सस्सी-पुन्नूं : हाशिम शाह
Sassi Punnu in Hindi : Hashim Shah
१
हिकमत ओस ख़ुदावन्द वाली, मालक मुलक मलक दा ।
लक्ख करोड़ करन चतराईआं, कोई पछान ना सकदा ।
कुदरत नाल रहे सरगरदां, दायम चरख़ फ़लक दा ।
हाशम ख़ूब होई गुलकारी, फ़रश फ़नाह ख़लक दा ।१।
(हिकमत=स्याणप, सरगरदां=घुकदा, दायम=सथाई,
चरख़=पहिया, फ़लक=आकाश, फ़रश=धरती)
२
हिकमत नाल हकीम अज़ल दे, नकश निगार बणाया ।
हर अरवाह असीर इशक दा, कैद जिसम विच पाया ।
जो मख़लूक ना बाहर उस थीं, अरज़ समां विच आया ।
हाशम जोश बहार इशक दी, हर इक शान सुहाया ।२।
(हकीम-ए-अज़ल=रब्ब, नकश निगार=वन्नसुवन्नता, अरवाह=
रूह, असीर=कैदी, अरज़-ओ-समां=धरत-आकाश)
३
हुसन कलाम जो शायर करदे, सुख़न ना साथीं आया ।
जेहा कु अकल शऊर असाडा, असां भी आख सुणाया ।
सुन सुन होत सस्सी दियां बातां, कामल इशक कमाया ।
हाशम जोश तबियत कीता, वहम इते वल आया ।३।
(कामल इशक=सच्चा प्यार, वहम=ख़्याल)
४
आदम जाम भम्बोर शहर दा, साहब तख़त कहावे ।
वहश तय्यूर जनायत आदम, हर इक सीस निवावे ।
जाह जलाल सिकन्दर वाला, खातर मूल ना ल्यावे ।
हाशम आख ज़बान ना सकदी, कौन तरीफ़ सुणावे ।४।
(वहश=पशू, तय्यूर=पंछी, जनायत=जिन्न, जाह जलाल=
शोभा)
५
शहर भम्बोर मकान इलाही, बाग़ बहशत बणाया ।
फ़रश फ़रूश चमन गुल बूटा, हर इक ज़ात लगाया ।
नदियां हौज़ तलाउ चुतरफ़ों, रल मिल ख़ूब सुहाया ।
हाशम रूह रहे विच फस्या, दाम फ़रेब विछाया ।५।
(बहशत=सुरग, दाम=जाल)
६
अमीर वज़ीर ग़ुलाम करोड़ां, लशकर फ़ौज़ ख़ज़ाने ।
बारक सुरख़ निशान हज़ारां, शाम घटां शम्याने ।
खावन ख़ैर फ़कीर मुसाफ़र, साहब होश दिवाने ।
हाशम एस ग़मी विच आजिज़, होश उलाद ना ख़ाने ।६।
७
ख़ाहश इकसु औलाद हमेशा, पीर शहीद मनावे ।
देइ लिबास पुशाक बरहन्यां, भुक्ख्यां ताम खुवावे ।
देख उजाड़ मुसाफ़र कारन, ताल सराए बणावे ।
हाशम करसु जहान दुआईं, आस साईं वर ल्यावे ।७।
(बरहन्यां=नंग्यां, ताम=रोटी)
८
दुर्रे यतीम सदफ़ विच आया, सुनी पुकार दिलां दी ।
फिरी बहार शगूफ़े वाली, होई उमैद गुलां दी ।
सेज मलूक होई अबरेशम, आही सख़त सूलां दी ।
हाशम देख होई गुल लाला, होगु बहार फुलां दी ।८।
(दुर्रे यतीम=दुरलभ्भ मोती, सदफ़=सिप्पी, गुल लाला=
पोसत दा लाल फुल्ल)
९
सस्सी जनम ल्या शब-कदरे, मिसल हिलाल दरख़शां ।
वेख बेआब होन नग मोती, मानक लाल बदख़शां ।
अकल ख़्याल क्यासों बाहर, नज़र कर वल नकशां ।
हाशम आख तरीफ़ हुसन दी, शमस मिसाल ज़रअफ़शां ।९।
(शब-कदरे=सुभागी रात, मिसल हिलाल दरख़शां=
एकम दे चन्न वांग, शमस=सूरज, ज़रअफ़शां=सोन-किरनां)
१०
जुमल जहान होई खुशहाली, फिर्या नेक ज़माना ।
नौबत नाच शुमार ना कोई, धुरपद ताल तराना ।
कर सिर वार सुट्टन ज़र मोती लाल जवाहर ख़ाना ।
हाशम ख़ैर कीता फ़ुकरावां, मिलक मुआश ख़ज़ाना ।१०।
(जुमल=सारे, नौबत=ढोल नगारे, मुआश=रोज़ी)
११
अहल नजूम सद्दे उस वेले, हिफ़ज़ तुरेत ज़बानी ।
साहब युमन करामत वाले, ख़बर देन असमानी ।
वेखन उमर नसीब सस्सी दे, खोल्ह कलाम रब्बानी ।
हाशम भार सस्सी सिर डाढा, दस्सदे भेत नेहानी ।११।
(हफ़ज़=याद, तुरेत=तौरेत,यहूदियां दा धारमिक
ग्रंथ, साहब युमन=बखशिश वाले, नेहानी=लुकाया)
१२
देख किताब नजूम नजूमी, होइ रहे चुप सारे ।
ज़ालम हुकम सहम सुलतानां, कौन कोई दम मारे ।
बादशाहां सच्च आखन औखा, होए लचार विचारे ।
हाशम बख़त बख़ील सस्सी दे, कौन जित्ते कौन हारे ।१२।
(बख़ीळ=चुग़लख़ोर)
१३
शाह दरबार कहआ, "चुप केही ? कहो जवाब की आवे ?"
अरज़ कीती, "दरबार असाथीं सुख़न कलाम ना आवे ।"
रास ज़बान ना आखन जोगी, झूठ इमान जलावे ।"
हाशम करन लुका बथेरा, किसमत कौन मिटावे ।१३।
१४
ओड़क ख़ौफ़ उतार नजूमी, बात कही मन भानी ।
"आशिक होगु कमाल सस्सी, जद होगु जवान स्यानी ।
मसत बेहोश थलां विच मरसी, दरद फ़िराक-रंञानी ।
हाशम दाग़ लगाउगु कुल नूं, रहुगु जहान कहाणी" ।१४।
१५
सुन तकदीर होए दिल बिरियां, मां प्यु ख़ेश कबीला ।
आतश चमक उठी हर दिल नूं, ज्युंकर तेल फ़तीला ।
ख़ुशी ख़राब होई विच ग़म दे, ज़रद होया रंग पीला ।
हाशम बैठ दनाउ स्याणे, होर विचारन हीला ।१५।
(दिल बिरियां=दिल सड़्या, ख़ेश कबीला=अंग साक)
१६
बे इतबार होया, हत्थ धोते, बाप उमैद मुरादों ।
ज़ालम रूप होया दिल उसदा, सख़त स्याह जल्लादों ।
"नंग नमूस की हासल होवे, एस पलीत उलादों ?"
हाशम, "ख़रच करो" फ़रमाया, "फ़ारग़ होहु फसादों"।१६।
(नंग नमूस=अणख, पलीत=पतित, "ख़रच करो=मारो)
१७
कहआ वज़ीर, "की दोश सस्सी नूं, लिख्या लेख लिखारी ।
बेतकसीर कहाउन कन्न्यां, नशट होवे कुल सारी ।
इस थीं पाप ना होर परेरे, कौम होवे हत्यारी ।
हाशम पाय सन्दूक रुढ़ाउ, दूर होवे जग खवारी" ।१७।
(बेतकसीर=बेगुनाह, कहाउण=मरवाउण)
१८
फ़रश ज़िमीं पर हर इक ताईं, मां प्यु बहुत प्यारा ।
सो फिर आप रुढ़ावन तिस नूं, वेख गुनाह निकारा ।
धन्न उह साहब सिरजनहारा, ऐब छुपावन हारा ।
हाशम जे उह करे अदालत, कौन करे निसतारा ।१८।
१९
वाह कलाम ! नसीब सस्सी दा, नाउं ल्यां दिल ड्रदा ।
तख़तों चाय सुटे सुलतानां, ख़ैर मंगन दर दर दा ।
बैल ग़रीब नाकाबल जेहा, चाय ज़िमीं सिर धरदा ।
हाशम जाह ना बोलन वाली, जो चाहे सो करदा ।१९।
२०
जिस उसताद सन्दूक सस्सी दा, घड़्या नाल मेहर दे ।
अफलातून अरसतू जेहे, होन शगिरद हुनर दे ।
ज़ीनत ज़ेब सिखन सभ उस थीं, दिलबर चीन मिसर दे ।
हाशम वेख आरायश करदा, शाबाश अकल फ़िकर दे ।२०।
(ज़ीनत ज़ेब=सजावट, आरायश=शिंगार)
२१
चन्नन शाख मंगाय किदाहों, बैठ कारीगर घड़्या ।
बूटे वेल सुनहरी करके, लाल जवाहर जड़्या ।
पाय ज़ंजीर चौफेर पिंजर नूं, बैठ बेदरदां कड़्या ।
हाशम वेख तवलद हुन्दी, आण दुखां लड़ फड़्या ।२१।
(तवलद हुन्दी=जंमन सार)
२२
कर तदबीर कीते त्रै छांदे, ख़रच दित्ता कर नाले ।
तिस दी मिलक होया इक छांदा, शीर पिलावन वाले ।
दूजा दाज दहेज सस्सी नूं, होर पढ़ावन वाले ।
हाशम लिख तावीज़ हकीकत, हरफ़ सस्सी गल डाले ।२२।
(छांदे=हस्से, मिलक=मालकी, शीर=दुद्ध)
२३
पाय सन्दूक रुढ़ाई सस्सी, नूह तूफ़ान वगेंदा ।
बाशक नाग ना हाथ ल्यावे, धौल पनाह मंगेंदा ।
पार उरार बलाईं भर्या, दानो देउ ड्रेंदा ।
हाशम वेख नसीब सस्सी दा, की कुझ होर करेंदा ।२३।
२४
मिट्ठी जिन्द सस्सी दी सोहणी, जंमन रात सुहाई ।
मां दी सेज नसीब ना होई, कुछड़ मिली ना दाई ।
बूहे उते सद्द ना कीती, डूम बरहमन नाई ।
हाशम ख़ौफ़ ना दिल विच आइउ, जीउंदी जान रुढ़ाई ।२४।
२५
टुर्या तोड़ ज़ंजीर सबर दा, चाईआं रिज़क मुहारां ।
गरदश फ़लक होया सरगरदां, बाझ मलाह कहारां ।
सूरज तेज़ होया जल ख़ूनी, पैन लसां चमकारां ।
हाशम वेख सस्सी विच घेरी, दुशमन लक्ख हज़ारां ।२५।
२६
आदम ख़ोर जनावर जल दे, राख़श रूप सुभाईं ।
मगरमच्छ कुंमे जलहोड़े, नाग सैंसार बलाईं ।
तन्दूए कहर जम्बूर बुल्हेणी, लावन ज़ोर तदाईं ।
हाशम मौत होवसु विच थल दे, मारसु कौन इथाईं ।२६।
२७
घुंमण-घेर चुफ़ेर्युं घेरन, ठाठां लैन कलावे ।
लहरां ज़ोर करन हर तरफों, इक आवे इक जावे ।
सूरत सेहर सन्दूक जड़ाऊ, बिजली चमक ड्रावे ।
हाशम चाह जिवें कन्यानी, वेख सन्दूक छुपावे ।२७।
(सेहर=जादू, चाह=खूह)
२८
शहरों दूर कु पत्तन धोबी, धोंदा नदी किनारे ।
अत्ता नाम मिसाल फरिशता, नेक बज़ुरग सितारे ।
डिट्ठा ओस सन्दूक दुराडा, दिल विच ख़ौफ़ चितारे ।
हाशम गइओसु होश दिमागों, वेख सन्दूक विचारे ।२८।
२९
करे ख़्याल जवाहरख़ाना, पाया आण तबाही ।
या कोई आफ़त रुढ़ी पहाड़ों, या असरार इलाही ।
बख़त बेदार होए अत्ते दे, भरी नसीब उगाही ।
हाशम जाय प्या जल डूंघे, हो दिल शेर सिपाही ।२९।
(असरार=भेद, इलाही=रब्बी, बख़त बेदार होए=
किसमत जाग पई)
३०
अत्ते ख़ूब कीती जिन्द बाज़ी, ल्या सन्दूक किनारे ।
शाद होया दिल ज़ात ख़ुदा वल, निअमत शुकर गुज़ारे ।
वड़्या शहर मुबारक देवन, रल मिल यार प्यारे ।
हाशम माल ल्या फिर दूजा, होया सुआब विचारे ।३०।
(जिन्द बाज़ी=दलेरी, शाद=ख़ुश, सुआब=पुन्न)
३१
खुल्हा आण नसीब अत्ते दा, करम भले दिन आए ।
जड़त जड़ाऊं महल बणाए, शौकत शान वधाए ।
ख़िदमतगार ग़ुलाम सस्सी दे, नौकर चाय रखाए ।
हाशम बाग़ सुक्के रब्ब चाहे, पल विच हरे कराए ।३१।
३२
सस्सी होई जवान स्याणी, सूरज जोत सवाई ।
साहब इलम हयायो हलीमीं, अकल हुनर चतराई ।
मां प्यु देख कारीग़र कोई, चाहुन कीती कुड़माई ।
हाशम सुनी सस्सी मसलाहत, ग़ैरत उस नूं आई ।३२।
(साहब इलम=विदवान, मसलाहत=सलाह-मशवरा)
३३
बन बण पैंच पंचायत धोबी, पास अत्ते दे आवन ।
कर तमसील व्याह (वेहार) जगत दा, बात हमेश चलावन ।
"धियां सोहन नहीं घर माप्यां, जे लक्ख राज कमावन ।"
हाशम वांग बुझारत धोबी, बात सस्सी वल ल्यावन ।३३।
(तमसील=मिसाल)
३४
इक दिन मां प्यु नाल सस्सी दे, बैठ कीते कुल झेड़े ।
आख,"बच्ची तूं बालग़ होईओं, वाग तेरी हत्थ तेरे ।
धोबी ज़ात उच्ची घर आवन, फिर फिर जान बतेरे ।
हाशम कौन तेरे मन भावे, आख सुणाय सवेरे" ।३४।
३५
सस्सी मूल जवाब ना कीता, मां प्यो तों शरमांदी ।
दिल विच सोज़ होई पुर आंसू, देख लिखी करमां दी ।
ढूंढन साक निमाने धोबी, मैं धी बादशाहां दी ।
हाशम फिर उह नाम ना लेवन, वेख सस्सी दरमांदी ।३५।
३६
शिकरत नाल शरीक अत्ते दे, मरद बख़ील फ़सादी ।
पास भम्बोर शहर दे वाली, जा होए फ़र्यादी ।
"होई जवान अत्ते घर बेटी, सूरत शकल शहज़ादी ।
हाशम कहआ पुकार बख़ीलां, लायक उह तुसाडी" ।३६।
(शिकरत=ईरखा, बख़ील=चुग़लख़ोर)
३७
भेज्या नफ़र गुलाम अत्ते नूं, आदम जाम बुलाया ।
सस्सी खोल्ह तावीज़ गले दा, शाह हज़ूर पुचाया ।
कागज़ वाच पछाता जेहड़ा, पाय सन्दूक रुढ़ाया ।
हाशम वेख होया शरमिन्दा, आदम जाम सवाया ।३७।
३८
लोहू गरम होया दिल बिरियां, फेर उलाद प्यारी ।
मां प्यो नाल सस्सी दे चाहुन बात कीती इक वारी ।
सस्सी साफ जवाब दित्तो ने, खोल्ह हकीकत सारी ।
हाशम "मिलन हराम तुसानूं, रोढ़ दित्ती इक वारी" ।३८।
३९
माउं फ़िराक सस्सी दे मारी, नींद अराम ना आवे ।
हरदम वांग याकूब पगम्बर, रो रो हाल वंञावे ।
करे सवाल लोड़े घर खड़्या, रोज़ सस्सी थे आवे ।
हाशम याद सन्दूक सस्सी नूं, ख़ातर मूल ना ल्यावे ।३९।
४०
जल थल मशरक मग़रब हर शै, जिस दा नाम ध्यावे ।
साहब कुदरत अपर अपारा, कित मुख नाल सलाहवे ।
अंत ना पार उरार तिसे दा, की कुझ आख सुणावे ।
हाशम फेर सस्सी नूं मिलसां, बात पुनूं वल आवे ।४०।
(मशरक मग़रब=पूरब पच्छम)
४१
शहर भम्बोर सुदागरज़ादा, गज़नी नाम सदावे ।
साहब शौक इमारत ताजी, बाग़ हमेश लवावे ।
तिस विच हर हर शहर मुलक दी, कर तसवीर लगावे ।
हाशम हर इक आप मुसव्वर, ज़बराईल कहावे ।४१।
(मुसव्वर=चित्रकार)
४२
सस्सी सुने तरीफ़ हमेशा लायक मुशक ख़ुतन दी ।
इक दिन नाल सईआं उठ दौड़ी, ख़ातर सैल चमन दी ।
देख्या नकश नगार खलोता सूरत सीम बदन दी ।
हाशम वेख होई दिल घायल, वांगूं कोह-शिकन दी ।४२।
(मुशक=कसतूरी, ख़ुतन=ईरान विच इक थां, सीम=
चांदी, कोह-शिकन=फ़रेहाद)
४३
सस्सी कहआ बुलाय मुसव्वर, "शाबाश, वीर भरायो ।
जिस सूरत दी मूरत कीती, मैनूं आख सुणायो ।
केहड़ा शहर ? कौन शहज़ादा ? थाउं मकान बतायो ।"
हाशम फेर सस्सी हत्थ जोड़े, "भेत पता दस जायो" ।४३।
४४
"केचम शहर वलायत थल दी, होत अली तिस वाली ।
तिस दा पुत्त पुन्नूं शहज़ादा, ऐब सवाबों ख़ाली ।
सूरत ओस हिसाबों बाहर, सिफ़त ख़ुदावन्द वाली ।"
हाशम अरज़ कीती उसतादां, चिनग कक्खां विच डाली ।४४।
४५
हो दिल-घायल नाल सईआं दे, फेर सस्सी घर आई ।
नींदर भुक्ख ज़ुलैखां वांगूं, पहली रमज़ वंञाई ।
वेख अहवाल होई दरमांदी, भेद पुछाउसु माई ।
हाशम बाझ कुट्ठी तलवारों, ज़ालम इशक कसाई ।४५।
४६
दिल विच सोज़ फ़िराक पुन्नूं दा, रोज़ अलम्बा बाले ।
बिरहों मूल आराम ना देंदा, वांग चिखा नित्त जाले ।
आतश आप आपे भट्यारा, आप जले नित्त जाले ।
हाशम फेर केहा सुख सोवन, जद पीते प्रेम-प्याले ।४६।
४७
दो दिन डाढ सस्सी कर दानश इक तदबीर बणाई ।
पत्तन घाट लए सभ प्यो थों, चौकी चाय बिठाई ।
पांधी राह मुसाफ़र जे कोई, आवे एस निवाही ।
हाशम पार उरार ना जावे, मैं बिन ख़बर पुचाई ।४७।
(दानश=स्यानप)
४८
बरस होया जद फेर सस्सी नूं, मेहनत ज़ुहद उठाए ।
केच वलों रल माल वेहाजन, ऊठ सुदागर आए ।
सूरत नाज़ न्याज़ बलोचां, वेख परी भुल्ल जाए ।
हाशम वेख बलोच ज़ुलैखां, यूसफ़ चाय भुलाए ।४८।
(ज़ुहद=तपस्स्या, वेहाजण=वपार करन, न्याज़=
भेटा)
४९
आख्या आण ग़ुलाम सस्सी नूं, नाल ज़बान प्यारी ।
"घाट उते इक राह-मुसाफ़र, उतरे आण वपारी ।
केच कन्नों सौदागर आए, ऊठ बेअंत शुमारी ।
हाशम डौल लिबास पहरावा, हर हर चाल न्यारी" ।४९।
५०
सस्सी सख़त ग़मी विच आई, दरद फ़िराक रंञानी ।
ना कुझ सुरत आवाज़ ना देंदी, ना कुझ होश टिकानी ।
रूह रूहां विच फिरे सस्सी दा, मलकुल मौत निशानी ।
हाशम बलोच भेज सच्चे रब्ब, फेर दित्ती ज़िन्दगानी ।५०।
५१
सुनी आवाज़ सस्सी उठ बैठी, सुरत सरीर संभाली ।
हार शिंगार लगे मन भावन, ख़ूब होई ख़ुशहाली ।
मिसल अनार होए रुख़सारे, फेर फिरी लब लाली ।
हाशम आख तरीफ़ बलोचां, आबि-हयात प्याली ।५१।
(मिसल अनार=अनार वांग, रुख़सारे=गल्ल्हां, आबि-
हयात=अंमृत)
५२
शहर उतार बलोच सस्सी ने, ख़िदमत ख़ूब कराई ।
हाल हकीकत होत पुन्नूं दी, पास बहाल पुछाई ।
ख़ातर लोभ कहयो ने, "साडा होत पुनूं है भाई ।"
हाशम वेख बलोचां दितिया, शामत आण दिखाई ।५२।
५३
सस्सी समझ भरा पुनूं दे, कैद बलोच कराए ।
होन ख़लास मुहाल होइयो ने, होत पुनूं बिन आए ।
बोल विगाड़ पिछों पछतावन, शामत आण फहाए ।
हाशम बाझ वकीलों कामल, फस्यां कौन छुडाए ।५३।
५४
दो सरदार आहे करवानी, हफ़त हज़ार शुतर दे ।
बब्बन नाम बबीहा दोवें बैठ अन्देशा करदे ।
पुनूं बाझ नहीं छुटकारा, हौज़ देईए भर ज़र दे ।
हाशम ज़ोर केहा पर मुलकीं, मान होवे विच घर दे ।५४।
(करवानी=काफ़ले वाले, हफ़त=सत्त, शुतर=उट्ठ,
ज़र=सोना)
५५
उडन खटोला नाम करहें दा, नाल कीता हमराही ।
बब्बन हो असवार सिधाया, केच बन्ने बण राही ।
ज्युं ज्युं शुतर पवे विच मज़लीं, त्युं त्युं चाल सवाई ।
आशक उह पुनूं पर आहा, हाशम शौक इलाही ।५५।
(करहें=उट्ठ)
५६
केचम शहर गए करवानी होत अली दरबारे ।
रो रो कूक सुनावन हालत, जाय बलोच पुकारे ।
"शहर भम्बोर बलोच सस्सी ने, कैद कीते वलि सारे ।
हाशम बाझ पुनूं नहीं छुट्टदे, कैद रहन जुग चारे" ।५६।
५७
होत अली सुन हाल हकीकत पुछ्या बैठ दीवानां ।
ना कुझ पेश हकूमत जावे, ना कुझ कार ख़ज़ानां ।
पहुंचन बहुत महाल पुन्नूं नूं, मुलक बिदेश बिगानां ।
हाशम कौन शहज़ादा तोरे, आख पिछे करवानां ।५७।
५८
बहुत बेज़ार होई गल्ल सुणके, होत पुन्नूं दी माई ।
कौन कोई तन लाय बुझावे, आतश चाय पराई ।
कौन बलोच पुन्नूं दे सिर तों, वार सुटां बादशाही ?
हाशम बाझ पुन्नूं विच दुनियां, होर मुराद ना काई ।५८।
५९
साफ़ जवाब ल्या करवानां, फेर पुन्नूं वल्ल आए ।
सूरत नकश निगार सस्सी दे, कर तारीफ़ सुणाए ।
घायल इशक तुसाडे हरदम, नींदर चशम ना लाए ।
हाशम ख़ातर मिलन तुसाडे, कैद बलोच कराए ।५९।
६०
सुन तारीफ़ होया दिल घायल, रुमकी वाउ पिरम दी ।
कौन कोई दिल रहस टिकाणे, दहशत तेग़ अलम दी ।
शहर भम्बोर पुन्नूं दिल वस्या, विसरी सुरत केचम दी ।
हाशम वाउ वगी उठ चमकी, आतश जनम करम दी ।६०।
६१
शुतर सवार पुन्नूं उठ तुर्या, प्रेम जड़ी सिर पाई ।
रात ग़ुबार चुराय पुन्नूं नूं, चोर चले कर धाई ।
पलक आराम ना वांग बेसबरां, रिज़क मुहार उठाई ।
हाशम वेख नसीब बलोचां, नाय पई बुर्याई ।६१।
६२
रात दिने फड़ राह ल्यु ने, पलकु ना थीवन मांदे ।
सख़त मिज़ाज बलोच हमेशां, बुरे नसीब जिन्हां दे ।
यसूफ़ मिसल बने करवानी, शहरों बाहर लिजांदे ।
हाशम बादशाहां दुख पावन, सख़त ज़ंजीर दिलां दे ।६२।
६३
शहर भम्बोर पइयो ने नज़रीं,आहा वकत सवेरा ।
नाल प्यार कीतो ने करहां, चुसत चलाक बथेरा ।
नाल हकारत बाग़ सस्सी दे, आण कीतो ने डेरा ।
हाशम छड्ड दितो ने शुतरां, चरन अराक चुफेरा ।६३।
(हकारत=नफ़रत, अराक=बिरछ)
६४
कह कह वांग तलिसमीं आहियां, बाग़ चुफेर दीवारां ।
फरश ज़मीन ज़मुरदी आहा, साबत नकश निगारां ।
नहरां हौज़, फ़व्वारे बरसन, हर हर चौक बहारां ।
हाशम शोर जनावर करदे, मोर चकोर हज़ारां ।६४।
६५
घायल इशक खड़े गुल लाला, नाल लहू मुख धोते ।
सेब, अनार, अंगूर भरे रस, चुंज ना लावन तोते ।
कुमरी कुझ करे फ़र्यादां, सरू अज़ाद खलोते ।
हाशम वेख बहार चमन दी, रूह रहे विच गोते ।६५।
(गुल लाला=पोसत दे लाल सूहे फुल्ल,कुमरी=घुग्गी)
६६
कुझ बलख़ी, बग़दादी उशतर, कुझ बुख़ती कन्यानी ।
दोज़ख पेट, लंमेरी गरदन, अज़राईल निशानी ।
चारन बाग़ तुड़ावन शाखां, करन बलोच हैवानी ।
हाशम नाल ग़ुमान पुन्नूं दे, चेह चढ़े करवानी ।६६।
६७
जाय खड़े दरबार सस्सी दे, शोर कीता बग़बानां ।
"बाग़ वीरान होया कुल सारा, चार ल्या करवानां ।
ख़ौफ़ ख़ुदाय ना मरनों ड्रदे, खावन माल बिगानां ।
हाशम शहर भम्बोर बेराजा, ख़ौफ़ नहीं सुलतानां" ।६७।
६८
सुन फ़र्याद सस्सी विच दिल दे, अकल ख़्याल विचारे ।
कौन कमीने ऐड दलेरी, करन बलोच निकारे ।
शायद होत पुन्नूं विच होसी, ताहीं करन पसारे ।
हाशम चावन ऐड फज़ूली, कौन गरीब विचारे ।६८।
६९
सस्सी नाल सईआं कर मसल्हत, बाग़ बन्ने चल आई ।
हर हर दे हत्थ शाख़ चिनारी, तेग़ मिसाल सिपाई ।
उमर अवायल मान हुसन दा, जाय पईआं कर धाई ।
हाशम मार पई करवानां, देन बलोच दुहाई ।६९।
(अवायल=छोटी)
७०
रहे तयार हमेश चमन विच, सेज सस्सी दी आही ।
कंचन पलंघ रवेल चम्बेली, मालन गुन्द विछाई ।
तिस पुर होत पुन्नूं विच नींदर, आही सेज सुखाई ।
हाशम आस मुराद सस्सी दी, सिदक पिछे वर आई ।७०।
७१
सस्सी आण डिट्ठा विच नींदर, होत बेहोश जो ख़ाबों ।
सूरज वांग शुआ हुसन दी, बाहर पवसु निकाबों ।
जे लक्ख पा सन्दूक छुपाईए, आवे मुशक गुलाबों ।
हाशम हुसन प्रीत ना पुछदे, फ़ारग होन हिसाबों ।७१।
(शुआ=किरन)
७२
सुन फ़र्याद बलोचां वाली, तां सुध होत संभाली ।
वेख हैरान होया शहज़ादा, फ़ौज महबूबां वाली ।
रौशन शमां जमाल सस्सी दा, चमक पवे हर डाली ।
हाशम दाग़ प्या गुल लाले, देख सस्सी लब लाली ।७२।
(जमाल=सुहप्पण)
७३
देख दीदार होए तन दोवें, आशक दरद रंञाने ।
डिट्ठ्यां बाझ ना रज्जन मूले, नैन उदास याने ।
सिकद्यां यार मिले जिस दिल नूं, कीमत कदर पछाने ।
हाशम नेहुं असील कमावन, होर गवार की जाने ।७३।
७४
भार लदाय चले करवानी, केचम राह सवेरे ।
आख रहे, चल होत पुन्नूं नूं, जोड़न दसत बथेरे ।
हो लाचार चले करवानी, तोर दित्त्यो ने डेरे ।
हाशम इशक जिन्हां तन रच्या, कौन तिन्हां दिल फेरे ।७४।
७५
केचम आइ केहा करवानां, बात जिवें कुझ आही ।
होत असीर सस्सी दिल कीता, ज़ुलफ़ कुंडल घत्त फाही ।
आवन जान ना याद पुन्नूं नूं, इशक दित्ती बदराही ।
हाशम हाल सुणाय बलोचां, तेग़ प्यु तन वाही ।७५।
७६
होत अली दिन रैन वेहावे, होश अराम ना तिस नूं ।
मौत भली मर जान चंगेरा, आ बने दुख जिस नूं ।
केचम नार जहन्नम कोलों, तेज़ होया तप तिस नूं ।
हाशम वांग यकूब पैग़म्बर, हाल सुणावे किस नूं ।७६।
(नार=अग्ग, जहन्नम=नरक)
७७
केचम लोक फ़िराक पुन्नूं दे, रो रो होन दीवाने ।
यूसफ़ वेच आए करवानी, हर इक विरद ज़बाने ।
पुट पुट वाल सुटन विच गलियां, महलीं शोर ज़नाने ।
हाशम फेर पुन्नूं रब्ब ल्यावे, सही सलामत ख़ाने ।७७।
७८
सुन के होत पुन्नूं दी माई, डाढियां मारे आहीं ।
पुत्त पुन्नूं दी ख़बर ना आए, इक पल जीवन नाहीं ।
हरदम पुन्नूं याद करेंदी, कर कर खलियां बाहीं ।
हाशम जे तूं साहब सच्चा, पुन्नूं मेल किदाहीं ।७८।
७९
शुतर सवार भरा पुन्नूं दे, फेर पुन्नूं वल्ल धाए ।
तेज़ बलाय शराब सुराही, नाल लुकाय ल्याए ।
डिट्ठी पेश ना जांदी हरगिज़, ओड़क धरोह कमाए ।
हाशम आख किने सुख पाया, बेइनसाफ़ दुखाए ।७९।
८०
शहर भम्बोर पुछाय पुन्नूं, नाल गए रंग रस्स दे ।
दिल विच खोट ज़बां विच शीरीं, आण मिले गल हस्सदे ।
बतनी लोक बतावन महरम, हरगिज़ भेत ना दस्सदे ।
हाशम करन लुकाउ ना हेड़ी, मिरग भला कद फस्सदे ।८०।
(शीरीं=मिठास, महरम=भेती, हेड़ी=शिकारी)
८१
सुन केचम करवान सस्सी नूं, चढ़आ चन्द वधेरे ।
रल मिल नाल सईआं दे आखे,"भाग भले दिन मेरे ।"
इक दूं चार होए विच ख़िदमत, नफ़र गुलाम बथेरे ।
हाशम फेर ना समझन पापी, पाप करेंदे जेहड़े ।८१।
८२
रात पई बह पास पुन्नूं दे, जीभ मिट्ठी दिल काले ।
होत पुन्नूं नूं मौत सस्सी दे, भर भर देन प्याले ।
उह की दरद दिलां दा जानन, ऊठ चरावन वाले ।
हाशम दोश नहीं करवानां, इशक कई घर गाले ।८२।
८३
मसत बेहोश होया शहज़ादा, रेहा सुआल जवाबों ।
इक नींदर गल बांह सस्सी दी, दूजा मसत शराबों ।
आशक होवन ते सुख सोवन, इह गल्ल दूर हिसाबों ।
हाशम जिन किन राहु इशक दा, काज़ गवाया ख़ाबों ।८३।
८४
निसफ़ों रात गई करवानां, करहां तंग कसाए ।
महमल पाय बेहोश पुन्नूं नूं, शहर भम्बोरों धाए ।
घंड बलोच बेतरस कुकरमी, यार विछोड़ ल्याए ।
हाशम रोन कुरलावन वाले, फेर सस्सी दिन आए ।८४।
(निसफ़ों=अद्धी, महमल=उट्ठ दा हौदा, घंड=फ़रेबी)
८५
निबड़ी रात होया दिन रौशन, आण चिड़ी चिचलानी ।
सूरज आख नहीं इह जलदी, देख चिता असमानी ।
खातर करन कबाब सस्सी दे, मार हिजर दी कानी ।
हाशम आण बने जिस जाणे, की गल्ल करन ज़बानी ।८५।
८६
नैन उघाड़ सस्सी जद देखे, जाग पई सुध आई ।
वाहद जान पई उह नाहीं, नाल सुत्ती जिस आही ।
ना उह ऊठ ना ऊूठां वाले, ना उह जाम सुराही ।
हाशम तोड़ शिंगार सस्सी ने, ख़ाक लई सिर पाई ।८६।
८७
जिस दिन होत सस्सी छड्ड टुर्या, आख वेखां दिन केहा ।
दोजख़ इक पल मूल ना होसी, तप्या तिस दिन जेहा ।
दिल दा ख़ून अक्खीं फुट आया, ज़ालम इशक इवेहा ।
हाशम मार रुलावे गलियां, बान इशक दी एहा ।८७।
८८
तोड़ शिंगार सस्सी उठ दौड़ी, खोल्ह लिटां घर बारों ।
घिर्या आण गिरहु शिताबी, चन्द छुटा परवारों ।
दौड़ी साथ पुन्नूं दा तकदी, तेग़ हिजर दी मारों ।
हाशम सहन मुहाल जुदाई, सख़त बुरी तलवारों ।८८।
८९
धोबन माउं नसीहत करदी, आ धिया पउ राहीं ।
धोबन ज़ात कमीनी करके, छड्ड गए तुध ताईं ।
भज्ज भज्ज फेर पिछे उठ दौड़ें, लाज अजे तुध नाहीं' ।
हाशम वेख कहे तिन पाए, घंड बलोच बलाईं ।८९।
९०
सस्सी मोड़ जवाब माउं नूं, कर दुख वैन सुणाए ।
'मसत बेहोश पुन्नूं विच महमल, पाय बलोच सिधाए ।
जे कुझ होश हुन्दी शहज़ादे, बाझ सस्सी कद जाए ।
हाशम लेख लिखे सो वाचे, छोड़ मेरा लड़ माए' ।९०।
९१
आ मुड़ जा नहीं जे तुध वल प्रीत पुन्नूं दी ऐसी ।
मसत बेहोश ना रहसी मूले, अंत समें सुद्ध लैसी ।
आपे वेख लईं वल्ल तेरे जाग पया मुड़ पैसी ।
हाशम बाझ दोवें तन मिल्यां, चाट लगी मन कैसी" ।९१।
९२
"माए सख़त ज़ंजीर बलोचां होत पुन्नूं नूं पाए ।
कद उह मुड़न पिछाहां देंदे, ऐड कुकरमी आए ।
शाला रहन ख़राब हमेशां दुखीए आण दुखाए ।
हाशम केतक बात सस्सी नूं जे रब्ब यार मिलाए" ।९२।
९३
"दिल दी बात समझ हुन धीए, कर कुझ होश टिकाने ।
ज़ोरी करन मुहाल बदेशीं, की जानन बाल याने ।
बाझ प्यार चुराय खड़े किन्ह आदम रूप स्याने ।
हाशम समझ विचार बलोचां, की सिर दोश धिंङाणे" ।९३।
९४
"सुन माए जे दिल विच होसी, हवस मेरे दिलबर दे ।
दिलबर बेपरवाह हमेशां, कुझ परवाह ना करदे ।
वेख चकोर पतंग विचारे, मुफ़त बिरहा विच मरदे ।"
हाशम मोड़ रहे नहीं मुड़दी, घर दे लोक शहर दे ।९४।
९५
माउं फेर सस्सी नूं आखे, "ना चढ़ चिखा दीवानी ।
कद तूं जाय बलोचां मिलसें, पैरीं टुरन बिगानी ।
सूली सार अग्गे थल मारू, तरस मरें बिन पानी ।
हाशम जान मुहाल इकल्ली, बरबर गाह ब्याबानी" ।९५।
(सार=लोहा, बरबर=उजाड़)
९६
"तुरसां मूल ना मुड़सां राहों, जान तली पर धरसां ।
जब लग सास निरास ना होवां, मरनों मूल ना ड्रसां ।
जे रब्ब कुझ सस्सी दी सुणसी, जा पला उस फड़सां ।
हाशम नहीं शहीद हो वैसां, थल मारू विच मरसां" ।९६।
९७
फड़्या पंध होई परदेसी टुट्ट गई डोर पतंगों ।
सस्सी जो ना धरदी आही, भोइं पैर पलंघों ।
दिल तों ख़ौफ़ उतार सिधाई, वांगूं शेर पलंगों ।
हाशम जो दम जास खलासी, होवसु कैद फ़रंगों ।९७।
(पलंग=चीता)
९८
कर असबाब ल्या शहज़ादी, क्युं जो राह ख़तर दा ।
पानी ख़ून ख़ुराक कलेजा रहबर दरद जिगर दा ।
गल विच बाल अक्खां विच सुरखी, सोज़ जनून कहर दा ।
हाशम वेख अहवाल कलेजा घायल शमस कमर दा ।९८।
(शमस कमर=सूरज चन्न)
९९
चमकी आण दुपहरां वेले, गरमी गरम बहारे ।
तपदी वाउ वगे असमानों, पंछी मार उतारे ।
आतश दा दर्या खलोता, थल मारू विच सारे ।
हाशम फेर पिछांह ना मुड़दी, लूं लूं होत पुकारे ।९९।
१००
नाज़ुक पैर मलूक सस्सी दे, महन्दी नाल शिंगारे ।
बालू रेत तपे विच थल दे, ज्युं जौं भुन्नन भठ्यारे ।
सूरज भज्ज वड़्या विच बदली, ड्रदा लिशक ना मारे ।
हाशम वेख यकीन सस्सी दा, सिदकों मूल ना हारे ।१००।
१०१
दिल विच तपश थलां दी गरमी, आण फ़िराक रंञानी ।
किचर कु नैन करन दिलबरियां, चोन लबां विच पानी ।
फिर फिर डाढ करे हठ दिल दा, पर जद बहुत वेहानी ।
हाशम याद भम्बोर प्या उस टुट ग्या मान निमानी ।१०१।
१०२
जे जाना छड्ड जान सुत्ती नूं इक पल अक्ख ना झमकां ।
गरद होवां विच गरद थलां दी, वांग जवाहर चमकां ।
जल वांगूं रल देन दिखाली, थल मारू दियां चमकां ।
हाशम कौन सस्सी बिन देखे, एस इशक दियां धमकां ।१०२।
१०३
थल मारू तप दोजख़ होया, आतश सोज़ हिजर दी ।
मुड़न मुहाल ते वेखन औखी, सूरत केच शहर दी ।
जब लग सास निरास ना थींवां, ज्युं यूसफ़ तांघ मिसर दी ।
हाशम सख़त बलोच कमीने, बेइनसाफ़ बेदरदी ।१०३।
१०४
कुझ डिगदी कुझ ढहन्दी उठदी, बहन्दी ते दम लैंदी ।
ज्युं कर तोट शराबों आवे, फेर उते वल वैंदी ।
ढूंडे खोज शुतर दा कित वल, हरगिज़ भाल ना पैंदी ।
हाशम जगत ना क्युंकर गावे, प्रीत सम्पूरन जैंदी ।१०४।
१०५
कुदरत नाल सस्सी हत्थ आया, फिरद्यां खोज शुतर दा ।
जान नहीं उह खोज सस्सी नूं मिल्या जाम खिज़र दा ।
जां उह नूर नज़र दा कहीए, दारू दरद जिगर दा ।
हाशम बलकि सस्सी नूं मिल्या, कासद केच शहर दा ।१०५।
१०६
दारू दरद जिगर दा करके, खोज लए गल लावे ।
फिर फिर ला ना सकदी ड्रदी, मत इह भी मिट जावे ।
फिर कर वेख रही होर दूजा, खोज ना नज़रीं आवे ।
हाशम फेर विसाह ना करदी, वांग पुन्नूं छल जावे ।१०६।
१०७
काका नाम अयाली आहा, उस गिरदे विच चिरदा ।
डिठा उह सस्सी ने दूरों, थल मारू विच फिरदा ।
अंचल छोड निशानी करके, फड़्या राह उधर दा ।
हाशम कूक करे तिस वल नूं, पर जावस दिल घिरदा ।१०७।
१०८
सूरत वेख अयाली डरया, आफ़त मार ना जावे ।
आदम रूप ज़नानी सूरत, थल मारू कद आवे ।
ज्युं ज्युं सुने आवाज़ सस्सी दी, लुक छिप जान बचावे ।
हाशम जां दिन उलटे आवन, सभ उलटा हो जावे ।१०८।
१०९
कूक पुकार निरास सस्सी हो, खोज वन्ने उठ दौड़ी ।
दिल विच साड़ थलां दी आतश, रूह रंञानी धौड़ी ।
पिछा दे चल्ली शहज़ादी, जान लगी सू कौड़ी ।
हाशम कौन फ़लक नूं पकड़े, जाय चढ़े धर पौड़ी ।१०९।
११०
तरले लक्ख जतन कर पहुंची, खोज तोड़ी हठ करके ।
टुटदी जान गईआं छुट आहीं, याद बलोचां करके ।
शाला ! रहन क्यामत ताईं, नाल सूलां दे लटके ।
हाशम मरन कुमौत बिदेसीं, लून वांग खुर खुर के ।११०।
१११
ओड़क वकत कहर दियां कूकां, सुन पत्थर ढल जावे ।
'जिस डाची मेरा पुन्नूं खड़्या, मर दोज़ख़ वल्ल जावे ।
जां उस नेहुं लगे विच बिरहों, वांग सस्सी जल जावे ।
हाशम मौत पवे करवानां, तुख़म ज़मीनों जावे' ।१११।
(तुख़म=बीज)
੧੧੨
फिर दिल समझ करे लक्ख तौबा, बहुत बेअदबी होई ।
जिस पुर यार करे असवारी तिस दे जेड ना कोई ।
को मैं वांग निकरमन नाहीं, कित वल्ल मिले ना ढोई ।
हाशम कौंत मिले हस्स जिस नूं, जान सुहागन सोई' ।११२।
११३
सिर धर खोज उत्ते गश आई, मौत सस्सी दी आई ।
'ख़ुश हो यार ! असां तुध कारन, थल विच जान गवाई ।'
डिगदे सार ग्या दम निकल, तन थीं जान सिधाई ।
हाशम कहु लक्ख लक्ख शुकराना, इशक वलों रह आई ।११३।
११४
कर कर ध्यान अयाली डरया, सोच करे इस गल दी ।
"की असरार रही डिग एवैं, फेर नहीं मुड़ हलदी ।
मत कोई नार रहे मर प्यासी, राह पंधानू चलदी ।
हाशम चल वेखां की ड्रना, होणहार नहीं टलदी" ।११४।
११५
अय्यड़ छोड़ अयाली तुर्या, दिल ड्रदे पग धरदा ।
सूरत देख अहवाल सस्सी दा, चढ़आ सोज़ कहर दा ।
दिल थीं शौक ग्या उठ सारा, माल धियां पुत्त घर दा ।
हाशम जान दिलों जग फ़ानी, वेख फ़कीरी फड़दा ।११५।
११६
थल विच गोर सस्सी दी करके, वांग यतीम निमाने ।
गल खफ़नी, सिर पाय बरहना, बैसा गोर सिर्हाने ।
इक गल जान लई जग फ़ानी, होर कलाम ना जाने ।
हाशम खास फ़कीरी एहो, पर इह कौन पछाने ।११६।
११७
मुनकर अते नकीर सस्सी नूं कबरीं पुच्छन आए ।
"सच्च कहु सस्सीए ! दुनियां दे विच, की की अमल कमाए ?"
"जंमदी पाय सन्दूक रुढ़ाई, सुत्ती होत वंञाए ।"
हाशम कह पुन्नूं दियां ख़बरां, कद केचम तों आए ?११७।
११८
उड्या रूह सस्सी दा तन थीं, फेर पुन्नूं वल धाया ।
महमल मसत बेहोश पुन्नूं नूं, सुफने आण जगाया ।
'लै हुन यार असां संग तेरे, कौल करार निभाया ।
हाशम रही सस्सी विच थल दे, मैं रुख़सत लै आया' ।११८।
११९
उटकी नींद पुन्नूं उठ बैठा, जलदी विच कचावे ।
ना उह शहर भम्बोर प्यारा, ना उह महल सुहावे ।
अचानक चमक लगी शहज़ादे, कुझ सिर पैर ना आवे ।
हाशम जाग लधी फिर केहा आशक चैन वेहावे ।११९।
(कचावे=काठी)
१२०
तिस दम मोड़ करहे नूं तुर्या, फेर सस्सी वल्ल मुड़्या ।
अगों मुड़न भराउ ना देंदे, उठ मुहारों फड़्या ।
तुध बिन बाप होया नाबीना, कूके सड़्या सड़्या ।
हाशम वेख महल्ल केचम दे, फिर मुड़ आवीं चढ़आ ।१२०।
(नाबीना=अन्न्हां)
१२१
हिजरों अग्ग पुन्नूं नूं भड़की, तोड़ जवाब सुनावे ।
"कैंदे माउं पिता पुत कैंदे, नाल मुयां मर जावे ।
जेही नाल असाडे कीती, पेश तुसाडे आवे ।
हाशम बाझ सस्सी नहीं दूजा, जे रब्ब फेर मिलावे" ।१२१।
१२२
घंड बलोच ख्याल ना छड्डदे, वल वल घेर खलोंदे ।
नाले ज़ोर विखालन नाले, ऊठ गले लग रोंदे ।
जब लग सास ना मुड़ने देसां, आइ पुन्नूं वस्स होंदे ।
हाशम आशक बाझ इशक दे, कहु कित वल दिल ढोंदे ।१२२।
१२३
बहुत लाचार होया शहज़ादा, खिची पकड़ कटारी ।
जिस दी चमक लगी जिन्द जावे, जो जम रूप दुधारी ।
छोड़ मुहार दिती तद भाईआं, ड्रद्यां जान प्यारी ।
हाशम कौन फड़े जिन्दबाज़ां, जान इशक विच हारी ।१२३।
१२४
सुट्टी होत मुहार सस्सी वल, छड्ड भाई दुखदाई ।
"मिलसां जा इक वार सस्सी नूं, जे रब्ब आस पुजाई ।
झब सुट पैर सस्सी वल करहा, वकत इहो हुन भाई ।
हाशम दुद्ध मलीदा देसां, करसां टहल सवाई" ।१२४।
१२५
शाबाश ! उस करहे दे तुरने, तेज़ धरे पग तीरों ।
पहुता आइ सस्सी दी कबरे, आकल शुतर वज़ीरों ।
ताज़ी गोर डिठी शहज़ादे, पुछ्या ओस फ़कीरों,
"हाशम कौन बज़ुरग समाना ? वाकिफ़ कर इस पीरों" ।१२५।
१२६
आखी ओस फ़कीर पुन्नूं नूं, खोल्ह हकीकत सारी ।
"आही नार परी दी सूरत, गरमीं मार उतारी ।
जपदी नाम पुन्नूं दा आही, दरद इशक दी मारी ।
हाशम नाम मुकाम ना जाणा, आही कौन विचारी" ।१२६।
१२७
सुन के होत ज़िमीं पुर डिग्या, खाय कलेजे कानी ।
खुल्ह गई गोर प्या विच कबरे, फेर मिले दिल जानी ।
खातर इशक गए रल मिट्टी, सूरत हुसन जवानी ।
हाशम इशक बलोच सस्सी दा, जग विच रही कहानी ।१२७।