मुकरी दिवस ( 4 जुलाई) विशेष

मुकरी के उन्नयन, संवर्धन और प्रचार प्रसार को बढ़ावा देने के लिए साहित्यकार त्रिलोक सिंह ठकुरेला की पहल पर साहित्यकारों एवं साहित्यिक संस्थाओं द्वारा प्रतिवर्ष 4 जुलाई को मुकरी दिवस मनाने का निश्चय किया गया है।

हिन्दी काव्य रूपों में मुकरी का अपना अलग ही आकर्षण है। मुकरी बहुत ही पुरातन और विरल काव्य विधा है। मुकरी को कहमुकरी के नाम से भी जाना जाता है। कह-मुकरी अर्थात् कहकर मुकर जाना।

अधिकांश विद्वान मुकरी को पहेली का ही एक प्रकार मानते हैं। पहेली की तरह ही मुकरी भी श्रोता के बुद्धि विकास के साथ साथ उसका मनोरंजन करती है। पुरातन मुकरियाँ देखने पर स्वत: स्पष्ट होता है कि मुकरी दो अंतरंग सखियों के बीच का संवाद है, जिसमें पहली सखी अपनी दूसरी सखी के सामने अपनी बात कुछ इस प्रकार रखती है कि उसे अर्थ-भ्रम हो जाता है। श्रोता सखी ज्यों ही अर्थ-ग्रहण करना चाहती है, त्यों ही वक्ता सखी दूसरा अर्थ करके उसे हतप्रभ कर देती है। यद्यपि यह दो पुरुष मित्रों या स्त्री-पुरुष का संवाद भी हो सकता है। मुकरी के केन्द्र में मूलतः मनोविनोद और गौणत: बुद्धि चातुर्य का परीक्षण रहता है।

मुकरी या कह-मुकरी चार पदों का सममात्रिक छंद है। मुकरी के प्रत्येक चरण में 16 -16 मात्राएँ होती हैं। इस प्रकार एक आदर्श मुकरी में 64 मात्राएँ होती हैं। प्रत्येक चरण में आठवीं मात्रा पर यति होना उत्तम माना गया है। मुकरी में पहली और दूसरी तथा तीसरी और चौथी पंक्तियों में तुक रहती है।

मुकरी ऐसी काव्य संरचना है, जिसमें प्रारंभिक तीन चरणों में पहेली की तरह 'बूझो तो जानें' बाली बात छिपी रहती है, जबकि अंतिम चरण में जिज्ञासा के साथ इसके दो उत्तर निहित होते हैं। मुकरी की विशेषता है कि इसमें श्रोता के उत्तर से असहमति जताते हुए वक्ता द्वारा दूसरा उत्तर प्रस्तुत कर उसे सही ठहराया जाता है।

शृंगार और रस मुकरी के प्राण तत्व हैं। सही शब्द-चयन और तुक इसे और अधिक प्रभावी बनाते हैं।

मुकरी को अमीर खुसरो द्वारा निर्मित छंद विधा माना जाता है। अमीर खुसरो की मुकरियों में लोक-जीवन और विनोद का अनूठा संगम है।

अमीर खुसरो के बाद आधुनिक काल में भारतेन्दु हरिश्चन्द्र और नागार्जुन के नाम उल्लेखनीय हैं। भारतेन्दु हरिश्चन्द्र ने उन्नीसवीं सदी के उत्तरार्ध में मात्र चौदह मुकरियाँ लिखीं, जो नये जमाने की मुकरियाँ के नाम से विख्यात हुईं।उन मुकरियों में अंग्रेजियत, पुलसिया जुल्म, महँगाई और बेरोजगारी जैसी तात्कालिक समस्याओं को विषय वस्तु बनाया गया है । राजनैतिक मुकरियाँ भारतेन्दु हरिश्चन्द्र का अभिनव प्रयोग हैं। लगभग छह दशक के लम्बे अंतराल के बाद नागार्जुन ने भी आठ मुकरियाँ लिखीं हैं।

वर्तमान संदर्भ में बात की जाए तो समकालीन हिन्दी साहित्यकारों में सर्वप्रथम त्रिलोक सिंह ठकुरेला का मुकरी संग्रह 'आनन्द मंजरी' प्रकाश में आया है। बहादुर मिश्र ने 'मुकरियाँ' ( लोक काव्य रूप) का सम्पादन करके इस विधा के लिए विशिष्ट कार्य किया है। त्रिलोक सिंह ठकुरेला ने 'समकालीन मुकरियाँ' नामक मुकरी संकलन का सम्पादन भी किया है।

समकालीन साहित्यकारों में डॉ. सतीश चन्द्र शर्मा 'सुधांशु' ने 'इक्कीसवी सदी के मुकरीकार' और 'मुकरी सप्तशती' नामक मुकरी संकलनों का सम्पादन करके मुकरी के प्रचार प्रसार में महत्वपूर्ण योगदान दिया है। मुकरी दिवस पर हिन्दी कविता के पाठकों के लिए कुछ मुकरियाँ प्रस्तुत हैं -



मुकरी छंद और रचनाकार

जब माँगू तब जल भरि लावे। मेरे मन की तपन बुझावे॥ मन का भारी तन का छोटा। ऐ सखि साजन? ना सखि लोटा। - अमीर खुसरो वह आवे तो शादी होय । उस बिन दूजा और न कोय। मीठे लागें वाके बोल। ऐ सखि साजन? ना सखि ढोल। - अमीर खुसरो भीतर-भीतर सब रस चूसै । हँसि-हँसि कै तन-मन-धन मूसै। जाहिर बातन में अति तेज। क्यों सखि साजन? नहिं अँगरेज। - भारतेन्दु हरिश्चन्द्र सीटी देकर पास बुलावै। रुपया ले तो निकट बिठावै। ले भागै मोहिं खेलहि खेल। क्यों सखि साजन? नहिं सखि रेल। - भारतेन्दु हरिश्चन्द्र बातन की फुलझडियाॅं छोड़ै । बखत पड़े तो चट मुॅंह मोड़ै । छन में शेर, छन में ही गीदड़। क्या सखि, शेर? ना सखि, लीडर। - नागार्जुन चाहैं अमृत, चटावैं धूल। वादे गए जिन्हें सब भूल। कोई भी अब नाम न लेता। कौन, गंजेड़ी ? ना सखि, नेता । - नागार्जुन जैसे चाहे वह तन छूता। उसको रोके किसका बूता। करता रहता अपनी मर्जी। क्या सखि, साजन? ना सखि, दर्जी। - त्रिलोक सिंह ठकुरेला पाकर उसे फिरूँ इतराती। जो मन चाहे सो मैं पाती। सहज नशा होता अलबत्ता । क्या सखि, साजन? ना सखि, सत्ता। - त्रिलोक सिंह ठकुरेला अंग लिपट ठंडक हर लेता। तन मन को गर्माहट देता। वह मेरे जीवन का संबल। क्यों सखि, साजन? ना सखि, कंबल। - सत्यनारायण शिवराम सिंह अजब गजब करतब दिखलाये। अधरों पर मुस्कान खिलाये। लगें न उसकी बातें कर्कश। क्यों सखि, साजन? ना सखि, सर्कस। - सत्यनारायण शिवराम सिंह