प्रसिद्ध रचनाएँ : रवीन्द्रनाथ ठाकुर

Prasiddh Rachnayen : Rabindranath Tagore


जन गण मन-भारत का राष्ट्रगान

जन गण मन अधिनायक जय हे भारत भाग्य विधाता पंजाब, सिन्ध, गुजरात, मराठा द्राविड़, उत्कल, बंग विन्ध्य, हिमाचल, यमुना, गंगा उच्छल जलधि तरंग तव शुभ नामे जागे तव शुभ आशिष मागे गाहे तव जय गाथा जन गण मंगल दायक जय हे भारत भाग्य विधाता जय हे, जय हे, जय हे जय जय जय जय हे (इस रचना के यहाँ तक के पदों को भारत के राष्ट्रगान होने का सम्मान प्राप्त है। यहाँ से नीचे दिये गये पद भारतीय राष्ट्रगान का अंग नहीं हैं) अहरह तव आह्वान प्रचारित, शुनि तव उदार वाणी हिन्दु बौद्ध शिख जैन पारसिक मुसलमान क्रिस्टानी पूरब पश्चिम आसे तव सिंहासन-पाशे प्रेमहार हय गाथा। जनगण-ऐक्य-विधायक जय हे भारत भाग्य विधाता! जय हे, जय हे, जय हे जय जय जय जय हे पतन-अभ्युदय-वन्धुर-पंथा, युगयुग धावित यात्री, हे चिर-सारथी, तव रथ चक्रेमुखरित पथ दिन-रात्रि दारुण विप्लव-माझे तव शंखध्वनि बाजे, संकट-दुख-श्राता, जन-गण-पथ-परिचायक जय हे भारत-भाग्य-विधाता, जय हे, जय हे, जय हे, जय जय जय जय हे घोर-तिमिर-घन-निविङ-निशीथ पीङित मुर्च्छित-देशे जाग्रत दिल तव अविचल मंगल नत नत-नयने अनिमेष दुस्वप्ने आतंके रक्षा करिजे अंके स्नेहमयी तुमि माता, जन-गण-दुखत्रायक जय हे भारत-भाग्य-विधाता, जय हे, जय हे, जय हे, जय जय जय जय हे रात्रि प्रभातिल उदिल रविच्छवि पूरब-उदय-गिरि-भाले, साहे विहन्गम, पून्नो समीरण नव-जीवन-रस ढाले, तव करुणारुण-रागे निद्रित भारत जागे तव चरणे नत माथा, जय जय जय हे, जय राजेश्वर, भारत-भाग्य-विधाता, जय हे, जय हे, जय हे, जय जय जय जय हे

आमार शोनार बांग्ला-बांग्लादेश का राष्ट्रगान

आमार शोनार बांग्ला आमार शोनार बांग्ला, आमि तोमाए भालोबाशी. चिरोदिन तोमार आकाश, तोमार बताश, अमार प्राने बजाए बाशी. ओ माँ, फागुने तोर अमेर बोने घ्राने पागल कोरे, मोरी हए, हए रे, ओ माँ, ओघ्राने तोर भोरा खेते अमी कि देखेछी मोधुर हाशी. की शोभा, की छाया गो, की स्नेहो, की माया गो, की अचोल बिछाइछो, बोतेर मूले, नोदिर कूले कूले! माँ, तोर मुखेर बानी आमार काने लागे, शुधार मोतो, मोरी हए, हए रे, माँ, तोर बोदोनखानी मोलीन होले, आमि नोयन जोले भाशी. (हिन्दी अनुवाद): मेरा प्रिय बंगाल मेरा सोने जैसा बंगाल, मैं तुमसे प्यार करता हूँ. सदैव तुम्हारा आकाश, तुम्हारी वायु मेरे प्राणों में बाँसुरी सी बजाती है. ओ माँ, वसंत में आम्रकुंज से आती सुगंध मुझे खुशी से पागल करती है, वाह, क्या आनंद! ओ माँ, आषाढ़ में पूरी तरह से फूले धान के खेत, मैने मधुर मुस्कान को फैलते देखा है. क्या शोभा, क्या छाया, क्या स्नेह, क्या माया! क्या आँचल बिछाया है बरगद तले नदी किनारे किनारे! माँ, तेरे मुख की वाणी, मेरे कानो को, अमृत लगती है, वाह, क्या आनंद! मेरी माँ, यदि उदासी तुम्हारे चेहरे पर आती है, मेरे नयन भी आँसुओं से भर आते हैं.

हो चित्त जहाँ भय-शून्य, माथ हो उन्नत

हो चित्त जहाँ भय-शून्य, माथ हो उन्नत हो ज्ञान जहाँ पर मुक्त, खुला यह जग हो घर की दीवारें बने न कोई कारा हो जहाँ सत्य ही स्रोत सभी शब्दों का हो लगन ठीक से ही सब कुछ करने की हों नहीं रूढ़ियाँ रचती कोई मरुथल पाये न सूखने इस विवेक की धारा हो सदा विचारों ,कर्मों की गतो फलती बातें हों सारी सोची और विचारी हे पिता मुक्त वह स्वर्ग रचाओ हममें बस उसी स्वर्ग में जागे देश हमारा. प्रयाग शुक्ल अनूदित गीतांजलि में से

पिंजरे की चिड़िया थी

पिंजरे की चिड़िया थी सोने के पिंजरे में वन कि चिड़िया थी वन में एक दिन हुआ दोनों का सामना क्या था विधाता के मन में वन की चिड़िया कहे सुन पिंजरे की चिड़िया रे वन में उड़ें दोनों मिलकर पिंजरे की चिड़िया कहे वन की चिड़िया रे पिंजरे में रहना बड़ा सुखकर वन की चिड़िया कहे ना... मैं पिंजरे में क़ैद रहूँ क्योंकर पिंजरे की चिड़िया कहे हाय निकलूँ मैं कैसे पिंजरा तोड़कर वन की चिड़िया गाए पिंजरे के बाहर बैठे वन के मनोहर गीत पिंजरे की चिड़िया गाए रटाए हुए जितने दोहा और कविता के रीत वन की चिड़िया कहे पिंजरे की चिड़िया से गाओ तुम भी वनगीत पिंजरे की चिड़िया कहे सुन वन की चिड़िया रे कुछ दोहे तुम भी लो सीख वन की चिड़िया कहे ना .... तेरे सिखाए गीत मैं ना गाऊँ पिंजरे की चिड़िया कहे हाय! मैं कैसे वनगीत गाऊँ वन की चिड़िया कहे नभ का रंग है नीला उड़ने में कहीं नहीं है बाधा पिंजरे की चिड़िया कहे पिंजरा है सुरक्षित रहना है सुखकर ज़्यादा वन की चिड़िया कहे अपने को खोल दो बादल के बीच, फिर देखो पिंजरे की चिड़िया कहे अपने को बाँधकर कोने में बैठो, फिर देखो वन की चिड़िया कहे ना... ऐसे मैं उड़ पाऊँ ना रे पिंजरे की चिड़िया कहे हाय बैठूँ बादल में मैं कहाँ रे ऐसे ही दोनों पाखी बातें करें रे मन की पास फिर भी ना आ पाए रे पिंजरे के अन्दर से स्पर्श करे रे मुख से नीरव आँखे सब कुछ कहें रे दोनों ही एक दूजे को समझ ना पाएँ रे ना ख़ुद समझा पाएँ रे दोनों अकेले ही पंख फड़फड़ाएँ कातर कहे पास आओ रे वन की चिड़िया कहे ना.... पिंजरे का द्वार हो जाएगा रुद्ध पिंजरे की चिड़िया कहे हाय मुझमे शक्ति नही है उडूँ ख़ुद

अगर प्‍यार में और कुछ नहीं

अगर प्‍यार में और कुछ नहीं केवल दर्द है फिर क्‍यों है यह प्‍यार ? कैसी मूर्खता है यह कि चूँकि हमने उसे अपना दिल दे दिया इसलिए उसके दिल पर दावा बनता है,हमारा भी रक्‍त में जलती इच्‍छाओं और आँखों में चमकते पागलपन के साथ मरूथलों का यह बारंबार चक्‍कर क्‍योंकर ? दुनिया में और कोई आकर्षण नहीं उसके लिए उसकी तरह मन का मालिक कौन है; वसंत की मीठी हवाएँ उसके लिए हैं; फूल, पंक्षियों का कलरव सब कुछ उसके लिए है पर प्‍यार आता है अपनी सर्वगासी छायाओं के साथ पूरी दुनिया का सर्वनाश करता जीवन और यौवन पर ग्रहण लगाता फिर भी न जाने क्‍यों हमें अस्तित्‍व को निगलते इस कोहरे की तलाश रहती है ? अंग्रेज़ी से अनुवाद : कुमार मुकुल

ब्राह्मण

सरस्वती नदी के किनारे अँधेरे हैं, सिलवन, छायादार, सूरज ढल चुका है, धुंधलका छा गया है। ऋषि के पुत्र चुपचाप आश्रम में लौटते हैं अपने सिर पर ज्वलन का भार लिए हुए। जंगल से वापस शेड में बुला लिया गया है थकी गायों के शांत नेत्रों में कोमलता का वास होता है। शाम के समय के स्नान को समाप्त करना, झोंपड़ी के बाहर आंगन में, यज्ञ में अग्नि की रोशनी में, गुरु गौतम के चारों ओर, एक घेरे में, वे बैठते हैं। ऊपर ध्यान करते हुए, अनंत, खाली नीला पर एक महान शांति लिखी जाती है, जबकि नक्षत्र, जिज्ञासु पुतलियों की तरह, मूक पंक्तियों में ग्रिड होते हैं। एक शुरुआत के साथ, शांत आश्रम सचेत करता है, जैसा कि गुरु गौतम इन शब्दों को कहते हैं - 'हे प्यारे, इरादे को हावी होने दो, ' ब्रह्म का ज्ञान अब मैं दूंगा'। हाथों की खोहों में उपहार लिए वो पल, आंगन में हम देखते हैं कि एक जवान लड़का खड़ा है। उन्होंने फल और फूल से ऋषि के चरणों की वंदना की। प्रणाम करने के बाद उन्होंने मीठे वचन कहे - 'भगवान, मैं ब्रह्म का ज्ञान चाहता हूँ, 'कुशक्षेत्र वह भूमि है जिस पर मैं घर होने का दावा करता हूं, 'सत्यकाम मेरा नाम है।' इन शब्दों को सुनकर, ब्रह्म के ज्ञाता हल्के से मुस्कुराए। फिर स्नेह से उसने धीरे से कहा- 'आपका कल्याण हो, सज्जन, आप किस गोत्र के हैं? 'प्रिय, ब्रह्म का ज्ञान , केवल एक ब्राह्मण ही प्राप्त कर सकता है।' लड़के ने इतने शांत स्वर में उत्तर दिया, 'भगवान, मेरा गोत्र मैं अभी तक नहीं जानता। 'कृपया मुझे इस कार्य के बाद कल लौटने की अनुमति दें, 'मैं अपनी माँ के पास जाऊँगा और पूछूँगा।' तब उन्होंने ऋषि के चरणों में प्रणाम किया और घने अँधेरे में, जंगल में पटरियों के नीचे, वह वहाँ चला गया रेतीले किनारे तक, पतले, शांत, साफ सरस्वती नदी के उस पार उस गाँव के सोए किनारे तक, उस छोटी सी झोपड़ी में, जहाँ उसकी माँ रहती थी। झोंपड़ी में शाम का दीया जल रहा था, द्वार पर खड़ा था, माता जाबाला की दृष्टि अपने पुत्र के मार्ग पर पड़ी थी। उसे देखते ही उसने उसे अपनी छाती से लगा लिया, उसके बालों को सहलाते हुए, उसने दिलासा देने वाले शब्दों को दबाया। सत्यकाम से पूछा, 'मुझे बताओ माँ, मेरे पिता का नाम क्या है, 'मैंने किस वंश में जन्म लिया है, अपना होने का दावा कर सकता हूं? 'मैं गौतम के पास गया था और दीक्षा मैंने मांगी थी। 'लेकिन गुरु ने कहा, 'प्रिय, केवल एक ब्राह्मण को ही ब्राह्मण का तात्पर्य जानने का अधिकार है' 'हे माँ, मुझे बताओ, मेरा कौन सा गोत्र है?' झंकार शब्द सुनकर जबला का चेहरा उतर गया और धीरे से निम्नलिखित बोला - 'मेरी जवानी में, गरीबी से त्रस्त, 'कई आदमियों की सेवा करके, तुमने मुझे जन्म दिया था। 'आप गोद में पैदा हुए हैं ' जबाला की , जिसका पति न हो। 'प्रिय, तुम्हारे गोत्र के ज्ञान की उसे कमी है।' आश्रम के जंगल के शिखर पर , अगले दिन, एक सुखद नव सवेरा जागा और बिछ गया। और तपस्वी यौवन, मानो ओस से लथपथ, वे धूप नई थीं, आँसुओं और भक्ति से धुले हुए, योग्यता के प्रकाश के रूप में, सुबह नहाने के बाद उनकी जटाओं पर पानी किरकिरा होता है, गुरु गौतम के चारों ओर , शुद्ध और शांत, तेज चमक, वे एक घेरे में बैठते हैं, एक पुराना बरगद का कमरबंद। साथ में मधुमक्खियों का गुंजन, पक्षियों का रोना, और पानी की हंसी उठती है एक साथ कब्र में, शुद्ध आवाज युवा साम भजनों के शांतिपूर्ण उपभेद गाए गए। सत्यकाम उसी क्षण ऋषि के पास गया , उनके चरणों में माथा टेका। फिर वह चुपचाप खड़ा रहा, अपनी दयालु आँखों से देखता रहा। गुरु ने आशीर्वाद दिया और उनसे निम्नलिखित पूछा - 'तुम्हारा कौन सा गोत्र है, हे सज्जन, सुहावने?' लड़के ने अपना चेहरा ऊपर किया और कहा, ' भगवान ! 'मेरा गोत्र मैं नहीं जानता, जब मेरी मां ने पूछा, तो उसने कहा 'कई लोगों को उसने दिलासा दिया था। 'मैं उससे पैदा हुआ हूं जिसका पति नहीं है। 'मेरे गोत्र का ज्ञान, इसलिए, मुझमें कमी है।' शब्द सुनकर विद्यार्थियों ने बात की दबी आवाज़ में, कई कानाफूसी। एक छत्ते में भ्रमित, अशांत मधुमक्खियाँ भिनभिनाती हैं। हक्का-बक्का, कुछ हँसे, कुछ ताने मारे, बेशर्म बदतमीजी देख बेशर्म। लेकिन गुरु गौतम अपने आसन से उठे, अपनी बाहों को फैलाते हुए, वह जिस लड़के से मिला, उसे गले लगा लिया। उन्होंने कहा, 'वास्तव में तुम एक ब्राह्मण हो, 'दो बार जन्म लेने वालों में श्रेष्ठ है तुम्हारा मूल्य, 'सच्चाई की रेखा के लिए आपने जन्म लिया है।' सौम्या डे द्वारा बंगाली मूल से अनुवादित

धीरे चलो, धीरे बंधु

धीरे चलो, धीरे बंधु, लिए चलो धीरे। मंदिर में, अपने विजन में। पास में प्रकाश नहीं, पथ मुझको ज्ञात नहीं। छाई है कालिमा घनेरी।। चरणों की उठती ध्वनि आती बस तेरी रात है अँधेरी।। हवा सौंप जाती है वसनों की वह सुगंधि, तेरी, बस तेरी।। उसी ओर आऊँ मैं, तनिक से इशारे पर, करूँ नहीं देरी!! मूल बांगला से अनुवाद: प्रयाग शुक्ल

झर झर झर जल झरता है

झर झर झर जल झरता है, आज बादरों से। आकुल धारा फूट पड़ी है नभ के द्वारों से।। आज रही झकझोर शाल-वन आँधी की चमकार। आँका-बाँका दौड़ रहा जल, घेर रहा विस्तार।। आज मेघ की जटा उड़ाकर नाच रहा है कौन। दौड़ रहा है मन बूँदों-बूँदों अँधड़ का सह भार। किसके चरणों पर जा गिरता ले अपना आभार।। द्वारों की साँकल टूटी है, अंतर में है शोर, पागल मनुवा जाग उठा है, भादों में घनघोर। भीतर-बाहर आज उठाई,किसने यह हिल्लोर।। मूल बांगला से अनुवाद: प्रयाग शुक्ल

आज दखिन पवन

आज दखिन पवन। झूम उठा पूरा वन।। बजे नूपुर मधुर दिक‍ ललना के सुर। हुआ अंतर भी तो आज रुनझुन।। लता माधवी की हाय आज भाषा भुलाए रहे पत्ते हिलाए करे वंदन।। पंख अपने उड़ाए, चली तितली ये जाए, देने उत्सव का देखो, निमंत्रण मूल बांगला से अनुवाद: प्रयाग शुक्ल

वे तुम्‍हें संपदा का समुद्र कहते हैं

वे तुम्‍हें संपदा का समुद्र कहते हैं कि तुम्‍हारी अंधेरी गहराईयों में मोतियों और रत्‍नों का खजाना है, अंतहीन। बहुत से समुद्री गोताखोर वह खजाना ढूंढ रहे हैं पर उनकी खोजबीन में मेरी रूचि नहीं है तुम्‍हारी सतह पर कांपती रोशनी तुम्‍हारे हृदय में कांपते रहस्‍य तुम्‍हारी लहरों का पागल बनाता संगीत तुम्‍हारी नृत्‍य करती फेनराशि ये सब काफी हैं मेरे लिए अगर कभी इस सबसे मैं थक गया तो मैं तुम्‍हारे अथाह अंतस्‍थल में समा जाउंगा वहां जहां मृत्‍यु होगी या होगा वह खजाना। अंग्रेजी से अनुवाद - कुमार मुकुल

गर्मी की रातों में

गर्मी की रातों में जैसे रहता है पूर्णिमा का चांद तुम मेरे हृदय की शांति में निवास करोगी आश्‍चर्य में डूबे मुझ पर तुम्‍हारी उदास आंखें निगाह रखेंगी तुम्‍हारे घूंघट की छाया मेरे हृदय पर टिकी रहेगी गर्मी की रातों में पूरे चांद की तरह खिलती तुम्‍हारी सांसें , उन्‍हें सुगंधित बनातीं मरे स्‍वप्‍नों का पीछा करेंगी। अंग्रेजी से अनुवाद - कुमार मुकुल

मेरे प्‍यार की ख़ुशबू

मेरे प्‍यार की ख़ुशबू वसंत के फूलों-सी चारों ओर उठ रही है। यह पुरानी धुनों की याद दिला रही है अचानक मेरे हृदय में इच्‍छाओं की हरी पत्तियाँ उगने लगी हैं मेरा प्‍यार पास नहीं है पर उसके स्‍पर्श मेरे केशों पर हैं और उसकी आवाज़ अप्रैल के सुहावने मैदानों से फुसफुसाती आ रही है । उसकी एकटक निगाह यहाँ के आसमानों से मुझे देख रही है पर उसकी आँखें कहाँ हैं उसके चुंबन हवाओं में हैं पर उसके होंठ कहाँ हैं ... अंग्रेज़ी से अनुवाद : कुमार मुकुल

रोना बेकार है

रोना बेकार है व्‍यर्थ है यह जलती अग्नि इच्‍छाओं की। सूर्य अपनी विश्रामगाह में जा चुका है। जंगल में धुंधलका है और आकाश मोहक है। उदास आँखों से देखते आहिस्‍ता क़दमों से दिन की विदाई के साथ तारे उगे जा रहे हैं। तुम्‍हारे दोनों हाथों को अपने हाथों में लेते हुए और अपनी भूखी आँखों में तुम्‍हारी आँखों को कैद करते हुए, ढूँढते और रोते हुए, कि कहाँ हो तुम, कहाँ ओ, कहाँ हो... तुम्‍हारे भीतर छिपी वह अनंत अग्नि कहाँ है... जैसे गहन संध्‍याकाश को अकेला तारा अपने अनंत रहस्‍यों के साथ स्‍वर्ग का प्रकाश, तुम्‍हारी आँखों में काँप रहा है,जिसके अंतर में गहराते रहस्‍यों के बीच वहाँ एक आत्‍मस्‍तंभ चमक रहा है। अवाक एकटक यह सब देखता हूँ मैं अपने भरे हृदय के साथ अनंत गहराई में छलांग लगा देता हूँ, अपना सर्वस्‍व खोता हुआ। अंग्रेज़ी से अनुवाद - कुमार मुकुल

रास्‍ते में जब हमारी आँखें

रास्‍ते में जब हमारी आँखें मिलती हैं मैं सोचता हूँ मुझे उसे कुछ कहना था पर वह गुज़र जाती है और हर लहर पर बारंबार टकराती एक नौका की तरह मुझे कंपाती रहती है- वह बात जो मुझे उससे कहनी थी यह पतझड़ में बादलों की अंतहीन तलाश की तरह है या संध्‍या में खिले फूलों-से सूर्यास्‍त में अपनी खुशबू खोना है जुगनू की तरह मेरे हृदय में भुकभुकाती रहती है निराशा के झुटपुटे में अपना अर्थ तलाशती- वह बात जो मुझे उसे बतानी थी । अंग्रेज़ी से अनुवाद - कुमार मुकुल

आरम्भ

कहाँ मिली मैं ? कहाँ से आई ? यह पूछा जब शिशु ने माँ से कुछ रोती कुछ हँसती बोली, चिपका कर अपनी छाती से छिपी हुई थी उर में मेरे, मन की सोती इच्छा बनकर बचपन के खेलों में भी तुम, थी प्यारी-सी गुड़िया बनकर मिट्टी की उस देव मूर्ति में, तुम्हे गढ़ा करती बेटी मैं प्रतिदिन प्रातः यही क्रम चलता, बनती और मिलती मिट्टी में कुलदेवी की प्रतिमा में भी, तुमको ही पूजा है मैंने मेरी आशा और प्रेम में, मेरे और माँ के जीवन में सदा रही जो और रहेगी, अमर स्वामिनी अपने घर की उसी गृहात्मा की गोदी में, तुम्ही पली हो युगों-युगों से विकसित होती हृदय कली की, पंखुडियाँ जब खिल रही थीं मंद सुगंध बनी सौरभ-सी, तुम ही तो चँहु ओर फिरी थीं सूर्योदय की पूर्व छटा-सी, तब कोमलता ही तो थी वह यौवन वेला तरुणांगों में, कमिलिनी-सी जो फूल रही थी स्वर्ग प्रिये उषा समजाते, जगजीवन सरिता संग बहती तब जीवन नौका अब आकर, मेरे ह्रदय घाट पर रूकती मुखकमल निहार रही तेरा, डूबती रहस्योदधि में मैं निधि अमूल्य जगती की थी जो, हुई आज वह मेरी है खो जाने के भय के कारण, कसकर छाती के पास रखूँ किस चमत्कार से जग वैभव, बाँहों में आया यही कहूँ? "The beginning" का अनुवाद मूल अंग्रेज़ी से अनुवाद : अत्रि 'गरुण'

करता जो प्रीत

दिन पर दिन चले गए,पथ के किनारे गीतों पर गीत,अरे, रहता पसारे ।। बीतती नहीं बेला, सुर मैं उठाता । जोड़-जोड़ सपनों से उनको मैं गाता ।। दिन पर दिन जाते मैं बैठा एकाकी । जोह रहा बाट, अभी मिलना तो बाकी ।। चाहो क्या,रुकूँ नहीं, रहूँ सदा गाता । करता जो प्रीत, अरे, व्यथा वही पाता ।। मूल बांगला से अनुवाद : प्रयाग शुक्ल

आए फिर,लौट गए, आए

उड़ती है धूल, कहती : "थे आए, चैतरात,लौट गए, बिना कुछ बताए ।" आए फिर, लगा यही, बैठा एकाकी । वन-वन में तैर रही तेरी ही झाँकी ।। नए-नए किसलय ये, लिए लय पुरानी, इसमें तेरी सुगंध, पैठी, समानी ।। उभरे तेरे आखर, पड़े तुम दिखाई । हाँ,हाँ, वह उभरी थी तेरी परछाईं ।। डोला माधवी-कुंज,तड़पन के साथ । लगा यही छू लेगा, तुम्हें बढ़ा हाथ ।। मूल बांगला से अनुवाद : प्रयाग शुक्ल

चीन्हूँ मैं चीन्हूँ तुम्हें ओ, विदेशिनी

चीन्हूँ मैं चीन्हूँ तुम्हें ओ, विदेशिनी ! ओ, निवासिनी सिंधु पार की- देखा है मैंने तुम्हें देखा, शरत प्रात में, माधवी रात में, खींची है हृदय में मैंने रेखा, विदेशिनी !! सुने हैं,सुने हैं तेरे गान, नभ से लगाए हुए कान, सौंपे हैं तुम्हें ये प्राण, विदेशिनी !! घूमा भुवन भर, आया नए देश, मिला तेरे द्वार का सहारा विदेशिनी !! अतिथि हूँ अतिथि, मैं तुम्हारा विदेशिनी !! मूल बांगला से अनुवाद : प्रयाग शुक्ल

वन-वन में फागुन लगा, भाई रे !

वन-वन में फागुन लगा, भाई रे ! पात पात फूल फूल डाल डाल देता दिखाई रे !! अंग रंग से रंग गया आकाश गान गान निखिल उदास । चल चंचल पल्लव दल मन मर्मर संग । हेरी ये अवनी के रंग । करते (हैं) नभ का तप भंग ।। क्षण-क्षण में कम्पित है मौन । आई हँसी उसकी ये आई रे । वन-वन में दौड़ी बतास । फूलों से मिलने को कुंजों के पास ।। सुर उसका पड़ता सुनाई रे !! मूल बांगला से अनुवाद : प्रयाग शुक्ल

आया मैं चुनने को फूल यहाँ वन में

आया मैं चुनने को फूल यहाँ वन में जाने था क्या मेरे मन में यह तो, पर नहीं, फूल चुनना जानूँ ना मन ने क्या शुरू किया बुनना जल मेरी आँखों से छलका, उमड़ उठा कुछ तो इस मन में । मूल बांगला से अनुवाद : प्रयाग शुक्ल

चुप-चुप रहना सखी

चुप-चुप रहना सखी, चुप-चुप ही रहना, काँटा वो प्रेम का- छाती में बींध उसे रखना तुमको है मिली सुधा, मिटी नहीं अब तक उसकी क्षुधा, भर दोगी उसमें क्या विष ! जलन अरे जिसकी सब बेधेगी मर्म, उसे खींच बाहर क्यों रखना !! मूल बांगला से अनुवाद : प्रयाग शुक्ल

जन्मकथा

” बच्चे ने पूछा माँ से , मैं कहाँ से आया माँ ? “ माँ ने कहा, ” तुम मेरे जीवन के हर पल के संगी साथी हो !” जब मैं स्वयं शिशु थी, खेलती थी गुडिया के संग , तब भी, और जब शिवजी की पूजा किया करती थी तब भी, आंसू और मुस्कान के बीच बालक को , कसकर, छाती से लिपटाए हुए , माँ ने कहा , ” जब मैंने देवता पूजे, उस वेदिका पर तुम्ही आसीन थे , मेरे प्रेम , इच्छा और आशाओं में भी तुम्ही तो थे ! और नानी माँ और अम्मा की भावनाओं में भी, तुम्ही थे ! ना जाने कितने समय से तुम छिपे रहे ! हमारी कुलदेवी की पवित्र मूर्ति में , हमारे पुरखो की पुरानी हवेली मेँ तुम छिपे रहे ! जब मेरा यौवन पूर्ण पुष्प सा खिल उठा था, तुम उसकी मदहोश करनेवाली मधु गँध थे ! मेरे हर अंग प्रत्यंग में तुम बसे हुए थे तुम्ही में हरेक देवता बिराजे हुए थे तुम, सर्वथा नवीन व प्राचीन हो ! उगते रवि की उम्र है तुम्हारी भी, आनंद के महासिंधु की लहर पे सवार, ब्रह्माण्ड के चिरंतन स्वप्न से , तुम अवतरित होकर आए थे। अनिमेष द्रष्टि से देखकर भी एक अद्भुत रहस्य रहे तुम ! जो मेरे होकर भी समस्त के हो, एक आलिंगन में बध्ध , सम्बन्ध , मेरे अपने शिशु , आए इस जग में, इसी कारण मैं , व्यग्र हो, रो पड़ती हूँ, जब, तुम मुझ से, दूर हो जाते हो… कि कहीँ, जो समष्टि का है उसे खो ना दूँ कहीँ ! कैसे सहेज बाँध रखूँ उसे ? किस तिलिस्मी धागे से ? अनुवाद : – लावण्या दीपक शाह

अयि! भुवन मन मोहनी

अयि! भुवन मन मोहनी निर्मल सूर्य करोज्ज्वल धरणी जनक-जननी-जननी।। अयि... अयि! नली सिंधु जल धौत चरण तल अनिल विकंपित श्यामल अंचल अंबर चुंबित भाल हिमाचल अयि! शुभ्र तुषार किरीटिनी।। अयि... प्रथम प्रभात उदय तव गगने प्रथम साम रव तव तपोवने प्रथम प्रचारित तव नव भुवने कत वेद काव्य काहिनी।। अयि... चिर कल्याणमयी तुमि मां धन्य देश-विदेश वितरिछ अन्न जाह्नवी, यमुना विगलित करुणा पुन्य पीयूष स्तन्य पायिनी।। अयि... अयि! भुवन मन मोहिनी। रचनाकाल: सन 1930

जीवन जब सूख जाए

जीवन जब सूख जाए करुणाधारा में आना समस्त माधुरी छुप जाए गीतसुधारस में आना कर्म ले जब प्रबल-आकार गरज उठे ढाक से दिशा चार हृदयप्रान्त में हे नीरवनाथ , शान्तचरण से आना स्वयं को जब बना कृपण कोने में रहे पड़ा दीनहीन मन द्वार खोल, हे उदार नाथ ! राज समारोह में आना इच्छा मिले जब विपुल धूल में कर अन्धा अबोध भूल में हे पवित्र, हे अनिद्र रूद्र आलोक में आना । मूल बांगला से अनुवाद : सुलोचना वर्मा

उदारचरितानाम

प्राचीर की छिद्र में एक नामगोत्रहीन खिला है छोटा फूल अतिशय दीन धिक् धिक् करता है उसे कानन का हर कोई सूर्य उगकर उससे कहता, कहो कैसे हो भाई ? मूल बांगला से अनुवाद : सुलोचना वर्मा

भक्ति और अतिभक्ति

भक्ति है आती रिक्तहस्त प्रसन्नवदन अतिभक्ति कहे, देखूँ कितना मिलता है धन भक्ति कहे, मन में है, नहीं दिखाने की औक़ात अतिभक्ति कहे, मुझे तो मिलता हाथोंहाथ । मूल बांगला से अनुवाद : सुलोचना वर्मा

हार-जीत

ततैये मधुमक्खी के बीच हुई रस्साकशी हुआ महातर्क दोनों में शक्ति ज्यादा किसकी ततैया कह रहा, है सहस्र प्रमाण तुम्हारा दंश नहीं है मेरे समान मधुकर निरुत्तर, छलछला उठी ऑंखें वनदेवी कहती कानों में उसके धीरे क्यूँ बाबू, नतसिर! यह बात है निश्चित विष से तुम जाते हो हार और मधु से जीत मूल बांगला से अनुवाद : सुलोचना वर्मा

मेरा सिर नत कर दो

मेरा सिर नत कर दो, हे देव, तुम्हारी चरण-धूल के तल में । अहंकार सब हे देव मेरे डुबा दो आँखों के जल में । करने को अपना गौरव दान किया अपना केवल अपमान, स्वयं को केवल घुमा - घुमा कर चकराकर मरता हूं पल-पल में । अहंकार सब हे देव मेरे डुबा दो आँखों के जल में । स्वयं का कहीं न करूँ प्रचार मेरे अपने काम में; अपनी ही इच्छा करो हे देव पूर्ण मेरे जीवन धाम में । माँगता हूँ तुम्हारी चरम शान्ति प्राणों में तुम्हारी परम कान्ति मुझे छुपाकर रख लो अपने हृदय-कमल के दल में । अहंकार सब हे देव मेरे डुबा दो आँखों के जल में । मूल बांगला से अनुवाद : सुलोचना वर्मा

अन्तर मेरा विकसित करो

अन्तर मेरा विकसित करो अन्तरतर हे ! निर्मल करो, उज्ज्वल करो, सुन्दर करो हे ! जाग्रत करो, उद्यत करो, निर्भय करो हे ! मंगल करो, निरलस नि:संशय करो हे ! अन्तर मेरा विकसित करो, अन्तरतर हे । सबके संग युक्त करो, मुक्त करो हे बन्ध, सकल मर्म में संचार करो शान्त तुम्हारे छ्न्द । चरणकमल में चित्त मेरा निस्पन्दित करो हे, नन्दित करो, नन्दित करो, नन्दित करो हे ! अन्तर मेरा विकसित करो अन्तरतर हे ! मूल बांगला से अनुवाद : सुलोचना वर्मा

मेघदूत

कविवर, कब किस विस्मृत बरस में किस पुण्य आषाढ़ के प्रथम दिवस में लिखा था तुमने मेघदूत ? मेघमन्द्र श्लोक विश्व में विरही हैं जितने, उन सबके शोक रखा है अपना अंधेरा कई तहों में सघन संगीत के मध्य में पुंजीभूत करके । उस दिन उज्जयिनी के उस प्रासाद-शिखर पर न जाने कैसी घन घटा, विद्युत-उत्सव, उद्दाम पवनवेग, गुड़गुड़ रव । गम्भीर निर्घोष उस मेघ संघर्ष का जगा उठा सहस्र वर्षों के अन्तरगूढ़ वाष्पाकुल विच्छेद क्रन्दन को एक दिन में | तोड़कर काल के बन्धन को उस दिन बह निकले थे अविरल चिरकाल से अवरुद्ध अश्रुजल आद्र करते हुए तुम्हारी उदार श्लोकराशि । उस दिन क्या संसार के समस्त प्रवासी जोड़ हस्त मेघपथ पर शून्य की ओर उठा माथा गाते थे समवेत स्वर में विरह की गाथा लौटकर प्रिय के गृह ? बन्धनविहीन नवमेघपंख पर कर आसीन भेजनी चाही थी प्रेमवार्ता अश्रुवाष्प से भरा - दूर वातायन में यथा विरहन थी सोई भूतलशयन में मुक्तकेश में, म्लान वेश में, सजल नयन में ? उन सबों का गीत तुम्हारे संगीत में भेज दिया क्या, कवि, दिवस में, निशीथ में देश-देशान्तर में, ढूँढ़ते हुए विरहिणी प्रिया ? श्रावण में जाहन्वी का जैसा हो जाता है प्रवाह खींच लाती है दिग्दिगन्त से वारिधारा महासमुद्र के मध्य होने के लिए दिशाहारा । पाषाण-शृंखलाओं में जैसे है बन्दी हिमाचल आषाढ़ के अनन्त शून्य में हेरता हूँ मेघदल होकर कातर लेता श्वास स्वाधीन-गगनचारी सहस्र कन्दराओं से ला वाष्प राशि-राशि भेजता है गगन की ओर; दौड़ते हैं वे भागने की कामना करते हुए; शिखर पर चढ़कर सब मिलकर अन्त में हो जाते हैं एकाकार, समस्त गगनतल पर जमा लेते हैं अधिकार । उस दिन के बाद से बीते कई सौ दिन प्रथम दिवस की स्निग्ध वर्षा नवीन । प्रत्येक वर्षा दे गई नवीन जीवन तुम्हारे काव्य पर बरसाकर बरिषण नववृष्टि वारिधारा, करते हुए विस्तार नवघन स्निग्ध छाया का करते हुए संचार नव नव प्रतिध्वनि जलद-मन्द्र की, स्फीत कर स्रोत-वेग तुम्हारे छन्द की वर्षातरंगिणी के समान । कितने काल से कितने विरही लोगों ने, प्रियतमाविहीन घरों में, वृष्टिक्लान्त बहुदीर्घ लुप्त तारा शशि आषाढ़ संध्या में क्षीण दीपलोक में बैठ उस छन्द का मन्द-मन्द कर उच्चारण निमग्न किया है निज विजन वेदना उन सबका कण्ठ-स्वर कानों में आता है मेरे समुद्र के तरंगों की कलध्वनि के समान तुम्हारे काव्य के भीतर से । भारत की पूर्वी सीमा पर बैठा हूँ आज मैं जिस श्यामल बंग देश में जहाँ कवि जयदेव ने वर्षा के एक दिन देखी थी दिगन्त के तमालविपिन में श्यामल छाया, मेघों से पूर्ण मेंदुर अम्बर । आज अन्धकार दिवा, वृष्टि झर-झर पवन दुरन्त अति, अपने आक्रमण में अरण्य बाहें उठाकर कर रही है हाहाकार । विद्युत् झाँक रही है चीरकर मेघ भार बरसकर शून्य में सुतीक्ष्ण वक्र मुस्कान के साथ । अन्धेरे बन्द गृह में बैठकर अकेला पढ़ रहा हूँ मेघदूत; मेरा गृह-त्यागी मन मुक्तगति मेघों की पीठ पर जमाकर आसन, उड़ रहा है देश-देशान्तर में । है कहाँ सानुमान आम्रकूट; बहती है कहाँ विमल विशीर्ण रेवा विन्ध्यपदमूल में शिलाओं से बाधित है जिसकी गति; वेत्रवती के तीर पर पके फलों से श्याम दिखने वाले जम्बू-वन की छाया में कहाँ छिपा हुआ है दशार्ण ग्राम खिली हुई केतकी के बाड़े से घिरा; पथतरुशाख पर जहाँ ग्रामविहंगों ने बनाए हैं अपने वर्षाकालीन नीड़, कलरव से पूर्ण वनस्पति; न जाने किस नदी के तीर पर वह जुहीवन में विहार करने वाली वनांगना लौट रही है, तप्त कपोल के ताप से क्लान्त कर्णोतपल मेघ की छाया लग वह हो रही है विकल; भ्रू विलास नहीं सीखा; कौन हैं वे नारियाँ जनपद की वधुएँ गगन में निहारती घनघटा, उर्ध्व नेत्र से देखती हैं मेघपथ की ओर, घननील छाया पड़ती है सुनील नयनों में; मेघों से श्याम वह कौन सा है शैल जिसकी शिला पर मुग्ध सिद्धान्गना स्निग्ध नवघन को देख हुई थी अनमना शिला के नीचे, सहसा भयानक झंझा के आते ही चकित, चकित हो भय से काँपती थर-थर वसन सम्भाल ढूँढ़ती फिरती गुहाश्रय, कहती हैं,"ओ माँ, लगता है गिरि-शृंग उड़ा कर ले जाएगी" कहाँ है अवन्तिपुरी; निर्विन्ध्या तटिनी; कहाँ उज्जयिनी ढूँढ़ती शिप्रा नदी के जल में स्वयं हिमछाया - जहाँ द्विप्रहर में प्रणय चंचलता भूल भवन के शिखर में सुप्त कपोत, है केवल विरह विकार में रमणी निकलती है बाहर प्रेम-अभिसार के लिए सूची भेद्य अन्धकार में राजपथ के मध्य कदाचित विद्युतलोक में; कहाँ विराजता है ब्रह्म्नावर्त में कुरुक्षेत्र; कहाँ है कनखल, जहाँ वह चंचल यौवना जहूकन्या, गौरी की भृकुटी भंगिमा की कर अवहेलना छोड़कर झाग कर रही है परिहास पकड़कर धुर्जटि की जटा भाल चन्द्रस्पर्शी तरंग रूपी हाथों से इस प्रकार मेघ रूप में कई देशों से होकर हृदय तैरता जाता है, उत्तरीय के अन्त में कामनाओं का मोक्षधाम अलका के मध्य, विरहणी प्रियतमा विराजती है जहाँ होती है सौन्दर्य की आदिसृष्टि | कौन ले जा सकता था वहाँ, तुम्हें छोड़, बिना खर्च के लक्ष्मी की विलासपूरी - अमर भुवन में ! अनन्त वसन्त में जहाँ नित्य पुष्पवन में नित्य चन्द्रलोक में, इन्द्रनील पर्वत के मूल में स्वर्ण सरोज खिलकर सरोवर कूल में मणिमहल के असीम सम्पदा में हो निमग्न रो रहे हैं एकाकीपन की विरह वेदना पर । खुले वातायन से उन्हें देखा जा सकता शैयाप्रान्त में लीन कमनीय क्षीण शाशिरेखा पूर्व गगन के मूल में लगभग अस्तप्राय । कवि, तुम्हार मन्त्र से आज मुक्त हो जाता है रुद्ध हो चुकी है इस हृदय के बन्धन की व्यथा; पाया है विरह का स्वर्गलोक, जहाँ चिरनिशि जाप रही है विरहिणी प्रिया जागकर अकेले अनन्त सौन्दर्य के साथ । फिर खो जाता है- ढूँढ़ता हूँ चहुँओर वृष्टि होती है अविरल; छा जाता है अन्धियारा आई है निर्जन निशा; प्रान्त के अन्त में रोता हुआ चला जा रहा है वायु बिना किसी उद्देश के। सोच रहा हूँ आधी रात, हैं अनिद्रनयान, किसने दिया ऐसा श्राप, काहे का व्यवधान ? क्यूँ उर्ध्व में देख रोता रुद्ध मनोरथ ? क्यूँ प्रेम को नहीं मिल पाता निज पथ ? सशरीर कौन नर गया है वहाँ, मानस सरसी तट पर विरह निद्रित रविहीन मणिदीप्त साँझ के देश में जगत की नदी, गिरी, सभी के शेष में । मूल बांगला से अनुवाद : सुलोचना वर्मा

अफ़्रीका

उद्भ्रान्त उस आदिम युग में जब स्रष्टा ने स्वयं से होकर असन्तुष्ट किया था विध्वस्त नूतन सृष्टि को बारम्बार, अधैर्य होकर बार-बार अपना सर हिलाने के उन दिनों में रुद्र समुद्र के बाहू प्राची धरित्री के सीने से छीनकर ले गए तुम्हें, अफ्रीका, बाँधा तुम्हें वनस्पतियों के निविड़ पहरे में कृपण आलोक के अन्तःपुर में । वहाँ तुमने निभृत अवकाश पर किया संग्रह दुर्गम के रहस्यों को, पहचान रहे थे तुम जल, स्थल और आकाश के दुर्बोध संकेतों को, प्रकृति का दृष्टि-अतीत जादू जगा रहा था मंत्र तुम्हारी चेतनातीत मन में । विद्रूप कर रहा था भीषण को विरूप के छद्मवेश में, चाह रहा था शंका से हार मनवा लेना स्वयं को कर उग्र विभीषिका की प्रचण्ड महिमा में ताण्डव के दुन्दुभिनाद में । हाय छायावृता, काले घूँघट के पीछे अपरिचित था तुम्हारा मानवरूप उपेक्षा की आबिल दृष्टि में । वे आए लोहे की हथकड़ी लेकर जिनके नाखून भेड़ियों से भी हैं तेज, आए लोगों कों गिरफ्तार करनेवाले दल गर्व से जो हैं अन्धे तुम्हारी बिना सूर्य की रौशनी वाले अरण्य से अधिक। सभ्यों के बर्बर लोभ ने नग्न की अपनी निर्लज्ज अमानवीयता । तुम्हारे भाषाहीन क्रन्दन के वाष्पाकुल अरण्य पथ पर पंकिल हुई धूल तुम्हारे रक्त और अश्रु में मिल; बड़े पाँव वाले कँटीले जूतों के नीचे वीभत्स कीचड़ पिण्ड चिरचिन्ह लगा गए तुम्हारे अपमानित इतिहास में । समुद्र तट पर उसी मुहूर्त उनके हर मोहल्ले के गिरजाघरों में बज रहा था प्रार्थना का घड़ियाल सुबह- शाम, दयामय देवता के नाम पर; शिशु खेल रहे थे माँ की गोद में; कवि के संगीत से गुंजायमान थी सुन्दरता की आराधना । आज जब पश्चिम-दिगन्त में प्रदोष काल के झंझा बतास से है रुद्ध श्वास , जब बाहर निकल आए पशु गुप्त गुफ़ा से, अशुभ ध्वनि के साथ करता है घोषणा दिन का अन्तिम काल, आओ, युगान्तकारी कवियों, आसन्न संध्या की शेष रश्मिपात में खड़े हो जाओ उस सम्मान खो चुकी मानवी के द्वार पर, कहो — "क्षमा कीजिए" — हिंस्र प्रलाप के मध्य वही हो तुम्हारी सभ्यता की शेष पुण्यवाणी । मूल बांगला से अनुवाद : सुलोचना वर्मा

अन्त की कविता

काल के यात्रा की ध्वनि सुन पाती हो क्या ? उसी का रथ गायब रहता है नित्य । बढ़ाया है अन्तरिक्ष का हृदय-स्पन्दन, चक्र द्वारा रौंदे गए अन्धेरे में तारों का हृदय-विदारक क्रन्दन । ओ बन्धु, वह धावमान काल गले से लगाया मुझे फैलाकर अपना जाल — उठा लिया मुझे अपने द्रुत रथ पर दुस्साहसी भ्रमण के पथ पर तुम से बहुत दूर । ऐसा लगता है कि अजस्र मृत्युओं को पार कर आया हूँ आज नवप्रभात के शिखर पर; रथ का चंचल वेग उड़ाता है हवाओं में मेरा पुराना नाम । लौटने का रास्ता नहीं है; अगर तुम दूर से देखोगी मुझे पहचान नहीं सकोगी । ऐ बन्धु, विदा । किसी दिन कर्महीन पूर्ण अवकाश में वसन्त के बतास में अतीत के तट से जिस रात बहेगी दीर्घश्वास, झड़े बकुल के रोने से व्यथित होगा आकाश, उस क्षण ढू्ँढ़कर देखना, कुछ मेरे पीछे रह गया वह तुम्हारी आत्मा की आत्मा में, विस्मृति प्रदोष में शायद वह देगा ज्योति, शायद धारण करेगा कभी नामहीन स्वप्न की मूर्ति । फिर भी वह तो सपना नहीं है, सबसे अधिक सत्य मेरा, वह है मृत्युंजय, वह है मेरा प्रेम । उसे मै रख आया अपरिवर्तन अर्घ्य तुम्हारे लिए । परिवर्तन के स्रोत में बह जाता हूँ मैं काल की यात्रा में । ऐ बन्धु, विदा । तुम्हारी नहीं हुई कोई क्षति । मर्त्य की मिट्टी है मेरी, इसलिए देकर अमृत मूर्त्ति यदि की हो सृष्टि, उसी की आरती हो फिर संध्या की बेला में । पूजा का वह खेल व्यवधान नहीं होगा मेरी ओर से हर दिन के म्लान स्पर्श से; तृषार्त आवेग वेग से भ्रष्ट नहीं होगा उसका कोई फूल नैवेद्य की थाली में । तुम्हारा मानस भोज में यत्नपूर्वक सजाया जिस भावरस का पात्र वाणी की तृषा में उसके साथ नहीं मिलाऊँगा जो है मेरी धूल का धन, जो है मेरे आँसुओं से गीला । आज भी तुम ख़ुद शायद दोगी वचन मेरी स्मृति भर देकर स्वप्नाविष्ट अपना वचन । भार उसका नहीं रहेगा, न दायित्व रहेगा । ऐ बन्धु, विदा । मेरे लिए न करना शोक, मेरे पास है कर्म, मेरे पास है विश्वलोक । मेरा पात्र रिक्त नहीं हुआ है, शून्य को मैं करूँगा पूर्ण, इस व्रत का पालन करूँगा सदा । उत्कण्ठावश मेरे लिए कोई अगर प्रतीक्षारत हो वह मुझे धन्य करेगी । शुक्लपक्ष से लाता हूँ रजनीगन्धा के वृन्त जो सजा सकते हैं अर्घ्य की थाली कृष्णपक्ष की रात में, जो मुझे देख सकती है अनन्त क्षमा में अच्छा, बुरा सब मिलाकर, इसबार उसकी पूजा में देना चाहता हूँ अपनी बलि । तुम्हें जो दिया था, उसका पाया तुमने निःशेष अधिकार । यहाँ मेरे दान का हर एक बून्द, करुण मुहूर्त सब अंजुरी भर पीया मेरी ह्रदय अंजली से । सुनो, तुम हो निरुपम, हे ऐश्वर्यवान, तुम्हें जो कुछ दिया वह था तुम्हारा ही दान; ग्रहण किया जितना ऋणी किया मुझे उतना । ऐ बन्धु, विदा । मूल बांगला से अनुवाद : सुलोचना वर्मा

हाइकु

कविवर रवीन्द्रनाथ ठाकुर ने 1919 में जापान-यात्रा से लौटने के पश्चात् ‘जापान-यात्री’ में हाइकु की चर्चा करते हुए बंगला में दो कविताओं के अनुवाद प्रस्तुत किये। इन्हें भारतीय धरती पर अवतरित पहले हाइकु के रूप में जाना जाता है वे कविताएँ हैं- (1) पुरोनो पुकुर ब्यांगेर लाफ जलेर शब्द (हिन्दी भावानुवाद) पुराना तालाब मेंढक की कूद पानी की आवाज (2) पचा डाल एकटा को शरत्काल (हिन्दी भावानुवाद) सूखी डाल एक कौआ शरत्काल दोनों अनुवाद शब्दिक हैं और जापानी हाइकुकार बाशो की प्रसिद्ध कविताओं के हैं।

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