, भावनाओं का सवेरा कोई अमीर गरीब नहीं हर चेहरा अपना लगता है, नाम, नाराज़गी, दूरी भुलाकर इंसान बस इंसान सा लगता है मन की धूल को पानी से आज निकालो, गलत विचार और अहंकार को धो डालो। अरमान रंगों में भीगे हैं, सपनों की है पिचकारी, अर्पित के शब्दों संग बहती, उम्मीदों की फुलवारी जो बीत गया उसे भूल चलो, आने कल को रंगोली, प्रेम, एकता, सद्भाव सिखाये प्रतापगढ़ की होली।

9. धर्मसम्राट करपात्री

धर्मसम्राट बन गया, प्रतापगढ़ की माटी का लाल, हरिनारायण से बन गया तपस्वी, जिसने जीता अपना काल कर ही बना पात्र भोजन का, सुख सुविधा से नाता तोड़ा, काशी की पावन धरती पर, भक्ति ज्ञान का संगम जोड़ा। नित्यानंद के शिष्य बने, पाया ज्ञान का पावन दीप, साधना के उस सागर में, बने सत्य के उज्ज्वल सीप अद्वैत मत की शक्ति और धर्म का शौर्य जगाया था, रामराज्य की परिकल्पना को, जन जन तक पहुँचाया था। गौ वंश की रक्षा हेतु जिसने, दिल्ली की सड़कें लाल करी, सत्य और मर्यादा हेतु अपनी बात बेबाक धरी मार्क्सवाद से लेकर वेदों तक, जिसका ज्ञान अगाध रहा, हर एक सनातनी का जिसके साथ साथ रहा नमन है उस महायोगी को, जिसने धर्म को प्राण दिया, आधुनिक इस युग में भी, प्राचीन वैभव का दान दिया जब तक माँ गंगा बहती है, नाम अमर उनका होगा, करपात्री जी के चरणों में, शीश नवाता जग होगा।

10. नवरात्रि

तेरी माया अपार है मईया, तेरी दीवानी ये सारा संसार है मईया, जो लोग करते हैं तेरी पूजा, उनपर तेरी कृपा का भंडार है मईया तू शैलपुत्री तू स्कंदमाता तू ही है कात्यायनी, तू चंद्रघंटा तू कुष्मांडा तू ही है भवानी, नव दिन नव रूप हैं तेरे, तेरी कृपा से किसी को न होती हानि पूरे विश्व में हर जगह सिर्फ तेरी आरती गाई जाती है, नन्ही नन्हीं बच्चियों को चुनर चढ़ाई जाती है, हर एक स्त्री में माता का रूप है, ये बात हम सबको बताई जाती है कभी तुमने खुद को संकट में डाल कर ब्रह्मांड को बचाया है, कभी तुमने प्रेम में तप कर के प्रेम का पाठ सिखाया है, सब कुछ तुमसे सीखा है मैंने माता, आज तेरा अर्पित सारी दुनिया में छाया है नारी का सम्मान करो, उसका तुम गुणगान करो, कोई पार्वती है तो कोई काली है, मेरी माँ संकट हरने वाली है।

11. बनारस

जहाँ की धरा में शिव का वास रहता है, जिसे हर कोई काशी विश्वनाथ कहता है गली गली में गूँजती है कोई कथा पुरानी, आओ सुनाता हूँ अपने बनारस की कहानी वरुणा और अस्सी नदियों के बीच की यह भूमि है, यहाँ के घाटों पर रानी लक्ष्मीबाई भी घूमी है यहाँ देवी देवता भी स्नान करने आते हैं, जन्मों जन्मों के पाप भी मिट जाते हैं शाम को जब दीप जलते हैं गंगाजल पर, लगता है स्वर्ग उतर आया है धरती पर घाटों पर बजते शंखों की गूँज निराली, यहाँ हर रोज मनाई जाती है दिवाली यहाँ मृत्यु भी मोक्ष का पर्व मानी जाती है, मणिकर्णिका की ज्वाला आत्मा को शांति सिखाती है कबीर की साखियाँ गली-गली में बिखरीं, तुलसी के रामचरित ने कथा अमर लिखी। यहाँ की माटी किसी महात्मा की कहानी कहती है, यहाँ हम सब की पूजनीय माँ गंगा रहती है बुद्ध ने भी यहीं दिया धर्म का ज्ञान, हर युग में निखरा काशी का मान हर नुक्कड़ पर पान और ठहाकों का व्यापार है, बनारस तो धर्म, संस्कृति, ज्ञान का भण्डार है ये सिर्फ शहर नहीं बल्कि, भाव है, विश्वास है, अर्पित का बनारस पूरे विश्व में विख्यात है।

12. मुझे इल्म नहीं

मुझे इल्म नहीं कि तुम हो भी या नहीं, मगर कभी मिलेगा कहीं न कहीं। मुझे इल्म नहीं कि तुम हो भी या नहीं, मगर कभी मिलोगी कहीं न कहीं। तेरी बातों को मैं याद करने से डरता हूँ, इस जन्म में न सही अगले जन्म में मिलने की फरियाद करता हूँ, जो तुम न मिले इस बार मुझे, आज भी तेरी जगह बचा कर रखता हूँ। हीर रांझा, लैला मजनूँ सभी ने प्यार की मिसाल दी है, जो कभी मिट नहीं सकती मेरी महबूबा ने वो निशान दी है, गम सिर्फ इस बात का ही रहेगा मुझे, उसने पहचाना नहीं और मुझे एक नई पहचान दी है। इस जहाँ की बातों में तू आई भी, मुझको हँसाया, खुद को रुलाई भी अब तो सब कुछ बस कहानी ही बन गई, हमने भी रो रो कर लोगों ये दास्ताँ सुनाई भी। वादों को निभाने की बात करती थी वो, सबके सामने मुझे अपना कहने से डरती थी वो, बातें करने से ज्यादा उसने कसमें खाई थी, रोज़ खुदा के नाम से पहले “अर्पित” का नाम लेती थी वो। जिसने तुम्हें पाने के लिए सब कुछ कर दिया, मुस्लिम होते हुए भी तुम्हारी माँग सिंदूर से भर दिया, अभी भी तुम करती हो मेरी कामयाबी की दुआ खुदा से, तुम्हे पाकर नहीं, मैंने तुम्हारा नाम लेकर है जिया। ये मोहब्बत, इश्क मुझे अब भाता नहीं, क्या तुम्हे अब मैं याद आता नहीं, जो लोग तुम्हारे अब अपने हो गए हैं, क्या मैं उनसे ज्यादा तुम्हें चाहता नहीं। तुमने लिखना सिखाकर, मुझे पहचान दिला दिया, तुम मेरी नहीं हो पाई फिर भी मैंने तुम्हें अपना बता दिया, हर लेख में तुम्हारा नाम जरूर लिखता हूँ, तुम वो हो जिसने जहन्नुम को भी जन्नत बना दिया।

13. इंसानियत

छोड़ो तुम सब भगवान पर भरोसा करना, क्या चाहते हो तुम देश का माहौल ख़राब करना, धर्म और मंदिर मस्जिद पर करते हो तुम लड़ाई, इतना ही धर्म का भूत सवार है तो पहले अपने धर्म ग्रंथों की पढ़ाई कर लो धर्म का तुम्हें मतलब नहीं पता और तुम खुद को कट्टर कहते हो, तुम्हें कुछ भी ज्ञान नहीं तुम तो गलतफहमी में रहते हो, हिंदू हिंदू कहते हो हिंदू का अर्थ नहीं जानते, जब तुममें इंसानियत ही नहीं तो क्या ईश्वर तुम्हें अपना भक्त मानते तुम भी मेरे भाई हो मैं भी तुम्हारा भाई हूँ, अगर कोई हमारी एकता और अखंडता को तोड़ेगा तो मैं उसके लिए कसाई हूँ, हम सब के घर में बच्चे हैं उनके भविष्य के लिए सोचो, जो लोग तुम्हें भटका रहे हर तरह से उनको तुम रोको, शिक्षा, नौकरी, अच्छा समाज ही हमारी जरूरत है, हमारा देश पूरे विश्व में सबसे खूबसूरत है, कुछ गलत लोगों की वजह से इंसानियत को तुम मत ख़तम करना, हम सब एक हैं, एक दूसरे के साथ ही हम सबको आगे है बढ़ना ईश्वर के सिवा कभी किसी से भी ना डरना, चार दिन की ज़िंदगी है तो क्या अफवाहों में पड़ना, अपना जीवन अपने देश और परिवार के लिए है अर्पित करना, हम सब मिल कर जियें आखिर एक दिन अलग-अलग ही मरना, ना धर्म हमारा ख़तरे में है ना हमारी संस्कृति, खतरे में है तो सिर्फ या सिर्फ हमारी प्रकृति....

14. उसके शहर

काफी दूर से मैं उससे मिलने था आया, मैं आ रहा हूँ उसको पहले से था बताया वो थोड़ा पागल है, समझ नहीं पाती, कुछ गलतफहमियों ने हम दोनों को बहुत हैरान किया। बात बंद हो गई मुलाकात बंद हो गई हमारी, फिर भी आज तक हमने एक दूसरे को है चाहा मुझे मालूम है वो रहना चाहती थी मेरे साथ, लेकिन देखो आज भी उसको मैं साथ नहीं लाया। फिक्र भी करती थी वो और नफरत भी दिखाती थी, मुझे उसकी यही तो अदा बहुत भाती है। हर चोट को सहकर भी मजबूत रहता हूँ, क्योंकि हर बार मरहम तो वही लगाती है रब ना जाने क्या करेगा हम दोनों के साथ, कभी गले मिला देता है कभी मिलने ना देता हाथ। इंतज़ार कर रहा हूँ उसके आने का, मुझे कोई फर्क नहीं पड़ता कि क्या है उसकी जात उसका एहसास शब्दों से ज्यादा बोलता है, हर आशिक इश्क में एक बार जरूर रोता है। सुना है वो मेरी शायरी पढ़ती है, हर शायरी में अर्पित उसका नाम ज़रूर लिखता है। मेरा वर्ल्ड रिकॉर्ड देख कर वो काफी खुश नज़र आ रही थी, उसके चेहरे पर खुशी की मुस्कान भा रही थी। मुझे लगा शायद सच में मैंने कुछ अच्छा किया है, वो मेरे और कामयाब होने की दुआ मांग रही थी। आज कार्यक्रम में मैंने आमंत्रित किया था, उसको जरूर मैंने काफी कुछ सीख लिया था। वो इसलिए नहीं आई क्योंकि मैं फिर शायद ही बोल पाता, उसने ही मुझे ये सब लिखने में मदद किया था। हर जगह मैंने उसका नाम लिख दिया है, बहुत करीब से आज उसको देख लिया है। उसकी सुन्दरता की तुलना नहीं की जा सकती, क्योंकि हर सुंदर चीज़ की तुलना मैंने उससे किया है। मैं उसे ही मिलूँगा ये मुझे विश्वास है, इतना दूर होकर भी वो आज सबसे ज्यादा पास है। जैसे कलम के बिना लेखक का जो हाल है ऐसे ही पागल के बिना अर्पित सिर्फ ज़िंदा लाश।

15. आओ ना

तुमसे मिलना है मुझे मिलने आओ ना, अपनी बातों से मुझे खुश कर जाओ ना तुम्हारे लिए कुछ लिखा है उन्हें पढ़कर सुनाओ ना, जिस तरह कोई चाह न सके वैसे चाहो ना अगर कोई बात दिल में हो तुम्हारे तो मुझे बताओ ना, ज़िंदगी कब ख़तम हो जाये थोड़ा पल मुझे दे जाओ ना हाँ तुम खुद को समझाओ ना, गलतियों को तुम भूल जाओ ना रात तो रात अब दिन भी तुम्हारे बारे में पूछता है, तुम खुद आकर अपना हाल बताओ ना मैं जानता हूँ काफी समझदार हो मुझसे, मुझे आकर कुछ भी समझाओ ना भविष्य में जो होगा अच्छा ही होगा, अभी के लिए मेरे बन जाओ ना सुना है भगवान को मानती हो तुम, मुझे भी उनसे एक बार मिलाओ ना, इंतजार तो मैं हरदम करूँगा तुम्हारा, तुम मेरे सब्र को खत्म कर जाओ ना मेरा विश्वास आँख बंद करके कर सकती हो, तुम मेरी ही हो इस का विश्वास कराओ ना दूर हैं हम दोनों एक दूसरे से बहुत, तुम दूरियों को पास में बदल जाओ ना इस अर्पित की पागल तुम बन जाओ ना, मेरी साँसे थमने से पहले तुम आओ ना।

16. लिखना है

मुझे उस पर एक किताब लिखना है, उसकी तरह सर्वगुण सम्पन्न मुझे भी दिखना है बहुत कुछ उससे मैंने सीखा है, उसके सामने पूरी कायनात का प्यार भी फीका है वो सबसे अलग नहीं पूरी दुनिया में सिर्फ एक है, मेरी सोच धार्मिक वाली उसके इरादे नेक है वो सरलता, स्वाभिमानी और ईमानदार है, उसके दिल में सिर्फ मेरे लिए ही प्यार है किलोमीटर में वो बहुत ज्यादा दूर है, उसका अर्पित सारी दुनिया में मशहूर है हम दोनों जैसे हैं वैसे पाए भी हैं, एक दूसरे के माता पिता को हम भाए भी हैं हर किसी को मंजूर है हमारा ये रिश्ता, वो मेरे लिए और मैं उसके लिए हूँ फरिश्ता पूरी ज़िंदगी एक दूसरे का इंतजार किया है, वफादारी का परिचय बार बार दिया है कहते हैं कि कुछ जोड़ियाँ भगवान बनाता है, वो जोड़ी अर्पित और मीरा की है ये हर कोई बताता है अपना ध्यान रखना तुम हमेशा, सबको खुश रखना मेरा यही है पेशा इंतजार करूँगा मैं तुम्हारे आने का, हर राह अपनाऊँगा मैं तुम्हे पाने का...

17. तू ही करेगा

जो तू सोच ले वो तू करेगा जो तू ठान ले वो तू करेगा अगर है तुझमें कुछ पाने तलब तो तू वही पाएगा छोटी छोटी बातों को तू ध्यान न दे अपने मंजिल को पार तू करेगा रास्ते में मुश्किलें न जाने कितनी है पर इन सबको पार तू करेगा प्रतीक्षा कर अपने परिणाम की अपनी ज़िंदगी को खुशी से तू भरेगा यूँ ही नहीं मिलती कामयाबी किसी को कुछ छोड़ना पड़ता है ज़िंदगी में इसीलिए जैसा तू करेगा वैसा ही भरेगा अगर कुछ गलत किया है तूने कभी तो देख लेना एक दिन बेमौत मरेगा कदम यूँ ही बढ़ाए चल एक दिन तू सबसे आगे निकलेगा सारी दुनिया तुझे सलाम करेगी जब तू सबसे आगे बढ़ेगा मत भूलना ऊपर वाला सब देख रहा है इसीलिए हमेशा जो भी करना सोचा समझ के करना माता पिता की इज्जत करना लोगों की दुआएँ लेना क्योंकि आने वाले कल में सबको साथ लेकर तू चलेगा एक न एक दिन जरूर जो कोई नहीं कर सकता वो तू करेगा वो तू करेगा कमल किए जा जो होना है होगा अपनी ज़िंदगी को अर्पित सभी के संग जिएगा जैसा तू सोचेगा वही होगा जो तू चाहेगा वही होगा अगर नियत और रास्ता सही है तो जो तू चाहेगा वही होगा।

18. पिता

कड़ी धूप में जलते हुए भी परिवार को छाँव में रखते हैं, अपनी भूख को भूलकर परिवार का पेट भरते हैं खुद के सपनों को भुलाकर संतान के सपने बुनते हैं, बच्चों की गलतियाँ देखकर भी चेहरे पर मुस्कान चुनते हैं माँ ममता की गंगा होती, पिता हमारा साहस हैं, जीवन में चाहे जो हो लेकिन सिर्फ पिता से ही राहत है ईश्वर का दूसरा रूप माता पिता को कहते हैं, हम तो सारे जीवन माता पिता के छाँव में रहते हैं कभी भी चेहरे पर दुख नहीं लाते हैं, हमेशा साथ बैठकर हँसते और मुस्कुराते हैं पिता की मेहनत और संघर्ष का करना तुम आदर, उनके चरणों में दंडवत प्रणाम करना सादर बच्चे सुखी रहें इसीलिए पिता घर से दूर जाकर नौकरी करते हैं, हर रोज न जाने कितने लोग, लोगों की बातों से लड़ते हैं तब जाकर कहीं वो हमारी हर ख्वाइश पूरी करते हैं।

19. ज़िंदगी

ज़िंदगी के बारे में कोई जानता है क्या, हमें इंसान कोई मानता है क्या जन्म के बाद जो नाम रखा, उस नाम को कोई पहचानता है क्या बचपन से लेकर बुढ़ापे तक तू जीता है क्यों, जब तू सच नहीं बोलता तो बोलता है क्यों पूरा समय मोह माया में बिता दिया, अब तू धर्म की बात करता है क्यों ख्वाइशों का अंत कभी होता ही नहीं, जरूरत पड़ने पर कोई साथ होता ही नहीं सब कुछ हासिल हो सकता है लेकिन, तू खुद के बुद्धि के भरोसे रहता ही नहीं कभी तो तुझे ये सब समझना ही पड़ेगा, तभी तू इस दुनिया में सबसे आगे बढ़ेगा परेशानियों को ध्यान ही न देना, वरना हर रोज तू खुद से ही लड़ेगा कुछ चीज़ समझ में क्यों नहीं आती, सुकून भरी ज़िंदगी किसी को क्यों नहीं भाती सब करना बहुत ही आसान है तुम्हारे लिए, ये समझदारी तुम्हारे मन में क्यों नहीं आती एक ही जीवन मिला है नया इतिहास लिखना है, तुम्हें सबसे ज्यादा सर्वगुण सम्पन्न बनना है जो समय मिला है उसे गँवाना नहीं तुम, अद्वितीय काम सिर्फ तुम्हें ही करना है माता पिता और सभी को खुश रखना तुम, अपने कर्मों से सबसे बेहतरीन दिखना तुम कभी मिले मौका अगर तुम्हे तो, अपना सब कुछ अर्पित करना तुम।

20. चिंता

ये जो मन में चिंता है क्यों कर रहे हो ऐसा, सब सही हो जाएगा छोड़ दो जो है जैसा जल्दबाजी में कुछ भी ठीक नहीं होता, जैसे तुम पहले थे फिर से हो जाओ वैसा उस मौज मस्ती को फिर से जीते क्यों नहीं तुम, थोड़ा सब्र का घूँट पीते क्यों नहीं तुम अभी खामोशी है चारों तरफ तुम्हारे, भविष्य में होने वाले शोर को सुनते नहीं तुम ऐसा लगता है कुछ भी अब बचेगा नहीं, जिस तरह पहले सजा था अब वैसा सजेगा नहीं इस मोह माया से थोड़ा बचो तुम, वरना ये मन का डर कभी हटेगा नहीं दूसरों की कामयाबी देख कर खुद की तुलना न करना, किसी से कुछ सीखने के लिए उसके पीछे न पड़ना उन्हें छोटी कामयाबी पर खुश होने दो, चाहे जो हो जाए तुम अपना रास्ता न बदलना सुनना ही छोड़ दो किसी और की बातों को, याद रखना जरूरत पड़ने पर बढ़ाए हुए हाथों को कुछ बड़ा, कुछ नया तुम्हें ही करना है, भूल जाओ ज़िंदगी के बुरे हालातों को एक दिन जरूर तुम्हारा दौर आएगा ही आएगा, हर इंसान तुम्हारा नाम गुनगुनाएगा ही गुनगुनाएगा खुद पर विश्वास हमेशा रखना तुम, अर्पित पूरी दुनिया में छाएगा ही छाएगा।