हद-ए-अमल से आगे लिखूँगा : दाहिर आज़मगढ़ी
Had-e-Amal Se Aage Likhunga : Dahir Aazamgarhi
अपनी बात
इसमें कोई शक नहीं कि उर्दू भारत की ज़बान है । हम जब बोल रहे होते हैं तो पता नहीं चलता कि हम हिंदी बोल रहे हैं या उर्दू । जहाँ तक रस्मुलख़त का तआल्लुक़ है मैं समझता हूँ कि उर्दू लिखने के लिये इस्तेमाल होने वाली फ़ारसी रस्मुलख़त उसी खरोष्ठी रस्मुलख़त की एक ज़दीद और बाद की शक्ल है, जिसकी इब्तिदा हिंदुस्तान में हुई थी । अगर ज़बानों के तनव्वो के नुक़्ते नज़र से देखा जाय तो हिंदुस्तान दुनियाँ का वाहिद मुल्क है जहाँ सबसे ज़्यादा ज़बानें बोली जाती हैं । बुरी सियासत नें मुल्क को हर तरह से नुक़सान पहुँचाया है ।
ज़बानें भी इससे अछूती नहीं थीं, इस क़दर कि ज़बानों के हवाले से जितनी सियासत हिंदुस्तान में हुई या हो रही है, दुनियाँ के किसी और मुल्क में नहीं हुई ।
इज़हारे राय की आज़ादी अच्छी बात है लेकिन इसकी आड़ में ग़ैर अख़लाक़ी हरकतें किया जाना ग़लत है । आज हम देखते हैं कि सियासत की वजह लोगों नें हमारे अज़ीम तरीन इंसानों को तक़्सीम किया, ज़बानें तक़्सीम कीं और तो और ख़ुदा के बनाये हुये रंगों को भी तक़्सीम किया । सियासतदाँ मुल्क के किसी भी हिस्से से हो, उसकी मादरी ज़बान कोई भी हो लेकिन जब कोई सियासी जुनूनी तक़रीर करता है तो उर्दू का इस्तेमाल करता है । यह बहुत ही ग़लत है । यह एक बदक़िस्मती बन गयी है, जिसको लेकर हमें आगाह होने की ज़रूरत है । मेरा एक शेर इस हवाले से है –
क्यूँ किया ग़ज़्ल की भाषा को नफ़रत की जबाँ
इसको रुसवा न कर ओ ख़ुद को आज़ार न कर
ज़बान की ताकत की अगर बात की जाय तो हिंदी की तरह देश की वाहिद ज़बान उर्दू है जो जज़्बात के इब्लाग़ की यकसाँ ताक़त रखती है और हर तरह की सलाहियत रखती है । हिंदी की तरह इसमें भी अदब की तमाम ख़ूबियाँ पैदा करने की सलाहियत है । ख़ास तौर पर शायरी में सन’अत वग़ैरह के तख़लीक़ की सलाहियत है । शृंगार, वीर वग़ैरह को उर्दू में सौती तौर पर ज़ाहिर किया जा सकता है ।
दूसरी ज़बानें संस्कृत, हिंदी और अंग्रेजी मेरे मुताले की ज़बानें रही हैं लेकिन उर्दू से मेरा बेपनाह लगाव रहा है । इसी लिये मेरी यह किताब आप सभी के सामने है ।
मग़रबी माहरीन लिसानियात की आलमी ज़बानों की दर्जाबंदी में फ़ारसी और अरबी को अफ्रो-एशियाटिक ज़बानों के तौर पर दर्जाबंद किया गया है जो कि ग़लत है । मेरा मानना है कि अरबी और फ़ारसी या तो भारत में पैदा हुई ज़बानें हैं या हिंदुस्तानी ज़बानों से ही निकली हुई दूसरे मुमालिक की ज़बानें हैं । हिंदुस्तानी ज़बानों के अल्फ़ाज़ अरबी और फ़ारसी के साथ दुनियाँ की किसी भी ज़बान से ज़्यादा मुमासलत रखते हैं ।
मुझे इस बात का भी काफी अफ़सोस है कि इसकी जानिब उतनी सब्त कोशिश नहीं की गयी । जहाँ हमने संस्कृत से पालि, प्राकृत, और तमाम शुमाली हिंद की जबानों की पैदाइश पर तहक़ीक़ किया उतनी उर्दू, फ़ारसी और अरबी पर नहीं किया । जबकि मेरे मुताले के मुताबिक क़दीम ज़माने में भारत और अरब के बीच राब्ते थे जो तिजारत ही नहीं एक दूसरे के साथ ता’ऊन का भी रिश्ता था और संस्कृत और अरबी मे काफी मुसावात है । इसी तरह संस्कृत ज़बान से ही अवेस्तन ज़बान आयी जो बाद में पहलवी तथा मौज़ूदा फ़ारसी ज़बान बनी । इसकी वुस’अत तुर्की तक है ।
उम्मीद है कि मेरी तरफ़ से दी गयी ग़ज़ल और नज़्म आप सभी को पसंद आयेगी ।
“दाहिर आज़मगढ़ी”
मो० 9415084488, 9335012670
तक़रीज़
आज़मगढ़ की ज़मीन का शुमार इल्म और अदब के नज़रिये से इंतेहाई हासिलख़ेज़ ज़मीन के तौर पर होता है । इस ज़मीन को ज़िले की नामचीन हस्तियों ने अपनी तख़लीक़ से सींचा है । जिसमें राहुल सांकृत्यायन, अल्लामा शिब्ली नोमानी, अयोध्या सिंह उपाध्याय हरिऔध, कैफ़ी आज़मी, श्याम नारायण पांडेय, विश्वनाथ लाल “शैदा” का नाम अदबी तवारीख़ की किताब के पहले सफ़े पर लिखा मिलता है । आज भी बहुत सारे अदीब इल्मो अदब की रियाज़त में में लगे हुये हैं । इन्हीं में से एक नाम है दिनेश श्रीवास्तव “दाहिर” । जिस ज़बान की तालीम हासिल न हो, उस ज़बान में शायरी करना मुश्किल और पुरज़हमत अमल है । दाहिर की उर्दू से मुहब्बत का आलम यह है कि ज़बान के मामले में उन्हें अंग्रेज़ी और संस्कृत की तालीम हासिल हुई, लेकिन बचपन से ही उनका लगाव उर्दू और फ़ारसी से था और घर पर ही उन्होंने उर्दू की शुरुआती तालीम हासिल की ।
एक अर्से से शायरी की दुनियाँ में एक तबदीली आयी और हिंदी ग़ज़लों का दौर शुरू हुआ । अकबर इलाहाबादी साहब अपने शेर में फरमाते हैं :-
रक़ीबों ने रपट लिखाई है जा जाके थाने में,
कि अकबर नाम लेता है ख़ुदा का इस ज़माने में ।
कुछ ऐसा ही इस दौर में पुराने रवायती अंदाज़ में उर्दू में लिखने की शुजाअत करना अपने आप में एक बड़ी कोशिश और दीग़र नज़रिये से हिमाक़त है, फिर भी दाहिर ने कोशिश की है और पूरी तरह से हौसलाअफ़ज़ाई के काबिल हैं ।
किसी भी इंसान के अंदर उसके फ़न और फ़िक्र और ज़िंदगी के हासिल तजरबात उसके ज़ेहन के अंदर तहलील हो जाते हैं और धीरे धीरे उनकी तश्कील अमल में आती है । शायर के अंदर कहने की शिद्दत है और ये कहने में अपनी हदें पार कर जाने का जज़्बा रखते हैं । इनकी शायरी मे साफ़गोई है जो इनकी शायरी में पूरी तरह से जल्वा अफ़रोज़ होती है । बेबाकी का आलम यह है कि ये ऐसी बातें लिखने से भी गुरेज़ नहीं करते जिससे आम तौर पर बहुत सारे लोग इत्तिफ़ाक़ न रखते हों-
क्यों बना फिरता है तैमूर ओ नादिर की नस्ल
तेरी मौलिद है तू इसको शरमशार न कर
और
इक शहंशाह ने सदियों से शर्मिंदा किया
बाज आ फिर से मुसावी कोई तैयार न कर
इनकी शायरी फ़लसफ़ा से लबरेज़ है वो चाहे आम आदमी ज़िंदगी का मामला हो या दुनियावी मसाइल हों-
तेरे मंतिक हमेशा आदतन इल्ज़ाम चुनते हैं
गुमाँ न कर ऐ ज़िंदगी कि हम इलहाम रखते हैं
और
बिखरे मेरे हैं लफ़्ज़ चारसू नफ़ासत से
मैं उन्हें खोज रहा ज़ह्न में सलासत से
इनकी शायरी में इश्क़ है, ईसार है, वफ़ा है, तंज़ है, शिकवा है, अख़्लाक़मंदी, समाज की बेज़ाब्तगी और तज़ाद भी है । आशिक़ी पर बहुत ज्यादा तो नहीं कहा है लेकिन जो कहा है वह सभी ग़मगीन करने वाली सानेहा है । इनके लिये वतन सबसे बड़ा है और अमन इनका मरकज़ है । कलाम में उर्दू शायरी की रवायत उरूज़ो बहर का खास खयाल रखा गया है । ग़ज़लों में असरे- हाज़िर के मसाइल के साथ साथ मुआशिरती ना हमवारी और बे इंसाफी को लेकर पुरजोर जद्दोजहद भी मिलता है ।
इनकी ग़ज़लों में नासेहाना अशआर भी हैं जो बड़े मंतक़ी अंदाज़ में लोगों को मानने पर मजबूर करते हैं । इनके अशआर मुआशरे के लिये पैग़ाम पेश करते हैं । मैं दिनेश श्रीवास्तव “दाहिर” को मुबारकबाद और नेक ख़्वाहिसात पेश करता हूँ और उम्मीद करता हूँ कि उनके इस मजमुए “ हद-ए-अमल से आगे लिखूँगा” को उर्दू ज़बान के अदीबों में ही नहीं बल्कि आवाम में भी पज़ीराई हासिल हो ।
डा० शम्स तबरेज़
एम०.ए०. पी.एच.डी
1. तख़लीक़ी सलाहियत से मेरी दुश्मनी न कर
तख़लीक़ी सलाहियत1 से मेरी दुश्मनी न कर, मैं हद्दे-अमल2 से आगे लिखूँगा यह ज़िद ही है ज़माने फ़र्ज़ पर रुसवा3 न कर, मैं रद्दे अमल4 पर बातें लिखूँगा तेरी ख़लवत वो जलवत5 की हक़ीक़त मावरा6, अमानो अम्न के नाते लिखूँगा बिना सुनकर मेरी बातों को समझने वालों सुनलो, तेरी बेदादी7 के नुक़्ते8 लिखूंगा बिना खुद देखे नाबीना9 की मदद का दम मत भर, मैं बारहा बीना10 वफातें11 लिखूँगा 1-तख़लीक़ी सलाहियत=रचनात्मकता, 2- हद्दे-अमल= कार्यक्षेत्र की सीमा, 3- रुसवा= बदनाम, 4-रद्दे-अमल= प्रतिक्रिया, 5- खलवत ओ जलवत=अंदर और बाहर, 6- मावरा=परोक्ष, 7- बेदादी=अन्यायपूर्णता ,8- नुक़्ते= टिप्पणी, 9- नाबीना=अंधा,10- बीना=आँख वाला, 11-वफातें=मौतें
2. कुछ तवारीख़ की सुन ख़ुद पे इसरार न कर
कुछ तवारीख़ की सुन ख़ुद पे इसरार1 न कर भागते वक़्त को तुम कुहना अदवार2 न कर तेरे असलाफ़3 ने अर्ज़ा4 को ख़ूँ रेज़5 किया अपनी उम्मत6 को अभी और गुनहगार न कर क्यों बना फिरता है तैमूर ओ नादिर की नस्ल तेरी मौलिद 7 है तू इसको शरमसार न कर ख़ाक में मिल गये हिंदुस्ताँ के बार8 अदू9 ज़ेह्न में बहते हुये ख़ूँ से तू वार न कर जो थे महरूम दरोदर10 से आये रहने ऐसे बेदर11 के सबब कोई भी तकरार न कर इक शहंशाह ने सदियों से शर्मिंदा किया बाज आ फिर से मुसावी12 कोई अफ़्कार13 न कर क्यूँ किया ग़ज़्ल की भाषा को नफ़रत की जबाँ इसको रुसवा न कर ओ ख़ुद को आज़ार14 न कर 1-इसरार=हठ, जिद, 2- कुहना अदवार= पुराना दौर (कबीलाई दौर), 3- असलाफ़=पूर्वजों, 4-अर्ज़ा=ज़मीनों, 5- ख़ूँरेज़=खून से लथपथ, 6- उम्मत=समुदाय, 7- मौलिद=जन्मभूमि, 8- बार=कष्टदायक, 9- अदू=दुश्मन, 10- दरोदर=आवास, 11- बेदर= मकान हीन, 12-मुसावी= मुसावी=एक सा, तुल्य, 13- अफ़्कार=विचार 14- आज़ार= दुख देना, जंजाल
3. मेरे मोहसिन मेरी रानाइयों से कुफ़्र न कर
मेरे मोहसिन1 मेरी रानाइयों2 से कुफ़्र3 न कर चादरे इज़्ज़तो नामूस4 को आज़ार5 न कर ना मुझे कलमा पढ़ा ना मेरी बपतिस्मा कर मैं तो एक इंसाँ हूँ अब और गुनहगार न कर तू तो इक आदमी है आदमी का क्या कहना तू कोई और नहीं है तू ऐतराज न कर मेरे ही दुश्मनों को मुझपे ऐतमाद6 रहा तू तो इक दोस्त है तू मुझपे ऐतबार न कर ख़ाक भी उससे किया हमने जलाया जो दिया ख़ुद की नज़रों में तू अपने को शरमशार न कर चाह दाहिर तेरी करके यहाँ मम्नून7 बहुत तू निहाँ8 ख़ाहिशों को और तलबगार न कर 1-मोहसिन=अभिभावक (यहाँ पुरुष से अभिप्रेत है) 2- रानाइयों= लावण्यताओं, 3-कुफ़्र=नास्तिकता 4- चादरे इज़्ज़तो नामूस=इज्जतरूपी चादर, 5- आज़ार=दुख देना, दुखी, 6- ऐतमाद=भरोसा, 7- मम्नून=आभारी, शुक्रगुज़ार, 8- निहाँ=छिपी हुई
4. मेरा अज़ीज़ मुहब्बत जताना चाहता है
मिरा अज़ीज़1 मुहब्बत जताना चाहता है ज़लाल2 अपना मुझे अब दिखाना चाहता है निसार3 ख़ुशियाँ दिया सारी जिसकी चाहत पर वो मुझको अपनी शरायत4 पे रखना चाहता है है मा’नी फ़र्ज़ का तहलील5 ऐसे ज़हनों में दलील दे के रवायत6 बदलना चाहता है सिखाया मा’नी जिसे इख्तियार7 का हमने वही हक़ूक़8 को ताक़त बताना चाहता है मदद-करम से जो ‘दाहिर’ तिरे हुआ आबाद मुबादले9 में वो तौहीन10 देना चाहता है 1-अज़ीज़=प्रिय,2-ज़लाल=प्रताप,3-निसार=कुर्बान, 4-शरायत=शर्तों, 5-तहलील=विलीन,6-रवायत=परम्परा, 7-इख्तियार=अधिकार, 8-हक़ूक़=अधिकारों, 9-मुबादला= आदान-प्रदान,10- तौहीन=अपमान
5. लगी है होड़ अपनों में हमारा नाम क्या होगा
लगी है होड़ अपनों में हमारा नाम क्या होगा जहाँ हैं दोस्त साहूकार मेरा दाम क्या होगा इसी ही बेवफ़ाई से तुम्हारा जह्न है बोझिल सभी के जाम ताबिंदा1 तुम्हारा जाम क्या होगा तेरी पेशानी2 पे शबनम3 तेरी सूरत है अफ़सुर्दा4 बसर महरूम5 महवे यास6 घर में बाम7 क्या होगा सदारत में कभी जिनकी भले ही काम होते थे उमर गुजरी सहर गुज़री हुई अब शाम क्या होगा थे जितने हम सफर “दाहिर” वही बन बैठे बेगाना खुदा की अंजुमन8 में फिर हमारा काम क्या होगा 1-ताबिंदा=चमकदार, नूरानी, 2-पेशानी= माथा, 3-शबनम=ओस(पसीना) 4-अफ़सुर्दा=उदास, बुझी हुई, 5-बसर महरूम= जीवन निर्वाह से हीन 6-महवे यास=ग़म में डूबा हुआ, 7-बाम=परकोटा 8-अंजुमन=महफिल
6. तर्ज़े अंदाज़ ही दिलकश शरीर होते हैं
तर्ज़े अंदाज़1 ही दिलकश2 शरीर3 होते हैं रहनुमा अब के बहुत कम नज़ीर4 होते हैं दूर बिस्यार5 से आती ख़बर सियासत की अब तो हर घर में सियासत के पीर होते हैं ज़िंदगी सबको ख़ुदा ने अता किया है मगर हद ए अमल से आगे लिखूँगा दाहिर आज़मगढ़ी भाई भाई में भी मुफ़लिस6 हक़ीर7 होते हैं सभी इन्सान हैं हालात से थके शायद फिर भी कुछ लोग हैं जो बा-ज़मीर8 होते हैं आलिमुल फ़लसफ़ा9 के हैं यहाँ सभी “दाहिर” बड़ी मुश्किल से ही पैदा कबीर होते हैं 1-तर्ज़े अंदाज़=तौर तरीके की शैली, 2-दिलकश= सम्मोहित करने वाले, 3- शरीर=दंगाई, फसादी, 4-नज़ीर=उदाहरण, 5-बिस्यार=बहुत, 6- मुफ़लिस= गरीब, 7- हक़ीर= छोटा ,तुच्छ,8- बा-ज़मीर=अंतरात्मा की आवाज़ सुनने वाला,9- आलिमुल फ़लसफ़ा= दर्शन शास्त्र के बहुत बड़े विद्वान
7. मुख़ालफ़त से जो आग़ाज़े-रोज़े-बद होगा
मुख़ालफ़त1 से जो आग़ाज़े-रोज़े-बद2 होगा अभी नहीं तो कभी ज़ुल्म भी बा-हद3 होगा तू पुरशिकोह4 जहाँ का हिदफ़5 तो करके चल कभी तो जद्दो जहद6 भी तेरा अबद7 होगा दिलों को क़ब्र बनाकर ज़मीर9 दफ़्न ना कर अगर जो उठ तो यहाँ आसमाँ बसद10 होगा तू अपनी अर्ज़ ओ तमद्दुन11, वतन का क़र्ज़ाई तिरी ज़मीं तू मददगार अहले हद12 होगा जला चिराग़ फ़रोज़ाँ13 बना उफ़क़14 ‘दाहिर’ शुरू’ कर जहाँ सारा इरम15 ला-हद16 होगा 1-मुख़ालफ़त=विरोध. 2-आग़ाज़े-रोज़े-बद= बुरे दिनों की शुरुआत, 3- बा-हद=सीमा के अंदर, 4-पुरशिकोह=वैभवशाली, 5- हिदफ़=लक्ष्य, 6- जद्दोजहद=पराक्रम और प्यास, 7- अबद=अमर, 8-लहद=कब्र के गड्ढे की खाली जगह, 9- ज़मीर= अंतरात्मा की आवाज, 10- बसद=विस्तृत, 11- अर्ज़ो तमद्दुन=धरती और संस्कृति,12- अहले हद= सीमा तक, 13- फ़रोज़ाँ=प्रकाशमान, 14-उफ़क़= क्षितिज, 15- इरम=स्वर्ग, 16- ला-हद=असीमित
8. कभी चटान से लड़ने को खड़ा रहता था
कभी चटान से लड़ने को था खड़ा रहता दरख्त1 बनके भी तूफ़ाँ में था अड़ा रहता जिसे अज़ीज रहीं खुशियाँ अपने बच्चों की अलील2 हो के भी सहरा3 में था पड़ा रहता शबा4 थी वक़्त की औलादों ने दिखाया जिसे अबा5 वही है मगर अब झुका झुका सा है ये वक़्त का है असर या कि क़हर कुदरत का वो शख्स नौहाँ कना6 है थका थका सा है निकल के घर से जो सपनों का साख़ता7 था महल खड़ा हुआ जो कभी देखता है अपना मकाँ बड़ी अमल से नुमायाँ किये कुहन8 अरमाँ मजीद9 वलवला10 मौजूद आसरा दरमाँ11 बही थी मौजे तबद्दुल12 में हौले हौले से उदास, आह पुरानी रवायतों13 की नज़्म परीदा14 पर जो उमीदों के जेरसाया हुए रहे सदाकतों15 की गफ़ लतों के बनते बज़्म16 ये कैसा खेल इलाही तिरी निज़ामत17 में निगाह खुद भी नज़ारे का ताब ला न सके मिरी ये तक़्ती18 है इल्मो अदब19 पे आमादा कि फ़र्क़ नस्ल ए अदीबी20 में खाब ला न सके 1-दरख्त=बृक्ष, 2- अलील=बीमार, 3- सहरा= रेगिस्तान, 4-शबा= हमला 5-अबा=एक प्रकार का वस्त्र, 6-, नौहाँ कना=विलाप करता हुआ, 7- साख़ता=बनाया हुआ, 8-कुहन= पुराना, 9- मजीद=बढ़ा हुआ, विस्तृत, 10- वलवला=उत्साह, 11-दरमाँ=दवा इलाज, 12- तबद्दुल= परिवर्तन, 13-रवायत=परम्परा, 14- परीदा=उड़े हुये, 15- सदाकतों= सच्चाई, सत्यता, 16-बज़्म=सभा, गोष्ठी, महफिल, 17- निज़ामत=संचालन,व्यवस्था, 18- तक़्ती=शब्द संयोजन, दृष्टि, 19- इल्म ओ अदब= ज्ञान और साहित्य, 20-अदीबी=साहित्य या साहित्यकार, (यहाँ तात्पर्य मानव से है)
9. थी हिचक शुआ ए नज़र रही
थी हिचक शुआ ए नज़र1 रही इन्हीं हरकतों ने अयाँ2 किया ये नए चलन की है दुश्मनी तेरी दोस्ती ने बयाँ किया थे कदम तुम्हारे ही हम कदम था ख़रोश3 तेरी निगाह में यही ठिठ कनें तेरी चाल की तेरी साज़िशों का निशाँ किया मिरी राह में कई ख़ार थे जहाँ कुछ थे अपने ही नस्ब4 के अभी ठोकरों से बचा था मैं तेरी रहमतों ने ज़माँ5 किया तू हो ख़ैर ख्वाह भी अस्ल में ऐलानियाँ तिरी हों भली तिरी मातहत के तुफ़ैल6 ने तिरी हुर्मतें7 बे-अमाँ8 किया तिरे शह्र का तो चलन है दाहिर खास थोड़ा जुदा जुदा हैं सभी गिरोह अलग अलग है हक़ीक़ी मसला फनाँ किया 1-शुआए नज़र=आँखों की रश्मियाँ, 2-अयाँ=प्रकट, जाहिर करना, 3- खरोश=जोश, 4-नसब=वंश, 5-ज़मा=जुर्माना, दंड, 6- तुफ़ैल=कारण,जरिया, हस्तक्षेप, 7- हुरमतें=इज्जत, 8- बे-अमाँ=असुरक्षित
10. ये मश्के-सितम, बशरत का अलम
ये मश्के-सितम,1 बशरत2 का अलम3 अब रोक यहीं, अब रोक यहीं बद रहनुमा ए आलम4 ही बता यह वहशी जंग किया क्यूँ अता इस सुलग रही धरती का अमल करने की क्यों की तल्ख़5 ख़ता हर सू है अदम,6 हर सू है अदम अब रोक यहीं, अब रोक यहीं मासूम निसा7 जिस्मों से लिपट ये मुहीब शरारे8 पूछते हैं माँ के बेहिस जिस्मों से चिपट उफ़तादा9 बिचारे पूछते हैं खाली है शिकम,10 खाली है शिकम अब रोक यहीं, अब रोक यहीं आती ज़िंद11 शै से है रोशनी मकसद तेरा अंधेरा है नफरत है तुझे गुलशन से है झूठा है जद्दोजहद तेरा इतना बेरहम, इतना बेरहम अब रोक यहीं, अब रोक यहीं तेरे नारा ए तक़बीर12 में इक आतिश वहशीपन की है आग़ाज़ तो तेरे सितम से है ये दास्ताँ बर्बरियत की है मत दे यूँ जखम , मत दे यूँ जखम अब रोक यहीं, अब रोक यहीं माता के शिकम से फाड़ मुझे थी कौन अदावत ये भी बता जो निस्फ़13 बनी वो ज़नीन14 भला उसकी तय की थी कौन खता रोता है हरम,15 रोता है हरम अब रोक यहीं, अब रोक यहीं वो कौन सा जज़्बा है तेरा हर वस्ल16 जो खूँ से होता है पामाल17 हर इक नेमत18 से किया इंसान बिलख कर रोता है कर सिर्फ़ करम, कर सिर्फ़ करम अब रोक यहीं, अब रोक यहीं मत खेल सियासत की बाजी फ़र्सूदा19 फिजाँ हवा नौहाँ कना20 जिसके लिये तारी जंग किया किस ओर गई तेरी पाक सना21 यह है न अहम, यह है न अहम अब रोक यहीं, अब रोक यहीं झुलसे हुये गुलशन वीराँ में ये चीखें मर्सिया22 लगती हैं घायल खामोश अलहदगी में गुल आदमियत ही सिसकती है वाबस्ता वहम, वाबस्ता वहम अब रोक यहीं, अब रोक यहीं 1-मश्के-सितम=अत्याचार का अभ्यास, 2- बशरत= इंसानियत,3- अलम=दुख, 4- रहनुमा ए आलम= संसार को राह दिखाने वाला, 5- तल्ख़=कड़वा,कटु, 6- अदम=अभाव, हानि, 7-निसा=औरत, 8- मुहीब शरारे=खौफनाक आग की लपट, 9- उफ़तादा= गिरा पड़ा,दुखी,10-शिकम=पेट, 11- ज़िंद =जीवंत, 12- नारा ए तकबीर=अल्लाह बहुत बड़ा है का नारा, 13-निस्फ़=आधा, 14- जनीन=भ्रूण, 15- हरम=मक्का, मदीना का पवित्र क्षेत्र, 16- वस्ल=मेल, मिलन, 17- पामाल=वंचित, 18- नेमत=ईश्वर की कृपा, धन, सम्पत्ति, 19-फ़र्सूदा=दुखी, 20- नौहाँ कना=विलाप करती हुई, 21- सना=स्तुति, पूजा 22- मर्सिया= मृत्यु के समय का शोक गीत
11. हमेशा भूल जाता हूँ मैं
सवेरे रात ढलती है, खुमारी टूट जाती है मेरी दुशवारियाँ मुझको इशारे से बुलाती हैं हमेशा भूल जाता हूँ मैं मुकद्दर बंटने वाली हो कोई चाहत बुलाती हो तेरी रानाइयों1 को छू कोई आवाज़ आती हो हमेशा भूल जाता हूँ मैं तवक्को जिस तरफ जानी थी चारो ओर अंधेरा था सवेरे के लिए भटका मेरी किस्मत का फेरा था हमेशा भूल जाता हूँ मैं चिरागाँ ज़िन्दगी के जल रहे हों बुझने वाले हों वो लम्हे फिर तुम्हारे साथ के ना मिलने वाले हों हमेशा भूल जाता हूँ मैं वो जिद्दो जिहद थी चाहत थी पिंजरा ए फुसूँ2 तेरा था तुम्हारे साथ होने वाला वो आखिर बसेरा था हमेशा भूल जाता हूँ मैं मैं ही हूँ या कि ना हूँ या कि है कोई और मेरे में हकीकत हो बताना ,ना बुलाना पास आ जाना हमेशा भूल जाता हूँ मैं 1-रानाइयों= लावण्यताओं 2 -फुसूँ= जादू
12. तूने आईन बनाया था क्या वो ज़िंदा है
तूने आईन बनाया था क्या वो ज़िंदा है या कि पामाल1 के उनवान2 पे शरमिंदा है जो थे पशमांदा वो छूटे वहीँ मुस्तहकम3 खाता ही हक़ रहा उन्हीं में जो चुनिंदा है तेरी ही दावरी4 के फैसले ओ सिल्सिलोँ से तू भले हो न हो इंसाफ़ तो शर्मिंदा है नज़्मे5 आईन6 नफा को ही बनाया नेता शख़्स हर एक लिहाज़ा यहाँ बोरिंदा7 है सोचता था जो भला वो अभी नाकाबिल है कार बर आरी8 अभी अर्श9 पे रख्शंदा10 है इश्क़ आशिक़ से नही इश्क़ की तरकीबों से क़ाइदा खत्म मुहब्बत यहाँ रमिन्दा11 है सामने जँग करे है वो बहादुर दाहिर घेर कमजोर को मारे वही ही रिंदा12 है 1-पामाल=पददलित, 2- उनवान=शीर्षक, 3- मुसतहकम=स्थिर, 4- दावरी=अदालत, 5- नज़्म=व्यवस्था, 6- आईन=संविधान, 7- बोरिंदा= काटा हुआ, कटा हुआ, 8- कार बर आरी=तिकड़मी, 9- अर्श= आकाश, तख़्त, 10- रख़्शंदा=चमकने वाला, प्रकाशित 11- रमिन्दा=पलायन करने वाला, 12- रिंदा=जंगली जानवर जो चीर फाड़ कर खा जाता है
13. कोई कहता है किस्से को छलावा
कोई कहता है क़िस्से को छलावा तेरा तो तख़्त क़िस्सों से बना है हैं क़िस्सागो1 भी जितने उतने मस्ले वो उतने फ़िरकों , हिस्सों में बँटा है हैं वाजेहगोई2 के मंदूब3 सब ही सभी जिसको हैं मानें बादशा है तिरा क़िस्सा तिरा हिस्सा खूँ रंगा अमन से खेलना तेरा नशा है फसाने दर्ज़ जो मज हब किताबों है किस्सा ही नहीं तो क्या बला है है मेरी खूँ सनी रोटी सचाई तेरी तदबीर4 जिसका ज़लज़ला5 है सबब से बादशाही तख़्त के याँ नये तहक़ीक़े6 क़िस्सा में लगा है वो ‘दाहिर ’ है तिरे क़िस्सों से ऊपर तेरा कुनबा मिटाने में लगा है 1- क़िस्सागो=कहानीकार, 2- वाजेहगोई= स्पष्टवादिता, 3- मंदूब=प्रतिनिधि, 4- तदबीर= युक्ति, 5- ज़लज़ला=भूकम्प, 6-तहक़ीक़=छानबीन,
14. बड़ी तमीज़ से तक़लब का खेल जारी है
बड़ी तमीज़ से तक़लब1 का खेल जारी है मुखालफत में मिरे जलजला तलाश करो हदे कसक 2 को ख़ला3 करके जो अमल हो ग़र उसी मेँ इब्तिदा-ए-वलवला4 तलाश करो चले जहाँ से थे वो घर तुम्हें बुलाता है चले ही आने का कोई सिला तलाश करो उधार हिर्स-ओ-हिरासाँ5 तेरे ज़मीर पे है निजात पाने को फिर कर्बला तलाश करो बहुत ज़लील हुआ है मगर अब और नहीं अमानो-अम्न से मिल सिल सिला6 तलाश करो अकेले चलने का 'दाहिर' कोई सबब ही नहीं चलो कुछ ऐसे कि एक क़ाफ़िला तलाश करो 1-तक़लब=फरेब, 2- हदे-दरद=दर्द की सीमा, 3- ख़ला=खाली, खाली करना, 4- इब्तिदाए- वलवला=उत्साह का प्रारंभ, 5- हिर्स-ओ-हिरासाँ= लालच और भय, 6- सिला= परिणाम, पुरस्कार,
15. मेरी दुखती हुई रग पर कोई जब हाथ रखता है
मेरी दुखती हुई रग पर कोई जब हाथ रखता है कोई मासूम जब दो ही निवालों को तरसता है किसी उगती खिली रंगीं क़बा1 नौख़ेज़2 की ताबाँ3 नई रअनाइयों4 अहसास से जब खेल खेलता है बढ़ें जो हाथ मज़लूम5 ओ परीशाँ के सहारे को कोई उस हाथ को छू उंगलियों को खींच लेता है जो बचपन देख ना पाया हो अपनी उम्र आधी तक कोई जब उसको गुजरी रूठती यादें दिलाता है कोई बेटा सहारा छोड़ दे उस पन में जब मौला सहारा खींच लेता है नज़र भी फेर लेता है कोई मिस्कीन6 बिन पैसे नहीं तालीम पाता है कोई जब अश्क को पीकर नज़र से मुस्कुराता है तेरे आईन7 में तब क्या कोई नज़्मे-गुलिस्ताँ8 है अगरचे हो जो ‘दाहिर’ ताजिरे दिल9 को बता देना तेरे दैरो हरम10 ने ग़र किसी के ज़ख़्म धोए हों यही पैगाम ना भूले उसी दर का पता देना 1-रंगीं क़बा=रंगबिरंगी सुंदरी, 2- नौख़ेज़=नवयुवती, 3- ताबाँ=प्रकाशमान, 4- रानाइयों=रमणीयताओं, 5- मज़लूम=सताया हुआ, दुखी, 6- मिस्कीन=दीन, गरीब. 7- आईन=नियम, 8-नज़्मे-गुलिस्ताँ=उपवन की व्यवस्था,9- ताजिरे-दिल=दिल का व्यापारी, 10- दैरो हरम=पूजा स्थल,
16. मेरी तनहाइयों में आसू दगी तेरी फ़रेबी है वफ़ा
मेरी तनहाइयों में आसू दगी1 तेरी फ़रेबी है वफ़ा मैं तो हर दौर में तनहा ही रहा इसके सबब ग़म न किया मेरी चाहतों से शनास2 थी मेरी सोच इक बुत तराश3 थी मेरी बुत फ़ज़ाँ में पिघल गयी बाकी कँपकँपाती तलाश थी मैंने ज़हनों में पनपती हुई आवारगी रुसवा4 न किया मैनें महलों की सियाही की तरफ बढ़ती तलब कम न किया मुझे क़ौम का ही धोका था मिला मेरी चाहतों का ना सिला मिला मुख़ालिफ़ से मिरी थी नसब5 मिली जो की रद्दे अमल6 तो गिला7 मिला मैंने नफ़रत को तो काटा है शहादत से सितम भी न किया ठोकरें खाया भी ठहरा ही नहीं और मदद कम न किया 1-आसूदगी=संतुष्टि, शांति, 2- शनास=जान पहचान, 3- बुत तराश= मूर्तिकार, 4- रुसवा=बदनाम,बेइज्जत, 5- नसब=वंश, पारिवारिक व्यक्ति, 6- रद्दे अमल= प्रतिक्रिया में किया गया कार्य, 7- गिला=उलाहना, निंदा,
17. अबस ईफ़ा बिताया है दरिंदा होनें में
अबस1 ईफ़ा2 बिताया है यहाँ पर रिंदा होनें में नहीं है ख़ैर अंदेशी3 यहाँ फिर ज़िन्दा होने में तेरी इंसानियत की दास्ताँ खूँरेज4 इतनी है मेरी हैवानियत शर्मिंदा है, शर्मिंदा होने में अमानो अम्न से तो वास्ता था ही नहीं तेरा यहाँ तारीख़ सोचेगी कभी आइंदा होने में अना अल हक़5 सज़ा ए मौत की इल्लत बनाया था बचाया कुछ नहीं या बच गया पाइंदा6 होने में फ़रोग़े फल्क7 तेरा है जियादा सँकरा ऐ “ दाहिर” जियादा शर्म आती है मुझे बाशिंदा होने में 1-अबस=व्यर्थ, 2- ईफ़ा=लड़के की बालिग़ होने की उम्र, 3- ख़ैर-अंदेशी =सद्भावना,अच्छाई, 4-ख़ूँरेज़= हिंसक, खून बहाने वाला, ,5- अनल हक़=अहम ब्र्ह्मास्मि (सूफ़ी विचारधारा का नारा), 6-पाइंदा=शाश्वत, 7- फ़रोग़ ए फ़लक़=आकाश का विस्तार,
18. हिजाब-आलूद बेहिस में अभी औहाम बाकी है
हिजाब- आलूद1 बेहिस2 में अभी औहाम3 बाकी है तेरे जुल्मों सितम का दिलशिकन4 इकराम5 बाकी है तेरे आईन6 की पाबन्दियां तेरा तमद्दुन7 हैं रसूले पाक की तौहीन का इल्ज़ाम बाकी है बनी आला-ए-पैदाइश8 ख़ुदा मेरी खता क्या है अभी ख़ाकस्तरे खामोश9 का इनआम बाकी है असल मफ़्हूम10 से तौबा बनाया ज़ुर्म को फ़तवा तेरी शब्ब-ए-क़यामत11 का अभी अन्जाम बाकी है कभी बदलेगा दौरे ज़ुल्म उसके बाद क्या होगा तिरी कोशिश का ‘’दाहिर’’ आखरी इक़्दाम12 बाकी है 1-हिजाब-आलूद=पर्दानशीं, 2- बेहिस=स्पंदनहीन, 3- औहाम=भ्रान्तियाँ,मुग़ालते, 4-दिलशिकन=दिल तोड़ने वाला, 5- इकराम=दान,बख़्शीश, 6- आईन= कानून, 7-तमद्दुन=संस्कृति, 8-आला-ए-पैदाइश= प्रजनन यंत्र, 9- खाकस्तरे-ख़ामोश=मौन राख, 10-मफ़्हूम=अर्थ, तात्पर्य,11- शब्ब ए क़यामत= प्रलय की रात, 12- इक़्दाम=क़दम बढ़ाना, आगे बढ़ना
19. बहस मोबाहिसों का दौर है, क्या लगता है
बहस ओ तमहीद का ये दौर है, क्या लगता है सही है क्या ओ गलत क्या न पता चलता है, आइने तेरी जरूरत न अभी हाज़िर में अक्स आमिल1 जो दिखाये है वही दिखता है लगे हैं जौके-तुफ़ैल-ए दग़ा-ए-नुक्ते नज़र2 वक़्त के इल्म का ही याँ फ़ूसूँ3 जो चलता है जुनूँ अंगेज़4 बयानात के जेरेसाया बस्ता-औहाम5 बशर6 ही यहाँ पे जलता है दिलशिकन फैसलों को देख अदालत जाके इंतिज़ाम उसका इसी क़ायदे पे चलता है इन्हीं ही क़ायदों की राह गुजर नस्ल तेरी कहाँ दाहिर तेरा अख़्लाक़7 यहाँ चलता है 1-आमिल=सम्मोहन करने वाला, 2- जौके तुफ़ैल ए दग़ा ए नुक्ते नज़र=दृष्टिकोण के धोखे के सादन के अंवेषण, 3- फ़ुसून=जादू, 4- जुनूँअंगेज़=उन्माद पैदा करने वाला, 5-बस्ता-औहाम=भ्रम ग्रस्त, 6- बशर=मानव, 7- अख़्लाक़=शिष्टाचार
20. गफलतों के अंदर ही पलते रहे हैं हम
गफलतों के अंदर ही पलते रहे हैं हम खंजर को जाना यद1 चूमा किये हैं हम बिजलियों की आतिश है आशियाँ पे बर्पा उनके तराने सदियों से गाते रहे हैं हम राह में पाँव हमारे कभी रुके ही ना थे माज़ी को छोड़ा और नये से मिले हैं हम जह्न की आदतों ने हमको मा'ज़ूर2 किया खुद के अमल से धोका खाते रहे हैं हम रहनुमा बन गए मंज़ूरी भी मिली लेकिन पूरे सफर में राह ना पाते रहे हैं हम प्यारा है हुब्बे-जाह हमेँ ऐसे “दाहिर” हम राही के ही पा3 खींचा किये हैं हम 1-यद=हाथ, 2-मा’ज़ूर=विवश, 3-पा=पैर
21. तिरे अल्फ़ाज़ मेरे रूबरू होते क्यों हैं
तिरे अल्फ़ाज़ मेरे रूबरू होते क्यों हैं मिरी नज़रों में मगर धुँधले होते क्यों हैं तिरे नग्मात हो पैवस्त ज़र्फ़1 ए ता-उम्र बनके अंगार मेरे नफ़्स2 में बहते क्यों हैं माना ये छोड़ दिया आरज़ू उल्फ़त की फिर रक़ीबों3 के खयालात उभरते क्यों हैं सामने मेरे वही पुर सुकूँ मन्ज़र हों मेरे अहसास जलावत न से लगते क्यों हैं रोशनी तुझको ख़ुदा ने ‘अता फ़रमाया क़ब्र के ताबाँ4 चिराग़ाँ हैं ये जलते क्यों हैं कर दे ख़्वाबीदा5 सा आहंग6 कोई हो “दाहिर” दिल के गोशों में मेरे मर्सिया7 बजते क्यों हैं 1-ज़रफ़=गहराई,विस्तार,शिष्टाचार,संस्कार, 2- नफ़्स=अस्तित्व, 3- रक़ीब =प्रेमिका का दूसरा प्रेमी, ,4-ताबाँ=प्रकाशमान , 5- ख़्वाबीदा= निद्रित, 6- आहंग=स़गीत, सुरीली आवाज, 7- मर्सिया=शोकगीत,
22. उस उफक़ के पार ले चल जहाँ कोई महवे-यास ना हो
उस उफक़1 के पार ले चल जहाँ कोई महवे-यास2 ना हो पोशिशे-अमन3 हो जहाँ और शिद्दते-एहसास4 ना हो नहीं हो वायदाखानी5 बनिस्बत कायदाखानी फ़ज़ा रक़्सो6 सुहानी ख़ुशनुमा आज़ार7 बेमानी न आशाइश8 हो गिर्या9 बाइसे नालाँ10 -फ़ना ताबाँ11 असीरे-हल्क़ा-ए-नेको-बदे-आलम1 पशेमानी13 हों जहाँ बेगाना-की माफिक14 ओ सितमगरी15 खास ना हो रंजो-ग़म के मजमुआ16 से हयात फर्ते-यास17 ना हो शफ़क़18 का रंग दिलकश हो हसीं हो और फ़रोज़ाँ19 हो तक़द्दुस20 नाजनीना21 अक़्स मंज़र में नुमायाँ हों तसव्वुर22 नीलगूँ23 हो पारसाई24 मावरा25 आहंग26 वहीं गुलहाए-रंगो-बू27 से अफ़सानें चिराग़ाँ28 हों ताबिन्दा29 इक बाग़े-जनाँ30 हो और अंधेरा पास ना हो हुस्ने-अक़्से-शाम31 हो कौसर32 हो और तलाश ना हो फ़जा की जह्न में अनवार33 ओ याराना दे आएँगे जहाँ की सह्न34 में नग़्मात पैराई35 ले आएँगे जमाले ज़िंदगी36 हो पारसाई ओ दिलबराना इसी माहौल के मन्ज़र मे फिर आ ही जायेंगे हो फ़ज़ाँ पुरअम्न जिला-ए-मुहब्बत37 मज़ाक़े-यास38 ना हो माअज़ूर39 ना दिल यहाँ हो रूह की अज़्म40 उदास ना हो 1-उफ़क़=क्षितिज, 2- महवे-यास=ग़म मेँ डूबा हुआ, 3- पोशिशे-अमन=शान्ति का आवरण, 4- शिद्दते-एहसास= अनुभूतियोँ की तीव्रता, 5- वायदाख्वानी=वायदे की बात करना, 6-रक़्स=नृत्य,7- आज़ार=दुख, तक्लीफ,8- आसाइश= अधिकता/वैभव, 9- गिर्या=रोना, विलाप, दुख, 10- नालाँ= रोता चिल्लाता हुआ, नामुनासिब,मजबूर, त्रस्त, 11- ताबाँ= चमकदार, 12- असीरे हल्क़ा ए नेको बदे आलम=संसार की अच्छाई बुराई की घेरेबंदी,13- पशेमानी=शर्मिंदगी, 14- बेगाना-की माफिक=अपरिचितोँ की तरह,15- सितमगरी= अत्याचार करना, 16- मजमुआ=गट्ठर,17- फ़र्ते-यास=निराशा की अधिकता, 18- शफ़क़=उषा, 19- फरोज़ाँ=रौशन, चमकता हुआ, 20- तक़द्दुस=पवित्रता, 21- नाज़नीनाँ=सभ्य, सच्चरित्र महिला,22- तसव्वुर=कल्पना,23-नीलगूँ=नीले रंग का, 24-पारसाई=पवित्रता, 25- मावरा=परे,बाहर,,सीमा से अधिक, 26- आहंग=संगीत, 27- गुलहाए-रंगो-बू=सुगंधित फूलों के, 28- अफ़साने चिराग़ाँ =दास्ताँ, प्रेम की कहानियाँ रौशन या जगमग, 29- ताबिन्दा=दीप्त, 30- बाग़े-जनाँ=स्वर्ग की वाटिका, 31- हुस्ने-अक़्से-शाम=शाम के प्रतिबिम्ब का सौन्दर्य, 32- कौसर= स्वर्ग में नदी जो मीठी कस्तूरी की खुशबू के साथ मोतियों से सजी है 33-अनवार=प्रकाश, ,34- सहन=आँगन, 35- नग़्मा-पैराई=संगीत छेड़ना,36- जमाले-ज़िंदगी=जीवन का सौंदर्य,37- जिला-ए-मोहब्बत=प्रेमोन्माद,38- मज़ाक़े-यास= निराशा का उपहास,39- माअज़ूर=विवश, 40- अज़्म=संकल्प,
23. इनायत मुझे है लगे आसमानी
इनायत मुझे है लगे आसमानी उन्हीँ से जिला1 रूह की शादमानी2 फलक3 पर जो नन्हे दिए जल रहे हैं समन्दर-निहाँ4 अक्स5 जो पल रहे हैं सितारों से रंगीं फ़ज़ाँ हैं वहीं से शुआओं6 के पर7 से सुकूँ ढल रहे हैं रवाँ8 है वहीं से हमारी कहानी इनायत मुझे है लगे आसमानी ये दरिया की लहरों की जद्दो जहद भी बयाँ कर रही हैं तुम्हारे इरादे जुनूँ का ये आलम है वहशत का तारी कि ज़ौके तलब9 आरज़ू की सदा दे तुम्हारे बदन की तराशें सुहानी इनायत मुझे है लगे आसमानी 1-जिला=चमकदार, प्रकाशमान, 2- शादमानी= प्रसन्नता, 3- फ़लक=आसमान, 4- निहाँ=गुप्त, 5-अक्स=प्रतिबिंब, 6- शुआओं= रश्मिओं, 7- पर=पंख, 8- रवाँ=यात्रा में, 9- ज़ौके तलब= तलाश की अभिरुचि,
24. हज़ार किस्से तेरी फ़ज़ल के फजाँ में उसका असर न देखा
हज़ार किस्से तेरे करम के फजाँ में उसका असर न देखा कि आफ़तों का उफ़क़2 ही देखा इनायतों की नज़र न देखा तुम्हीं को पूजें अमीरो उमरा लगा हूँ मैं तेरी ही दुआ में किसी को बख्शा महल दुमहले अगरचे मैंने बसर3 न देखा दिलों की धड़कन बनाने वाले दिलों में नफ़रत भी तूने डाला दिलों की तस्कीं4 चुराने वाले ग़मे जिगर5 का हशर6 न देखा तुम्हारी तक़रीर में है धोका हिसाबों में तेरे गड़बड़ी है अदम7 है क़ायम मिरे मुक़द्दर दुखों का तूने गुज़र न देखा है एक देता तेरे जहाँ को पसीने को ख़ूँ में एक करके जमीं की ख़ुशबू लपेटे दहक़ाँ9 को छू के बहती लहर न देखा सही मसाइल से मोड़ देना तिरी जमातों का है सलीका कि किस्सा गोई है तेरा हरबा जिसे कभी बेअसर न देखा तुम्हारी अज़मत10 से ही है रौशन चिराग़े उल्फ़त11 हसीन लम्हे है एक “दाहिर” है सोज़12 जिसका ग़ज़ल का उसने हुनर न देखा 1-फ़ज़ल=कृपा,2- उफ़क़=क्षितिज, 3- बसर=जीवन निर्वाह, गुजर बसर, 4- तस्कीं=सान्त्वना,5-ग़मे जिगर=दिल के दुख, 6- हशर=परिणाम,अंत, 7- अदम=अभाव, 8- दहर=संसार, समय, 9-दहक़ाँ=किसान, 10- अज़मत=सम्मान,ठाटबाट, 11- चिराग़े उल्फ़त=मोहब्बत का चिराग़ 12-सोज़=दुख, दाह,अथाह कष्ट,
25. बाग़बाँ हाथों बाग़ीचा को उजड़ते देखा
बाग़बाँ हाथों बागीचे को उजड़ते देखा अस्ल उसूलन आदमी को ही मरते देखा जिनको करनी थी बातें हक़ दावे की यारों अकसर कमरे में अश्क़ उसको बहाते देखा कर जो गर बातें जम्हूरिया की याँ ना कर मैंने इसके सबब तो क़त्ल ही होते देखा जीस्त थी गुजरी उसूलों को लिये चलता ही था आदमी है बेकार सा लोगों को कहते देखा रास्ती1 आतिश का दरिया रही ताबाँ2 “दाहिर” धोके को तो तंज हमेशा करते देखा 1-रास्ती=सचाई, 2- ताबाँ=चमकदार,
26. तेरे मंतिक़ हमेशा आदतन इल्जाम चुनते हैं
तिरे मंतिक़1 हमेशा आदतन इल्जाम चुनते हैं गुमा ना कर ऐ हस्ती हम भी अब इलहाम2 रखते हैं फ़िकर में चल रही किस्मत 'अता है जिसने फरमाया हुई जो फ़न से बे फ़िक्री उसे इन'आम करते हैं तुम्हारे फन की दानाई3 इसी कोशिश से है ज़ाहिर सही मफ़्हूम4 से गाफ़िल5 हैं बस औहाम रखते हैं कशिश6 की चर्चा करने वाले मेरी रूह तो देखो तिरा तो इश्क़ है धोका तेरे ही नाम करते हैं मुझे मालूम था “दाहिर” तिरे पैमाने का जौहर7 मगर इस मोहलिक8 तजवीज9 को इकराम10 करते हैं 1-मंतिक़=तर्क, 2- इलहाम=ईश्वर की ओर से हृदय में आई हुई बात, ईश्वरीय ज्ञान या प्रेरणा, 3-दानाई= समझदारी, 4- मफ़्हूम=उद्देश्य, 5- ग़ाफ़िल=लापरवाह, 6-,कशिश=आकर्षण, 7-जौहर=विशेषता, गुण, 8- मोहलिक=घातक, जानलेवा, 9-तजवीज=पेशकश, 10-इकराम=दान,बख्शीश
27. वो सितम को अपनी शगल कहें
वो सितम को अपनी शगल1 कहें मुझे हर जुलम से भी प्यार है जो उन्हें था करना वही किया मिरा दर्द बाकी बहार है वो तो घाव मेरे अज़ीज़ का था दिया बड़े ही जो प्यार से इसे मरहमों से है क्या करें मेरे जख्म मेरे सिंगार हैं वो सदा कहाँ से मैं लाऊँ अब जो फिजाँ में ताजा सिमट गयीं दे दिया वो मेरा रहा जो ले लिया आशना का बरार2है तिरी बज्म3 की हों रवायतें तिरी सादगी तिरीरहनुमा मैं अमन का पैरवी कार हूँ मिरा हर बशर4 से करारहै मिरा ज़ेहन कितना अजीब है कभी जो रुका ना मक़ाम पर कभी चारसू ए ख़लिश5 रहा अभी सारे दर्दों के पार है 1-शगल=चुहल, 2- बरार=कर, टैक्स, 3- बज़्म=सभा, महफ़िल, 4-बशर=मनुष्य, 5- चारसू ए ख़लिश=चुभन के चारों ओर,
28. मिरा दर्दो ग़म था हटा नहीं जो अज़ीज़ था वो मिला नहीं
मिरा दर्दो ग़म1 था हटा नहीं जो अज़ीज़2 था वो मिला नहीं जो मिला वो ग़म से उदास था कि कुछ इस तरह कि मिला नहीं सुनो गर मिलो जो खु़लूस3 से हो दिलों के शिकवों से रूबरू वो जो इस्तलाह4 नजर में है तुम्हें उनपे कोई गिला नहीं मैं चिराग हूँ बड़ी दूर का हूँ अँधेरे बीच जला हुआ कभी मुझको देख क़रीब से मिरे हुस्न का तो सिला नहीं बड़ी हसरतों से बचाया था तेरी शख़्सियत के उरूज5 को मेरे दिल के गोशों6 ने ये कहा ये वो फूल था जो खिला नहीं जो वफ़ा के मेरे गवाह थे वही वक़्त और था मेरा सनम वो बराहे वक़्त गुज़र गया जो मुकर गया तो गिला नहीं 1-दर्दो ग़म =कष्ट और दुख, 2-अज़ीज़ = प्रिय, 3- खुलूस=निश्छलता, 4- इस्तलाह=विशेष अर्थ 5-उरूज=उत्थान, 6- गोशों=किनारों,
29. तुम्हारे पास अगर है जवाब दे देना
तुम्हारे पास अगर है जवाब दे देना हमारी गुल शुदा1 नज़रोँ के खाब दे देना बहारें शाद2 करे रुख को शादमानी3 करें वही गुलों की तरावत4 के ताब5 दे देना बड़ी ही मुश्किलों से मैं बराह रास्त6 हुआ इसी रू शिकवा कुनाँ7 इज तिराब8 दे देना बने अराइशे बज़्मे जहाँ9 तगाफुल10 हो गुलों में आस है उम्मीद-आब11 दे देना तुम्हारे वास्ते इक ख़त सफ़े12 में रखा था दिखा हो तुमको या ना पर किताब दे देना 1-गुल शुदा=बुझी हुई, 2- शाद=आनंदित, 3- शादमानी=प्रसन्नतापूर्ण, 4- तरावत= ताजगी, 5- ताब=आभा, चमक,6- वराह रास्त= प्रत्यक्ष, सामने, 7- शिकवा कुनाँ=उलाहना देती हुई, 8- इज़्तिराब=बेताबी, बेचैनी, 9-अराइशे बज़्मे जहाँ=दुनियाँ की महफिल का श्रृंगार, 10- तगाफुल=जान बूझकर की गयी उपेक्षा, 11- उम्मीद-आब=आशा का जल, 12- सफ़े=पन्ने,
30. आँख में आज कुछ नमीं सी है
आँख में आज कुछ नमीं सी है धुंद मंजर से कुछ हटी सी है जो कली खिलनी थी मेरे आँगन दूसरे दर पे वो खिली सी है करती जो रोज कश्मकश1 वफा की वो तराज़ू थमी थमी सी है जो महक थी गुलों2 में जज़्ब3 कभी उनमें क्यों इतनी बेबसी सी है ये नसीबों का खेल है दाहिर तेरी क़िस्मत में बेहिसी सी है 1-कश्मकश=द्वंद्व, 2- गुल=फूल, 3- ज़ज्ब=विलीन,
31. दरिया ए इश्क़ में गुजरे तो जो मोकाम आये
दरिया ए इश्क़ में गुजरे तो जो मोकाम आये वो समन्दर है इसे मौत कहाँ काम आये चाहने वाले जो तनहाइयों की नज़्र हुए आसरामंद थे कितने जो लब ए बाम1 आए ज़िंदगी भर के लिए चुन लिया जो जाम कभी मुड़े देखे भी नहीं चाहे जो अंजाम आये उनकी रानाइयों2 में डूब गए इल्म ओ अदीब3 नज़्म का रूप लिए अक्स4 ही मादाम5 आए साथ तेरा था जफ़ाओं6 से ही लम्बा “दाहिर” तूने चाहा न था कि तेरा कभी नाम आए 1-लब ए बाम=छत की मुँडेर या किनारा, 2- रानाइयों=रूपसौंदर्य की लावण्यताओं, 3- इल्म ओ अदीब=ज्ञान और साहित्यकार, 4- अक्स=प्रतिबिम्ब, 5- मादाम=हमेशा, सर्वदा 6-जफ़ाओं=अत्याचार, सितम,
32. तुम्हारी तरफ से इशारा नहीं है, तुम्हें मुझपे शायद
तुम्हारी तरफ से इशारा नहीं है, तुम्हें मुझपे शायद भरोसा नहीं है बहुत ग़म ज़दा हैं ये घायल निगाहें सदा है कहीं बुलबुलों की हैं आहें वो कहते हैं तरज़े मुहब्बत1 निभायें मगर अपनी हस्ती को क्यूँ कर मिटायें मुझे तुमसे वल्लाह शिकवा नहीं है तुम्हें मुझपे शायद भरोसा नहीं है जिगर चीरकर तुमको कैसे दिखाऊँ इसी ग़म में डर है कहीं मर ना जाऊँ यूँ ही हाले दिल अपना कैसे सुनाऊँ ये मुमकिन नहीं मैं तुम्हें भूल जाऊँ मेरे दिल को ये भी गवारा नहीं है तुम्हें मुझपे शायद भरोसा नहीं है मेरे दिल में तूफ़ान क्यों उठ रहा है मेरा दिल हिरासान2 क्यों हो रहा है अरे नाख़ुदा3 तुझको क्या हो रहा है मेरी नाव मझधार में ले चला है उधर कोई साहिल किनारा नहीं है तुम्हें मुझपे शायद भरोसा नहीं है ज़माने में ‘दाहिर’ फ़कत तुमको चाहा न जाने मुझे उस घड़ी क्या हुआ था आग़ाज़4 सोचा ना अन्ज़ाम समझा बहुत खूब उल्फ़त को तुमने निबाहा यूँ ही दिल जलाना भी अच्छा नहीं है तुम्हें मुझपे शायद भरोसा नहीं है 1-तरज़े मुहब्बत-प्रेम की रीति 2- हिरासान=हलकान,परेशान, 3- नाख़ुदा=नाविक, 4- आग़ाज़=प्रारम्भ,शुरुआत,
33. बहाने से कभी छूना बहाने से कभी रुकना
बहाने से कभी छूना बहाने से कभी रुकना निहाँ1 दिलचस्प था पुरकैफ़2 कामिल3 शायराना था कभी शाइस्तगी4 से चलते रहना और रुक जाना दिखावा सोचने का करते करते लौटकर आना तराना नीमबाज़5 आँखों का ख़ुद वाबस्ता6 हो जाना नज़र की उन शुआओं का तख़ैयुल7 था सुहाना था मुज़महिल8 लफ़्जों को दिल के उसूलों से फ़ना करना पलक के सर्निगूं9 कोरों से घायल अश्क़ का बहना मिरे दिल की है धड़कन मैं तिरे दिल का हूँ क़ासिद10 गर मैं हूँ दाहिर11 तेरा तुझको इशारे से बताना था 1-निहाँ=छिपा हुआ,गुप्त, 2-पुरकैफ़=मस्ती से भरा हुआ, 3- कामिल=पूरा, 4- शाइस्तगी-शिष्टता, 5- नीमबाज़= अर्धनिमीलित, 6- वाबस्ता=लिपटा हुआ, 7- तख़ैय्युल= अकल्पनीय,8- मुज़महिल=व्याकुल, 9- सरनिगूं=झुकी हुई, 10- क़ासिद=संदेशवाहक, 11- दाहिर=बुद्धि, विवेक,
34. ये ज़फ़ाए इश्क़ हैं क्यूँ भला, इसे टूटे दिल की तलाश है
ये ज़फ़ाए इश्क़ हैं क्यूँ भला, इसे टूटे दिल की तलाश है मैं फ़रेबी इश्क़ करूँगी क्या, मुझे हम नशीं1 की तलाश है तू फ़रिश्तख़ू2 है जो नासेहा3, तुझे हाले दिल मैं सुनाऊँ क्या जो तू है वही तो ये सच बता, मुझे दिलकुशा4 की तलाश है कई बार राहे हयात में कहा कुछ नहीँ सुना कुछ नहीँ मगर आज राहे फ़ना में क्यों मुझे गुफ़्तगू5 की तलाश है मिरा अक्से-सोज़े-जिगर6 सदा मिरी हसरतों का बयाँ रहा मिरी इब्तिदाई7 ग़ज़ल तो दे मुझे शाइरी की तलाश है तिरी हस्ती ही मेरा फ़ख़्र थी मेरे ख़ाब में तू सुकून था मिरी क़ब्र में ज़रा आके कह मुझे बस इसी की तलाश है 1-हमनशीं =साथ रहने वाला,2- फ़रिश्ताख़ू= फ़रिश्ता की तरह,3- नासेहा=नसीहत देने वाला,4- दिल-कुशा = दिल को आनंद देने वाला,5- गुफ़्तगू= वार्तालाप, 6- अक्से-सोज़े-जिगर=दुखी दिल का प्रतिबिम्ब, 7-इब्तेदायी=शुरुआत की
35. जंग काँटों की कलियों से ऐसी हुई, हाथ बढ़ते लिये
जंग काँटों की कलियों से ऐसी हुई, हाथ बढ़ते नहीं दोस्ती के लिये अब तो कोई भी गुल क शनाख़ाँ1 नहीं, बाग़बाँ है परीशाँ इसी के लिये इश्क़ की रहगुज़र इतनी आसाँ नहीं, दरिया ए इश्क़ है इतना उथला नहीं जो भी इसमें गया जाँ-ब-हक़2 हो गया जो बचा बस वो दीवानगी के लिये बेबसी बस मिरी याँ3 तलबगार है , एक साअत मेरा जीना दुश्वार है बस इसी ग़म के मझधार में डूबकर, कोई हासिल नहीं तिश्नगी4 के लिये क्या बतायें यहाँ कोई मिलता नहीं जो मिला वो फ़रिश्तों की ख़सलत लिये उम्र भर यूँ ही नज़रें परखती रहीं, हम तड़पते रहे आदमी के लिये जुस्तजू5 थी निहाँ6 पुर सुकूने मकीं7, पर नज़ारे यहाँ जो मिले, थे हज़ीं8 तेरी दुनियाँ है ‘दाहिर’ नये दौर की, ना मुनासिब वली-आदमी10 के लिये 1-शनाख़ाँ==पहचानने वाला, 2- ज़ाँ-ब-हक़=आत्मोत्सर्गित करना, 3- याँ=यहाँ, 4-तिश्नगी=प्यास, 5- जुस्तजू=तलाश, 6- निहाँ=छुपे हुये, 7- मकीं=वासी, 8- हज़ीं=शोकाकुल, 9- ना-अहल=अयोग्य, 10- वली-आदमी=सीधा सादा/संत आदमी,
36. मेरा दुख दर्द मुझको प्यारा है
मेरा दुख दर्द मुझको प्यारा है अहद1 तेरा मेरा सहारा है ग़र तेरे पाँव में चुभें काँटे दर्द सहने को दिल हमारा है कुल तमन्नाओं की उड़ानों में तेरा उनवान2 सबसे न्यारा है तेरे पुरकैफ़3 जिस्म की ख़ुशबू मेरे जीवन का ये शरारा4 है मुझमें तू जज़्ब इस कदर “दाहिर” मैं तेरा चाँद तू सितारा है 1-अहद=दृढ़ संकल्प, 2- उन्वान= प्रस्तावना,शैली,3- पुरकैफ़=मस्ती भरा, 4- शरारा=प्रकाश
37. वफ़ा के बाद भी इल्ज़ाम उनके सर जाते
वफ़ा के बाद भी इल्ज़ाम उनके सर जाते वो ज़िन्दगी में न आते तो हम किधर जाते कलाम दीद – ए – फ़र्दा1 नहीं मुनासिब था मगर उसी में तो उमरे – रवाँ2 गुज़र जाते तुम्हारे अक्स की दीवार थी खड़ी वरना वो दौर ऐसा था गुज़रा कि हम बिखर जाते भला हुआ जो कि उनतक सदाए-दिल3 पहुँची तलाशे यार में अल्फ़ाज़ दर बदर जाते फ़िराके-यार4 न था ज़ह्ने-काबिले-इम्काँ5 फ़ना के पहले जो ‘दाहिर’ नहीं मुकर जाते 1-कलाम दीद – ए – फ़र्दा= कल देखने का कथन, 2- उमरे – रवाँ= क्षण भंगुर जीवन, 3- सदाए-दिल= दिल की पुकार, 4- फ़िराके-यार= महबूब से दूरी, 5- ज़ह्ने-काबिले-इम्काँ=समझ में संभावना के लायक,
38. मुझे तलाश न कर मैं अभी तलाश में हूँ
मुझे तलाश न कर मैं अभी तलाश में हूँ अलीम ओ इल्म1 की तहकीक और शनास2 में हूँ कि मेरी हस्ती अभी जज़्ब जो खुदी में ही है बसर बदर3 हूँ अभी एक नौ-लिबास4 में हूँ वो एक शख़्स जो गुजरा कभी था दिल से लिपट ज़माना बीत गया फिर भी तो मैं आस5 में हूँ ख़याल करता हूँ उसका तो भूल जाता हूँ तवील दीद6 की चाहत में महव ए यास7 में हूँ हवाएँ कम हो रही दिन भी ढल गया दाहिर’ वहीद8 हूँ मैं या नग्मा ए इल्तिबास9 में हूँ 1-अलीम ओ इल्म=सर्वज्ञ एवं ज्ञान, 2- तहक़ीक़ और शिनास=जाँच-पड़ताल और पहचान, 3- बसर बदर=दृष्टि से निकाला गया (मनुष्यों के बीच से निकाला गया), 4- नौ-लिबास =नए वस्त्र, 5-आस=उम्मीद,6- तवील दीद=लम्बे समय तक देखने,7- महव ए यास=निराशा में घिरा हुआ, 8-वहीद=अकेला,तन्हा,9- नग़्मा ए इल्तिबास= सदृश होने या एक सा होने के गीत
39. तेरी सिम्त आकर गुज़र गई
तेरी सिम्त1 आकर गुज़र गई तेरी ख्वाहिशों की लहर गई वो ही ज़िंदगी की किताब थी ग़ालिबन2 तुम्हारी नज़र गई गर पलट के उसको जो देखते तेरा आश्याना उधर गई वो था जब गया खाम3 छोड़कर तेरी जीस्त उस दर ठहर गई ये तलाश दाहिर मिज़ाज़ की तेरी शख़्सियत में उतर गई 1-सिम्त=ओर,2- ग़ालिबन=शायद, 3- खाम=अपरिपक्व, कच्चा, नातजुर्बेकार
40. बहर में डोलती लहर निकली
बहर1 में डोलती लहर निकली जान मेरी थी इस क़दर निकली ज़िंदगी ढूँढता रहा उसमें जैसे अब्रे रवाँ2 सहर निकली बाहमी-ज़ीस्त3 तो हुई ही नहीं उम्र थी एक रहगुज़र निकली ता ख़यालात ही बा-हद4 जो रहा मेरी उल्फत ही दर बदर5 निकली अम्न जिसमें था खोजता “दाहिर” क़ातिलाना वही नज़र निकली 1-बहर=समुद्र,2- अब्रे-रवाँ=बादलों की भटकती हुई छाया,3- बाहमी= मिलन, 4-बा-हद=सीमित, 5- दर बदर= आवारा,
41. मेरे किरदार मुझे सब्र दे सदाक़त से
मेरे किरदार मुझे सब्र दे सदाक़त1 से मैं हूँ बेज़ार2 मुझे रहने दे सहूलत से खड़ा हूँ दर्दो-ग़मो-जब्र3 की मुहीत4 फज़ा ख़ुद का दस्तूर बता रखने दे रिवायत से हमने था सौंप दिया आखिरी अमानत को तूने महरूम किया ख़ाहिशी अलामत5 से आसरा बरतरी6 लेकर शुआए नौ7 की भी तुमने परहेज़ ही रखा सदा ज़ियारत8 से राब्ते-वास्ते9 तहलील10 सब ही हो जाएँ दूर होते गये सब रोज़ की अदावत11 से ठोकरें बढ़तीं रहीं माअज़ूरी12 चारो ओर है समझदार मगर दूर है हिदायत13 से चाह उनको तो दुआओं की ही नहीं “दाहिर” मादियत14 से है करीबी ब’अद15 लियाक़त16 से 1-सदाक़त=सच्चाई, 2- बेज़ार= खिन्न, ऐसा व्यक्ति जो भीड़ और लोगों की संगत से घबड़ाता है,3-दर्दो-ग़मो-जब्र=दर्द,ग़म और जबर्दस्ती, 4- मुहीत=छाई हुई, 5- अलामत= चिँह, निशान,पहचान,6- बरतरी=श्रेष्ठता, ऊँचाई, 7- शुआए-नौ=नई किरणों, 8- ज़ियारत=दर्शन, दीदार, 9-राब्ते-वास्ते= सम्बंध और रिश्ता, 10- तहलील=नष्ट, 11- अदावत=दुश्मनी,12- मा’अज़ूरी= विवशता,13- हिदायत=सलाह,14- मादियत= भौतिकता, 15- ब’अद=दूरी, 16- लियाक़त= गुण,हुनर,अच्छे बुरे की पहचान,
42. किसी के नाम कभी इक सलाम लिखता हूँ
किसी के नाम कभी इक सलाम लिखता हूँ मैं खुश्क1 फूल किताबों के नाम लिखता हूँ हर एक धागे को रंगाता हूँ नए रंगों में मैं फन्दबाज फसाने की बात लिखता हूँ हयात मेरी उमूदी2 दयार3 कैनवस सी मैं उनकी अपनी तफ़ाउत हदूद4 लिखता हूँ मिटाता हूँ मैं हर एक रोज राज की बातें मैं तो अकाइद5- उसूलों की बात लिखता हूँ ये ख़म6 न दो कि अभी मुस्तकि़ल7 नहीं “दाहिर” मैं अपने दिल का मुकम्मल पयाम8 लिखता हूँ 1-खुश्क=सूखे,2- उमूदी=लम्बवत,3- दयार=सीमा, 4- फर्क ए हदूद=सीमाँ का अंतर,5- अकाइद= कायदा का बहुबचन, 6- ख़म=झुकाव,7- मुस्तकिल= पूर्ण,8- पयाम=संदेश
43. बिखरे मेरे हैं लफ़ज़ चारसू नफ़ासत से
बिखरे हैं लफ़्ज़ मेरे चारसू नफ़ासत से मैं उन्हे खोज रहा जह्न में सलासत1 से यही तो लफ़्ज़ है तख़्लीक़े कायनात2 सबब वास्ता इसका हमेशा रहा तिलावत3 से यही अल्फ़ाज़ मोहब्बत का जस्र4 हुस्नतरीन ग़ैर-अख़लाक़5 अगर जोड़ दे अदावत से यहाँ हर शख्स का जज़्बा समझ नहीं सकते नहीं तफ़सील6 है मुमकिन यहाँ इबारत7 से नज़रिया और नज़र कर अलीम8 मुझको अता तेरा “दाहिर” है तेरे दर खड़ा रिवायत9 से 1-सलासत= भाषा के सलीस अर्थात् सरल और सुबोध होने की अवस्था या भाव, सरलता, रवानी, 2- तख़्लीक़े कायनात=सृष्टि की उत्पत्ति, 3- तिलावत=कुरान का पाठ, पूजा, 4-जस्र=पुल, 5- अख़लाक़= नैतिकता शिष्टाचार, 6- तफ़सील= व्याख्या,7- इबारत=अक्षर,8-अलीम= ईश्वर, सर्वज्ञ, 9- रिवायत=परम्परा
44. वो मुसलसल है जहन में मेरे
वो मुसलसल है जिगर में मेरे मेरे सपनों में क़याम उसका है वो खुदा है कि है मन्जूरे नज़र1 कश्मकश का ये सिरा किसका है मेरी है रूह की बादा-ए-अस्ल2 ये दरोदर3 सिरे से जिसका है हुस्न है बार ए गुदाज़ ए गुल नौ4 काम यह आज ही क़ुरबत5 का है तेरे आने की खुशी है ‘दाहिर’ फिर है जाना ही मलाल इसका है 1-मन्जूरे नज़र=नज़रों में स्वीकृत, 2- बादा=वह मूल्य जो असल से बढ़ाकर लगाया जाय,3-दरोदर= घर बार, 4- बार ए गुदाज़ ए गुल नौ= नए फूलोँ की मुलायमियत का बोझ, 5- क़ुरबत=सामीप्य,
45. बहारे अंजुमन पहरे में है
बहारे अंजुमन1 पहरे में है अलामत2 ही जो अब खतरे में है पिघलती खाहिशों के हादसे हर एक शै डूबती गहरे में है हिकारत4 को तू मेरे नाम कर वफ़ा के क़िस्से का कर खात्मा इसी आज़ार का किस्सा यहाँ दरीदा5 जोश के सहरे में है हक़ायक6 की तू इज़्ज़त करता रह सदाकत का कोई ऐलान कर गुजश्ता ज़िंदगी के सफ़ पलट कि पेशोपश8 तेरे चेहरे में है 1-अंजुमन=सभा, महफिल, 2- अलामत=चिन्ह, 3- रुदाद=परिस्थिति, दशा, 4- हिकारत=घृणा, 5- दरीदा=विदीर्ण, 6- हक़ायक= वास्तविकताएँ, 7- एहतेराम=आदर, 8- पेशोपश= दुविधा, असमंजस,
46. है शिकस्ता दिल कुछ जता नहीं
है शिकस्ता दिल कुछ जता नहीं तेरी खाहिशों का पता नहीं तू खलिश1 है अपने वजूद का जैसे और मुझको बता नहीं मेरा ग़म सुकूने हयात2 है तेरी राहतों की अता नहीं तेरी खामुशी ही बयान है मेरे कश्मकश की खता नहीं मेरी चाहतों3 का कलाम है तेरी आरज़ू4 की कता नहीं तेरी राय से ही ना-रास्त5 है इस दिले खराबो6 सता नहीं 1-खलिश=चुभन, कसक, 2- सुकूने हयात= जीवन को शान्ति पहुँचाने वाला, 3- चाहतों= मोहब्बत, 4- आरज़ू= अभिलाषा, 5- ना-रास्त= ग़लत 6- खराबों=वीरानी, खाली पड़ी जगह
47. ज़माने भर की तशद्दुद से ना शिकायत है
ज़माने भर की तशद्दुद1 से ना शिकायत है शिकस्ता साज़2 ही बनना मेरी अलामत3 है उजाले तुझको मुबारक ज़रूर होते हों बक़दरे4 मुझको अंधेरा घना नियामत5 है जो हक़ मिरा था उसे बांट देते ग़ैरों में यही कहा है दिलेरी से ये बगावत है तमन्ना चाक कलेजे6 की जो निहाँ7 है मिरी उधेड़ूँ गर तो कहे देते हो अदावत है इसी तरह से हुआ गर्क़ वक़्त ऐ दाहिर हर एक बात में घुलती यहाँ सियासत है 1-तशद्दुद=कष्ट्दायक व्यवहार, 2- शिकस्ता साज़=टूटा हुआ वाद्ययन्त्र, 3- अलामत=चिन्ह, पता, 4- बक़दरे= तुलना में, 5- नियामत=प्रिय, 6- चाक कलेजे= टूटे हुये दिल, 7- निहाँ = छिपी हुई
48. तेरी नज़रों में शायद जी रहा हूँ
तेरी नज़रों में शायद जी रहा हूँ मैं महवे-यास1 तनहा ही रहा हूँ तमन्ना गुफ़्तगू2 ए गूँगे की हूँ जबाने-ज़िस्म3 भी क़ैदी रहा हूँ दरीदा4 आँधियों का आश्ना5 हूँ गुरेज़ाँ6 रेत लिखता ही रहा हूँ बिखरती रोज कड़ियाँ वादों की ही इसी रुसवाई का ग़म पी रहा हूँ कभी दावे की सुनवाई ना होती उसी मिस्कीन7 की अर्ज़ी रहा हूँ कहानी जो उधेडी थी ऐ “दाहिर” उसी को मोतियों से सी रहा हूँ 1-महवे-यास=ग़म में डूबा हुआ, 2- गुफ़्तगू=वार्तालाप, 3- जबाने-जिस्म= शरीर की जबान से, 4-दरीदा= परेशान, 5- आश्ना=चाहने वाला, प्रेमी, 6- गुरेज़ाँ= भागती हुई, 7- मिस्कीन=गरीब आदमी
49. मरज जो आतशी कमतर हुई
मरज़1 जो आतशी2 कमतर हुई तिलिस्मी ज़िंदगी बेहतर हुई न जाने क्यों मुझे लगता है यूँ नज़र कुछ वक़्त की बदतर हुई ये खिदमतगार कुछ जो कम हुए सजाए मौत भी बेहतर हुई भरम का पर्दा फैला चारसू सबब3 वादागरी4 नश्तर5 हुई तिरे दर्ज़े का कोई नाम हो इनायत की नज़र क्यूँ कर हुई 1-मरज=तबाही,2- आतशी=उग्र, 3- सबब=वजह,कारण, 4- वादागरी= प्रतिबद्धता, 5- नश्तर=पतली छुरी
50. जो ना जानते थे वही कही
जो ना जानते थे वही कही जो कही थी वो न समझ सके यही कहते सुनते उमर गयी न ही मैं न तू ही समझ सके कोई राहगीर ना राह में यही सूनी है मेरी रहगुज़र उसी बेवफ़ा से है क्या मिला याँ सुकून ही जो ना दे सके हों हज़ार हाथ तेरे मगर हो तेरा जलाल बलंद भी मिरा है सवाल इसे बता बा असर जवाब ना दे सके
51. ख़ामोशी देख ली कहते हो कभी ज़िन्दा थी
ख़ामोशी देख ली कहते हो कभी ज़िन्दा थी फ़न-मोहब्बत1 में भी मायूस किया है तूने कैफ़-रूहानी2 रही क़ौस-ए-क़ुज़ह3 मेरी हयात चश्म को माजी से वीरान किया है तूने कभी ना तर्जुमा4 करके मेरे मन आशना का मेरा सफ़्फ़ाफ़ जिगर ज़र्द किया है तूने तेरी आँखों से उलझती थीं जो आँखें मेरी उन्हीं आँखों को ही बेनूर किया है तूने अब न कोई राग ना रंगीनियाँ बाकी ‘दाहिर’ साज़-ए-ज़िंदा दिली तखरीब5 किया है तूने 1-फ़ने-मोहब्बत=मुहब्बत जताने के तरीके, 2- कैफ़-रूहानी=आत्मा को आनंद देने वाली, 3- क़ौस-ए-क़ुज़ह=इन्द्रधनुष,4- तर्जुमा=अनुवाद, 5-तखरीब= बरबाद
52. नज़र का मस्ला है चारो तरफ़ है इक चर्चा
नज़र का मस्ला है चारो तरफ है इक चर्चा कोई तो है कि जमाना जिसे मिटा न सका कई मलाल थे टूटा बड़ी शुजा’त2 से कोई असीर3 के आलम में भी झुका न सका वो जो झुका ही नहीं बिखरा था तो ऐसे ही निशान बाकी न था और कोई पा न सका चमन न उजड़े बयाँ की मिली जो आज़ादी सँभल के बोल जो बिगड़ा कोई बचा न सका जगा के अम्न हक़ीक़ी ए मुत्तहिद5 'दाहिर' इरादा क़ोह6 बना जो कोई बना न सका 1-नुक़्ते नज़र=दृष्टिकोण,2- शुजात=वीरता, 3- असीर=कैदी,4- गुलूख़लासी=बंधन मुक्ति, 5-मुत्तहिद=एकता,6- क़ोह=पर्वत
53. तड़प में भी नज़ाकत थी अदा थी
तड़प में भी नज़ाकत थी अदा थी निगाहे नाज़ कुछ यूँ ग़म ज़दा थी वो लब जो छू गए मेरे लबों से न जाने किसके दिल की इन्त हा थी गजल जो बन गयी मेरी तड़प थी जो ना परवान ही थी इक कता थी तिरी मुन्डेर पे था लिपटा ताबाँ वो चंदा था या नज़रों की खता थी गुजस्ता ज़िंदगी के चन्द सफ़हे जो देखा तिश्नगी की दास्ताँ थी निभाया अह्दे-शफ़क़त1 को ऐ “दाहिर” निभाते वक्ते रुखसत ही सदा थी 1-अह दे-शफ़क़त=ममता की प्रतिज्ञा
54. चमन ए अम्न था बर्बादी का सहरा निकला
चमन ए अम्न था बर्बादी का सहरा निकला कभी जो मिट ना सके जख्म वो गहरा निकला खूँफशाँ1 माँ के बदन शीर खवारा2 लिपटी ज़िस्म माँ का मकाँ तख़रीब3 में ठहरा निकला भूक से रो रही बच्ची ने पिया ताकत से उसके पल्लू से नहीं दूध का कतरा निकला सोज़4 की चीखें हुईं दफ्न पशेमाँ5 न हुआ कस्रते ख़ौफ़6 की भी सौत7 में बहरा निकला क़ज़ा8 है चूम रही जीस्त9 को “दाहिर” ऐसे इब्तिदा10 जिसने किया वो भी था मारा निकला 1-ख़ूँफशाँ=जिससे खून टपके, 2- शीरख्वारा= दूध पीती बच्ची,3- तख़रीब=नष्ट्, 4- सोज़=अथाह कष्ट, 5- पशेमाँ=लज्जित,6- कसरत=अधिकता, 7- सौत=आवाज,8- क़ज़ा=मौत,9- जीस्त= जीवन,10- इब्तिदा=शुरुआत
55. शफ़क़ का रंग जो दिलकश ओ ख़ुशगवार है आज
शफ़क़1 का रंग दिलो दीद2-ख़ुश गवार है आज मशरकी3 शान तिरंगे से चम्कदार है आज उफ़क़ की सुर्खी बताती है जज़्ब इसमें लहू उसी लहू से शहीदों के शहरयार4 है आज लहू जलाया है रौशन किया है हिंद-फ़जाँ सलाम कर बे जनाज़ों की यादगार है आज वो वलवला5 ओ जुनूँ जो हमारे हिंद का था उसी क़सम से शुकर मंदी तल्बगार है आज चढ़े थे सूली पे हँसते हुये था ग़म न किया थे हौले हौले मरे उनका तेवहार है आज तू बद नसीब है दाहिर तू ठीक वक़्त न था बे दख़्ल क्यूँ हुआ उसपे गिला गुजार7 है आज 1-शफ़क़=उषा,2-दिलो दीद=दिल और दृष्टि, 3- मशरकी=पूरब का 4- शहरयार=सम्प्रभु,, 5-वलवला=उमंग, उत्साह, 6- ‘अहद=प्रतिज्ञा, 7-गिला गुजार=शिकायत करने वाला,
56. हयात था मेरी मंज़िल था कोई और न था
हयात1 था मेरी मंज़िल था कोई और न था वो लज़्ज़ते दिले मजरूह2 था कोई और न था था उसने सिर्फ़ कहा बस कि मुझको छोड़ न जा फ़िराके-यार मुक़ाबिल3 था कोई और न था मेरा ‘ अहद मेरी मग़रूरियत4 का था हासिल वजूद का ही सलासिल5 था कोई और न था मेरा सबब मेरी मसरूफ़ियत6 का था कामिल7 ख़मोश झील मुमासिल8 था कोई और न था लगा था जिस्म को छूकर कोई थी शै निकली सबा की ख़ुशबू का बातिल था कोई और न था मिरे जिगर को छुआ बन गया मिरी खाहिश नदामतों9 का तो फ़ासिल10 था कोई और न था जो दौर मुफ़लिसी का तेरा था गुजरा दाहिर उसी ही दौर का हासिल था कोई और न था 1-हयात=जीवन, 2- लज़्ज़ते दिले मजरूह= प्रेम में गिरफ्तार दिल का आनंद, 3- फ़िराके यार मुकाबिल=आशिक़ से जुदाई का विरोधी, 4- मगरूरियत=गुरूर,5- सलासिल=बेड़ियाँ, 6-मसरूफियत=व्यस्तता,7- कामिल=पूर्णता, 8- मुमासिल=सदृश, हमशक्ल, समान, 9-नदामत=शर्मिंदगी,10- फ़ासिल=पृथक करने वाला,
57. रुबाइयाँ
अजीब रस्म है उल्फत में उनकी दुनियाँ का हसीन सपने तो पहले दिखाये जाते हैं हर एक मू1 में समा जाती जब बलन्द ख़ुशी बड़ी बदर्दी से फिर ख़ाब छीने जाते हैं है वो इक जाम मुसव्विर2 ने रूह डाली है इसको पीने के लिए पूरी उम्र थोड़ी है दिल के प्याले में मुहब्बत का जाम पेश न कर अभी तो तर्क ए मयकशी3 की अहद4 तोड़ी है पौध को देखके बच्ची का वहम होता है करिश्मा कुदरत ना क़ाबिल ए फ़हम5 होता है हर इक रोज़ हुयी नर्म प्यार की बातें हमारी खिलवत6 में कुछ तो कर म होता है 1-मू=रोम, 2- मुसव्विर=मूर्तिकार, 3- तर्क ए मयकशी=शराब पीने को बंद करना, 4-अहद= प्र्तिज्ञा, 5- ना क़ाबिल ए फ़हम= समझ में न आने योग्य, 6- खिलवत=एकांत ईलाही ने अ‘ता कौसर की मय की है जिसे पीने के लिए सारी हदें तोड़ी है मुझे पैमाना पेश इसका ही कर साक़ी सिर्फ इस वास्ते ही मय जग की छोड़ी है खुले आकाश में जुगनू की तरह झिलमिलाता हूँ मैं सोज़ो दर्द1 की शिद्दत2 से पहरों तिलमिलाता हूँ सुख़न गो3 हूँ मुझे आतिश नवा4 से प्यार इतना है मैं उस बेपीर बुत के सामने आँसू बहाता हूँ 1-सोजो दर्द=पीड़ा व दर्द, 2- शिद्दत=कठिनाई, कष्ट, 3- सुख़न गो=कवि या शायर 4- आतिशनवा= शोकपूर्ण ध्वनि या प्रवचन
58. अशआर
मैंने गमलों में नई रोपी ज़िंदगी थी पर मुझको इलहाम1 न था जिंदगी अर्ज़ा से है मेरी धरती मिरे कर्ज़े से है लबरेज़ बहुत मेरी आँखों की चमक हुस्न की क़र्ज़ाई है मैं तमन्नाई हूँ तक़दीसो-इश्क2 का इतना जहाँ से रुखसती के बाद भी जो क़ायम हो मैंने था सोचा कुशादा3 से तअश्शुक4 की वजह वही पाया जो अस्ल ज़िंदगी से लम्बा हो किया था मैंने जो हक़ायक़ के लिये नालिश बरहम तिरा था फ़ैसला मुझको था गुनहगार किया कर न याँ पर तू सदाक़त5 का जिक्र भी दाहिर तेरे ही हम नवा6 तुमसे गुरेज़7 कर लेंगे 1-इलहाम=ज्ञान, जानकारी, 2-तक़दीसो- इश्क़= पवित्रता-प्यार, 3- कुशादा=विस्तार, 4-तअश्शुक= मुहब्बत, 5- सदाक़त=सच्चाई, 6- हम नवा=अपने, 7- गुरेज़=मुँह मोड़ना
