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समर्पण : माखनलाल चतुर्वेदी
Samarpan Makhanlal Chaturvedi
तुम भी देते हो तोल तोल
बेटी की बिदा
यह बारीक खयाली देखी
तुम्हारा मिलन
लाल टीका
युग-ध्वनि
यह लाशों का रखवाला
उल्लास का क्षण
स्मृति का वसन्त
वृक्ष और वल्लरी
न्याय तुम्हारा कैसा
तान की मरोर
युग और तुम
दूध की बूँदों का अवतरण
यह बरसगाँठ
किनकी ध्वनियों को दुहराऊँ
झरना
आँसू से
गति-दाता
पास बैठे हो
अधिकार नहीं दोगे मुझको
दाईं बाजू
अमर-अमर
फूल की मनुहार
हरियालेपन की साध
पर्वत की अभिलाषा
गोधूली है
दृग-जल-जमुना
बोल नये सपने
उलहना
नन्हे मेहमान
क्या सावन, क्या फागन
कैदी की भावना
युग-पुरुष
गीत (१)
यौवन का पागलपन
हृदय
युग-धनी
ध्वनि बिखर उठी
ओ तृण-तरु गामी
एक तुम हो
मन की साख
उधार के सपने
गीत (२)
जोड़ी टूट गई
अटल
हिमालय पर उजाला
कुलवधू का चरखा
लक्ष्य-भेद के उतावले तीर से
वीणा का तार
गीत (३)
चले समर्पण आगे-आगे
अंधड़ और मानव
झूला झूलै री
आराधना की बेली
पतित
मुक्ति का द्वार
आने दो
तेरा पता
टूटती जंजीर
दूर या पास
तर्पण का स्वर
बेचैनी
दूर गई हरियाली
धरती तुझसे बोल रही है
रोटियों की जय
जबलपुर जेल से छूटते समय
पथ में
जलियाँ वाला की बेदी
नज़रों की नज़र उतारूँगा
समय की चट्टान
गीत (४)
झंकार कर दो
क्या-क्या बीत रही है
तुम न हँसो
नीलिमा के घर
यह आवाज
ऊषा
कुछ पतले पतले धागे
तरुणई का ज्वार
सखि कौन
हौले-हौले, धीरे-धीरे