हिन्दी कविताएँ : सुभद्रा कुमारी चौहान (हिन्दी कविता)
Hindi Poetry : Subhadra Kumari Chauhan
1. जलियाँवाला बाग में बसंत
(जलियाँवाला बाग की घटना बैसाखी को घटी थी,
बैसाखी वसंत से सम्बंधित महीनों (फाल्गुन और चैत्र)
के अगले दिन ही आती है)
यहाँ कोकिला नहीं, काग हैं, शोर मचाते,
काले काले कीट, भ्रमर का भ्रम उपजाते।
कलियाँ भी अधखिली, मिली हैं कंटक-कुल से,
वे पौधे, व पुष्प शुष्क हैं अथवा झुलसे।
परिमल-हीन पराग दाग सा बना पड़ा है,
हा! यह प्यारा बाग खून से सना पड़ा है।
ओ, प्रिय ऋतुराज! किन्तु धीरे से आना,
यह है शोक-स्थान यहाँ मत शोर मचाना।
वायु चले, पर मंद चाल से उसे चलाना,
दुःख की आहें संग उड़ा कर मत ले जाना।
कोकिल गावें, किन्तु राग रोने का गावें,
भ्रमर करें गुंजार कष्ट की कथा सुनावें।
लाना संग में पुष्प, न हों वे अधिक सजीले,
तो सुगंध भी मंद, ओस से कुछ कुछ गीले।
किन्तु न तुम उपहार भाव आ कर दिखलाना,
स्मृति में पूजा हेतु यहाँ थोड़े बिखराना।
कोमल बालक मरे यहाँ गोली खा कर,
कलियाँ उनके लिये गिराना थोड़ी ला कर।
आशाओं से भरे हृदय भी छिन्न हुए हैं,
अपने प्रिय परिवार देश से भिन्न हुए हैं।
कुछ कलियाँ अधखिली यहाँ इसलिए चढ़ाना,
कर के उनकी याद अश्रु के ओस बहाना।
तड़प तड़प कर वृद्ध मरे हैं गोली खा कर,
शुष्क पुष्प कुछ वहाँ गिरा देना तुम जा कर।
यह सब करना, किन्तु यहाँ मत शोर मचाना,
यह है शोक-स्थान बहुत धीरे से आना।
2. झांसी की रानी
सिंहासन हिल उठे राजवंशों ने भृकुटी तानी थी,
बूढ़े भारत में भी आई फिर से नई जवानी थी,
गुमी हुई आज़ादी की कीमत सबने पहचानी थी,
दूर फिरंगी को करने की सबने मन में ठानी थी।
चमक उठी सन सत्तावन में, वह तलवार पुरानी थी,
बुंदेले हरबोलों के मुँह हमने सुनी कहानी थी,
खूब लड़ी मर्दानी वह तो झाँसी वाली रानी थी।
कानपूर के नाना की, मुँहबोली बहन छबीली थी,
लक्ष्मीबाई नाम, पिता की वह संतान अकेली थी,
नाना के सँग पढ़ती थी वह, नाना के सँग खेली थी,
बरछी, ढाल, कृपाण, कटारी उसकी यही सहेली थी।
वीर शिवाजी की गाथायें उसको याद ज़बानी थी,
बुंदेले हरबोलों के मुँह हमने सुनी कहानी थी,
खूब लड़ी मर्दानी वह तो झाँसी वाली रानी थी।
लक्ष्मी थी या दुर्गा थी वह स्वयं वीरता की अवतार,
देख मराठे पुलकित होते उसकी तलवारों के वार,
नकली युद्ध-व्यूह की रचना और खेलना खूब शिकार,
सैन्य घेरना, दुर्ग तोड़ना ये थे उसके प्रिय खिलवाड़।
महाराष्ट्र-कुल-देवी उसकी भी आराध्य भवानी थी,
बुंदेले हरबोलों के मुँह हमने सुनी कहानी थी,
खूब लड़ी मर्दानी वह तो झाँसी वाली रानी थी।
हुई वीरता की वैभव के साथ सगाई झाँसी में,
ब्याह हुआ रानी बन आई लक्ष्मीबाई झाँसी में,
राजमहल में बजी बधाई खुशियाँ छाई झाँसी में,
सुघट बुंदेलों की विरुदावलि-सी वह आई थी झांसी में।
चित्रा ने अर्जुन को पाया, शिव को मिली भवानी थी,
बुंदेले हरबोलों के मुँह हमने सुनी कहानी थी,
खूब लड़ी मर्दानी वह तो झाँसी वाली रानी थी।
उदित हुआ सौभाग्य, मुदित महलों में उजियाली छाई,
किंतु कालगति चुपके-चुपके काली घटा घेर लाई,
तीर चलाने वाले कर में उसे चूड़ियाँ कब भाई,
रानी विधवा हुई, हाय! विधि को भी नहीं दया आई।
निसंतान मरे राजाजी रानी शोक-समानी थी,
बुंदेले हरबोलों के मुँह हमने सुनी कहानी थी,
खूब लड़ी मर्दानी वह तो झाँसी वाली रानी थी।
बुझा दीप झाँसी का तब डलहौज़ी मन में हरषाया,
राज्य हड़प करने का उसने यह अच्छा अवसर पाया,
फ़ौरन फौजें भेज दुर्ग पर अपना झंडा फहराया,
लावारिस का वारिस बनकर ब्रिटिश राज्य झाँसी आया।
अश्रुपूर्ण रानी ने देखा झाँसी हुई बिरानी थी,
बुंदेले हरबोलों के मुँह हमने सुनी कहानी थी,
खूब लड़ी मर्दानी वह तो झाँसी वाली रानी थी।
अनुनय विनय नहीं सुनती है, विकट शासकों की माया,
व्यापारी बन दया चाहता था जब यह भारत आया,
डलहौज़ी ने पैर पसारे, अब तो पलट गई काया,
राजाओं नव्वाबों को भी उसने पैरों ठुकराया।
रानी दासी बनी, बनी यह दासी अब महरानी थी,
बुंदेले हरबोलों के मुँह हमने सुनी कहानी थी,
खूब लड़ी मर्दानी वह तो झाँसी वाली रानी थी।
छिनी राजधानी दिल्ली की, लखनऊ छीना बातों-बात,
कैद पेशवा था बिठूर में, हुआ नागपुर का भी घात,
उदैपुर, तंजौर, सतारा,कर्नाटक की कौन बिसात?
जब कि सिंध, पंजाब ब्रह्म पर अभी हुआ था वज्र-निपात।
बंगाले, मद्रास आदि की भी तो वही कहानी थी,
बुंदेले हरबोलों के मुँह हमने सुनी कहानी थी,
खूब लड़ी मर्दानी वह तो झाँसी वाली रानी थी।
रानी रोईं रनिवासों में, बेगम ग़म से थीं बेज़ार,
उनके गहने कपड़े बिकते थे कलकत्ते के बाज़ार,
सरे आम नीलाम छापते थे अंग्रेज़ों के अखबार,
'नागपुर के ज़ेवर ले लो लखनऊ के लो नौलख हार'।
यों परदे की इज़्ज़त परदेशी के हाथ बिकानी थी,
बुंदेले हरबोलों के मुँह हमने सुनी कहानी थी,
खूब लड़ी मर्दानी वह तो झाँसी वाली रानी थी।
कुटियों में भी विषम वेदना, महलों में आहत अपमान,
वीर सैनिकों के मन में था अपने पुरखों का अभिमान,
नाना धुंधूपंत पेशवा जुटा रहा था सब सामान,
बहिन छबीली ने रण-चण्डी का कर दिया प्रकट आहवान।
हुआ यज्ञ प्रारम्भ उन्हें तो सोई ज्योति जगानी थी,
बुंदेले हरबोलों के मुँह हमने सुनी कहानी थी,
खूब लड़ी मर्दानी वह तो झाँसी वाली रानी थी।
महलों ने दी आग, झोंपड़ी ने ज्वाला सुलगाई थी,
यह स्वतंत्रता की चिनगारी अंतरतम से आई थी,
झाँसी चेती, दिल्ली चेती, लखनऊ लपटें छाई थी,
मेरठ, कानपुर,पटना ने भारी धूम मचाई थी,
जबलपुर, कोल्हापुर में भी कुछ हलचल उकसानी थी,
बुंदेले हरबोलों के मुँह हमने सुनी कहानी थी,
खूब लड़ी मर्दानी वह तो झाँसी वाली रानी थी।
इस स्वतंत्रता महायज्ञ में कई वीरवर आए काम,
नाना धुंधूपंत, ताँतिया, चतुर अज़ीमुल्ला सरनाम,
अहमदशाह मौलवी, ठाकुर कुँवरसिंह सैनिक अभिराम,
भारत के इतिहास गगन में अमर रहेंगे जिनके नाम।
लेकिन आज जुर्म कहलाती उनकी जो कुरबानी थी,
बुंदेले हरबोलों के मुँह हमने सुनी कहानी थी,
खूब लड़ी मर्दानी वह तो झाँसी वाली रानी थी।
इनकी गाथा छोड़, चले हम झाँसी के मैदानों में,
जहाँ खड़ी है लक्ष्मीबाई मर्द बनी मर्दानों में,
लेफ्टिनेंट वाकर आ पहुँचा, आगे बढ़ा जवानों में,
रानी ने तलवार खींच ली, हुया द्वंद असमानों में।
ज़ख्मी होकर वाकर भागा, उसे अजब हैरानी थी,
बुंदेले हरबोलों के मुँह हमने सुनी कहानी थी,
खूब लड़ी मर्दानी वह तो झाँसी वाली रानी थी।
रानी बढ़ी कालपी आई, कर सौ मील निरंतर पार,
घोड़ा थक कर गिरा भूमि पर गया स्वर्ग तत्काल सिधार,
यमुना तट पर अंग्रेज़ों ने फिर खाई रानी से हार,
विजई रानी आगे चल दी, किया ग्वालियर पर अधिकार।
अंग्रेज़ों के मित्र सिंधिया ने छोड़ी राजधानी थी,
बुंदेले हरबोलों के मुँह हमने सुनी कहानी थी,
खूब लड़ी मर्दानी वह तो झाँसी वाली रानी थी।
विजय मिली, पर अंग्रेज़ों की फिर सेना घिर आई थी,
अबके जनरल स्मिथ सम्मुख था, उसने मुहँ की खाई थी,
काना और मंदरा सखियाँ रानी के संग आई थी,
युद्ध श्रेत्र में उन दोनों ने भारी मार मचाई थी।
पर पीछे ह्यूरोज़ आ गया, हाय! घिरी अब रानी थी,
बुंदेले हरबोलों के मुँह हमने सुनी कहानी थी,
खूब लड़ी मर्दानी वह तो झाँसी वाली रानी थी।
तो भी रानी मार काट कर चलती बनी सैन्य के पार,
किन्तु सामने नाला आया, था वह संकट विषम अपार,
घोड़ा अड़ा, नया घोड़ा था, इतने में आ गये सवार,
रानी एक, शत्रु बहुतेरे, होने लगे वार-पर-वार।
घायल होकर गिरी सिंहनी उसे वीर गति पानी थी,
बुंदेले हरबोलों के मुँह हमने सुनी कहानी थी,
खूब लड़ी मर्दानी वह तो झाँसी वाली रानी थी।
रानी गई सिधार चिता अब उसकी दिव्य सवारी थी,
मिला तेज से तेज, तेज की वह सच्ची अधिकारी थी,
अभी उम्र कुल तेइस की थी, मनुज नहीं अवतारी थी,
हमको जीवित करने आई बन स्वतंत्रता-नारी थी,
दिखा गई पथ, सिखा गई हमको जो सीख सिखानी थी,
बुंदेले हरबोलों के मुँह हमने सुनी कहानी थी,
खूब लड़ी मर्दानी वह तो झाँसी वाली रानी थी।
जाओ रानी याद रखेंगे ये कृतज्ञ भारतवासी,
यह तेरा बलिदान जगावेगा स्वतंत्रता अविनासी,
होवे चुप इतिहास, लगे सच्चाई को चाहे फाँसी,
हो मदमाती विजय, मिटा दे गोलों से चाहे झाँसी।
तेरा स्मारक तू ही होगी, तू खुद अमिट निशानी थी,
बुंदेले हरबोलों के मुँह हमने सुनी कहानी थी,
खूब लड़ी मर्दानी वह तो झाँसी वाली रानी थी।
3. मेरा नया बचपन
बार-बार आती है मुझको मधुर याद बचपन तेरी।
गया ले गया तू जीवन की सबसे मस्त खुशी मेरी।
चिंता-रहित खेलना-खाना वह फिरना निर्भय स्वच्छंद।
कैसे भूला जा सकता है बचपन का अतुलित आनंद?
ऊँच-नीच का ज्ञान नहीं था छुआछूत किसने जानी?
बनी हुई थी वहाँ झोंपड़ी और चीथड़ों में रानी।
किये दूध के कुल्ले मैंने चूस अँगूठा सुधा पिया।
किलकारी किल्लोल मचाकर सूना घर आबाद किया।
रोना और मचल जाना भी क्या आनंद दिखाते थे।
बड़े-बड़े मोती-से आँसू जयमाला पहनाते थे।
मैं रोई, माँ काम छोड़कर आईं, मुझको उठा लिया।
झाड़-पोंछ कर चूम-चूम कर गीले गालों को सुखा दिया।
दादा ने चंदा दिखलाया नेत्र नीर-युत दमक उठे।
धुली हुई मुस्कान देख कर सबके चेहरे चमक उठे।
वह सुख का साम्राज्य छोड़कर मैं मतवाली बड़ी हुई।
लुटी हुई, कुछ ठगी हुई-सी दौड़ द्वार पर खड़ी हुई।
लाजभरी आँखें थीं मेरी मन में उमँग रँगीली थी।
तान रसीली थी कानों में चंचल छैल छबीली थी।
दिल में एक चुभन-सी थी यह दुनिया अलबेली थी।
मन में एक पहेली थी मैं सब के बीच अकेली थी।
मिला, खोजती थी जिसको हे बचपन! ठगा दिया तूने।
अरे! जवानी के फंदे में मुझको फँसा दिया तूने।
सब गलियाँ उसकी भी देखीं उसकी खुशियाँ न्यारी हैं।
प्यारी, प्रीतम की रँग-रलियों की स्मृतियाँ भी प्यारी हैं।
माना मैंने युवा-काल का जीवन खूब निराला है।
आकांक्षा, पुरुषार्थ, ज्ञान का उदय मोहनेवाला है।
किंतु यहाँ झंझट है भारी युद्ध-क्षेत्र संसार बना।
चिंता के चक्कर में पड़कर जीवन भी है भार बना।
आ जा बचपन! एक बार फिर दे दे अपनी निर्मल शांति।
व्याकुल व्यथा मिटानेवाली वह अपनी प्राकृत विश्रांति।
वह भोली-सी मधुर सरलता वह प्यारा जीवन निष्पाप।
क्या आकर फिर मिटा सकेगा तू मेरे मन का संताप?
मैं बचपन को बुला रही थी बोल उठी बिटिया मेरी।
नंदन वन-सी फूल उठी यह छोटी-सी कुटिया मेरी।
'माँ ओ' कहकर बुला रही थी मिट्टी खाकर आई थी।
कुछ मुँह में कुछ लिये हाथ में मुझे खिलाने लाई थी।
पुलक रहे थे अंग, दृगों में कौतुहल था छलक रहा।
मुँह पर थी आह्लाद-लालिमा विजय-गर्व था झलक रहा।
मैंने पूछा 'यह क्या लाई?' बोल उठी वह 'माँ, काओ'।
हुआ प्रफुल्लित हृदय खुशी से मैंने कहा - 'तुम्हीं खाओ'।
पाया मैंने बचपन फिर से बचपन बेटी बन आया।
उसकी मंजुल मूर्ति देखकर मुझ में नवजीवन आया।
मैं भी उसके साथ खेलती खाती हूँ, तुतलाती हूँ।
मिलकर उसके साथ स्वयं मैं भी बच्ची बन जाती हूँ।
जिसे खोजती थी बरसों से अब जाकर उसको पाया।
भाग गया था मुझे छोड़कर वह बचपन फिर से आया।
4. साध
मृदुल कल्पना के चल पँखों पर हम तुम दोनों आसीन।
भूल जगत के कोलाहल को रच लें अपनी सृष्टि नवीन।
वितत विजन के शांत प्रांत में कल्लोलिनी नदी के तीर।
बनी हुई हो वहीं कहीं पर हम दोनों की पर्ण-कुटीर।
कुछ रूखा, सूखा खाकर ही पीतें हों सरिता का जल।
पर न कुटिल आक्षेप जगत के करने आवें हमें विकल।
सरल काव्य-सा सुंदर जीवन हम सानंद बिताते हों।
तरु-दल की शीतल छाया में चल समीर-सा गाते हों।
सरिता के नीरव प्रवाह-सा बढ़ता हो अपना जीवन।
हो उसकी प्रत्येक लहर में अपना एक निरालापन।
रचे रुचिर रचनाएँ जग में अमर प्राण भरने वाली।
दिशि-दिशि को अपनी लाली से अनुरंजित करने वाली।
तुम कविता के प्राण बनो मैं उन प्राणों की आकुल तान।
निर्जन वन को मुखरित कर दे प्रिय! अपना सम्मोहन गान।
5. यह कदम्ब का पेड़
यह कदंब का पेड़ अगर माँ होता यमुना तीरे।
मैं भी उस पर बैठ कन्हैया बनता धीरे-धीरे।
ले देतीं यदि मुझे बांसुरी तुम दो पैसे वाली।
किसी तरह नीची हो जाती यह कदंब की डाली।
तुम्हें नहीं कुछ कहता पर मैं चुपके-चुपके आता।
उस नीची डाली से अम्मा ऊँचे पर चढ़ जाता।
वहीं बैठ फिर बड़े मजे से मैं बांसुरी बजाता।
अम्मा-अम्मा कह वंशी के स्वर में तुम्हे बुलाता।
बहुत बुलाने पर भी माँ जब नहीं उतर कर आता।
माँ, तब माँ का हृदय तुम्हारा बहुत विकल हो जाता।
तुम आँचल फैला कर अम्मां वहीं पेड़ के नीचे।
ईश्वर से कुछ विनती करतीं बैठी आँखें मीचे।
तुम्हें ध्यान में लगी देख मैं धीरे-धीरे आता।
और तुम्हारे फैले आँचल के नीचे छिप जाता।
तुम घबरा कर आँख खोलतीं, पर माँ खुश हो जाती।
जब अपने मुन्ना राजा को गोदी में ही पातीं।
इसी तरह कुछ खेला करते हम-तुम धीरे-धीरे।
यह कदंब का पेड़ अगर माँ होता यमुना तीरे।
6. ठुकरा दो या प्यार करो
देव! तुम्हारे कई उपासक कई ढंग से आते हैं
सेवा में बहुमूल्य भेंट वे कई रंग की लाते हैं
धूमधाम से साज-बाज से वे मंदिर में आते हैं
मुक्तामणि बहुमुल्य वस्तुऐं लाकर तुम्हें चढ़ाते हैं
मैं ही हूँ गरीबिनी ऐसी जो कुछ साथ नहीं लाई
फिर भी साहस कर मंदिर में पूजा करने चली आई
धूप-दीप-नैवेद्य नहीं है झांकी का श्रृंगार नहीं
हाय! गले में पहनाने को फूलों का भी हार नहीं
कैसे करूँ कीर्तन, मेरे स्वर में है माधुर्य नहीं
मन का भाव प्रकट करने को वाणी में चातुर्य नहीं
नहीं दान है, नहीं दक्षिणा खाली हाथ चली आई
पूजा की विधि नहीं जानती, फिर भी नाथ चली आई
पूजा और पुजापा प्रभुवर इसी पुजारिन को समझो
दान-दक्षिणा और निछावर इसी भिखारिन को समझो
मैं उनमत्त प्रेम की प्यासी हृदय दिखाने आई हूँ
जो कुछ है, वह यही पास है, इसे चढ़ाने आई हूँ
चरणों पर अर्पित है, इसको चाहो तो स्वीकार करो
यह तो वस्तु तुम्हारी ही है ठुकरा दो या प्यार करो
7. कोयल
देखो कोयल काली है पर
मीठी है इसकी बोली
इसने ही तो कूक कूक कर
आमों में मिश्री घोली
कोयल कोयल सच बतलाना
क्या संदेसा लाई हो
बहुत दिनों के बाद आज फिर
इस डाली पर आई हो
क्या गाती हो किसे बुलाती
बतला दो कोयल रानी
प्यासी धरती देख मांगती
हो क्या मेघों से पानी?
कोयल यह मिठास क्या तुमने
अपनी माँ से पाई है?
माँ ने ही क्या तुमको मीठी
बोली यह सिखलाई है?
डाल डाल पर उड़ना गाना
जिसने तुम्हें सिखाया है
सबसे मीठे मीठे बोलो
यह भी तुम्हें बताया है
बहुत भली हो तुमने माँ की
बात सदा ही है मानी
इसीलिये तो तुम कहलाती
हो सब चिड़ियों की रानी
8. पानी और धूप
अभी अभी थी धूप, बरसने
लगा कहाँ से यह पानी
किसने फोड़ घड़े बादल के
की है इतनी शैतानी।
सूरज ने क्यों बंद कर लिया
अपने घर का दरवाजा़
उसकी माँ ने भी क्या उसको
बुला लिया कहकर आजा।
ज़ोर-ज़ोर से गरज रहे हैं
बादल हैं किसके काका
किसको डाँट रहे हैं, किसने
कहना नहीं सुना माँ का।
बिजली के आँगन में अम्माँ
चलती है कितनी तलवार
कैसी चमक रही है फिर भी
क्यों खाली जाते हैं वार।
क्या अब तक तलवार चलाना
माँ वे सीख नहीं पाए
इसीलिए क्या आज सीखने
आसमान पर हैं आए।
एक बार भी माँ यदि मुझको
बिजली के घर जाने दो
उसके बच्चों को तलवार
चलाना सिखला आने दो।
खुश होकर तब बिजली देगी
मुझे चमकती सी तलवार
तब माँ कर न कोई सकेगा
अपने ऊपर अत्याचार।
पुलिसमैन अपने काका को
फिर न पकड़ने आएँगे
देखेंगे तलवार दूर से ही
वे सब डर जाएँगे।
अगर चाहती हो माँ काका
जाएँ अब न जेलखाना
तो फिर बिजली के घर मुझको
तुम जल्दी से पहुँचाना।
काका जेल न जाएँगे अब
तूझे मँगा दूँगी तलवार
पर बिजली के घर जाने का
अब मत करना कभी विचार।
9. वीरों का कैसा हो वसंत
आ रही हिमालय से पुकार
है उदधि गरजता बार बार
प्राची पश्चिम भू नभ अपार;
सब पूछ रहें हैं दिग-दिगन्त
वीरों का कैसा हो वसंत
फूली सरसों ने दिया रंग
मधु लेकर आ पहुंचा अनंग
वधु वसुधा पुलकित अंग अंग;
है वीर देश में किन्तु कंत
वीरों का कैसा हो वसंत
भर रही कोकिला इधर तान
मारू बाजे पर उधर गान
है रंग और रण का विधान;
मिलने को आए आदि अंत
वीरों का कैसा हो वसंत
गलबाहें हों या कृपाण
चलचितवन हो या धनुषबाण
हो रसविलास या दलितत्राण;
अब यही समस्या है दुरंत
वीरों का कैसा हो वसंत
कह दे अतीत अब मौन त्याग
लंके तुझमें क्यों लगी आग
ऐ कुरुक्षेत्र अब जाग जाग;
बतला अपने अनुभव अनंत
वीरों का कैसा हो वसंत
हल्दीघाटी के शिला खण्ड
ऐ दुर्ग सिंहगढ़ के प्रचंड
राणा ताना का कर घमंड;
दो जगा आज स्मृतियां ज्वलंत
वीरों का कैसा हो वसंत
भूषण अथवा कवि चंद नहीं
बिजली भर दे वह छन्द नहीं
है कलम बंधी स्वच्छंद नहीं;
फिर हमें बताए कौन हन्त
वीरों का कैसा हो वसंत
10. खिलौनेवाला
वह देखो माँ आज
खिलौनेवाला फिर से आया है।
कई तरह के सुंदर-सुंदर
नए खिलौने लाया है।
हरा-हरा तोता पिंजड़े में
गेंद एक पैसे वाली
छोटी सी मोटर गाड़ी है
सर-सर-सर चलने वाली।
सीटी भी है कई तरह की
कई तरह के सुंदर खेल
चाभी भर देने से भक-भक
करती चलने वाली रेल।
गुड़िया भी है बहुत भली-सी
पहने कानों में बाली
छोटा-सा 'टी सेट' है
छोटे-छोटे हैं लोटा थाली।
छोटे-छोटे धनुष-बाण हैं
हैं छोटी-छोटी तलवार
नए खिलौने ले लो भैया
ज़ोर-ज़ोर वह रहा पुकार।
मुन्नू ने गुड़िया ले ली है
मोहन ने मोटर गाड़ी
मचल-मचल सरला करती है
माँ ने लेने को साड़ी
कभी खिलौनेवाला भी माँ
क्या साड़ी ले आता है।
साड़ी तो वह कपड़े वाला
कभी-कभी दे जाता है
अम्मा तुमने तो लाकर के
मुझे दे दिए पैसे चार
कौन खिलौने लेता हूँ मैं
तुम भी मन में करो विचार।
तुम सोचोगी मैं ले लूँगा।
तोता, बिल्ली, मोटर, रेल
पर माँ, यह मैं कभी न लूँगा
ये तो हैं बच्चों के खेल।
मैं तो तलवार खरीदूँगा माँ
या मैं लूँगा तीर-कमान
जंगल में जा, किसी ताड़का
को मारुँगा राम समान।
तपसी यज्ञ करेंगे, असुरों-
को मैं मार भगाऊँगा
यों ही कुछ दिन करते-करते
रामचंद्र मैं बन जाऊँगा।
यही रहूँगा कौशल्या मैं
तुमको यही बनाऊँगा।
तुम कह दोगी वन जाने को
हँसते-हँसते जाऊँगा।
पर माँ, बिना तुम्हारे वन में
मैं कैसे रह पाऊँगा।
दिन भर घूमूँगा जंगल में
लौट कहाँ पर आऊँगा।
किससे लूँगा पैसे, रूठूँगा
तो कौन मना लेगा
कौन प्यार से बिठा गोद में
मनचाही चींजे़ देगा।
11. उल्लास
शैशव के सुन्दर प्रभात का
मैंने नव विकास देखा।
यौवन की मादक लाली में
जीवन का हुलास देखा।
जग-झंझा-झकोर में
आशा-लतिका का विलास देखा।
आकांक्षा, उत्साह, प्रेम का
क्रम-क्रम से प्रकाश देखा।
जीवन में न निराशा मुझको
कभी रुलाने को आई।
जग झूठा है यह विरक्ति भी
नहीं सिखाने को आई।
अरिदल की पहिचान कराने
नहीं घृणा आने पाई।
नहीं अशान्ति हृदय तक अपनी
भीषणता लाने पाई।
12. झिलमिल तारे
कर रहे प्रतीक्षा किसकी हैं
झिलमिल-झिलमिल तारे?
धीमे प्रकाश में कैसे तुम
चमक रहे मन मारे।
अपलक आँखों से कह दो
किस ओर निहारा करते?
किस प्रेयसि पर तुम अपनी
मुक्तावलि वारा करते?
करते हो अमिट प्रतीक्षा,
तुम कभी न विचलित होते।
नीरव रजनी अंचल में
तुम कभी न छिप कर सोते।
जब निशा प्रिया से मिलने,
दिनकर निवेश में जाते।
नभ के सूने आँगन में
तुम धीरे-धीरे आते।
विधुरा से कह दो मन की,
लज्जा की जाली खोलो।
क्या तुम भी विरह विकल हो,
हे तारे कुछ तो बोलो।
मैं भी वियोगिनी मुझसे
फिर कैसी लज्जा प्यारे?
कह दो अपनी बीती को
हे झिलमिल-झिलमिल तारे!
13. मधुमय प्याली
रीती होती जाती थी
जीवन की मधुमय प्याली।
फीकी पड़ती जाती थी
मेरे यौवन की लाली।
हँस-हँस कर यहाँ निराशा
थी अपने खेल दिखाती।
धुंधली रेखा आशा की
पैरों से मसल मिटाती।
युग-युग-सी बीत रही थीं
मेरे जीवन की घड़ियाँ।
सुलझाये नहीं सुलझती
उलझे भावों की लड़ियाँ।
जाने इस समय कहाँ से
ये चुपके-चुपके आए।
सब रोम-रोम में मेरे
ये बन कर प्राण समाए।
मैं उन्हें भूलने जाती
ये पलकों में छिपे रहते।
मैं दूर भागती उनसे
ये छाया बन कर रहते।
विधु के प्रकाश में जैसे
तारावलियाँ घुल जातीं।
वालारुण की आभा से
अगणित कलियाँ खुल जातीं।
आओ हम उसी तरह से
सब भेद भूल कर अपना।
मिल जाएँ मधु बरसायें
जीवन दो दिन का सपना।
फिर छलक उठी है मेरे
जीवन की मधुमय प्याली।
आलोक प्राप्त कर उनका
चमकी यौवन की लाली।
14. मेरा जीवन
मैंने हँसना सीखा है
मैं नहीं जानती रोना;
बरसा करता पल-पल पर
मेरे जीवन में सोना।
मैं अब तक जान न पाई
कैसी होती है पीडा;
हँस-हँस जीवन में
कैसे करती है चिंता क्रिडा।
जग है असार सुनती हूँ,
मुझको सुख-सार दिखाता;
मेरी आँखों के आगे
सुख का सागर लहराता।
उत्साह, उमंग निरंतर
रहते मेरे जीवन में,
उल्लास विजय का हँसता
मेरे मतवाले मन में।
आशा आलोकित करती
मेरे जीवन को प्रतिक्षण
हैं स्वर्ण-सूत्र से वलयित
मेरी असफलता के घन।
सुख-भरे सुनले बादल
रहते हैं मुझको घेरे;
विश्वास, प्रेम, साहस हैं
जीवन के साथी मेरे।
15. झाँसी की रानी की समाधि पर
इस समाधि में छिपी हुई है, एक राख की ढेरी ।
जल कर जिसने स्वतंत्रता की, दिव्य आरती फेरी ।
यह समाधि यह लघु समाधि है, झाँसी की रानी की ।
अंतिम लीलास्थली यही है, लक्ष्मी मरदानी की ।
यहीं कहीं पर बिखर गई वह, भग्न-विजय-माला-सी ।
उसके फूल यहाँ संचित हैं, है यह स्मृति शाला-सी ।
सहे वार पर वार अंत तक, लड़ी वीर बाला-सी ।
आहुति-सी गिर चढ़ी चिता पर, चमक उठी ज्वाला-सी ।
बढ़ जाता है मान वीर का, रण में बलि होने से ।
मूल्यवती होती सोने की भस्म, यथा सोने से ।
रानी से भी अधिक हमे अब, यह समाधि है प्यारी ।
यहाँ निहित है स्वतंत्रता की, आशा की चिनगारी ।
इससे भी सुन्दर समाधियाँ, हम जग में हैं पाते ।
उनकी गाथा पर निशीथ में, क्षुद्र जंतु ही गाते ।
पर कवियों की अमर गिरा में, इसकी अमिट कहानी ।
स्नेह और श्रद्धा से गाती, है वीरों की बानी ।
बुंदेले हरबोलों के मुख हमने सुनी कहानी ।
खूब लड़ी मरदानी वह थी, झाँसी वाली रानी ।
यह समाधि यह चिर समाधि है, झाँसी की रानी की ।
अंतिम लीला स्थली यही है, लक्ष्मी मरदानी की ।
16. इसका रोना
तुम कहते हो - मुझको इसका रोना नहीं सुहाता है ।
मैं कहती हूँ - इस रोने से अनुपम सुख छा जाता है ।
सच कहती हूँ, इस रोने की छवि को जरा निहारोगे ।
बड़ी-बड़ी आँसू की बूँदों पर मुक्तावली वारोगे । 1 ।
ये नन्हे से होंठ और यह लम्बी-सी सिसकी देखो ।
यह छोटा सा गला और यह गहरी-सी हिचकी देखो ।
कैसी करुणा-जनक दृष्टि है, हृदय उमड़ कर आया है ।
छिपे हुए आत्मीय भाव को यह उभार कर लाया है । 2 ।
हँसी बाहरी, चहल-पहल को ही बहुधा दरसाती है ।
पर रोने में अंतर तम तक की हलचल मच जाती है ।
जिससे सोई हुई आत्मा जागती है, अकुलाती है ।
छुटे हुए किसी साथी को अपने पास बुलाती है । 3 ।
मैं सुनती हूँ कोई मेरा मुझको अहा ! बुलाता है ।
जिसकी करुणापूर्ण चीख से मेरा केवल नाता है ।
मेरे ऊपर वह निर्भर है खाने, पीने, सोने में ।
जीवन की प्रत्येक क्रिया में, हँसने में ज्यों रोने में । 4 ।
मैं हूँ उसकी प्रकृति संगिनी उसकी जन्म-प्रदाता हूँ ।
वह मेरी प्यारी बिटिया है मैं ही उसकी प्यारी माता हूँ ।
तुमको सुन कर चिढ़ आती है मुझ को होता है अभिमान ।
जैसे भक्तों की पुकार सुन गर्वित होते हैं भगवान । 5 ।
17. नीम
सब दुखहरन सुखकर परम हे नीम! जब देखूँ तुझे।
तुहि जानकर अति लाभकारी हर्ष होता है मुझे।
ये लहलही पत्तियाँ हरी, शीतल पवन बरसा रहीं।
निज मंद मीठी वायु से सब जीव को हरषा रहीं।
हे नीम! यद्यपि तू कड़ू, नहिं रंच-मात्र मिठास है।
उपकार करना दूसरों का, गुण तिहारे पास है।
नहिं रंच-मात्र सुवास है, नहिं फूलती सुंदर कली।
कड़ुवे फलों अरु फूल में तू सर्वदा फूली-फली।
तू सर्वगुणसंपन्न है, तू जीव-हितकारी बड़ी।
तू दु:खहारी है प्रिये! तू लाभकारी है बड़ी।
है कौन ऐसा घर यहाँ जहाँ काम तेरा नहिं पड़ा।
ये जन तिहारे ही शरण हे नीम! आते हैं सदा।
तेरी कृपा से सुख सहित आनंद पाते सर्वदा।
तू रोगमुक्त अनेक जन को सर्वदा करती रहै।
इस भांति से उपकार तू हर एक का करती रहै।
प्रार्थना हरि से करूँ, हिय में सदा यह आस हो।
जब तक रहें नभ, चंद्र-तारे सूर्य का परकास हो।
तब तक हमारे देश में तुम सर्वदा फूला करो।
निज वायु शीतल से पथिक-जन का हृदय शीतल करो।
(यह सुभद्रा जी की पहली कविता है जो 1913 में
"मर्यादा" नामक पत्रिका में प्रकाशित हुई थी। तब
वे मात्र 9 साल की थीं। )
18. मुरझाया फूल
यह मुरझाया हुआ फूल है,
इसका हृदय दुखाना मत।
स्वयं बिखरने वाली इसकी
पंखड़ियाँ बिखराना मत।
गुजरो अगर पास से इसके
इसे चोट पहुँचाना मत।
जीवन की अंतिम घड़ियों में
देखो, इसे रुलाना मत।
अगर हो सके तो ठंडी
बूँदें टपका देना प्यारे!
जल न जाए संतप्त-हृदय
शीतलता ला देना प्यारे!!
19. फूल के प्रति
डाल पर के मुरझाए फूल!
हृदय में मत कर वृथा गुमान।
नहीं है सुमन कुंज में अभी
इसी से है तेरा सम्मान।
मधुप जो करते अनुनय विनय
बने तेरे चरणों के दास।
नई कलियों को खिलती देख
नहीं आवेंगे तेरे पास।
सहेगा कैसे वह अपमान?
उठेगी वृथा हृदय में शूल।
भुलावा है, मत करना गर्व
डाल पर के मुरझाए फूल।
20. चलते समय
तुम मुझे पूछते हो ’जाऊँ’?
मैं क्या जवाब दूँ, तुम्हीं कहो!
’जा...’ कहते रुकती है जबान
किस मुँह से तुमसे कहूँ ’रहो’!!
सेवा करना था जहाँ मुझे
कुछ भक्ति-भाव दरसाना था।
उन कृपा-कटाक्षों का बदला
बलि होकर जहाँ चुकाना था।
मैं सदा रूठती ही आई,
प्रिय! तुम्हें न मैंने पहचाना।
वह मान बाण-सा चुभता है,
अब देख तुम्हारा यह जाना।
21. कलह-कारण
कड़ी आराधना करके बुलाया था उन्हें मैंने।
पदों को पूजने के ही लिए थी साधना मेरी।
तपस्या नेम व्रत करके रिझाया था उन्हें मैंने।
पधारे देव, पूरी हो गई आराधना मेरी।
उन्हें सहसा निहारा सामने, संकोच हो आया।
मुँदीं आँखें सहज ही लाज से नीचे झुकी थी मैं।
कहूँ क्या प्राणधन से यह हृदय में सोच हो आया।
वही कुछ बोल दें पहले, प्रतीक्षा में रुकी थी मैं।
अचानक ध्यान पूजा का हुआ, झट आँख जो खोली।
नहीं देखा उन्हें, बस सामने सूनी कुटी दीखी।
हृदयधन चल दिए, मैं लाज से उनसे नहीं बोली।
गया सर्वस्व, अपने आपको दूनी लुटी दीखी।
22. मेरे पथिक
हठीले मेरे भोले पथिक!
किधर जाते हो आकस्मात।
अरे क्षण भर रुक जाओ यहाँ,
सोच तो लो आगे की बात।
यहाँ के घात और प्रतिघात,
तुम्हारा सरस हृदय सुकुमार।
सहेगा कैसे? बोलो पथिक!
सदा जिसने पाया है प्यार।
जहाँ पद-पद पर बाधा खड़ी,
निराशा का पहिरे परिधान।
लांछना डरवाएगी वहाँ,
हाथ में लेकर कठिन कृपाण।
चलेगी अपवादों की लूह,
झुलस जावेगा कोमल गात।
विकलता के पलने में झूल,
बिताओगे आँखों में रात।
विदा होगी जीवन की शांति,
मिलेगी चिर-सहचरी अशांति।
भूल मत जाओ मेरे पथिक,
भुलावा देती तुमको भ्रांति।
23. जीवन-फूल
मेरे भोले मूर्ख हृदय ने
कभी न इस पर किया विचार।
विधि ने लिखी भाल पर मेरे
सुख की घड़ियाँ दो ही चार।
छलती रही सदा ही
मृगतृष्णा सी आशा मतवाली।
सदा लुभाया जीवन साकी ने
दिखला रीती प्याली।
मेरी कलित कामनाओं की
ललित लालसाओं की धूल।
आँखों के आगे उड़-उड़ करती है
व्यथित हृदय में शूल।
उन चरणों की भक्ति-भावना
मेरे लिए हुई अपराध।
कभी न पूरी हुई अभागे
जीवन की भोली सी साध।
मेरी एक-एक अभिलाषा
का कैसा ह्रास हुआ।
मेरे प्रखर पवित्र प्रेम का
किस प्रकार उपहास हुआ।
मुझे न दुख है
जो कुछ होता हो उसको हो जाने दो।
निठुर निराशा के झोंकों को
मनमानी कर जाने दो।
हे विधि इतनी दया दिखाना
मेरी इच्छा के अनुकूल।
उनके ही चरणों पर
बिखरा देना मेरा जीवन-फूल।
24. भ्रम
देवता थे वे, हुए दर्शन, अलौकिक रूप था।
देवता थे, मधुर सम्मोहन स्वरूप अनूप था।
देवता थे, देखते ही बन गई थी भक्त मैं।
हो गई उस रूपलीला पर अटल आसक्त मैं।
देर क्या थी? यह मनोमंदिर यहाँ तैयार था।
वे पधारे, यह अखिल जीवन बना त्यौहार था।
झाँकियों की धूम थी, जगमग हुआ संसार था।
सो गई सुख नींद में, आनंद अपरंपार था।
किंतु उठ कर देखती हूँ, अंत है जो पूर्ति थी।
मैं जिसे समझे हुए थी देवता, वह मूर्ति थी।
25. समर्पण
सूखी सी अधखिली कली है
परिमल नहीं, पराग नहीं।
किंतु कुटिल भौंरों के चुंबन
का है इन पर दाग नहीं।
तेरी अतुल कृपा का बदला
नहीं चुकाने आई हूँ।
केवल पूजा में ये कलियाँ
भक्ति-भाव से लाई हूँ।
प्रणय-जल्पना चिन्त्य-कल्पना
मधुर वासनाएं प्यारी।
मृदु-अभिलाषा, विजई आशा
सजा रहीं थीं फुलवारी।
किंतु गर्व का झोंका आया
यदपि गर्व वह था तेरा।
उजड़ गई फुलवारी सारी
बिगड़ गया सब कुछ मेरा।
बची हुई स्मृति की ये कलियाँ
मैं समेट कर लाई हूँ।
तुझे सुझाने, तुझे रिझाने
तुझे मनाने आई हूँ।
प्रेम-भाव से हो अथवा हो
दया-भाव से ही स्वीकार।
ठुकराना मत, इसे जानकर
मेरा छोटा सा उपहार।
26. चिंता
लगे आने, हृदय धन से
कहा मैंने कि मत आओ।
कहीं हो प्रेम में पागल
न पथ में ही मचल जाओ।
कठिन है मार्ग, मुझको
मंजिलें वे पार करनीं हैं।
उमंगों की तरंगें बढ़ पड़ें
शायद फिसल जाओ।
तुम्हें कुछ चोट आ जाए
कहीं लाचार लौटूँ मैं।
हठीले प्यार से व्रत-भंग
की घड़ियाँ निकट लाओ।
27. प्रियतम से
बहुत दिनों तक हुई परीक्षा
अब रूखा व्यवहार न हो।
अजी, बोल तो लिया करो तुम
चाहे मुझ पर प्यार न हो।
जरा जरा सी बातों पर
मत रूठो मेरे अभिमानी।
लो प्रसन्न हो जाओ
गलती मैंने अपनी सब मानी।
मैं भूलों की भरी पिटारी
और दया के तुम आगार।
सदा दिखाई दो तुम हँसते
चाहे मुझ से करो न प्यार।
28. प्रथम दर्शन
प्रथम जब उनके दर्शन हुए,
हठीली आँखें अड़ ही गईं।
बिना परिचय के एकाएक
हृदय में उलझन पड़ ही गई।
मूँदने पर भी दोनों नेत्र,
खड़े दिखते सम्मुख साकार।
पुतलियों में उनकी छवि श्याम
मोहिनी, जीवित जड़ ही गई।
भूल जाने को उनकी याद,
किए कितने ही तो उपचार।
किंतु उनकी वह मंजुल-मूर्ति
छाप-सी दिल पर पड़ ही गई।
29. परिचय
क्या कहते हो कुछ लिख दूँ मैं
ललित-कलित कविताएं।
चाहो तो चित्रित कर दूँ
जीवन की करुण कथाएं।
सूना कवि-हृदय पड़ा है,
इसमें साहित्य नहीं है।
इस लुटे हुए जीवन में,
अब तो लालित्य नहीं है।
मेरे प्राणों का सौदा,
करती अंतर की ज्वाला।
बेसुध-सी करती जाती,
क्षण-क्षण वियोग की हाला।
नीरस-सा होता जाता,
जाने क्यों मेरा जीवन।
भूली-भूली सी फिरती,
लेकर यह खोया-सा मन।
कैसे जीवन की प्याली टूटी,
मधु रहा न बाकी?
कैसे छुट गया अचानक
मेरा मतवाला साकी??
सुध में मेरे आते ही
मेरा छिप गया सुनहला सपना।
खो गया कहाँ पर जाने?
जीवन का वैभव अपना।
क्यों कहते हो लिखने को,
पढ़ लो आँखों में सहृदय।
मेरी सब मौन व्यथाएं,
मेरी पीड़ा का परिचय।
30. अनोखा दान
अपने बिखरे भावों का मैं
गूँथ अटपटा सा यह हार।
चली चढ़ाने उन चरणों पर,
अपने हिय का संचित प्यार।
डर था कहीं उपस्थिति मेरी,
उनकी कुछ घड़ियाँ बहुमूल्य
नष्ट न कर दे, फिर क्या होगा
मेरे इन भावों का मूल्य?
संकोचों में डूबी मैं जब
पहुँची उनके आँगन में
कहीं उपेक्षा करें न मेरी,
अकुलाई सी थी मन में।
किंतु अरे यह क्या,
इतना आदर, इतनी करुणा, सम्मान?
प्रथम दृष्टि में ही दे डाला
तुमने मुझे अहो मतिमान!
मैं अपने झीने आँचल में
इस अपार करुणा का भार
कैसे भला सँभाल सकूँगी
उनका वह स्नेह अपार।
लख महानता उनकी पल-पल
देख रही हूँ अपनी ओर
मेरे लिए बहुत थी केवल
उनकी तो करुणा की कोर।
31. उपेक्षा
इस तरह उपेक्षा मेरी,
क्यों करते हो मतवाले!
आशा के कितने अंकुर,
मैंने हैं उर में पाले।
विश्वास-वारि से उनको,
मैंने है सींच बढ़ाए।
निर्मल निकुंज में मन के,
रहती हूँ सदा छिपाए।
मेरी साँसों की लू से
कुछ आँच न उनमें आए।
मेरे अंतर की ज्वाला
उनको न कभी झुलसाए।
कितने प्रयत्न से उनको,
मैं हृदय-नीड़ में अपने
बढ़ते लख खुश होती थी,
देखा करती थी सपने।
इस भांति उपेक्षा मेरी
करके मेरी अवहेला
तुमने आशा की कलियाँ
मसलीं खिलने की बेला।
32. तुम
जब तक मैं मैं हूँ, तुम तुम हो,
है जीवन में जीवन।
कोई नहीं छीन सकता
तुमको मुझसे मेरे धन।
आओ मेरे हृदय-कुंज में
निर्भय करो विहार।
सदा बंद रखूँगी
मैं अपने अंतर का द्वार।
नहीं लांछना की लपटें
प्रिय तुम तक जाने पाएँगीं।
पीड़ित करने तुम्हें
वेदनाएं न वहाँ आएँगीं।
अपने उच्छ्वासों से मिश्रित
कर आँसू की बूँद।
शीतल कर दूँगी तुम प्रियतम
सोना आँखें मूँद।
जगने पर पीना छक-छककर
मेरी मदिरा की प्याली।
एक बूँद भी शेष
न रहने देना करना खाली।
नशा उतर जाए फिर भी
बाकी रह जाए खुमारी।
रह जाए लाली आँखों में
स्मृतियाँ प्यारी-प्यारी।
33. व्याकुल चाह
सोया था संयोग उसे
किस लिए जगाने आए हो?
क्या मेरे अधीर यौवन की
प्यास बुझाने आए हो??
रहने दो, रहने दो, फिर से
जाग उठेगा वह अनुराग।
बूँद-बूँद से बुझ न सकेगी,
जगी हुई जीवन की आग।
झपकी-सी ले रही
निराशा के पलनों में व्याकुल चाह।
पल-पल विजन डुलाती उस पर
अकुलाए प्राणों की आह।
रहने दो अब उसे न छेड़ो,
दया करो मेरे बेपीर!
उसे जगाकर क्यों करते हो?
नाहक मेरे प्राण अधीर।
34. आराधना
जब मैं आँगन में पहुँची,
पूजा का थाल सजाए।
शिवजी की तरह दिखे वे,
बैठे थे ध्यान लगाए।
जिन चरणों के पूजन को
यह हृदय विकल हो जाता।
मैं समझ न पाई, वह भी
है किसका ध्यान लगाता?
मैं सन्मुख ही जा बैठी,
कुछ चिंतित सी घबराई।
यह किसके आराधक हैं,
मन में व्याकुलता छाई।
मैं इन्हें पूजती निशि-दिन,
ये किसका ध्यान लगाते?
हे विधि! कैसी छलना है,
हैं कैसे दृश्य दिखाते ?
टूटी समाधि इतने ही में,
नेत्र उन्होंने खोले।
लख मुझे सामने हँस कर
मीठे स्वर में वे बोले।
फल गई साधना मेरी,
तुम आईं आज यहाँ पर।
उनकी मंजुल-छाया में
भ्रम रहता भला कहाँ पर।
अपनी भूलों पर मन यह
जाने कितना पछताया।
संकोच सहित चरणों पर,
जो कुछ था वही चढ़ाया।
35. पूछो
विफल प्रयत्न हुए सारे,
मैं हारी, निष्ठुरता जीती।
अरे न पूछो, कह न सकूँगी,
तुमसे मैं अपनी बीती।
नहीं मानते हो तो जा
उन मुकुलित कलियों से पूछो।
अथवा विरह विकल घायल सी
भ्रमरावलियों से पूछो।
जो माली के निठुर करों से
असमय में दी गईं मरोड़।
जिनका जर्जर हृदय विकल है,
प्रेमी मधुप-वृंद को छोड़।
सिंधु-प्रेयसी सरिता से तुम
जाके पूछो मेरा हाल।
जिसे मिलन-पथ पर रोका हो,
कहीं किसी ने बाधा डाल।
36. मेरा गीत
जब अंतस्तल रोता है,
कैसे कुछ तुम्हें सुनाऊँ?
इन टूटे से तारों पर,
मैं कौन तराना गाऊँ??
सुन लो संगीत सलोने,
मेरे हिय की धड़कन में।
कितना मधु-मिश्रित रस है,
देखो मेरी तड़पन में।
यदि एक बार सुन लोगे,
तुम मेरा करुण तराना।
हे रसिक! सुनोगे कैसे?
फिर और किसी का गाना।
कितना उन्माद भरा है,
कितना सुख इस रोने में?
उनकी तस्वीर छिपी है,
अंतस्तल के कोने में।
मैं आँसू की जयमाला,
प्रतिपल उनको पहनाती।
जपती हूँ नाम निरंतर,
रोती हूँ अथवा गाती।
37. वेदना
दिन में प्रचंड रवि-किरणें
मुझको शीतल कर जातीं।
पर मधुर ज्योत्स्ना तेरी,
हे शशि! है मुझे जलाती।
संध्या की सुमधुर बेला,
सब विहग नीड़ में आते।
मेरी आँखों के जीवन,
बरबस मुझसे छिन जाते।
नीरव निशि की गोदी में,
बेसुध जगती जब होती।
तारों से तुलना करते,
मेरी आँखों के मोती।
झंझा के उत्पातों सा,
बढ़ता उन्माद हृदय का।
सखि! कोई पता बता दे,
मेरे भावुक सहृदय का।
जब तिमिरावरण हटाकर,
ऊषा की लाली आती।
मैं तुहिन बिंदु सी उनके,
स्वागत-पथ पर बिछ जाती।
खिलते प्रसून दल, पक्षी
कलरव निनाद कर गाते।
उनके आगम का मुझको
मीठा संदेश सुनाते।
38. विदा
अपने काले अवगुंठन को
रजनी आज हटाना मत।
जला चुकी हो नभ में जो
ये दीपक इन्हें बुझाना मत।
सजनि! विश्व में आज
तना रहने देना यह तिमिर वितान।
ऊषा के उज्ज्वल अंचल में
आज न छिपना अरी सुजान।
सखि! प्रभात की लाली में
छिन जाएगी मेरी लाली।
इसीलिए कस कर लपेट लो,
तुम अपनी चादर काली।
किसी तरह भी रोको, रोको,
सखि! मुझ निधनी के धन को।
आह! रो रहा रोम-रोम
फिर कैसे समझाऊँ मन को।
आओ आज विकलते!
जग की पीड़ाएं न्यारी-न्यारी।
मेरे आकुल प्राण जला दो,
आओ तुम बारी-बारी।
ज्योति नष्ट कर दो नैनों की,
लख न सकूँ उनका जाना।
फिर मेरे निष्ठुर से कहना,
कर लें वे भी मनमाना।
39. प्रतीक्षा
बिछा प्रतीक्षा-पथ पर चिंतित
नयनों के मदु मुक्ता-जाल।
उनमें जाने कितनी ही
अभिलाषाओं के पल्लव पाल।
बिता दिए मैंने कितने ही
व्याकुल दिन, अकुलाई रात।
नीरस नैन हुए कब करके
उमड़े आँसू की बरसात।
मैं सुदूर पथ के कलरव में,
सुन लेने को प्रिय की बात।
फिरती विकल बावली-सी
सहती अपवादों के आघात।
किंतु न देखा उन्हें अभी तक
इन ललचाई आँखों ने।
संकोचों में लुटा दिया
सब कुछ, सकुचाई आँखों ने।
अब मोती के जाल बिछाकर,
गिनतीं हैं नभ के तारे।
इनकी प्यास बुझाने को सखि!
आएंगे क्या फिर प्यारे?
40. विजई मयूर
तू गरजा, गरज भयंकर थी,
कुछ नहीं सुनाई देता था।
घनघोर घटाएं काली थीं,
पथ नहीं दिखाई देता था।
तूने पुकार की जोरों की,
वह चमका, गुस्से में आया।
तेरी आहों के बदले में,
उसने पत्थर-दल बरसाया।
तेरा पुकारना नहीं रुका,
तू डरा न उसकी मारों से।
आखिर को पत्थर पिघल गए,
आहों से और पुकारों से।
तू धन्य हुआ, हम सुखी हुए,
सुंदर नीला आकाश मिला।
चंद्रमा चाँदनी सहित मिला,
सूरज भी मिला, प्रकाश मिला।
विजई मयूर जब कूक उठे,
घन स्वयं आत्मदानी होंगे।
उपहार बनेंगे वे प्रहार,
पत्थर पानी-पानी होंगे।
41. स्वदेश के प्रति
आ, स्वतंत्र प्यारे स्वदेश आ,
स्वागत करती हूँ तेरा।
तुझे देखकर आज हो रहा,
दूना प्रमुदित मन मेरा।
आ, उस बालक के समान
जो है गुरुता का अधिकारी।
आ, उस युवक-वीर सा जिसको
विपदाएं ही हैं प्यारी।
आ, उस सेवक के समान तू
विनय-शील अनुगामी सा।
अथवा आ तू युद्ध-क्षेत्र में
कीर्ति-ध्वजा का स्वामी सा।
आशा की सूखी लतिकाएं
तुझको पा, फिर लहराईं।
अत्याचारी की कृतियों को
निर्भयता से दरसाईं।
42. विदाई
कृष्ण-मंदिर में प्यारे बंधु
पधारो निर्भयता के साथ।
तुम्हारे मस्तक पर हो सदा
कृष्ण का वह शुभचिंतक हाथ।
तुम्हारी दृढ़ता से जग पड़े
देश का सोया हुआ समाज।
तुम्हारी भव्य मूर्ति से मिले
शक्ति वह विकट त्याग की आज।
तुम्हारे दुख की घड़ियाँ बनें
दिलाने वाली हमें स्वराज्य।
हमारे हृदय बनें बलवान
तुम्हारी त्याग मूर्ति में आज।
तुम्हारे देश-बंधु यदि कभी
डरें, कायर हो पीछे हटें,
बंधु! दो बहनों को वरदान
युद्ध में वे निर्भय मर मिटें।
हजारों हृदय बिदा दे रहे,
उन्हें संदेशा दो बस एक।
कटें तीसों करोड़ ये शीश,
न तजना तुम स्वराज्य की टेक।
43. मेरी टेक
निर्धन हों धनवान,
परिश्रम उनका धन हो।
निर्बल हों बलवान,
सत्यमय उनका मन हो।
हों स्वाधीन गुलाम,
हृदय में अपनापन हो।
इसी आन पर कर्मवीर
तेरा जीवन हो।
तो, स्वागत सौ बार
करूँ आदर से तेरा।
आ, कर दे उद्धार,
मिटे अंधेर-अंधेरा।
44. प्रभु तुम मेरे मन की जानो
मैं अछूत हूँ, मंदिर में आने का मुझको अधिकार नहीं है।
किंतु देवता यह न समझना, तुम पर मेरा प्यार नहीं है।
प्यार असीम, अमिट है, फिर भी पास तुम्हारे आ न सकूँगी।
यह अपनी छोटी सी पूजा, चरणों तक पहुँचा न सकूँगी।
इसीलिए इस अंधकार में, मैं छिपती-छिपती आई हूँ।
तेरे चरणों में खो जाऊँ, इतना व्याकुल मन लाई हूँ।
तुम देखो पहिचान सको तो तुम मेरे मन को पहिचानो।
जग न भले ही समझे, मेरे प्रभु! मेरे मन की जानो।
मेरा भी मन होता है, मैं पूजूँ तुमको, फूल चढ़ाऊँ।
और चरण-रज लेने को मैं चरणों के नीचे बिछ जाऊँ।
मुझको भी अधिकार मिले वह, जो सबको अधिकार मिला है।
मुझको प्यार मिले, जो सबको देव! तुम्हारा प्यार मिला है।
तुम सबके भगवान, कहो मंदिर में भेद-भाव कैसा?
हे मेरे पाषाण! पसीजो, बोलो क्यों होता ऐसा?
मैं गरीबिनी, किसी तरह से पूजा का सामान जुटाती।
बड़ी साध से तुझे पूजने, मंदिर के द्वारे तक आती।
कह देता है किंतु पुजारी, यह तेरा भगवान नहीं है।
दूर कहीं मंदिर अछूत का और दूर भगवान कहीं है।
मैं सुनती हूँ, जल उठती हूँ, मन में यह विद्रोही ज्वाला।
यह कठोरता, ईश्वर को भी जिसने टूक-टूक कर डाला।
यह निर्मम समाज का बंधन, और अधिक अब सह न सकूँगी।
यह झूठा विश्वास, प्रतिष्ठा झूठी, इसमें रह न सकूँगी।
ईश्वर भी दो हैं, यह मानूँ, मन मेरा तैयार नहीं है।
किंतु देवता यह न समझना, तुम पर मेरा प्यार नहीं है।
मेरा भी मन है जिसमें अनुराग भरा है, प्यार भरा है।
जग में कहीं बरस जाने को स्नेह और सत्कार भरा है।
वही स्नेह, सत्कार, प्यार मैं आज तुम्हें देने आई हूँ।
और इतना तुमसे आश्वासन, मेरे प्रभु! लेने आई हूँ।
तुम कह दो, तुमको उनकी इन बातों पर विश्वास नहीं है।
छुत-अछूत, धनी-निर्धन का भेद तुम्हारे पास नहीं है।
(अंतिम रचना)
45. बालिका का परिचय
यह मेरी गोदी की शोभा, सुख सोहाग की है लाली
शाही शान भिखारन की है, मनोकामना मतवाली
दीप-शिखा है अँधेरे की, घनी घटा की उजियाली
उषा है यह काल-भृंग की, है पतझर की हरियाली
सुधाधार यह नीरस दिल की, मस्ती मगन तपस्वी की
जीवित ज्योति नष्ट नयनों की, सच्ची लगन मनस्वी की
बीते हुए बालपन की यह, क्रीड़ापूर्ण वाटिका है
वही मचलना, वही किलकना, हँसती हुई नाटिका है
मेरा मंदिर,मेरी मसजिद, काबा काशी यह मेरी
पूजा पाठ, ध्यान, जप, तप, है घट-घट वासी यह मेरी
कृष्णचन्द्र की क्रीड़ाओं को अपने आंगन में देखो
कौशल्या के मातृ-मोद को, अपने ही मन में देखो
प्रभु ईसा की क्षमाशीलता, नबी मुहम्मद का विश्वास
जीव-दया जिनवर गौतम की,आओ देखो इसके पास
परिचय पूछ रहे हो मुझसे, कैसे परिचय दूँ इसका
वही जान सकता है इसको, माता का दिल है जिसका
46. स्मृतियाँ
क्या कहते हो? किसी तरह भी
भूलूँ और भुलाने दूँ?
गत जीवन को तरल मेघ-सा
स्मृति-नभ में मिट जाने दूँ?
शान्ति और सुख से ये
जीवन के दिन शेष बिताने दूँ?
कोई निश्चित मार्ग बनाकर
चलूँ तुम्हें भी जाने दूँ?
कैसा निश्चित मार्ग? ह्रदय-धन
समझ नहीं पाती हूँ मैं
वही समझने एक बार फिर
क्षमा करो आती हूँ मैं।
जहाँ तुम्हारे चरण, वहीँ पर
पद-रज बनी पड़ी हूँ मैं
मेरा निश्चित मार्ग यही है
ध्रुव-सी अटल अड़ी हूँ मैं।
भूलो तो सर्वस्व ! भला वे
दर्शन की प्यासी घड़ियाँ
भूलो मधुर मिलन को, भूलो
बातों की उलझी लड़ियाँ।
भूलो प्रीति प्रतिज्ञाओं को
आशाओं विश्वासों को
भूलो अगर भूल सकते हो
आंसू और उसासों को।
मुझे छोड़ कर तुम्हें प्राणधन
सुख या शांति नहीं होगी
यही बात तुम भी कहते थे
सोचो, भ्रान्ति नहीं होगी।
सुख को मधुर बनाने वाले
दुःख को भूल नहीं सकते
सुख में कसक उठूँगी मैं प्रिय
मुझको भूल नहीं सकते।
मुझको कैसे भूल सकोगे
जीवन-पथ-दर्शक मैं थी
प्राणों की थी प्राण ह्रदय की
सोचो तो, हर्षक मैं थी।
मैं थी उज्ज्वल स्फूर्ति, पूर्ति
थी प्यारी अभिलाषाओं की
मैं ही तो थी मूर्ति तुम्हारी
बड़ी-बड़ी आशाओं की।
आओ चलो, कहाँ जाओगे
मुझे अकेली छोड़, सखे!
बंधे हुए हो ह्रदय-पाश में
नहीं सकोगे तोड़, सखे!
47. सभा का खेल
सभा सभा का खेल आज हम,
खेलेंगे जीजी आओ।
मैं गांधी जी छोटे नेहरू,
तुम सरोजिनी बन जाओ।
मेरा तो सब काम लंगोटी,
गमछे से चल जायेगा।
छोटे भी खद्दर का कुर्ता,
पेटी से ले आयेगा।
लेकिन जीजी तुम्हें चाहिये,
एक बहुत बढ़िया सारी।
वह तुम मां से ही ले लेना,
आज सभा होगी भारी।
मोहन लल्ली पुलिस बनेंगे,
हम भाषण करने वाले।
वे लाठिया चलाने वाले,
हम घायल मरने वाले।
छोटे बोला देखो भैया,
मैं तो मार न खाऊंगा।
कहा बड़े ने छोटे जब तुम,
नेहरू जी बन जाओगे।
गांधी जी की बात मानकर,
क्या तुम मार न खाओगे।
खेल खेल में छोटे भैया,
होगी झूठ मूठ की मार।
चोट न आयेगी नेहरू जी,
अब तुम हो जाओ तैयार।
हुई सभा प्रारम्भ कहा,
गांधी चरखा चलवाओ।
नेहरू जी भी बोले भाई,
खद्दर पहनो पहनाओ।
उठ कर फिर देवी सरोजिनी,
धीरे से बोलीं बहनों।
हिन्दू मुस्लिम मेल बढ़ाओ,
सभी शुद्ध खद्दर पहनों।
छोड़ो सभी विदेशी चीजे़,
लो देशी सूई तागा।
इतने में लौटे काका जी,
नेहरू सीट छोड़ भागा।
काका आये काका आये,
चलो सिनेमा जायेंगे।
घोरी दीक्षित को देखेंगे,
केक मिठाई खायेंगे।
जीजी चलो सभा फिर होगी,
अभी सिनेमा है जाना।
चलो चलें अब जरा देर को,
घोरी दीक्षित बन जायें।
उछलें कूदें शोर मचावें,
मोटर गाड़ी दौड़ावे।
48. राखी
भैया कृष्ण ! भेजती हूँ मैं
राखी अपनी, यह लो आज ।
कई बार जिसको भेजा है
सजा-सजाकर नूतन साज ।।
लो आओ, भुजदण्ड उठाओ
इस राखी में बँध जाओ ।
भरत - भूमि की रजभूमि को
एक बार फिर दिखलाओ ।।
वीर चरित्र राजपूतों का
पढ़ती हूँ मैं राजस्थान ।
पढ़ते - पढ़ते आँखों में
छा जाता राखी का आख्यान ।।
मैंने पढ़ा, शत्रुओं को भी
जब-जब राखी भिजवाई ।
रक्षा करने दौड़ पड़ा वह
राखी - बन्द - शत्रु - भाई ।।
किन्तु देखना है, यह मेरी
राखी क्या दिखलाती है ।
क्या निस्तेज कलाई पर ही
बँधकर यह रह जाती है ।।
देखो भैया, भेज रही हूँ
तुमको-तुमको राखी आज ।
साखी राजस्थान बनाकर
रख लेना राखी की लाल ।।
हाथ काँपता, हृदय धड़कता
है मेरी भारी आवाज ।
अब भी चौक-चौक उठता है
जलियाँ का वह गोलन्दाज ।।
यम की सूरत उन पतितों का
पाप भूल जाऊँ कैसे?
अंकित आज हृदय में है
फिर मन को समझाऊँ कैसे ?
बहिने कई सिसकती हैं हा
सिसक न उनकी मिट पाई ।
लाज गँवाई, गाली पाई
तिस पर गोली भी खाई ।।
डर है कही न मार्शल-ला का
फिर से पड़ जावे घेरा ।
ऐसे समय द्रौपदी-जैसा
कृष्ण ! सहारा है तेरा ।।
बोलो, सोच-समझकर बोलो,
क्या राखी बँधवाओगे
भीर पडेगी, क्या तुम रक्षा-
करने दौड़े आओगे।
यदि हाँ तो यह लो मेरी
इस राखी को स्वीकार करो ।
आकर भैया, बहिन 'सुभद्रा'-
के कष्टों का भार हरो ।।
49. राखी की चुनौती
बहिन आज फूली समाती न मन में ।
तड़ित आज फूली समाती न घन में ।।
घटा है न झूली समाती गगन में ।
लता आज फूली समाती न बन में ।।
कही राखियाँ है, चमक है कहीं पर,
कही बूँद है, पुष्प प्यारे खिले हैं ।
ये आई है राखी, सुहाई है पूनो,
बधाई उन्हें जिनको भाई मिले हैं ।।
मैं हूँ बहिन किन्तु भाई नहीं है ।
है राखी सजी पर कलाई नहीं है ।।
है भादो घटा किन्तु छाई नहीं है ।
नहीं है खुशी पर रुलाई नहीं है ।।
मेरा बंधु माँ की पुकारो को सुनकर-
के तैयार हो जेलखाने गया है ।
छिनी है जो स्वाधीनता माँ की उसको
वह जालिम के घर में से लाने गया है ।।
मुझे गर्व है किन्तु राखी है सूनी ।
वह होता, खुशी तो क्या होती न दूनी ?
हम मंगल मनावे, वह तपता है धूनी ।
है घायल हृदय, दर्द उठता है खूनी ।।
है आती मुझे याद चित्तौर गढ की,
धधकती है दिल में वह जौहर की ज्वाला ।
है माता-बहिन रो के उसको बुझाती,
कहो भाई, तुमको भी है कुछ कसाला ?
है, तो बढ़े हाथ, राखी पड़ी है ।
रेशम-सी कोमल नहीं यह कड़ी है ।।
अजी देखो लोहे की यह हथकड़ी है ।
इसी प्रण को लेकर बहिन यह खड़ी है ।।
आते हो भाई ? पुन पूछती हूँ--
कि माता के बन्धन की है लाज तुमको?
-तो बन्दी बनो, देखो बन्धन है कैसा,
चुनौती यह राखी की है आज तुमको ।।
50. जाने दे
कठिन प्रयत्नों से सामग्री
एकत्रित कर लाई थी ।
बड़ी उमंगों से मन्दिर में,
पूजा करने आई थी ।।
पास पहुंकर देखा तो,
मन्दिर का का द्वार खुला पाया ।
हुई तपस्या सफल देव के
दर्शन का अवसर आया ।।
हर्ष और उत्साह बढ़ा, कुछ
लज्जा, कुछ संकोच हुआ ।
उत्सुकता, व्याकुलता कुछ-कुछ
कुछ सभ्रम, कुछ सोच हुआ ।।
किंतु लाज, संकोच त्यागकर
चरणों पर बलि जाऊंगी ।
चिर संचित सर्वस्व पदों पर
सादर आज चढ़ाऊँगी ।।
कह दूंगी अपने अंतर की
कुछ भी नहीं छिपाऊँगी ।
जैसी जो कूछ हूं उनकी ही
हूं, उनकी कहलाऊँगी ।।
पूरी जान साधना अपनी
मन को परमानन्द हुआ ।
किंतु बढ़ी आगे, देखा तो
मन्दिर का पट बन्द हुआ ।।
निठुर पुजारी ! यह क्या मुझ पर
तुझे न तनिक दया आई?
किया द्वार को बन्द और
मैं प्रभु को नहीं देख पाई ?
करके कृपा पुजारी, मुझको
जरा वहां तक जाने दे ।
प्रियतम के थोड़ी-सी पूजा
चरणों तक पहुँचाने दे ।।
जी भर उन्हे देख लेने दे,
जीवन सफल बनाने दे ।
खोल, खोल दे द्वार पुजारी !
मन की व्यथा मिटाने दे ।।
बहुत बड़ी आशा से आई हूं,
मत कर तू मुझे निराश ।
एक बार, बस एक बार, तू
जाने दे प्रियतम के पास।
51. पुरस्कार कैसा
सहसा हुई पुकार ! मातृ-
मन्दिर में मुझे बुलाया क्यों ?
जान-बूझकर सोई थी, फिर
जननी ! मुझे जगाया क्यों ?
भूल रही थी स्वप्न देखना,
आमंत्रण पहुँचाया क्यों ?
बन्द द्वार करने जाती थी
फिर पथ हाय ! सुझाया क्यों ?
मान मातृ-आदेश, दौड़ कर
आने को लाचार हुई ।
क्या मेरी टूटी-फूटी-सी
सेवा है स्वीकार हुई ?
स्वयं उपेक्षित पर गुरुजन का
पथ-भूला दुलार कैसा ?
तिरस्कार के योग्य बावली,
पर यह अतुल प्यार कैसा ?
इस बुन्देलों की झांसी में
शस्त्रों बिना तार कैसा ?
देश-प्रेम की मतवाली को
जननी ? पुरस्कार कैसा ?
क्षत्राणी हूं, सुख पाने दे
अरुणामृत की धारों से ।
बनने दे इतिहास देश का
पानी चढ़े दुधारों से ।।
जरा सुलग जाने दे चारों-
दिशि कुरबानी की आगी ।
अरी बेतवा ! दिखा समर में !!
तेरे पानी की आगी !!
हर पत्थर पर लिखा जहां
बलिदान लक्ष्मीबाई का ।
कौन मूल्य है वहां 'सुभद्रा'
की कविता-चतुराई का ?
न्यौता ! न्यौते का जवाब
मैं न्यौता देने आयी हूं ।
भाई ! दो, मैं तिलक-लालिमा
साथ न अपने लायी हूं ।।
आज तुम्हारी लाली से
मां के मस्तक पर हो लाली ।
काली जंजीरें टूटें, काली
जमना में हो लाली ।।
जो स्वतंत्र होने को है,
पावन दुलार उन हाथों का ।
स्वीकृत है, मां की वेदी पर
पुरस्कार उन हाथों का ।।
लड़ने की धुन में भाई !
ममता का मधुर स्वाद कैसा?
अपने ही से अपनों का,
डरती हूं धन्यवाद कैसा ?
(सन् १९३१ में सेकसरिया पारितोषिक
मिलने पर)
52. शिशिर-समीर
शिशिर-समीरण, किस धुन में हो,
कहो किधर से आती हो ?
धीरे-धीरे क्या कहती हो ?
या यों ही कुछ गाती हो ?
क्यों खुश हो ? क्या धन पाया है ?
क्यों इतना इठलाती हो ?
शिशिर-समीरण ! सच बतला दो,
किसे ढूँढने जाती हो ?
मेरी भी क्या बात सुनोगी,
कह दूँ अपना हाल सखी ?
किन्तु प्रार्थना है, न पूछना,
आगे और सवाल सखी ।।
फिरती हुई पहुँच तुम जाओ,
अगर कभी उस देश सखी !
मेरे निठुर श्याम को मेरा
दे देना सन्देश सखी !
मिल जावें यदि तुम्हें अकेले,
हो ऐसा संयोग सखी !
किन्तु देखना वहाँ न होवें
और दूसरे लोग सखी !!
खूब उन्हें समझा कर कहना
मेरे दिल की बात सखी ।
विरह-विकल चातकी मर रही
जल-जल कर दिन रात सखी !!
मेरी इस कारुण्य दशा का
पूरा चित्र बना देना ।
स्वयं आँख से देख रही हो
यह उनको बतला देना !!
दरस-लालसा जिला रही है,
कह देना, समझा देना ।
नासमझी यदि कहीं हुई हो
तो उसको सुलझा देना ।।
कहना किसी तरह वे सोचें
मिलने की तदबीर सखी ।
सही नहीं जाती अब मुझसे
यह वियोग की पीर सखी ।।
चूर-चूर हो गया ह्रदय यह
सह-सह कर आघात सखी !
शिशिर-समीरण भूल न जाना ।
कह देना सब बात सखी ।।
53. मानिनि राधे
थीं मेरी आदर्श बालपन से
तुम मानिनि राधे
तुम-सी बन जाने को मैंने
व्रत-नियमादिक साधे ।।
अपने को माना करती थी
मैं वृषभानु-किशोरी।
भाव-गगन के कृष्णचन्द्र की
थी मैं चतुर चकोरी ।।
था छोटा-सा गाँव हमारा
छोटी-छोटी गलियां ।
गोकुल उसे समझती थी मैं
गोपी संग की अलियां ।।
कुटियों मे रहती थी, पर
मैं उन्हें मानती कुँजें ।
माधव का सन्देश समझती
सुन मधुकर की गुंजें ।।
बचपन गया, नया रंग आया
और मिला वह प्यारा ।
मैं राधा बन गयी, न था वह
कृष्णचन्द्र से न्यारा ।।
किन्तु कृष्ण यह कभी किसी पर
जरा पेम दिखलाता ।
लग जाती है आग
हृदय में, कुछ भी नहीं सुहाता ।।
खूनी भाव उठें उसके प्रति
जो हो प्रिय का प्यारा ।
उसके लिए हदय यह मेरा
बन जाता हत्यारा ।।
मुझे बता दो मानिनि राधे ।
प्रीति-रीति वह न्यारी ।
क्यों कर थी उस मनमोहन पर
अविचल भक्ति तुम्हारी ।।
तुम्हें छोड़कर बन बैठे जो
मथुरा-नगर-निवासी ।
कर कितने ही ब्याह, हुए जो
सुख-सौभाग्य-विलासी ।।
सुनतीं उनके गुण-गुण को ही,
उनको ही गाती थीं !
उन्हें याद कर सब कुछ भूली
उन पर बलि जाती थीं।।
नयनों के मृदु फूल चढातीं
मानस की मूरत पर ।
रहीं ठगी-सी जीवन भर
उस क्रूर श्याम-सूरत पर ।।
श्यामा कहलाकर, हो बैठी
बिना दाम की चेरी ।
मृदुल उमंगों की तानें थीं-
तू मेरा मैं तेरी ।।
जीवन का न्यौछावर हा हा !
तुच्छ उन्होनें लेखा ।
गये, सदा के लिए गये
फिर कभी न मुड़कर देखा ।।
अटल प्रेम फिर भी कैसा था
कह दो राधारानी !
कह दो मुझे जली जाती हूँ,
छोड़ो शीतल पानी ।।
ले आदर्श तुम्हारा, रह-रह
मैं मन को समझाती हूँ ।
किन्तु बदलते भाव न मेरे
शान्ति नहीं पाती हूँ ।।
54. पुरस्कार का मूल्य
मधुर-मधुर मीठे शब्दों में
मैंने गाना गाया एक ।
वे प्रसन्न हो उठे खुशी से
शाबाशी दी मुझे अनेक ।।
निश्चल मन से मैंने उनकी
की सभक्ति सादर सेवा ।
पाया मैंने कृतज्ञता
का उसी समय मीठा मेवा ।।
नवविकसित सुरभित कलियाँ ले,
मैंने रुचि से किया सिंगार ।
मेरी सुन्दरता की प्रिय ने
ली तुरन्त तस्वीर उतार ।।
हुई प्रेम-विह्वल मैं उनके
चरणों पर बलिहार गयी ।
बदले में प्रिय का चुम्बन पा
जीत गयी या हार गयी ।।
उस शाबाशी से, कृतज्ञता से,
तस्वीर खिंचाने से ।
हुई खुशी से मैं पागल-सी
प्रिय का चुम्बन पाने से ।।
घटने लगा किन्तु धीरे-
धीरे यह पागलपन मेरा ।
एक नशा था, उतर गया, हो
गया दुखी-सा मन मेरा ।।
गाना एक और गाया, अब
केवल मन बहलाने को।
सेवा-भाव लिये निकली मैं
अब जन-कष्ट मिटाने को ।।
सुन्दर खिले हुए फूलों से
किया आज भी साज-सिंगार
अखिल विश्व के लिए समेटे
अपने नन्हें उर में प्यार ।।
मैं प्रसन्न थी, पर प्रसन्नता
मेरी आज निराली थी।
मैं न आज मैं थी यह कोई
विश्व-प्रेम-मतवाली थी ।।
सेवा और श्रृंगार प्रेम से
भरा हुआ मेरा गाना ।
छिप कर सुना किसी ने
जिसका जान न पायी मैं आना ।।
सुनने वाला बोला, पर क्या
शब्द सुनाई देते थे ।
करते हुए प्रशंसा, विकसित
नेत्र दिखायी देते थे ।।
'पहिले में यह बात न थी,
यह है बेजोड़ निराला गीत ।'
मेरी प्रसन्नता ने प्रतिध्वनि
किया कि प्यारे वह संगीत-
शाबाशी के पुरस्कार का
कोरा मूल्य चुकाती थी,
वही कमी उस पुरस्कार
की कीमत को दरशाती थी ।।
55. मातृ-मन्दिर में
वीणा बज-सी उठी, खुल गये नेत्र
और कुछ आया ध्यान।
मुड़ने की थी देर, दिख पड़ा
उत्सव का प्यारा सामान॥
जिसको तुतला-तुतला करके
शुरू किया था पहली बार।
जिस प्यारी भाषा में हमको
प्राप्त हुआ है माँ का प्यार॥
उस हिन्दू जन की गरीबिनी
हिन्दी प्यारी हिन्दी का।
प्यारे भारतवर्ष -कृष्ण की
उस प्यारी कालिन्दी का॥
है उसका ही समारोह यह
उसका ही उत्सव प्यारा।
मैं आश्चर्य भरी आँखों से
देख रही हूँ यह सारा॥
जिस प्रकार कंगाल-बालिका
अपनी माँ धनहीना को।
टुकड़ों की मोहताज़ आजतक
दुखिनी सी उस दीना को॥
सुन्दर वस्त्राभूषण सज्जित,
देख चकित हो जाती है।
सच है या केवल सपना है,
कहती है रुक जाती है ।।
पर सुंदर लगती है, इच्छा
यह होती है कर ले प्यार ।
प्यारे चरणों पर बलि जाये
कर ले मन भर के मनुहार ।।
इच्छा प्रबल हुई, माता के
पास दौड़ कर जाती है ।
वस्त्रों को संवारती, उसको
आभूषण पहनाती है ।
उसी भांति आश्चर्य मोदमय,
आज मुझे झिझकाता है ।
मन में उमड़ा हुआ भाव बस,
मुंह तक आ रुक जाता है ।।
प्रेमोन्मत्ता होकर तेरे पास
दौड़ आती हूं मैं ।
तूझे सजाने या संवारने
में ही सुख पाती हूं मैं ।।
तेरी इस महानता में,
क्या होगा मूल्य सजाने का ?
तेरी भव्य मूर्ति को नकली
आभूषण पहनाने का ?
किन्तु हुआ क्या माता ! मैं भी
तो हूं तेरी ही सन्तान ।
इसमें ही संतोष मुझे है
इसमें ही आनन्द महान ।।
मुझ-सी एक एक की बन तू
तीस कोटि की आज हुई ।
हुई महान, सभी भाषाओं
की तू ही सरताज हुई ।।
मेरे लिए बड़े गौरव की
और गर्व की है यह बात ।
तेरे ही द्वारा होवेगा,
भारत में स्वातंत्रय-प्रभात ।।
असहयोग पर मर-मिट जाना
यह जीवन तेरा होगा ।
हम होंगे स्वाधीन, विश्व का
वैभव धन तेरा होगा ।।
जगती के वीरों-द्वारा
शुभ पदवन्दन तेरा होगा !
देवी के पुष्पों द्वारा,
अब अभिनन्दन तेरा होगा ।।
तू होगी आधार, देश की
पार्लमेण्ट बन जाने में ।
तू होगी सुख-सार, देश के
उजड़े क्षेत्र बसाने में ।।
तू होगी व्यवहार, देश के
बिछड़े हृदय मिलाने में ।
तू होगी अधिकार, देशभर
को स्वातंत्रय दिलाने में ।।
56. रामायण की कथा
आज नहीं रुक सकता अम्मां
जाऊंगा मैं बाहर
रामायण की कथा हो रही
होगी सरला के घर ।
मेरे ही आगे उसके घर
आया था हलवाई
पूजा में प्रसाद रखने को
वह दे गया मिठाई ।
पूजा हो जाने पर बंटता
है प्रसाद मनमाना
चाहो तो प्रसाद लेने को
मां तुम भी आ जाना ।
क्या कहती हो अभी धूप है
अभी न बाहर जाऊं
यह क्या मां, जब अभी
जा रहे थे काका जी बाहर
तब भी तो थी धूप गए थे
वे भी तो नंगे सर ।
उन्हें नहीं रोका था तुमने
मुझे रोकती जातीं
यही तुम्हारी बात समझ में
कभी न मेरे आती ।
वे किसलिए कचहरी में मां
रोज धूप में जाते
कुछ भी उन्हें न कहतीं वे तो
बहुत शाम को आते ।
मैं जब कभी काम पड़ने पर
भी हूँ बाहर जाता
नहीं शाम भी होने पाती
जल्द लौट कर आता ।
तब भी मुझको रोका करतीं
मां तुम कितनी भोली
नहीं खेलने जाता हूँ मैं
गुल्ली डंडा गोली ।
काका जी की तरह न अम्मां
देर लगाऊंगा मैं
कथा हुई फिर क्या, प्रसाद
लेकर आ जाऊँगा मैं ।
तो घंटा बज उठा, हो गई
अम्मां मुझको देरी
वह देखो, आ रही बुलाने
मुझको सरला मेरी ।
57. कुट्टी
मोहन से तो आज हो गई
है मेरी कुट्टी अम्मां ।
अच्छा है शाला जाने से
मिली मुझे छुट्टी अम्मां ।।
रोज सवेरे आकर मुझको
वह शाला ले जाता था ।
दस बजते हैं इसी समय तो
यह अपने घर आता था ।।
मोहन बुरा नहीं है अम्मां
मैं उसको करता हूं प्यार ।
फिर भी जाने क्यों हो जाया
करती है उससे तकरार ।।
यह क्या ! कुट्टी होने पर भी
वह आ रहा यहां मोहन ।
आते उसको देख विजयसिंह
हुए वहुत खुश मन ही मन ।।
बोले-कुट्टी तो है मोहन
फिर तुम कैसे आए हो
फूल देख उसके बस्ते में
पूछा यह क्या लाए हो ।।
चलो दोस्ती कर लें फिर से
दे दो हम को भी कुछ फूल।
हमे खिला दो खाना अम्माँ
अब हम जाएँगे स्कूल ।।
58. नटखट विजय
कितना नटखट मेरा बेटा ।
क्या लिखता है लेटा-लेटा ॥
अभी नहीं अक्षर पहचाना ।
ग, म, भ का भेद न जाना ॥
फिर पट्टी पर शीश झुकाए ।
क्या लिखता है ध्यान लगाए ॥
मैं लिखता हूँ बिटिया रानी।
मुझे पिला दो ठंडा पानी॥
59. मुन्ना का प्यार
माँ मुन्ना को तुम हम सबसे
क्यों ज्यादा करती हो प्यार ?
हमें भेज देतीं पढ़ने को
उसका करतीं सदा दुलार
उसे लिए रहती गोद में
पैरों हमें चलाती हो
हमें अकेला छोड़ उसे तुम
अपने साथ सुलाती हो
उसके रोने पर तुम अपने
काम छोड़ कर आती हो
किंतु हमारे रोने पर तुम
कितनी डाँट लगाती हो
माँ, क्या मुन्ना ही बेटा है
हम क्या नहीं तुम्हारे हैं?
सच कह दो माँ, उसी तरह
क्या तुम्हें नहीं हम प्यारे हैं?
60. पतंग
जो तुम अम्माँ देर करोगी
पतंग न हम ले पाएँगे
सब लड़के खरीद लेंगे माँ
हम यों ही रह जाएँगे
तुम तो नहीं समझती हो माँ
पतंग और मंझे की बात
घर में बैठी-बैठी जाने क्या
करती रहतीं दिन-रात
अब हम रह न सकेंगे अम्माँ
हम भी पतंग उड़ाएँगे
पैसा हमें न दोगी तो
हम रोएँगे चिल्लाएँगे।
61. अजय की पाठशाला
माँ ने कहा दूध तो पी लो,
बोल उठे माँ रुक जाओ
वहीं रहो पढ़ने बैठा हूँ
मेरे पास नहीं आओ
है शाला का काम बहुत-सा
माँ उसको कर लेने दो
ग म भ लिख-लिख कर अम्माँ
पट्टी को भर लेने दो
तुम लिखती हो हम आते हैं
तब तुम होती हो नाराज
मैं भी तो लिखने बैठा हूँ
कैसे बोल रही हो आज ?
क्या तुम भूल गई माँ
पढ़ते समय दूर रहना चाहिए
लिखते समय किसी से कोई
बात नहीं कहना चाहिए
...................................
बोले माँ पढ़ लिया बहुत-सा
आज न शाला जाऊँगा
फूल यहाँ भी बहुत लगे हैं
माला एक बनाऊँगा
यहाँ मजे में पेड़ों पर चढ़
बिही तोड़ कर खाता हूँ
माँ शाला में बैठा-बैठा
मैं दिन भर थक जाता हूँ
बैठूँगा मैं आज पेड़ पर
पहने फूलों की माला
माँ, मत शाला भेज इकट्ठा
मैंने सब कुछ पढ़ डाला
62. लोहे को पानी कर देना
जब जब भारत पर भीड़ पड़ी, असुरों का अत्याचार बढ़ा,
मानवता का अपमान हुआ, दानवता का परिवार बढ़ा ।
तब तब हो करुणा से प्लावित करुणाकर ने अवतार लिया,
बनकर असहायों के सहाय दानव-दल का संहार किया ।
दुख के बादल हट गये, ज्ञान का चारों ओर प्रकाश दिखा,
कवि के उर में कविता जागी, ऋषि-मुनियों ने इतिहास लिखा ।
जन-जन में जागा भक्ति-भाव, दिशि-दिशि में गूंजा यशोगान,
मन-मन में पावन प्रीति जगी, घर-घर में थे सब पुण्यवान ।
सतयुग त्रेता देता बीता, यश-सुरभि राम की फैलाता,
द्वापर भी आया, गया, कृष्ण की नीति-कुशलता दरशाता ।
कलियुग आया, जाते-जाते उसके गांधी का युग आया,
गांधी की महिमा फैल गयी, जग ने गांधी का गुण गाया ।
कवि गद्गद् हो अपनी-अपनी श्रद्धांजलियां भर-भर लाये
रोमा रोलां रवि ठाकुर ने उल्लसित गीत यश के गाये ।
इस समारोह में रज-कण-सी मैं क्या गाऊँ ? कैसे गाऊँ ?
इतनी विभूतियों के सम्मुख घबराती हूं कैसे जाऊँ ?
दुनिया की सब आवाजों से जो ऊपर उठ-उठ जाती है,
लोहे से लोहा बजने की आवाज उस तरफ आती है ।
विज्ञान ज्ञान की परिधि आज अब नहीं किसी बन्धन में है,
लोहे को पानी कर देना
.........................................................
उस ओर साधना है ऐसी इस ओर अशिक्षित और अजान,
फावड़ा और कुदालवाले मजदूर और भोले किसान ।
आशा करते थे एक रोज वह अवतारी जरूर आवेगा,
आसुरी कृत्य करके समाप्त फिर नई दुनिया बसावेगा ।
पर किसे ज्ञात था जग में वह अवतरित हो चुका ज्ञानी,
जिसके तप बल से फुंकें सभी दुनिया के ज्ञानी-विज्ञानी ।
63. पुत्र-वियोग
आज दिशाएं भी हंसती हैं
है उल्लास विश्व पर छाया,
मेरा खोया हुआ खिलौना
अब तक मेरे पास न आया ।
शीत न लग जाए, इस भय से
नहीं गोद से जिसे उतारा
छोड़ काम दौड़ कर आयी
'माँ' कहकर जिस समय पुकारा ।
थपकी दे दे जिसे सुलाया
जिसके लिए लोरियां गायीं ।
जिसके मुख पर जरा मलिनता
देख आंख में रात बितायी ।
जिसके लिए भूल अपनापन
पत्थर को भी देव बनाया
कहीं नारियल, दूध, बताशे
कहीं चढ़ाकर शीश नवाया ।
फिर भी कोई कुछ कर न सका
छिन ही गया खिलौना मेरा
मैं असहाय विवश बैठी ही
रही उठ गया छौना मेरा ।
तड़प रहे हैं विकल प्राण ये ।
मुझको पलभर शान्ति नहीं है
वह खोया धन पा न सकूंगी
इसमें कुछ भी भ्रांति नहीं है ।
फिर भी रोता ही रहता है
नहीं मानता है मन मेरा
बड़ा जटिल नीरस लगता है
सूना-सूना जीवन मेरा ।
यह लगता है एक बार यदि
पल भर को उसको पा जाती ।
जी से लगा प्यार से सर
सहला सहला उसको समझाती ।
मेरे भैया मेरे बेटे अब
मां को यों छोड़ न जाना
बड़ा कठिन है बेटा खोकर
मां को अपना मन समझाना ।
भाई-बहिन भूल सकते हैं
पिता भले ही तुम्हें भुलावें
किन्तु रात दिन की साथिन मां
कैसे अपना मन समझावे ।
64. तुम
कितनी बार बुलाया तुमको
दे दे सविनय आमंत्रण ।
फिर भी नहीं पसीजे तिल-भर
अरे निठुर तुम मेरे धन ।।
तूम चपला सी चमक दिखाकर
नीले नभ में छिप जाते ।
फिर ऊषा की लाली में आ
फूलों में मुसका जाते ।।
मन्द वायु लहरों के संग आ
छू जाते हो मेरा तन ।
वर्षा की बून्दों में मिल
शीतल कर जाते मेरा मन ।।
मेरी इस जीवित समाधि पर
बरसा जाते हो तुम फूल ।
बिखरा कर मृदु मुस्कानों का
हर ले जाते मेरा शूल ।।
किन्तु कहो कब तक खेलोगे
आंख मिचौनी तुम बेपीर ।
मेरा चंचल मन हो जाता
है अस्थिर अत्यंत अधीर ।।
नहीं सूझता मार्ग भूल जाती हूँ
धोखा खाती हूँ
कलियों में, भ्रमरावलियों में
तुम्हें ढूढ़न्ने जाती हूँ ।।
तुम मुझसे छिप-छिप-जाने क्यों
मुझे कलेश पहूँचाते हो ?
अरे प्राण ! किस लिए कहो
नाहक मुझको तरसाते हो ।।
65. व्यथित हृदय
व्यथित है मेरा हृदय-प्रदेश
चलूँ उसको बहलाऊँ आज ।
बताकर अपना सुख-दुख उसे
हृदय का भार हटाऊँ आज ।।
चलूँ मां के पद-पंकज पकड़
नयन जल से नहलाऊँ आज ।
मातृ-मन्दिर में मैंने कहा-
चलूँ दर्शन कर आऊँ आज ।।
किन्तु यह हुआ अचानक ध्यान
दीन हूं, छोटी हूं, अञ्जान!
मातृ-मन्दिर का दुर्गम मार्ग
तुम्हीं बतला दो हे भगवान !
मार्ग के बाधक पहरेदार
सुना है ऊंचे-से सोपान ।
फिसलते हैं ये दुर्बल पैर
चढ़ा दो मुझको यह भगवान !
अहा ! वे जगमग-जगमग जगी
ज्योतियां दीख रहीं हैं वहां ।
शीघ्रता करो, वाद्य बज उठे
भला मैं कैसे जाऊं वहां ?
सुनाई पड़ता है कल-गान
मिला दूं मैं भी अपने तान ।
शीघ्रता करो, मुझे ले चलो
मातृ-मन्दिर में हे भगवान !
चलूं मैं जल्दी से बढ़ चलूं
देख लूं मां की प्यारी मूर्ति ।
अहा ! वह मीठी-सी मुसकान
जगाती होगी न्यारी स्फूर्ति ।।
उसे भी आती होगी याद
उसे ? हां, आती होगी याद ।
नहीं तो रूठूंगी मैं आज
सुनाऊँगी उसको फरियाद ।।
कलेजा मां का, मैं सन्तान,
करेगी दोषों पर अभिमान ।
मातृ-वेदी पर घण्टा बजा,
चढ़ा दो मुझको हे भगवान् !!
सुनूँगी माता की आवाज,
रहूँगी मरने को तैयार।
कभी भी उस वेदी पर देव !
न होने दूँगी अत्याचार।।
न होने दूँगी अत्याचार
चलो, मैं हो जाऊँ बलिदान
मातृ-मन्दिर में हुई पुकार
चढ़ा दो मुझको हे भगवान् ।
66. विदाई
आशे ! किसी हरित पल्लव में जाओ, जाओ छिप जाओ ।
खुला हूआ है द्वार निराशे ! आओ स्वागत है आओ ।।
आयो उद्विग्नते ! हृदय का मंथन कर दुख पहुंचाओ ।
निष्ठुरते ! जाओ- निष्ठुरतम उनका हृदय बना आओ ।।
मुझ अकिंचना को तजकर जाने में उन्हें न हो दुख लेश ।
उनके सरस हृदय को करुणे ! जाकर पहुँचाना मत कलेश ।।
हे समत्व की मधु-लालिमे ! आज बदल दो अपना वेश ।
मेरे लिए हृदय में उनके रह न जाय कुछ ममता शेष ।।
मेरे आगे स्वार्थ है उनके आगे है कर्तव्य ।
मुख्रर भावना उन्हें रोकने की क्या हो सकती क्षणतव्य ।।
अरे हृदय रोको अपने को, अरी आंख रुक जाओ अब ।
विघ्न और बाधाएं उनके पथ की दूर हटाओ सब ।।
जाने दो, जाने दो, उनको जाने ही में सुख होगा ।
सह लेना पाषाण हृदय, तू भी जो कूछ भी दुख होगा ।।
उनकी उन प्यारी स्मृतियों का चित्र सदा सन्मुख होगा ।
इन प्यासी आंखों के आगे उनका निर्मल मुख होगा ।।
फिर क्यों हे बावले हृदय ! नाहक होते चंचल ।
अंतरतम में मची हूई है क्यों इतनी भीषण हलचल ।।
मेरे तो प्रति रोम-रोम में उनका समावेश अविचल ।
है कोई क्या मिटा सकेगा मेरा यह निश्चय निश्चल ।।
जाओ, जाओ, हृदय देवता ! जाओ हे मेरे पाषाण !
तुम्हें न रोकूंगी यद्यपि हो रहे कंठगत मेरे प्राण ।।
जाओ अंतिम विनय यही है मुझे भूल ही जाना तुम ।
मेरी स्मृतियों की समाधि पर कभी न फूल चढ़ाना तुम ।।
67. आहत की अभिलाषा
जीवन को न्यौछावर करके तुच्छ सुखों को लेखा।
अर्पण कर सब कुछ चरणों पर तुम में ही सब देखा।।
थे तुम मेरे इष्ट देवता, अधिक प्राण से प्यारे।
तन से, मन से, इस जीवन से कभी न थे तुम न्यारे।।
अपना तुमको समझ, समझती थी, हूँ सखी तुम्हारी।
तुम मुझको प्यारे हो, मैं तुम्हें प्राण से प्यारी।।
दुनिया की परवाह नहीं थी, तुम में ही थी भूली।
पाकर तुम-सा सुहृद, गर्व से फिरती थी मैं फूली।।
तुमको सुखी देखना ही था जीवन का सुख मेरा।
तुमको दुखी देखकर पाती थी मैं कष्ट घनेरा।।
‘मेरे तो गिरधर गोपाल तुम और न दूजा कोई।।’
गाते-गाते कई बार हो प्रेम-विकल हूँ रोई।।
मेरे हृदय-पटल पर अंकित है प्रिय नाम तुम्हारा।
हृदय देश पर पूर्ण रूप से है साम्राज्य तुम्हारा।।
है विराजती मन-मन्दिर में सुन्दर मूर्ति तुम्हारी।
प्रियतम की उस सौम्य मूर्ति की हूँ मैं भक्त पुजारी।।
किन्तु हाय! जब अवसर पाकर मैंने तुमको पाया।
उस नि:स्वार्थ प्रेम की पूजा को तुमने ठुकराया।।
मैं फूली फिरती थी बनकर प्रिय चरणों की चेरी।
किन्तु तुम्हारे निठुर हृदय में नहीं चाह थी मेरी।।
मेरे मन में घर कर तुमने निज अधिकार बढ़ाया।
किन्तु तुम्हारे मन में मैंने तिल भर ठौर न पाया।।
अब जीवन का ध्येय यही है तुमको सुखी बनाना।
लगी हुई सेवा में प्यारे! चरणों पर बलि जाना।।
मुझे भुला दो या ठुकरा दो, कर लो जो कुछ भावे।
लेकिन यह आशा का अंकुर नहीं सूखने पावे।।
करके कृपा कभी दे देना शीतल जल के छींटे।
अवसर पाकर वृक्ष बने यह, दे फल शायद मीठे ॥
68. विजयादशमी
विजये ! तूने तो देखा है
वह विजयी श्री राम सखी !
धर्म भीरु सात्विक निश्छ्ल मन
वह करुना का धाम सखी !
वनवासी असहाय और फिर
हुआ विधाता वाम सखी ।
हरी गई सहचरी जानकी
वह व्याकुल घनश्याम सखी !
कैसे जीत सका रावण को
रावण था सम्राट सखी !
सोने की लंका थी उसकी
सजे राजसी ठाट सखी !
रक्षक राक्षस सैन्य सबल था
प्रहरी सिंधु विराट सखी !
नर ही नहीं, देव डरते थे
सुन कर उसकी डांट सखी !
राम-समान हमारा भी तो
रहा नहीं अब राज सखी !
राजदुलारों के तन पर हैं
सजे फकीरी साज सखी !
हो असहाय भटकते फिरते
वनवासी-से आज सखी !
सीता-लक्ष्मी हरी किसी ने
गयी हमारी लाज सखी !
आशा का सन्देश सुनाती
तू हमको प्रति वर्ष सखी !
इसी लिए तेरे आने पर
होता अतिशय हर्ष सखी !
रामचन्द्र की विजय-कथा का
भेद बता आदर्श सखी !
पराधीनता से छूटे यह
प्यारा भारतवर्ष सखी !
पर इतने से ही होता है,
किसे भला संतोष सखी !
जरा हृदय तो देख भरे हैं,
यहां रोष के कोष सखी !
वह दिन था, जब दिया किसी ने,
रन में जरा प्रचार सखी !
मिटा दिया यम को भी हमने,
हुआ हमारा वार सखी !
और, आज तू देख, देख ये
सबल बचाते प्राण सखी ।
रण से पिछड़ पड़े, कहते हैं-
करो देश का तराण सखी !
छिड़ा आज यह पाप-पुण्य का
युद्ध अनोखा एक सखी ।
मर जावें पर साथ न देंगे,
पापों का, है टेक सखी ।
सबलों को कुछ सीख सिखाओ
मरें करें … उद्धार सखी !
दानव दल दें, पाप मसल दें,
मेटें अत्याचार सखी !
सबल पुरुष यदि भीरु बनें,
तो हमको दे वरदान सखी।
अबलाएँ उठ पड़ें देश में,
करें युद्ध घमसान सखी।
पंद्रह कोटि असहयोगिनियाँ,
दहला दें ब्रह्मांड सखी।
भारत-लक्ष्मी लौटाने को,
रच दें लंका काण्ड सखी ।
खाना पीना सोना जीना,
हो पापी का भार सखी !
मर-मर कर पापों का कर दें,
हम जगती से छार सखी ।
देखें फिर इस जगती-तल में,
होगी कैसे हार सखी !
भारत मां की बेड़ी काटें,
होवे बेड़ा पार सखी !
दो विजये ! वह आत्मिक बल दो,
वह हुंकार मचाने दो।
अपनी निर्बल आवाजों से,
दुनिया को दहलाने दो ।
‘जय स्वतंत्रिणी भारत माँ’ !
यों कहकर मुकुट लगाने दो।
हमें नहीं, इस भू-मण्डल को,
माँ पर बलि-बलि जाने दो ।
छेड़ दिया संग्राम, रहेगी
हलचल आठों याम सखी!
असहयोग सर तान खड़ा है
भारत का श्रीराम सखी !
पापों के गढ़ टूट पड़ेंगे,
रहना तुम तैयार सखी !
विजये! हम तुम मिल कर लेंगी,
अपनी माँ का प्यार !
69. वे कुंजें
देव ! वे कुंजें उजड़ी पड़ीं
और वह कोकिल उड़ ही गयी ।
हटायीं हमने लाखों बार
किन्तु घड़ियां जुड़ ही गयीं ।।
विष्णु ने दिया दान ले लिया
कुश्लता गयी, अंधेरा मिला ।
मातृ-मन्दिर में सूने खड़े
मुक्ति के बदले मरना मिला ।।
आह की कठिन लूह चल रही
नाश का घन-गर्जन हो रहा ।
बूंद या बाण बरसने लगे
पापियों से तर्जन हो रहा ।
अमर-लोचन के धन को लिये
चलो, चल पड़ें, खुले हैं द्वार ।
गर्ज का कुश्लाम्बर ले चलें
मातृ-मन्दिर से हुई पुकार ।।
जननि के दुख की घड़ियां कटें
सजावें पूजा का साहित्य ।
आरती उतरे आदर-भरी
करों में लें नभ का आदित्य ।।
आज वे सन्देशे सुन पड़ें
कटे पद-कंजों की जंजीर ।
मुक्ति की मतवाली मां उठे
उठावें बेटी-बेटे वीर ।।
पाप पृथ्वी से उठ जाय
पापियों से टूटे सम्बन्ध।
प्यार, प्रतिभा, प्राणों की उठे
त्यागमय शीतल-मंद-सुगंध ।।
विजयिनी मां के वीर सुपुत्र
पाप से असहयोग लें ठान ।
गुंजा डालें स्वराज्य की तान
और सब हो जावें बलिदान ।।
जरा ये लेखनियां उठ पड़ें
मातृ-भूमि को गौरव से मढ़ें ।
करोड़ों क्रांतिकारिणि मूर्ति
पलों में निर्भयता से गढ़ें ।।
हमारी प्रतिभा साध्वी रहे
देश के चरणों पर ही चढ़े ।
अहिंसा के भावों में मस्त
आज यह विश्व जोतना पड़े ।।
70. सेनानी का स्वागत
हम हारे या थके रुकी-सी
किन्तु युद्ध की गति है ।
हमें छोड़कर चला गया
पथ-प्रदर्शक सेनापति है ।
अन्धकार छा रहा भ्रमित सी
आज हमारी मति है ।
जिधर उठाते दृष्टि दिखायी
देती क्षति ही क्षति है ।।
ऐसी घोर निराशा में तुम
आशा बनकर आओ ।
स्वागत है शत बार विजय का
आओ मार्ग दिखाओ ।।
वह सेनापति हमें आज भी
है प्राणों से प्यारा ।
ऐसे-विषम समय में भी है
उसका हमें सहारा ।।
पर अपने ही चक्रव्यूह में
है वह फंसकर हारा ।
...........................
रण भेरी का नाद सदा को
क्या अब रुक जायेगा ?
जिसको ऊँचा किया वही
क्या झण्डा झुक जायेगा ?
गोली लाठी चार्ज, जेल की
वे भीषण दीवारें
काल-कोठरी, दण्ड यातना,
वे कोड़ों की मारें ।
प्रभुता-मद से भरी शत्रु की
व्यंग्य भरी बौछारें
साक्षी हैं साहस की
फिर हम जीतें अथवा हारें।
हैं सन्तप्त तदपि आशा से
स्वागत आज तुम्हारा
एक बार फिर कह दो
झण्डा ऊँचा रहे हमारा ।।
71. मेरी प्याली
अपने कविता-कानन की
मैं हूँ कोयल मतवाली
मुझ से मुखरित हो गाती
उपवन की डाली-डाली ।
मैं जिधर निकल जाती हूँ
मधुमास उतर आता है।
नीरस जन के जीवन में
रस घोलघोल जाता है।
सूखे सुमनों के दल पर
मैं मधु-संचालन करती।
मैं प्राणहीन का अपने
प्राणों से पालन करती ।
मेरे जीवन में जाने
कितना मतवालापन है ।
कितने हैं प्राण छलकते
कितना मधु-मिश्रित मन है !
दोनों हाथों से भर-भर
मैं मधु को सदा लुटाती ।
फिर भी न कमी होती है
प्याली भरती ही जाती
72. जल समाधि
अति कृतज्ञ हूंगी मैं तेरी
ऐसा चित्र बना देना।
दुखित हृदय के भाव हमारे।
उस पर सब दिखला देना।।
प्रभु की निर्दयता, जीवों की
कातरता दरसा देना।
मृत्यु समय के गौरव को भी
भली-भांति झलका देना।।
भाव न बतलाए जाते हैं।
शब्द न ऐसे पाती हूं।
इसीलिए हे चतुर चितेरे!
तुझको विनय सुनाती हूं।।
देख सम्हलकर, खूब सम्हलकर
ऐसा चित्र बना देना।
सुंदर इठलाती सरिता पर
मंदिर-घाट दिखा देना।।
वहीं पास के पुल से बढ़कर
धारा तेज बहाना फिर।
चट्टान से टकराता-सा
भारी भंवर घुमाना फिर।।
उसी भंवर के निकट, किनारे
युवक खेलते हों दो-चार।
हंसते और हंसाते हों वे
निज चंचलता के अनुसार।।
किंतु उसी! धारा में पड़कर
तीन युवक बह जाते हों।
थके हुए फिर किसी शिला से
टकराकर रुक जाते हों।।
उनके मुंह पर बच जाने का
कुछ संतोष दिखा देना।
किंतु साथ ही घबराहट में
उत्कंठा झलका देना।।
गहरी धारा में नीचे अब
एक दृश्य यह दिखलाना।
रो-रो उसे बहा मत देना
कुशल चितरे! रुक जाना।।
धारा में सुंदर बलिष्ठ-तन
युवक एक दिखलाता हो।
क्रूर शिलाओं में फंसकर जो
तड़प-तड़प रह जाता हो।।
फिर भी मंद हंसी की रेखा
उसके मुंह पर दिखलाना।
नहीं मौत से डरता था वह,
हंस सकता था बतलाना।।
किंतु साथ ही धीरे-धीरे
बेसुध होता जाता हो।
क्षण-क्षण से सर्वस्व दीप का
मानो लुटता जाता हो।।
ऊपर आसमान में धुंधला-सा
प्रकाश कुछ दिखलाना।
उसी ओर से श्यामा तरुणी का
धीरे-धीरे आना।।
बिखरे बाल विरस वदना-सी
आंखे रोई-रोई-सी।
गोदी में बालिका लिए,
उन्मन-सी खोई-खोई-सी।।
आशा-भरी दृष्टि से प्रभु की
ओर देखती जाती हो।
दुखिया का सर्वस्व न लुटने
पावे, यही मनाती हो।।
इसके बाद चितेरे जो तू
चाहे, वही बना देना।
अपनी ही इच्छा से अंतिम
दृश्य वहां दिखला देना।।
चाहे तो प्रभु के मुख पर
कुछ करुणा-भाव दिखा देना।
अथवा मंद हंसी की रेखा,
या निर्लज्ज बना देना।।
(यह कविता नर्मदा नदी के
भंवर में फंसकर डूब जाने
वाले देवीशंकर जोशी की
मृत्यु पर लिखी गई है।)
73. मनुहार
क्यों रूठे हो, क्या भूल हुई,
किसलिए आज हो खिन्न हुए?
जो थे अभिन्न दो हृदय देव,
वे आज कहो क्यों भिन्न हुए?
सुख की कितनी अतुलित घड़ियां
हमने मिल साथ बिताई हैं।
कितनी ही कठिन समस्याएं
हमने मिलकर सुलझाई हैं।
मिल बैठे दोनों जहां कहीं
संसार हमारा वहीं हुआ
था स्वर्ग तुच्छ इन आंखों में
यदि एक वहां पर नहीं हुआ
तुम थे मेरे सर्वस्व और मैं
जीवन–ज्योति तुम्हारी थी
मैं तुममें थी, तुम मुझ में थे,
हम दोनों की गति न्यारी थी।
है ज्ञात मुझे सौ–सौ मेरे
अपराध क्षमा करते थे तुम
मेरी कितनी त्रुटियों पर भी
कुछ ध्यान नहीं धरते थे तुम
फिर क्या अपराध हुआ जिससे
रूखा व्यवहार तुम्हारा है?
उन अपराधों से क्या कोई
अपराध इस समय न्यारा है।
बोलो, अब कृपा करो, कह दो,
कह दो, अब रहा नहीं जाता
यह मौन तुम्हारा हे मानी,
मुझ से अब सहा नहीं जाता
हंसती हूं, बातें करती हूं
खाती–पीती हूं, जीती हूं
यह पीर छिपाए अंतर में
चुपचाप अश्रु–कण पीती हूं।
यह मर्म–कथा अपनी ही है
औरों को नहीं सुनाऊंगी
तुम रूठो सौ–सौ बार तुम्हें
पैरों पड़ सदा मनाऊंगी !
बस, बहुत हो चुका, क्षमा करो,
अवसाद हटा दो अब मेरा
खो दिया जिसे मद में मैंने
लाओ, दे दो वह सब मेरा।
प्रिय ! हृदय–देश में फिर अपने
जम जाने दो आसन मेरा
बन जाने दो रानी फिर से
दे दो, दे दो शासन मेरा
दे दो सुख का साम्राज्य मुझे,
दोनों दिल फिर मिल जाने दो
मुरझाई जाती आशा की
कलियों को फिर खिल जाने दो
74. मेरी कविता
मुझे कहा कविता लिखने को,
लिखने बैठी मैं तत्काल ।
पहले लिखा जलियाँवाला,
कहा कि बस हो गये निहाल ।।
तुम्हें और कुछ नहीं सूझता,
ले-देकर वह खूनी बाग ।
रोने से अब क्या होता है,
धुल न सकेगा उसका दाग ।।
भूल उसे चल हंस मस्त हो,
मैंने कहा -धरो कुछ धीर ।
तुमको हंसते देख कहीं,
फिर फ़ायर करे न डायर वीर ।।
कहा- न मैं कुछ लिखने दूंगा,
मुझे चाहिए प्रेम-कथा !
मैंने कहा -नवेली ही है वह,
रम्य-वदन है चन्द्र यथा !!
अहा ! मगन हो उछल पड़े वे,
मैंने कहा-सुनो चुपचाप ।
बड़ी-बड़ी-सी भोली आंखें,
केश-पाश ज्यों काले नाग ।।
भोली-भाली आंखें देखो,
उसे नहीं तुम रुलवाना ।
उसके मुंह से प्रेम-भरी,
कुछ मीठी बातें कहलाना ।।
हां, वह रोती नहीं कभी भी,
और नहीं कुछ कहती है ।
शून्य दृष्टि से देखा करती
खिन्नमना-सी रहती है ।।
करके याद पुराने सुख की,
कभी चौंक-सी पड़ती है ।
भय से कभी कांप जाती है,
कभी क्रोध में भरती है ।।
कभी किसी की ओर देखती,
नहीं दिखायी देती है !
हंसती नहीँ किन्तु चुपके से,
कभी-कभी रो लेती है ।।
ताजे हल्दी के रंग-सी,
कुछ पीली उसकी सारी है ।
लाल-लाल से धब्बे हैं कुछ,
अथवा लाल किनारी है ।।
उसका छोर लाल ! संभव है,
हो वह खूनी रंग से लाल ।
है सिन्दूर-बिन्दु से सज्जित,
अब भी कुछ-कुछ उसका भाल ।।
अब भी है उसके पैरों में,
बनी महावर की लाली,
हाथों में मेंहदी की लाली,
वह दुखिया भोली-भाली ।।
उसी बाग की ओर शाम को,
जाती हुई दिखाती है ।
प्रात:काल सूर्योदय से,
पहले ही फिर आती है ।।
लोग उसे पागल कहते हैं,
देखो तुम न भूल जाना !
तुम भी उसे न पागल कहना,
मुझे क्लेश मत पहुँचाना ।।
उसे लौटती समय देखना,
रम्य वदन पीला-पीला !
सारी का वह लाल छोर भी,
रहना है बिलकुल गीला ।।
डायन भी कहते हैं उसको
कोई कोई हत्यारे ।
उसे देखना किन्तु न ऐसी
गलती तुम करना प्यारे ।।
बाईं ओर हृदय में धड़कन
कुछ उसके दिखलाती है ।
वह भी तो प्रतिदिन क्रम-क्रम से
धीमी होती जाती है ।।
किसी रोज सम्भव है, उसकी
मिट जावे यह भी धड़कन ।
बुझ जायें आंखें, धीमी
जो होती जाती हैं क्षण-क्षण ।।
उसकी ऐसी दशा देखना
आंसू चार बहा देना ।
उसके दु:ख में दुखिया बनकर
तुम भी दु:ख मना लेना ।।
75. स्वागत गीत
कर्म के योगी, शक्ति-प्रयोगी
देश-भविष्य सुधारियेगा ।
हाँ, वीर-वेश के दीन देश के,
जीवन प्राण पछारियेगा ।।
तुम्हारा कर्म-चढ़ाने को हमें डोर हुआ ।
तुम्हारी बातों से दिल-में हमारे जोर हुआ ।।
तुम्हें कुचलने को दुश्मन का जी कठोर हुआ ।
तुम्हारे नाम का हर ओर आज शोर हुआ ।।
हां, पर-उपकारी, राष्ट्र-बिहारी ।
कर्म का मर्म सिखाइयेगा ।।
तुम्हारे बच्चों को कष्टों में आज याद हुई ।
तुम्हारे आने से पूरी सभी मुराद हुई ।।
गुलामखानों में राष्ट्रीयता आबाद हुई ।
मादरे हिन्द यों बोली कि मैं आजाद हुई ।।
हां, दीन के भ्राता, संकट त्राता,
जी की जलन बुझाइयेगा ।।
राष्ट्र ने कहा कि महायुद्ध का नियोग करो ।
कम्पा दो विश्व को, अब शक्ति का प्रयोग करो ।
हटा दो दुश्मनों को, डट के असहयोग करो ।
स्वतंत्र माता को करके, स्वराज्य भोग करो ।।
हां, हिंसा-हारी, शस्त्र-प्रहारी
रार की रीति सिखाइयेगा ।।
76. स्वागत
(१९२० में नागपुर में होने वाली
कांग्रेस के स्वागत में)
तेरे स्वागत को उत्सुक यह खड़ा हुआ है मध्य-प्रदेश
अर्घ्यदान दे रही नर्मदा दीपक सवयं बना दिवसेश ।।
विंधयाचल अगवानी पर है
वन-श्री चंवर डुलाती है ।
भोली-भाली जनता तेरा
अटपट स्वागत गाती है।।
आ मैया कांग्रेस हमारी आकांक्षा की प्यारी मूर्ति !
राज्यहीन राजाओं के गत वैभव की स्वाभाविक पूर्ति !!
है स्वागत की स्फूर्ति तदपि
मां ! मन में होता है कुछ सोच ।
आनन्द में घबराहट-सी है,
है उत्साह और संकोच ।।
हमें नहीं भय संगीनों का, चमक रहीं जो उनके हाथ ।
जरा नहीं डर उन तोपों का, गरज रहीं जो बल के साथ ।।
ढीठ सिपाही की हथकड़ियाँ
दमन नीति के वे कानून ।
....................................
77. मत जाओ
अंधकार ! सघनांधकार ! हा,
निराधार संसार हुआ ।
हम असहाय निहत्थों पर, यह
कैसा भीषण वार हुआ ।
लुटते देखा अपना धन, हम
कुछ न कर सके हार गये ।
लोकमान्य, यह क्या सुनती हूँ,
सहसा स्वर्ग सिधार गये ?
यों असहाय छोड़ कर असमय
कैसे जाते हो भगवान ?
लौटो, तुम्हें न जाने देंगे,
दुखी देश के जीवन-प्राण !
भारत मैया की नैया के
चतुर खेवैया लौट चलो ।
इस कुसमय में साथ न छोड़ो,
रुक जाओ, ठहरो, सुन लो ।।
आशा-बेलि स्वदेश-भूमि की
यों न हाय ! मुर्झाने दो !
...............................
तिलक यहीं के कहलाओ ।
अमरपुरी बलि कर दो इस पर
यहीं रहो, हां ! मत जायो ।।
78. स्वागत साज
ऊषे सजनि ! अपनी लाली से
आज सजा दो मेरा तन,
कला सिखा खिलने की कलिके
विकसित कर दो मेरा मन ।
हे प्रसून-दल ! अपना वैभव
बिखरा दो मेरे ऊपर,
मुझ-सी मोहक और न कोई
कहीं दिखायी दे भू पर ।।
माधव ! अपनी मनोमोहिनी
मधु-माया मुझ में भर दो,
पल भर को कर कृपा सजीले !
मुझ को भी सजिजत कर दो ।
अरी वेहंगिनी ! गर्वीली,
यो ऋतुपति के प्राणों की प्राण ।
हे कलकंठ ! सिखा दे पल भर
के ही लिए मुझे कल गान ।
अरी मयूरी ! नर्तन तेरा
मोहित करता है घन को,
मुझे सिखा दे कला, मोह लूँ
मैं अपने मन के धन को ।
सखि ! मेरे सौभाग्य सदन में
लाली छा जायेगी आज,
वे आयेंगे, मुझे सजा दो
दे दे कर तुम अपना साज ।
उस महान वैभव के आगे
मैं भी ठहर सकूँ क्षण-भर ।
उस विशालता के सम्मुख सखि !
मेरा भी कुछ हो क्षण-भर ।
79. करुण-कहानी
आह ! करोगे क्या सुन कर तुम
मेरी करुण कहानी को ।
भूल चुकी मैं स्वयं आज
उस स्वप्न-लोक की रानी को ।।
जो चुन कर आकाश-कुसुम का
हार बनाने वाली थी ।
उनके काँटों से इस उर का
साज सजाने वाली थी ।
अपने वैभव को बटोर कर
कहीं चढ़ाने वाली थी ।
उन्हें पकड़ने को यह दुबर्ल
हाथ बढ़ाने वाली थी ।
पर क्या संभव है पा जाना
नील-गगन का प्यारा फूल ।
जो मेरी आँखों में बरबस
रहा पुतलियों के संग झूल ।
मुझे वहां तक पहुँचाने में,
हो न सका विधि भी अनुकूल ।
सजनि ! वायु भी तो बहती थी
उस दिन मेरे ही प्रतिकूल ।।
थे अप्राप्त तो मुझे सुनहले
सपने ही दिखलाये क्यों ?
छिप-छिप बिना सूचना के
मेरे मानस में आये क्यों?
मधुमय पीड़ा से मेरी
रीती प्याली भर लाये क्यों ?
जलते जीवन में जल के
दो चार बिन्दु टपकाये क्यों ?
अरे प्राण ! इस भांति निठुर
होकर ही तुमको जाना था ?
तो फिर क्यों केवल दो दिन के
लिए मुझे पहिचाना था ?
चपला की सी चमक दिखाकर
ही यदि फिर छिप जाना था ।
तो प्राणेश ! तुम्हें मेरे
प्राणों में नहीं समाना था ।
आज झर रही हैं निर्झर-सी
झर-झर यह आंखें अविराम ।
नहीं खोजने पर भी पाता
यह उद्भ्रांत हृदय विश्राम ।
बाल-सूर्य की प्रथम रश्मि के
साथ-साथ ही आयी शाम ।
जल तम में प्रज्जवलित हो उठी
वह वियोग-ज्वाला उद्दाम ।।
यहीं रुको बस, बहत सुन लिया
तुमने उसका करुण कलाप ।
यहीं करो इति आगे सुनकर
नाहक ही होगा संताप ।।
अर्थहीन है, सारहीन है
उस पगली का सभी प्रलाप ।
भूलो उसे, भूल भी जाओ
समझो उसे अरण्य-विलाप ।।
मुझ अकिंचना के प्रति होकर
द्रवित न होना कहीं विकल ।
मेरी उष्म उसासों से मत
झुलसा लेना अन्तस्तल ।।
80. अपराधी है कौन
अपराधी है कौन, दण्ड का
भागी बनता है कौन ?
कोई उनसे कहे कि पल भर
सोचें रह कर मौन ।
वे क्या समझ सकेंगे
उनकी खीजमयी मनुहार ।
उनका हँस कर कह देना, 'सखि,
निभ न सकेगा प्यार ।
यहीं कुचल दो, यहीं मसल दो
मत बढ़ने दो बेल
निर्मम जग के आघातों से
बिगड़ जायेगा खेल ।
मेरे लिए न करना, सखि,
तुम थोड़ा सा भी त्याग ।
जलने दो, मुझ को सुखकर है
यह जीवन की आग ।
रहने दो क्यों मोल ले रही
हो नाहक उन्माद ।
जीवन का सुख बेच रही
हो लेकर विषम विषाद ।
स्नेहसलिल अपराधी है कौन
............................
मोल लिया उन्माद ।
सखा बन गया जीवन का अब
उनके विषय विवाद ।
है प्रफुल्लता के परदे में
भीषण-भीषण दाह ।
अपनी इन आंखों से मैं सब
देख रही हूं आह ।
जलती हूं, ज्वाला उठती है
पा नैनों का नीर ।
क्रांति मच रही जीवन में
हूं उद्भ्रांत अधीर ।।
नहीं मार्ग अज्ञात, किन्तु मैं
फिर भी हूं गतिहीन ।
वैभव की गोदी में हूं पर
फिर भी दीन मलीन ।
कोई उनसे कहे कि मेरा
ही है सब अपराध ।
उनको अपना कहूं हृदय में
मेरी ही थी साध ।
वही साध अपराध हुई,
हो गयी हृदय का दाह ।
प्राणों का उन्माद बन गयी ।
मेरी पागल चाह ।