साखी - करणीं बिना कथणीं कौ अंग : भक्त कबीर जी
Sakhi - Karni Bina Kathni Ko Ang : Bhakt Kabir Ji in Hindi
कथणीं कथी तो क्या भया, जे करणी नाँ ठहराइ। कालबूत के कोट ज्यूँ, देषतहीं ढहि जाइ॥1॥ जैसी मुख तैं नीकसै, तैसी चालै चाल। पारब्रह्म नेड़ा रहै, पल में करै निहाल॥2॥ जैसी मुष तें नीकसै, तैसी चालै नाहिं। मानिष नहीं ते स्वान गति, बाँध्या जमपुर जाँहिं॥3॥ पद गोएँ मन हरषियाँ, सापी कह्याँ अनंद। सों तन नाँव न जाँणियाँ, गल मैं पड़िया फंध॥4॥ करता दीसै कीरतन, ऊँचा करि करि तूंड। जाँणै बूझे कुछ नहीं, यौं ही आँधां रूंड॥5॥373॥