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क़ितआ अब्दुल हमीद अदम
Qita Abdul Hamid Adam in Hindi
अब भी साज़ों के तार हिलते हैं
अब मिरी हालत-ए-ग़मनाक पे कुढ़ना कैसा
आख़िरत का ख़याल भी साक़ी
इक शिकस्ता से मक़बरे के क़रीब
उरूस-ए-सुब्ह ने ली है मचल के अंगड़ाई
एक रेज़ा तिरे तबस्सुम का
ऐ ख़राबात के ख़ुदावंदो
ऐ गदागर ख़ुदा का नाम न ले
ऐ मिरा जाम तोड़ने वाले
और अरमान इक निकल जाता
काफ़ी वसीअ सिलसिला-ए-इख़्तियार है
कितनी सदियों से अज़्मत-ए-आदम
कौन है जिस ने मय नहीं चक्खी
ख़राबात-ए-मंज़िल गह-ए-कहकशाँ है
खू-ए-लैल-ओ-नहार देखी है
गुल्सितानों में घूम लेता हूँ
चलते चलते तमाम रस्तों से
जाम उठा और फ़ज़ा को रक़्साँ कर
जा रहा था हरम को मैं लेकिन
जिन को मल्लाह छोड़ जाते हैं
ज़िंदगी इक फ़रेब-ए-पैहम है
ज़िंदगी की दराज़ पलकों पर
ज़िंदगी है कि इक हसीन सज़ा
ज़ीस्त दामन छुड़ाए जाती है
ज़ुल्मतों को शराब-ख़ाने से
ज़ौक़-ए-परवाज़ अगर रहे ग़ालिब
तीरगी के घने हिजाबों में
तुम्हारे हुस्न को मेरी नज़र लगी है ज़रूर
दफ़्न हैं साग़रों में हंगामे
दिल की हस्ती बिखर गई होती
न ख़ुदा है न नाख़ुदा साथी
नाख़ुदा किस लिए परेशाँ है
पर लगा कर उड़ेगा नाम तिरा
बहर-ए-आलाम बे-किनारा है
मरमरीं मरक़दों पे वक़्त-ए-सहर
मायूस हो गई है दुआ भी जबीन भी
माह-ओ-अंजुम के सर्द होंटों पर
मिरे दिल की उदास वादी में
मुफ़लिसों को अमीर कहते हैं
मैं रास्ते का बोझ हूँ मेरा न कर ख़याल
मौत का सर्द हाथ भी साक़ी
ये वो फ़ज़ा है जहाँ फ़र्क़-ए-सुब्ह-ओ-शाम नहीं
रूह को एक आह का हक़ है
वस्ल की शब है और सीने में
शाम है और पार नद्दी के
शिकन न डाल जबीं पर शराब देते हुए
साहिल पे इक थके हुए जोगी की बंसरी
सूरत के आइने में दिल-ए-पाएमाल देख
सो रही है गुलों के बिस्तर पर
हश्र तक भी अगर सदाएँ दें