कहीं पे धूप की चादर बिछा के बैठ गए (ग़ज़ल) : दुष्यन्त कुमार
कहीं पे धूप की चादर बिछा के बैठ गए
कहीं पे धूप की चादर बिछा के बैठ गए कहीं पे शाम सिरहाने लगा के बैठ गए । जले जो रेत में तलवे तो हमने ये देखा बहुत से लोग वहीं छटपटा के बैठ गए । खड़े हुए थे अलावों की आंच लेने को सब अपनी अपनी हथेली जला के बैठ गए । दुकानदार तो मेले में लुट गए यारों तमाशबीन दुकानें लगा के बैठ गए । लहू लुहान नज़ारों का ज़िक्र आया तो शरीफ लोग उठे दूर जा के बैठ गए । ये सोच कर कि दरख्तों में छांव होती है यहाँ बबूल के साए में आके बैठ गए । (ग़ज़ल-संग्रह 'साये में धूप' में से)