1. बाज़ार
लग गया बाज़ार टोपियों का, रंगबिरंगे।
कुछ लाल, हरा, केसरिया, सफेद।
सब जन, धन, मन की माया है।
रंग देखकर व्यंग्य आप भगवा, इस्लामी,
मार्क्सवादी, राष्ट्रवादी, भक्तवादी - आलोचक।
मैं कहता सब अर्थतंत्र का खेल है।
जिसकी रोटी जिससे चलती वो बन जाता है,
उस धारा का सामन्त।
बाजार है विचारों का जहाँ सब हैं - गिरगिट।
कैसे बचूँ इन गिरगिटों से जो हैं - सर्वव्यापी।
आज गया मैं भारतवर्ष के साँसों (गाँव) में,
न दिखा कोई रंग।
रंगहीन, पंथहीन, सब ओर एकही रंग
हरियाली, हरियाली और हरियाली।
शहर शहर रंग अलग अलग गाँव गाँव बेरँग,
मोह, माया, कपट बिना।
गाँवो की रंगहीन बाज़ार में जहाँ सब
अपना, हमारा, और तुम्हारा है,
न कोई धारा, न कोई विचार।
