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तार सप्तक गिरिजा कुमार माथुर
Taar Saptak Girija Kumar Mathur
आज हैं केसर रंग रंगे वन
रुक कर जाती हुई रात
चूड़ी का टुकड़ा
रेडियम की छाया
कुतुब के खँडहर
पानी भरे हुए बादल
क्वाँर की दुपहरी
भीगा दिन
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छाया मत छूना