'चार तार' (नाकू तांती) - हिन्दी में : दत्तात्रेय रामचंद्र बेन्द्रे
Chaar Taar (Naku Tanti) in Hindi : D. R. Bendre
मतवाला श्रावण
( अ ) 1 श्रावण श्रावण देहवीणा पर गाया गया यह गीत अहंभाववश कैलास के नीचे दबे मुझे छुड़ा दो । जोड़ दो सम्बन्ध उस परम धाम से, जहाँ शिव हर-हरि का एकाकार है, जिनके चरणों पर चैत्र कुन्दपुष्प चढ़ा चुका हूँ- अब कैसा हवन पम्पापति1 को मत कहो भग्नावशेष तुंग और भद्रा के स्वर से स्वर मिलाकर गायक का गीत गाओ । 2 हरहर श्रावण में आये श्रुति लाये हरिहरि श्रावण में आये कृति लाये आप हैं हमारे सर्जनहार मैं हूँ आपका पुत्र हम हैं स्कन्दवंश के । हम पर है नारद की शिक्षा लम्बी और वक्रित रेखाएं शिव-शक्ति के मध्य यह कौन कामदेव ! एक ओर रख दो उसे वसुदेव देवकी के गर्भ में आये जगत्पिता, सुर-असुरों की कलश-कालिमा दूर कर शरीर धर आओ ! श्रावण, क्या श्रवण को कष्ट देना ही होगा ?2 हे भ्रमर भ्रमराम्बा3 मेरा तेरा एक गोत्र नहीं जानता यमराज। 3 रोमांच रे रोमांच कैसी यह ओट 'क्या किसी अकवि को सम्भव है कि पर-हृदय को मोह ले ?' श्रीविजय को इस मान्यता को नृपतुंग4 का समर्थन मिला। बाईस श्रुति-सहस्रों कृतियों की व्याप्ति शुष्कता त्याग, टीले-टीले पर मोर विद्युत रेखा, मेघाडम्बर नौका सकल गन्धर्वों का नगर, हँस हँस रे हंस मयूर दिन के उजाले में श्रावण में अभिजित् योग यही है काव्योद्योग । 1. विजयनगर के पम्पाक्षेत्र के भग्नावशेष में विराजमान पम्पापति (विरूपाक्ष या शिव) 2. कवि के जीवन में श्रावणमास का महत्वपूर्ण स्थान है--अनेक दुःखद घटनाएं भी घटी थीं। इसीलिए यह उद्गार है। 3. दुर्गा मन्दिर, जो शृंगेरी में है। कहा जाता है कि दुर्गा ने भ्रमरों का रूप धारण कर औरंगजेब की सेना को भगा दिया था। 4. नृपतुंग राष्ट्रकूट राजा था कन्नड़ का सर्वप्रथम कवि था: इसकी कृति 'कविराज मार्ग' कन्नड़ की उपलब्ध सर्वप्रथम कृति मानी जाती है।
फिर आया सावन
( आ ) श्वेतारविन्द, रक्तारविन्द श्रावण-माघ-योग लाया फिर सावन आया बोला - "लहर की तो सीमा है पर अम्बर कब किससे बँधा है ? मूल से मिलना ही तो उद्देश्य है ओ आर्य !" 'विश्वं आर्यं कृण्वन्' 'अमृतस्य पुत्राः ' 'ॐ देवाय जन्मने' ! देव और मानव का सम्बन्ध मुक्ति के उस पार की भक्ति का भगवत्-सृष्टि का निर्माण सामवेद-प्रबन्ध वृन्दा, वृन्दा, वृन्दा वृन्दावन की शोभा सम्यक् यह रासलीला 'ग्लोबल' है भूमण्डल – भगवान् का सुन्दर गृह छोड़ो मीन-मेख भरने दो कुम्भ । सिंह में रवि का प्रवेश धनिष्ठा है निष्ठावान् । वसुओं की प्रतिष्ठा शततारा को वरुण का त्रिविधमयी पाश अधमाऽ मध्यमाऽ उत्तमाऽ तमस चीर कर वह चलो, व्याप्त कर हरहर कह रहे हैं अजैकचरण वाह-वाह धन्य-धन्य अहहा भद्राकरण चन्द्राभरण भालचन्द्र, एकदन्त, नाच, मूषक तद्धितान्त, कृदन्त, वक्रदन्त स्वभावतः वक्रोक्ता, वक्रतुण्ड पुष्ट शुण्ड लिपटे मोदक मकरन्द वाह-वाह धन्य-धन्य शिव-शिव हस्त, कर, शुण्ड, किष्किन्ध सासिवे गणेश1 वातापी को शीत प्रदानकर्ता विघ्नकर्ता हर्ता मूषक दोष दूर हो ओ यक्ष, यज्ञ, सर्वत्र ॐकारो मरुमय पथ, रेत रेत मृत्तिकावती धूलधूसर सदा उदयोन्मुख सूर्य निसर्ग, विसर्ग, सूर्य, दुर्गा, हेरुक प्रिय लम्बोदर आनन्द भरपूर इस चन्द्र ने सावित्री के सिंहासन को कृष्ण के हाथ में दिया चांदनी रात गयी सूर्य की किरणें गयीं बुला रहा है माघ सुगन्ध फैलाकर महकाता परिमल अरविन्द आया अग्नि और चन्द्र में आदान प्रदान लाया और बोला "सावन आया । श्रवण खोल" 1. विजयनगर के पास पम्पाक्षेत्र में गणेशजी का एक भव्य विग्रह है यह सासिवे गणपति के नाम से प्रसिद्ध है।
प्रसूति
मूर्धन्य के तेजस् की कोई किरण वर्ण-वर्ण धारण कर श्रुति का आवरण बनी ऋषि ने खोला हृदय का कपाट पुकारा 'लुसिका लुसिका' और तारों के जाल को झंकृत किया- "जानों- रहो - बहो - हरहर हरिहरि गिरि-गिरि का चक्कर काट, उतर, धरती पर इस क्षण, उस क्षण" —कह वह पास आया वहाँ वाणी मौन के आँचल में लेटी अन्तःकरण के विस्मय में आओ, हे रसिक, हिम पिघलाकर बहा दो अन्धकार को मिटा दो कविता भगीरथ-रथ और तुम सारथी-तुल्य हित-मित रहे काव्य-शैली में सात्विक हो पथ्य विरले लोगों के आडम्बरहीन अम्बर में चलने दो नृत्य हो ! हो ! पावन कृत्य पावक स्तुत्य, होताss ताताऽऽ ताताऽऽ महकता सुगन्धित पथ गन्धर्वों का स्वर्ग अन्तःस्वर में स्फुरित लौकिक अपवर्ग तेजस् की गति में है सुन्दरी का सामीप्य अर्थ और शब्द के मेल से होता है सद्भाव का जन्म ॥
किसान का हृदय गीत
तत् को तत् कहो, बीज को बीज कहो विपत्ति में सत् कहो बीत गया चित्रा, स्वाति अधर मोती लायी सूरज चढ़ा सिर पर छोड़ो बैलों को पानी में। हृदय की टंकशाला में स्नेह की भट्टी है शिला आधार पर हथौड़े की मार है समय- समय पर ढणा ढणा दीप-घण्टा स्नेह का बल है संग में आओ भाई, आओ बन्धु साथ में । पत्थर के भगवान् मिट्टी के भगवान् भस्म के भगवान् चले जायेंगे रंग के भगवान्, चूने के भगवान् दृष्टिदाता भगवान् आयेंगे कहेंगे वर माँगो वर मांगो। "सूर्य चन्द्र घर का दीप बने । धरती में पानी सरलता से मिले मनुष्य का कुल-मूल एक होकर सत्यवान् बन नित्यवान बन सुखमय जीवन बिताओ और भगवान् का प्रकाश बनकर आगे बढ़ो।"
