निरुपमा, करना मुझको क्षमा : रवीन्द्रनाथ ठाकुर मूल बांगला से अनुवाद प्रयाग शुक्ल

Nirupama Karna Mujhko Kshama : Rabindranath Tagore Translator Prayag Shukla


(रवीन्द्रनाथ ठाकुर के गीतों के वृहद् संकलन 'गीतवितान' से चुनकर इन गीतों का अनुवाद मूल बांग्ला से ही किया गया है।)

ओरे मेरे भिखारी !

ओगो काङाल, आमारे काङाल करेछ, आरो की तोमार चाइ । ओगो भिखारि, आमार भिखारि, चलेछ की कातर गान गाई ।। ओरे, ओरे भिखारी, मुझे किया है भिखारी, और चाहो भला क्या तुम ! ओरे ओरे भिखारी, ओरे मेरे भिखारी, गान कातर सुनाते हो क्यों ।। रोज़ दूँगी तुम्हें धन नया ही अरे, साध पाली थी मन में यही, सौंप सब कुछ दिया, एक पल में ही तो पास मेरे बचा कुछ नहीं ।। तुमको पहनाया मैंने वसन । घेर आँचल से तुमको लिया ।। आस पूरी की मैंने तुम्हारी, अपने संसार से सब दिया ।। मेरा मन प्राण यौवन सभी, देखो मुट्ठी, उसी में तो है ।। ओरे मेरे भिखारी, ओरे, ओरे भिखारी हाय चाहो अगर और भी, कुछ तो दो फिर मुझे और तुम ।। लौटा जिससे सकूँ उसको तुमको ही मैं, ओ भिखारी ।। ('गीत पंचशती' में 'प्रकृति' के अन्तर्गत 33 वीं गीत-संख्या)

ओ करबी, ओ चंपा

सहसा डालपाला तोर उतला जे ओ चांपा, ओ करबी ओ करबी, ओ चंपा, चंचल हौठीं तेरी डालें । किसको है देख लिया तुमने आकाश में जानूँ ना जानूँ ना ।। किस सुर का नशा हवा घूम रही पागल, ओ चंपा, ओ करबी । बजता है नुपुर ये किसका जानूँ ना ।। क्षण क्षण में चमक चमक उठतीं तुम । करती हो रह रह कर ध्यान भला किसका ।। किसके रंग हुई बेहाल फूल फूल उठती हर डाल । किसने है आज किया अदभुत्त ये साज जानूँ ना ।। ('गीत पंचशती' में 'प्रकृति' के अन्तर्गत 56 वीं गीत-संख्या)

ओ री, आम्र मंजरी, ओ री, आम्र मंजरी

ओ मंजरी, ओ मंजरी, आमेर मंजरी आज हृदय तोमार उदास हये पड़छे कि झरि। ओ री, आम्र मंजरी, ओ री, आम्र मंजरी क्या हुआ उदास हृदय क्यों झरी ।। गंध में तुम्हारी धुला मेरा गान दिशि-दिशि में गूँज उसी की तिरी ।। डाल-डाल उतरी है पूर्णिमा, गंध में तुम्हारी, मिली आज चन्द्रिमा ।। दौड़ रही पागल हो दखिन वातास, तोड़ रही अर्गला, इधर गई, उधर गई, चहुँदिश है वो फिरी ।। ('गीत पंचशती' में 'प्रकृति' के अन्तर्गत 43 वीं गीत-संख्या)

मन में है बसा वही मधुर मुख

ओइ मधुर मुख जागे मन । भुलिब ना ए जीवने, की स्वपने की जागरणे ।। मन में है बसा वही मधुर मुख । जागूँ या देखूँ मैं सपना, लगे वही अपना ।। जीवन में भूलूँगा कभी नहीं । जानो या जानो न तुम ।। मन में है बजे सदा वही मधुर बाँसुरी । मन में जो बसे तुम । बता नहीं पाऊँ । इन कातर नयनों में वही रखूँ सनमुख ।। ('गीत पंचशती' में 'प्रकृति' के अन्तर्गत 9 वीं गीत-संख्या)

तुम आओ

तुम नव-नव रूपे एसो प्राणे ! नव रूप लिए प्राणों में तुम आओ । गन्धों रंगों गानों में तुम आओ ।। पुलकित स्पर्शों अंगों तुम आओ । हो चित्त सुधामय हर्षित तुम आओ ।। इन मुग्ध चकित नयनों में तुम आओ । ओ ! निर्मल उज्ज्वल कान्त । सुन्दर स्निग्ध प्रशान्त ।। हो अद्भुत्त एक विधान तुम आओ । सुख-दुःख जीवन मर्मों में तुम आओ ।। सब नित्य नित्य कर्मों में तुम आओ । जब कर्म सभी हों पूरे तुम आओ ।। ('गीत पंचशती' में 'पूजा' के अन्तर्गत 40 वीं गीत-संख्या)

मेरे बादल में मादल बजे

बादल मेघे मादल बाजे, गुरु गुरु गगन माझे । मेघ बादल में मादल बजे, गगन मेंसघन सघन वो बजे ।। उठ रही कैसी ध्वनि गंभीर, हृदय को हिला-झुला वो बजे । डूब अपने में रह-रह बजे ।। गान में कहीं प्राण में कहीं— कहींतो गोपन थी यह व्यथा आज श्यामल बन — छाया बीच फैलकर कहती अपनी कथा । गान में रह-रह वही बजे ।। ('गीत पंचशती' में 'प्रकृति' के अन्तर्गत 40 वीं गीत-संख्या)

पथ का वह बंधु, बंधु वही तेरा है, बंधु वही

सेई तो तोमार पथेर बंधु सेई तो पथ का वह बंधु गंध लिए कुसुमों की पथ का वह बंधु उसका आलोक अरे बंधु वही तेरा है बंधु वही तो । कहे मधु खोजो मधु वही तो ।। बंधु वही तो । उसका अंधियार अभी-अभी यहीं और अभी नहीं वो ।। बंधु वही तो !

विपुल तरंग रे, विपुल तरंग रे

विपुल तरंग रे, विपुल तरंग रे! उद्वेलित हुआ गगन, मगन हुए गत आगत उज्ज्वल आलोक में झूमा जीवन चंचल । कैसी तरंग रे ! दोलित दिनकर — तारे — चंद्र रे ! काँपी फिर चमक उठी चेतना, नाचे आकुल चंचल नाचे कुल ये जगत, कूजे हृदय विहंग । विपुल तरंग रे, विपुल तरंग रे !! ('गीत पंचशती' में 'पूजा' के अन्तर्गत 45 वीं गीत-संख्या)

चुप-चुप रहना सखि

नीरवे थाकिस, सखी ओ तुई नीरवे थाकिस चुप चुप रहना सखी, चुप चुप ही रहना, काँटा वो प्रेम का— छाती में बींध उसे रखना । तुमको है मिली सुधा, मिटी नहीं अब तक उसकी क्षुधा, भर दोगी उसमें क्या विष ! जलन अरे, जिसकी सब बींधेगी मर्म, उसे खींच बाहर क्यों रखना !! ('गीत वितान' में 'प्रेम' के अन्तर्गत 338 वीं गीत-संख्या)

बजो, रे बंशी, बजो

बाजो रे बाँशरि, बाजो । बजो, रे बंशी, बजो । सुंदरी, चंदनमाला में, अरे मंगल संध्या में सजो । लगे यह मधु-फागुन के मास, पांथ वह आता है चंचल— अरे वह मधुकर कंपित फूल नहीं आया आँगन में खिल । लिए रक्तिम अंशुक माथे, हाथ में कंकण किंशुक के, मंजरी से झंकृत पदचाप, गंध यह मंथर बिखराती, गीत वंदन के तुम गाकर, कुंज में गुंजन बनकर सजो ।। ('गीत पंचशती' में 'विचित्र' के अन्तर्गत 41 वीं गीत-संख्या)

बह रही आनन्दधारा भुवन में

आनन्दधारा बहिछे भुवने बह रही आनन्दधारा भुवन में, रात-दिन अमृत छलकता गगन में ।। दान करते रवि-शशि भर अंजुरी, ज्योति जलती नित्य जीवन-किरण में ।। क्यों भला फिर सिमट अपने आप में बंद यों बैठे किसी परिताप में ।। क्षुद्र दुःख सब तुच्छ, बंदी क्यों बनें, प्रेम में ही हों हृदय अपने सने ।। हृदय को बस प्रेम की रस-धार दो । दिशाओं में उसे ख़ूब प्रसार दो ।। ('गीत पंचशती' में 'पूजा' के अन्तर्गत 5 वीं गीत-संख्या)

सोने के पिंजरे में नहीं रहे दिन

दिनगुलि मोर सोनार खाँचाय र‍इल ना सोने के पिंजरे में नहीं रहे दिन । रंग-रंग के मेरे वे दिन ।। सह न सके हँसी-रुदन ना कोई बँधन । थी मुझको आशा— सीखेंगे वो प्राणों की भाषा ।। उड़ वे तो गए कही नही सकल कथा । कितने ही रंगों के मेरे वे दिन ।। देखूँ ये सपना टूटा जो पिंजरा वे उसको घेर । घूम रहे हैं लो चारों ओर । रंग भरे मेरे वे दिन । इतनी जो वेदना हुई क्या वृथा ! क्या हैं वे सब छाया-पाखि ! कुछ भी ना हुआ वहाँ क्या नभ के पार, कुछ भी वहन !! ('गीत पंचशती' में 'विचित्र' के अन्तर्गत 34 वीं गीत-संख्या)

परवासी, आ जाओ घर

परवासी, चले एसो घरे परवासी, आ जाओ घर नैय्या को मोड़ लो इधर ।। देखो तो कितनी ही बार नौका है नाविक की हुई आर-पार ।। मांझी के गीत उठे अंबर पुकार । गगन गगन आयोजन पवन पवन आमंत्रण ।। मिला नहीं उत्तर पर, मन ने हैं खोले ना द्वार ।। हुए तभी गृहत्यागी, निर्वासित कर डाले अंतर-बाहर ।। ('गीत पंचशती' में 'विचित्र' के अन्तर्गत 49 वीं गीत-संख्या)

आज जागी क्यों मर्मर-ध्वनि !

आजि मर्मर-ध्वनि केन जागिल रे ! आज जागी क्यों मर्मर-ध्वनि ! पल्लव पल्लव में मेरे हिल्लोल, हुआ घर-घर अरे कंपन ।। कौन आया ये द्वारे भिखारी, माँग उसने लिए मन-धन ।। जाने उसको मेरा यह हृदय, उसके गानों से फूटें कुसुम । आज अंतर में बजती मेरे, उस पथिक की-सी बजती है ध्वनि ।। नींद टूटी, चकित चितवन । ('गीत पंचशती' में 'पूजा' के अन्तर्गत 133 वीं गीत-संख्या)

किसका आघात हुआ फिर मेरे द्वार

के दिल आबार आघात आमार दुयारे ! किसका आघात हुआ फिर मेरे द्वार । कौन, कौन इस निशीथ खोज रहा है किसको— आज बार-बार ।। बीत गए कितने दिन, आया था वह अतिथि नवीन, दिन था वह वासन्ती— जीवन कर गया मगन पुलक भरी तन-मन में— फिर हुआ विलीन ।। झर-झर-झर झरती बरसात । छाया है तिमिर आज रात ।। अतिथि वह अजाना है लगते पर बड़े मधुर, उसके सब गीत-सुर ।। सोच रहा जाऊँगा मैं उसके साथ— अनजाने इस असीम अंधकार ।। ('गीत वितान' में 'प्रेम' के अन्तर्गत 154 वीं गीत-संख्या)

आज बादल-गगन, गोधूली-लगन

आजि गोधूलि लगने एइ बादल-गगने आज बादल-गगन, गोधूली-लगन आई उसके ही चरणों की ध्वनि । कह रहा मन यही आज 'आएगा वह', यही कहता है मन हर पल ।। आँखों छाई ख़ुशी, हैं उठीं वे पुलक, उनमें भर आया देखो ये जल ।। लाया लाया पवन, उसका कैसा परस, उड़ता-उड़ता दिखा उत्तरीय । मन है कहता यही, कहती रजनीगंधा, आज 'आएगा वह', निर्मल ।। हुई आकुल बड़ी मालती की लता, हुई पूरी नहीं उसके मन की कथा ।। बतकही जाने बन में ये कैसी चली, आज किसकी मिली है ख़बर । दिग्वधुओं के आँचल में कंपन हुआ, कह रहा मन यही, आज 'आएगा वह' आज उसकी ही है हलचल ।। ('गीत पंचशती' में 'प्रेम' के अन्तर्गत 114 वीं गीत-संख्या)

मैंने पाया उसे बार-बार

बारे बारे पेयेछि जे तारे चेनाय चेनाय अचेनारे ।। मैंने पाया उसे बार-बार । उस अचीन्हे को चीन्हे में चीन्हा ।। जिसे देखा उसी में कहीं वंशी बजती अदेखे की ही ।। जो है मन के बहुत पास में, चल पड़ा उसके अभिसार में ।। कैसे चुप-चुप रहा है वो खेल, रूप कितने ही धारे अरूप ।। दूर से उठ रहा किसका सुर, कानों कानों कथा कह मधुर ।। आँखों आँखों का वो देखना, लिए जाता मुझे किस पार !! ('गीत पंचशती' में 'पूजा' के अन्तर्गत 129 वीं गीत-संख्या)

रखो मत अँधेरे में दो मुझे निरखने

आर रेखो ना अँधारे, आमाय देखते दाओ रखो मत अँधेरे में दो मुझे निरखने । तुममें समाई लगती हूँ कैसी, दो यह निरखने । चाहो तो मुझको रुलाओ इस बार, सहा नहीं जाता अब दुःख मिला सुख का यह भार ।। धुलें नयन अँसुवन की धार, मुझे दो निरखने ।। कैसी यह काली-सी छाया, कर देती घनीभूत माया । जमा हुआ सपनों का भार, खोज खोज जाती मैं हार— मेरा आलोक छिपा कहीं निशा पार, मुझे दो निरखने ।। ('गीत पंचशती' में 'पूजा' के अन्तर्गत 143 वीं गीत-संख्या)

यदि नहीं चीन्ह मैं पाऊँ, क्या चीन्ह मुझे वह लेगा

यदि तारे नाइ चिनि गो से कि आमाय नेबे चिने यदि नहीं चीन्ह मैं पाऊँ, क्या चीन्ह मुझे वह लेगा । इस नव फागुन की बेला, यह नहीं जानती हूँ मैं ।। निज गान कली में मेरी, वह आकर क्या भर देगा, यह कहाँ जानती हूँ मैं ।। इन प्राणों को हर लेगा । क्या अपने ही रंगों में, वह फूल सभी रंग देगा, क्या अंतर में आ करके वह नींद चुरा ही लेगा, क्या गःऊँघट नव पत्तों का, कर जाएगा वह चंचल, मेरे अंतर की गोपन वह बात जान ही लेगा— यह कहाँ जानती हूँ मैं ।। ('गीत पंचशती' में 'प्रकृति' के अन्तर्गत 55 वीं गीत-संख्या)

हे नवीना

हे नवीना, प्रतिदिनेर पथेर धूलाय जाय न चीना । हे नवीना, प्रतिदिन के पथ की ये धूल उसमें ही छिप जाती ना ! उठूँ अरे, जागूँ जब देखूँ ये बस, स्वर्णिम-से मेघ वहीं तुम भी हो ना ।। स्वप्नों में आती हो, कौतुक जगाती । किन अलका ('मेघदूत' की अलकापुरी) -फूलों को केशों सजाती किस सुर में कैसी बजाती ये बीना ।। ('गीत वितान' में 'प्रेम' के अन्तर्गत 97 वीं गीत-संख्या)

मन के मंदिर में लिखना सखि

भालो बेसे सखी, निभृत नयने आमार नामटि लिखो — तोमार मनेर मंदिरे मन के मंदिर में लिखना सखी नाम लिखना मेरा प्रेम से । मेरे प्राणों के ही गीत से, सुर वो नूपुर का लेना मिला ।। मेरा पाखी मुखर है बहुत घेर रखना महल में उसे धागा ले के मेरे हाथ का एक बंधन बनाना सखी, जोड़ सोने के कंगन इसे ।। मेरी यादों के रंगों से तुम एक टिकुली लगाना सखी, अपने माथे के चंदन पे, हाँ ! मोही मन की मेरी माधुरी, अपने अंगों पे मलना सखी, अपना सौरभ भी देना मिला ।। मरन-जीना मेरा लूटकर अपने वैभव में लेना समा । मुझको लेना उसी में छिपा ।। ('गीत पंचशती' में 'प्रेम' के अन्तर्गत 36 वीं गीत-संख्या)

खोलो यह तिमिर-द्वार

तिमिर दुयार खोलो— एसो, एसो नीरवचरणे । खोलो यह तिमिर द्वार रखतीं नीरव चरण आओ । ओ ! जननी सनमुख हो, अरुण अरुण किरणों में आओ ।। पुण्य परस से पुलकित आलस सब भागे । बजे गगन में वीणा जगती यह जागे ।। जीवन हो तृप्त मिले सुधा-रस तुम्हारा । जननी ओ ! हो सनमुख, ज्योति चकित नयनों में आओ, समाओ ।। ('गीत पंचशती' में 'पूजा' के अन्तर्गत 41 वीं गीत-संख्या)

मैंने पाया उसे बार-बार

बारे बारे पेयेछि जे तारे चेनाय चेनाय अचेनारे ।। मैंने पाया उसे बार-बार । उस अचीन्हे को चीन्हे में चीन्हा ।। जिसे देखा उसी में कहीं वंशी बजती अदेखे की ही ।। जो है मन के बहुत पास में, चल पड़ा उसके अभिसार में ।। कैसे चुप-चुप रहा है वो खेल, रूप कितने ही धारे अरूप ।। दूर से उठ रहा किसका सुर, कानों कानों कथा कह मधुर ।। आँखों आँखों का वो देखना, लिए जाता मुझे किस पार !! ('गीत पंचशती' में 'पूजा' के अन्तर्गत 129 वीं गीत-संख्या)

जो गए उन्हें जाने दो

जो गए उन्हें जाने दो तुम जाना ना, मत जाना. बाकी है तुमको अब भी वर्षा का गान सुनाना. हैं बंद द्वार घर-घर के, अँधियारा रात का छाया वन के अंचल में चंचल, है पवन चला अकुलाया. बुझ गए दीप, बुझने दो, तुम अपना हाथ बढ़ाना, वह परस तनिक रख जाना. जब गान सुनाऊं अपना, तुम उससे ताल मिलाना. हाथों के कंकन अपने उस सुर में जरा बिठाना. सरिता के छल-छल जल में, ज्यों झर-झर झरती वर्षा, तुम वैसे उन्हें बजाना. ('गीत पंचशती' में 'प्रकृति' के अन्तर्गत 74 वीं गीत-संख्या)

किसलय ने पाया क्या उसका संदेश

आज कि ताहार बारता पेल रे किसलय किसलय ने पाया क्या उसका संदेश । दूर-दूर सुर गूँजा किसका ये आज ।। कैसी ये लय । गगन गगन होती है किसकी ये जय ।। चम्पा की कलियों की शिखा जहाँ जलती, झिल्ली-झंकार जहाँ उठती सुरमय ।। आओ कवि, बंशी लो, पहनो ये माल, गान-गान हो ले विनिमय ।। ('गीत पंचशती' में 'प्रकृति' के अन्तर्गत 74 वीं गीत-संख्या)

जिस पथ पर तुमने थी लिखी चरण-रेखा

चरणरेखा तब ये पथे दिले लेखि चिन्ह आजि तारि आपनि घुचाले कि ।। जिस पथ पर तुमने थी लिखी चरण रेखा उसको ख़ुद मिटा दिया आज ।। जिस पथ पर बिछे कहीं फूल थे अशोक के, उनको भी घास तले दबे आज देखा ।। खिलना भी फूलों का होता है शेष पाखी भी और नहीं फिर से गाता । दखिन पवन हो उदास यों ही बह जाता ।। तो भी क्या अमृत ही उनमें न छलका— मरण-पार सब होगा बस बीते कल का ।। ('गीत पंचशती' में 'प्रकृति' के अन्तर्गत 84 वीं गीत-संख्या)

यह कौन विरहणी आती

यह कौन विरहणी आती ! केशों को कुछ छितराती । वह म्लान नयन दर्शाती ।। लो आती वह निशि-भोर । देती है मुझे झिंझोर ।। वह चौंका मुझको जाती । प्रातः सपनों में आती। वह मदिर मधुर शयनों में, कैसी मिठास भर जाती ।। वह यहाँ कुसुम-कानन में, है सौंप वासना जाती ।। ('गीत पंचशती' में 'प्रेम' के अन्तर्गत 153 वीं गीत-संख्या)

आलोकित अमल कमल किसने यह खिला दिए

आलोर अमल कमल खानि के फुटाले नील आकाशेर घूम छुटाले ।। आलोकित अमल कमल किसने ये खिला दिया इस नीले अम्बर को धीरे से जगा दिया । पंख खोल बाहर को आईं चिन्ताएँ— उसी कमल-पथ पे ये किसने जुटाईं। वीणा बज उठी शरत् वाणी की आज उसका वह मधुर राग शेपाली लाई ।। मतवाली तभी हवा देखो वह आई, धानों के हरे खेत फिरती लहराई ।। मर्मर ध्वनि अरे तभी वन में है छाई— किसकी सुधि प्राणों में उसके गहराई ।। ('गीत पंचशती' में 'प्रकृति' के अन्तर्गत 81 वीं गीत-संख्या)

बजते नूपुर रुनझुन-रुनझुन

नूपुर बेजे जाय रिनिरिनि। आमार मन कय, चिनि चिनि। बजते नूपुर रुनझुन रुनझुन कहता मेरा मन उनको सुन 'पहचानूँ उसको पहचानूँ'। बहती मधुऋतु की वायु । लेती कुँजों को छाय । वे कलश और वे कंगन । उसके चरणों से धरणी रह-रह उठती सिहराय ।। पूछे पारुल, वो कौन ? किस वन के तुम माया-मृग । अर्पित होते हैं फूल, सहलाता केश पवन । हर्षित हैं तारागण । झिल्ली स्वर उठते झिन झिन। ('गीत वितान' में 'प्रेम' के अन्तर्गत 105 वीं गीत-संख्या)

व्याकुल यह बादल की साँझ

आमार दिन फुरालो व्याकुल बादल साँझे व्याकुल यह बादल की साँझ दिन बीता मेरा, बीता ये दिन मेघों के बीच सघन मेघों के बीच । बहता जल छलछल बन की है छाया हृदय के किनारे से आकर टकराया । गगन गगन क्षण क्षण में बजता मृदंग कितना गम्भीर । अनजाना दूर का मानुष वह कौन आया है पास आया है पास । तिमिर तले नीरव वह खड़ा हुआ छुप छुप छाती से झूल रही माला है चुप-चुप, विरह व्यथा की माला, जिसमें है अमृतमय गोपन मिलन । खोल रहा वह मन के द्वार । चरण-ध्वनि उसकी ज्यों लगती है पहचानी । उसकी इस सज्जा से मानी है हार । ('गीत पंचशती' में 'प्रकृति' के अन्तर्गत 29 वीं गीत-संख्या)

फागुन में आई है माधवी

माधवी हठात् कोथा हते एक फागुन — दिनेर सोते आई है फागुन में माधवी । आई कहाँ से अचानक । 'जाना मुझे अब जाना ।' कहे वह, पत्ते कहें घेर कानों में उसके, 'ना ना ना ना' नाचें वो ता ता थैय्या ।। तारे कहें ये उससे गगन के, 'आओ गगन के पार, हम तुमको चाहें, आना तुम्हें यहाँ आना' पत्ते कहें घेर कानों में उसके, 'ना ना ना ना' नाचें वो ता ता थैय्या ।। आती है दखिन वातास कहती है आके पास 'आना इधर अरे आना।' कहती है, 'बेला जाती है बीती नीले अतल में दूर' कहत, 'घटेगा क्रमशः अरे ये पूनम का चन्द्र प्रकाश समय नहीं और, आना अरे बस आना।' पत्ते कहें घेर कानों में उसके, 'ना ना ना ना' नाचें वो ता ता थैय्या ।। ('गीत पंचशती' में 'प्रकृति' के अन्तर्गत 54 वीं गीत-संख्या)

आओ आओ फसल काटें

आय रे मोरा फसल काटि आओ आओ फसल काटें । खेत ही मीत हैं, उनकी सौगात है घर और आँगन रहेंगे भरे, वर्ष भर वे रहेंगे भरे । उनका ही दान यह, धान हम काटते, गान गाते हैं हम, ख़ूब खटते हैं हम । आए बादल उड़े, एक माया रची एक छाया रची, फिर ये जादू हुआ धूप आई निकल । खेत में श्याम से आ सुनहरा मिला— इनकी माटी में है प्यार अपना खिला । दान लेंगे इन्हीं का ही हम । धान हम काटते गान गाते हैं हम ख़ूब खटते हैं हम । हमें सुख तो यही बाँटें— आओ आओ फसल काटें । ('गीत पंचशती' में 'विचित्र' के अन्तर्गत 37 वीं गीत-संख्या)

आकाशी पाखी मैं, बंदी अब तेरा

धरा दिएछि गो आमि आकाशेर पाखि आकाशी पाखि मैं बंदी अब तेरा, नयनों में तेरे नभ नया एक देखा, पलकों में ढककर क्या रखा अरे, बोलो— हँसती जब दिखती है वहाँ उषा-रेखा ।। उड़ उड़ एकाकी मन वहीं चला जाए चाहे वह आँखों के तारों के देश बस जाए ।। गगन वही देख हुआ विह्वल मन आज । फूटा उच्छवास वहीं गीत बहा जाए ।। ('गीत पंचशती' में 'प्रेम' के अन्तर्गत 53 वीं गीत-संख्या)

युग-युग को पार कर आया आषाढ़ आज मन में

बहु युगेर ओ पार हते आषाढ़ एल आमार मने, कोन् से कबिर छंद बाजे झरो झरो बरिषने । युग-युग को पार कर आया आषाढ़ आज मन में, बजता है किस कवि का छंद आज घन में ।। धूल हुई मालाएँ जो थीं मिलन की, गंध बही आती है उनकी पवन में ।। रेवा के तीर छटा ऐसी थी उस दिन शिखरों पर श्यामल थी वर्षा ही पल-छिन ।। पथ को थी हेर रही मालविका क्षण-क्षण बह आई मेघों के साथ वही चितवन ।। ('गीत पंचशती' में 'प्रकृति' के अन्तर्गत 41 वीं गीत-संख्या)

फागुन की संध्या में आज, ओ ! मेरे चंद्र प्रकाश

ओ आमार चाँदेर आलो आज फागुनेर संध्या काले धरा दिएछ ये आमार पाताय पाताय डाले डाले डाल डाल पात पात आए पकड़ में फैलाए हास ।। लाता जो गान ज्वार तारों के बीच आँगन में आज वही मेरे उतरा— प्राणों के पास ।। कली कली खिली आज तेरी हँसी से मत्त हुआ फूलों से दखिन वातास ।। शुभ्र, अरे, कैसी उठाई हिलोर, प्राणों को ठगा भरा कैसा उल्लास ।। ('गीत पंचशती' में 'प्रकृति' के अन्तर्गत 44 वीं गीत-संख्या)

बीते यह रात उससे ही पहले

निशि ना पोहाते जीवन ज्वालाइया याओ प्रिया तोमार अनल दिया बीते ये रात उससे ही पहले दो तुम जला जीवन-प्रदीप, ओ ! मेरी प्रिया अगिन छुआ । लिए हुए दीप शिखा आओगी तुम, सोच यही देख रहा मैं तेरी राह, दोगी जला तुम मेरा ये दीप, कर दोगी दूर अँधेरा । मेरी प्रिया मेरी प्रिया ! लाओ तो अपना अगिन-दिया। उसकी ही आस, उसकी ही आस— आशा का वो ही तो घेरा ।। ('गीत पंचशती' में 'प्रेम' के अन्तर्गत 42 वीं गीत-संख्या)

पुकारा हमको माँ ने आज

आमरा मिलेछि आज मायेर डाके ।। पुकारा हमको माँ ने आज, मिले हम जैसे भाई मिलें, एक ही घर में रहकर अरे, पराए होकर कैसे रहें ।। प्राण में आती यही पुकार, सुनाई पड़ता स्वर बस 'आ', वही स्वर उठता है गम्भीर, पकड़ अब किसको कौन रखे ।। जहाँ हम रहते उसमें सहज प्राण से प्राणों का बंधन, प्राण लेते प्राणों को टान, जानते प्राणों का वेदन । मान-अपमान हुए सब लीन, गए नयनों के आँसू सूख, हृदय में आशा जगी नवीन, देख भाई-भाई का मिलन । साधना हुई हमारी सफल, मिले हैं आकर दल के दल चलो लड़को सब घर के आज, मिलो माँ से जाकर तुम विकल ।। ('गीत पंचशती' में 'स्वदेश' के अन्तर्गत चौथी गीत-संख्या)

हेर श्यामल घन नील गगन

हेरिया श्यामल घन नील गगने हेर श्यामल घन नील गगन याद आए हैं काजल नयन । अधर वे कातर करुणा भरे, देखते थे जो रह-रह अरे, विदा के क्षण ।। झर रहा जल चमके बिजुरी हवा मतवाली वन में तिरी, व्यथा प्राणों में आई फूट, कथा यह किसकी मन में फिरी ।। ('गीत पंचशती' में 'प्रकृति' के अन्तर्गत 6 वीं गीत-संख्या)

मेघ पर उड़ते आते मेघ सघन

मेघेर परे मेघ जमेछे आँधार करे आसे । मेघ पर उड़ते आते मेघ सघन करते मिलकर अँधियार। दिया बस मुझे यहाँ का ठौर, यहां एकाकी बैठा द्वार ।। रोज़ कितने लोगों के बीच किया करता हूँ कितने काम । यहाँ बस आज तुम्हारी आस, छोड़कर बैठा सारे काम ।। न यदि छवि अपनी दिखलाई अगर की मेरी अवहेला, बताओ काटूँगा कैसे अरे, मैं ये बादल-बेला ।। जहाँ तक पाता हूँ मैं देख, देखता रहता हूँ अपलक, प्राण क्रंदन करते मेरे, मिले तो एक तुम्हारी झलक ।। ('गीत पंचशती' में 'प्रकृति' के अन्तर्गत 10 वीं गीत-संख्या)

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