हिंदी कवितायें : दाहिर आज़मगढ़ी
Hindi Kavitayen : Dahir Aazamgarhi
1. मैं बाप हूँ
मैं बाप हूँ मैं युगों से हूँ तिरस्कृत और शापित आधुनिक आगामी पीढ़ी के लिए अभिशाप हूँ मैं बाप हूँ बसुदेव हूँ निस्तब्ध काली रात्रि का चीरता मैं लहर को आकंठ जल में पुत्र रक्षा प्राण पण पर खेलता विरह का तप पुत्र हित के लिए मैं निस्ताप हूँ मैं बाप हूँ मैं वो दशरथ हूँ जो अपने राम के वन गमन के कष्ट के अनुमान से गिर पड़ा पीड़ा से तिल तिल कर मरा मैं अकेला ही युगों से नियति का सन्ताप हूँ मैं बाप हूँ फीस की चिंता निवाले की तो क्या जो न कर पाया कोई वह मैं करूँगा जो उठा दे पुत्र को आकाश तक मैं चिरन्तन से मनस का ही अकेला ताप हूँ मैं बाप हूँ माँ नहीं हूँ मैं जो रो लूँ जी भरकर है सभी तो भार मेरे काँधे पर भाई बहनों और बच्चों का सहारा मैं विधाता की नियति से बंध गया परिमाप हूँ मैं बाप हूँ मेरी झुकती पीठ पर था भार लेकिन मैं हूँ जिसने भावना इच्छाओं को रोज कुचला किन्तु खुश होकर बस पुलक इप्सित रही इस बात का ही पाप हूँ मैं बाप हूँ मैं बना अग्रज हूँ अनुजा अनुज का में नहीं रोया पा जीवन मनुज का मैं निवाला बाँट भूखे पेट का वार उल्टा ही रहा करता मैं ऐसा चाप हूँ मैं बाप हूँ मैं वो जड़ हूँ जो कभी ना रुग्ण हो क्योंकि मेरे तन बंधी कुछ जिंदगी तीन तापों सु:ख दु:ख से मैं परे दर्द पीता मुस्कुराता मैं तो अपने आप हूँ मैं बाप हूँ मैं पसीने संग अपना रक्त गूँधा मैं सुबह को शाम करता बनके गूँगा चोट लग जाए तो सुनता माँ रे माँ चोट जो छूकर गुजर जाए तो बाप रे बाप हूँ मैं बाप हूँ
2. विरह की वेदना
अंधेरी सूनी रातों में पपीहा बोलता है विरह की वेदना के द्वार कोई खोलता है पखेरू नीड़ में थक चैन की जब नींद सोता है मेरा मन अर्ध निद्रा में किसी को खोजता है मेरे अंदर अंधेरा धीरे धीरे डोलता है – विरह की वेदना मेरी आँखों में सपनों की सभी छायायें तिरती हैं मेरे घर की हवाओं में घुली खुशबू सी मिलती है क्षणिक आवेग फिर से भग्न भ्रम को जोड़ता है —विरह की वेदना कभी ना खत्म होती बातों के जो सिलसिले थे जो तबसे अनवरत था जिंदगी में हम मिले थे विधाता क्यों बंधे तारों को सहसा तोड़ता है —विरह की वेदना
3. छब्बीस जनवरी क्यों आती है
छब्बीस जनवरी क्यों आती है हर बार हमें अपमानों के जब कड़वे घूँट पिलाती है छब्बीस जनवरी क्यों आती है लहराता था जिसका साम्राज्य फारस से लेकर कम्बुज तक जिसकी गरिमा जिसकी संस्कृति फैली धरती से अम्बुद तक था गुप्त काल का स्वर्णिम युग सोने की चिड़िया कहते थे उस काल यही अंग्रेज म्लेच्छ जानवर सरीखे रहते थे भारत के उस देदीप्यमान इतिहास पर हास कराती है छब्बीस जनवरी क्यों आती है गूंजता जहां आकाश वेद मंत्रों की अमर ऋचाओं से बसुधैव कुटुम्बम का नारा देता पूरी शुचिताओं से फिर हम टूटे निज स्वार्थ लिपट टुकड़े टुकड़े भारत तोड़ा हमने ही अपनी संस्कृति में परदेशी संस्कृति को जोड़ा जब हृदय भेद हर वर्ष हमें लज्जा का पाठ पढ़ाती है छब्बीस जनवरी क्यों आती है अब भी है समय बहुत बाकी कहता है सावधान हो जा फिर जगा विश्व में नया राग चिर संस्कृति का वितान हो जा कुछ लोग लगे हैं अब फिर से अपनी अस्मिता मिटाने को उठ जाग अभी लग जा अपना खोया हुआ गौरव पाने को हर वर्ष आत्मा मरती है मर मर कर हमें जगाती है छब्बीस जनवरी क्यों आती है यह सच है राजनीति ने जन को निपट निकृष्ट बनाया है रच संविधान एक पर्व बना हमको सच से भरमाया है ताकि यह सनद रहे हमने यह देश आजाद कराया है अपने हित साधन मात्र हेतु जन जन को मूर्ख बनाया है अभियान चला व सवाल उठा यह बार बार क्यों आती है छब्बीस जनवरी क्यों आती है
4. बचपन ने रोया
बचपन ने रोया मुनिया की शादी पर शाश्वत ने झाँका तिर आए पानी को नियति ने सोख लिया बापू की खाँसी फटी हुई धौकनी लुहार की धँसी हुई आँखों के खोखे में आँधी में, पानी में दावानल बड़वानल, हिला रहे अन्तस्थल दूर कहीं तौल रहे बिन बाट
5. अश्रु नि:सृत विष्णु के
अश्रु नि:सृत विष्णु के सरयू प्रवाहित फिर कहाँ जन्म फिर कहाँ युद्ध स्वप्न विप्लव स्खलित हो मिल रहा निशि हो दिवा विधि की विधा में हाड़ का पुतला करेगा क्या सिमट कर डूबना आवर्त में ही जब नियति है और अंतिम संश्लेषण हो लघुत्तम का महत्तम में
6. मैं भारतीय हूँ (व्यंग्य)
मैं भारतीय हूँ क्योंकि मैं स्वतंत्र भारतीय हूँ मेरे अपने विचार हैं कम नहीं हूँ मैं मेरे वैसे ही आचार हैं नित नये वेद गढ़ता हूँ उपनिषदों से खेलता हूँ विचारशीलता में कर्तव्यहीनता में मैं अपनी पीठ में खुद छुरा भोंकता हूँ अपना पैर खुद अपने हाथों से काटता हूँ उपदेश देता हूँ भविष्य का बनता हूँ समिधा हविष्य का आक्रांता को आमंत्रित करता हूँ अपने ही धर्म की निंदा करता हूँ अपने हित के लिए देश, संस्कृति, धर्म, कर के नेपथ्य में आलुप्त हूँ निज कर्म बड़ी चालाकी से ज्ञानदायी बात मैं जिसकी करता हूँ उसी नैतिकता और समाज को ताक पर रखता हूँ इतिहास देख रहा है मैंने कई बार सिद्ध किया है भारत माँ की छाती को बार बार विद्ध किया हूँ सच मैं आदतन ग़ुलाम हूँ, आदर्श बताता सरे आम हूँ मैं वह सिपाही हूँ जिसने युद्ध तो जीता हूँ, पर वास्तव में हारा हूँ अपने ही देश की आज़ादी के मतवालों को अपने ही हाथों मारा हूँ सबके अपने अपने हैं विचार, सब हैं स्वतंत्र इसी के लिए ही बना है देशघाती है लोकतंत्र और इसीलिए ही, मैं भारतीय हूँ । देखना और सोचना सचमुच मैं भारतीय हूँ
7. कुंडलियाँ ( हास्य, व्यंग्य )
भारत में है आ गई पटु कवियों की बाढ़ चाहे फागुन मास हो चाहे मास आषाढ़ चाहे मास अषाढ़ एक पर एक चँपे हैं कविता चली पराय कविगण अभी डटे हैं कह दाहिर मूर्खाय समझ कुछ अब नहीं आवत रोहिंग्या सी बाढ़ कौन खल छोड़े भारत उमड़ा यह सैलाब क्यों जाँच हुई भरपूर गहन परीक्षण से हुई शंका सबकी दूर शंका सबकी दूर पटक पीटी है वनिता झोला लिये उठाय करें मंचों पर कविता कहते ज्ञानी जनों हटाओ अब यह झगड़ा दीन हीन जन का सैलाब यहाँ पर उमड़ा गागर में बैठे हैं लेकिन सागर नाम कहाय कविता में मधुरस नहीं सरस वही कहलाय सरस वही कहलाय करुण झगड़ा ही करते झोला फटा फटी चप्पल पर रत्न हैं कहते कैसे करें संतोष एक से एक गुणागर बूदों से भरता कह पोथी भरते गागर कवियों में भी आ गया राजनीति का भाव दल बदलू हैं बन गये पल्टू राम प्रभाव पल्टू राम प्रभाव शब्द वैज्ञानिक लगता ट्रम्प नाथ चौबे की अब कोई नहीं सुनता दल को बदले फिर भी कुछ गुंजाइश दुखियों प्रभु न रक्षा करें सखी यदि बदलो कवियों कविता तीन प्रकार की गुणी करें पहचान कवि का वर्गीकरण भी होता उसी समान होता उसी समान तीसरा वह कवि न्यारा जो खुद समझे और समझ ले श्रोता सारा दोयम कवि जो कहता केवल वही समझता अव्वल दाहिर, दोनो नहीं समझते कविता एक बात का दावा करता दुर्गम है यह बाढ़ सदाबहारी पौध को कोई न सके उखाड़ कोई न सके उखाड़ हालाँकि जंग छिड़ी है ताल ठोंकते सभी युद्ध-भू रिक्त पड़ी है कविता हुई मजाक खड़ी है लाठी टेक मसि कागज ले गड़बड़ लिखता है हर एक
8. हे प्रिय प्रेम रंग से रङ्ग दूँ
हे प्रिय प्रेम रंग से रङ्ग दूँ नख शिख वासन्ती कर तुझको अङ्ग प्रत्यङ्ग सुवासित कर दूँ अधर गुलाब पङ्खुड़ियाँ कर के हो अलि हर्ष प्रश्वासित कर दूँ पद्म धरूँ नयनों के घट पर गाल गुलाल हुलासित कर दूँ रवि पुष्प कुच हरसिंगार कटि साङ्गोपाङ्ग अनुप्रासित कर दूँ लिपटाऊँ अहि व्याली जैसे आलिङ्गन उच्छ्वासित कर दूँ मृगनयनों के घट से लेकर मद तेरे अक्षि प्रवाहित कर दूँ फूलों की कलियों से निकला रम्य लावण्य समाहित कर दूँ पर्वत - सी उत्तुङ्ग चोटियों आभूषणों उद्भासित कर दूँ गज की चाल छीनकर तेरे पग का प्रवाह प्रभासित कर दूँ अधर तेरे अमृत घट जैसे जिह्वा प्रचण्ड पिपासित कर दूँ
9. संस्कृति
इस संश्लेषण की संस्कृति की धार को बनती हार ही देखा तेजाबी भाषण को आखिर परदा पीछे क्षार ही देखा नैतिकता चरित्र पर चलने वाले को शर्मसार ही देखा मख़मली राहें देने वालों को तो देते खार ही देखा पीठ पे वार करे जो मानुष ऐसे जग में यार ही देखा धन दौलत के पीछे भागे ऐसी सुंदर नार भी देखा नइया डोले बीच भँवर में टूट रही पतवार भी देखा ऊपर से नीचे तक एक ही रस डूबी सरकार ही देखा तेरे मेरे बीच पल रही अनबोली तकरार ही देखा तेरे सिद्धांतों की लय की रोज़ टूटती तार ही देखा तेरे वादों और नारों का छद्मभाव हर बार ही देखा देह, भावना और रूह का होता बलात्कार ही देखा अबला के मुख से जो निकले ऐसी करुण पुकार भी देखा लुटे आदमी को न लूटले ऐसा कभी कभार ही देखा मनुज सभ्यता के ही सृजन से चलता भ्रष्टाचार ही देखा राजनीति और धर्म तंत्र में जनश्रुति का बाज़ार ही देखा राजनीति में हर मानव को खुद बनते औज़ार ही देखा आत्मवंचना के प्रतिफल से देश को जाते गार ही देखा भाई को छोटी बातों पर कटने को तैयार ही देखा बेटा छोड़ चला उस पन में अभिभावक बेज़ार ही देखा देख लिये जाने कितनों की आँखों में जलधार ही देखा देखा जो देखा सो देखा पर ऐसा हर बार न देखा प्रकृति नियंता देख ले तू भी मैंने बारम्बार ही देखा
