हिन्दी कविताएँ : महादेवी वर्मा

Hindi Poetry : Mahadevi Verma


1. अधिकार (वे मुस्काते फूल, नहीं)

वे मुस्काते फूल, नहीं जिनको आता है मुर्झाना, वे तारों के दीप, नहीं जिनको भाता है बुझ जाना; वे नीलम के मेघ, नहीं जिनको है घुल जाने की चाह वह अनन्त रितुराज,नहीं जिसने देखी जाने की राह; वे सूने से नयन,नहीं जिनमें बनते आँसू मोती, वह प्राणों की सेज,नही जिसमें बेसुध पीड़ा सोती; ऐसा तेरा लोक, वेदना नहीं,नहीं जिसमें अवसाद, जलना जाना नहीं, नहीं जिसने जाना मिटने का स्वाद! क्या अमरों का लोक मिलेगा तेरी करुणा का उपहार? रहने दो हे देव! अरे यह मेरा मिटने का अधिकार!

2. मैं नीर भरी दुख की बदली!

मैं नीर भरी दुख की बदली! स्पंदन में चिर निस्पंद बसा, क्रंदन में आहत विश्व हँसा, नयनों में दीपक से जलते, पलकों में निर्झणी मचली! मेरा पग पग संगीत भरा, श्वासों में स्वप्न पराग झरा, नभ के नव रंग बुनते दुकूल, छाया में मलय बयार पली! मैं क्षितिज भृकुटि पर घिर धूमिल, चिंता का भार बनी अविरल, रज-कण पर जल-कण हो बरसी, नव जीवन-अंकुर बन निकली! पथ न मलिन करता आना, पद चिह्न न दे जाता जाना, सुधि मेरे आगम की जग में, सुख की सिहरन हो अंत खिली! विस्तृत नभ का कोई कोना, मेरा न कभी अपना होना, परिचय इतना इतिहास यही, उमड़ी कल थी मिट आज चली

3. मुर्झाया फूल

था कली के रूप शैशव- में अहो सूखे सुमन, मुस्कराता था, खिलाती अंक में तुझको पवन ! खिल गया जब पूर्ण तू- मंजुल सुकोमल पुष्पवर, लुब्ध मधु के हेतु मँडराते लगे आने भ्रमर ! स्निग्ध किरणें चन्द्र की- तुझको हँसाती थीं सदा, रात तुझ पर वारती थी मोतियों की सम्पदा ! लोरियाँ गाकर मधुप निद्रा विवश करते तुझे, यत्न माली का रहा- आनन्द से भरता तुझे। कर रहा अठखेलियाँ- इतरा सदा उद्यान में, अन्त का यह दृश्य आया- था कभी क्या ध्यान में। सो रहा अब तू धरा पर- शुष्क बिखराया हुआ, गन्ध कोमलता नहीं मुख मंजु मुरझाया हुआ। आज तुझको देखकर चाहक भ्रमर घाता नहीं, लाल अपना राग तुझपर प्रात बरसाता नहीं। जिस पवन ने अंक में- ले प्यार था तुझको किया, तीव्र झोंके से सुला- उसने तुझे भू पर दिया। कर दिया मधु और सौरभ दान सारा एक दिन, किन्तु रोता कौन है तेरे लिए दीनी सुमन? मत व्यथित हो फूल! किसको सुख दिया संसार ने? स्वार्थमय सबको बनाया- है यहाँ करतार ने। विश्व में हे फूल! तू- सबके हृदय भाता रहा! दान कर सर्वस्व फिर भी हाय हर्षाता रहा! जब न तेरी ही दशा पर दुख हुआ संसार को, कौन रोयेगा सुमन! हमसे मनुज नि:सार को?

4. जो तुम आ जाते एक बार

जो तुम आ जाते एक बार । कितनी करूणा कितने संदेश पथ में बिछ जाते बन पराग गाता प्राणों का तार तार अनुराग भरा उन्माद राग आँसू लेते वे पथ पखार जो तुम आ जाते एक बार । हंस उठते पल में आद्र नयन धुल जाता होठों से विषाद छा जाता जीवन में बसंत लुट जाता चिर संचित विराग आँखें देतीं सर्वस्व वार जो तुम आ जाते एक बार ।

5. बीन भी हूँ मैं तुम्हारी रागिनी भी हूँ!

बीन भी हूँ मैं तुम्हारी रागिनी भी हूँ! नींद थी मेरी अचल निस्पन्द कण कण में, प्रथम जागृति थी जगत के प्रथम स्पन्दन में, प्रलय में मेरा पता पदचिन्ह जीवन में, शाप हूँ जो बन गया वरदान बन्धन में, कूल भी हूँ कूलहीन प्रवाहिनी भी हूँ! नयन में जिसके जलद वह तुषित चातक हूँ, शलभ जिसके प्राण में वह ठिठुर दीपक हूँ, फूल को उर में छिपाये विकल बुलबुल हूँ, एक हो कर दूर तन से छाँह वह चल हूँ; दूर तुमसे हूँ अखण्ड सुहागिनी भी हूँ! आग हूँ जिससे ढुलकते बिन्दु हिमजल के, शून्य हूँ जिसको बिछे हैं पाँवड़े पल के, पुलक हूँ वह जो पला है कठिन प्रस्तर में, हूँ वही प्रतिबिम्ब जो आधार के उर में; नील घन भी हूँ सुनहली दामिनी भी हूँ! नाश भी हूँ मैं अनन्त विकास का क्रम भी, त्याग का दिन भी चरम आसक्ति का तम भी तार भी आघात भी झंकार की गति भी पात्र भी मधु भी मधुप भी मधुर विस्मृत भी हूँ; अधर भी हूँ और स्मित की चाँदनी भी हूँ!

6. मधुर-मधुर मेरे दीपक जल!

मधुर-मधुर मेरे दीपक जल! युग-युग प्रतिदिन प्रतिक्षण प्रतिपल प्रियतम का पथ आलोकित कर! सौरभ फैला विपुल धूप बन मृदुल मोम-सा घुल रे, मृदु-तन! दे प्रकाश का सिन्धु अपरिमित, तेरे जीवन का अणु गल-गल पुलक-पुलक मेरे दीपक जल! तारे शीतल कोमल नूतन माँग रहे तुझसे ज्वाला कण; विश्व-शलभ सिर धुन कहता मैं हाय, न जल पाया तुझमें मिल! सिहर-सिहर मेरे दीपक जल! जलते नभ में देख असंख्यक स्नेह-हीन नित कितने दीपक जलमय सागर का उर जलता; विद्युत ले घिरता है बादल! विहँस-विहँस मेरे दीपक जल! द्रुम के अंग हरित कोमलतम ज्वाला को करते हृदयंगम वसुधा के जड़ अन्तर में भी बन्दी है तापों की हलचल; बिखर-बिखर मेरे दीपक जल! मेरे निस्वासों से द्रुततर, सुभग न तू बुझने का भय कर। मैं अंचल की ओट किये हूँ! अपनी मृदु पलकों से चंचल सहज-सहज मेरे दीपक जल! सीमा ही लघुता का बन्धन है अनादि तू मत घड़ियाँ गिन मैं दृग के अक्षय कोषों से- तुझमें भरती हूँ आँसू-जल! सहज-सहज मेरे दीपक जल! तुम असीम तेरा प्रकाश चिर खेलेंगे नव खेल निरन्तर, तम के अणु-अणु में विद्युत-सा अमिट चित्र अंकित करता चल, सरल-सरल मेरे दीपक जल! तू जल-जल जितना होता क्षय; यह समीप आता छलनामय; मधुर मिलन में मिट जाना तू उसकी उज्जवल स्मित में घुल खिल! मदिर-मदिर मेरे दीपक जल! प्रियतम का पथ आलोकित कर!

7. तुम सो जाओ मैं गाऊँ !

तुम सो जाओ मैं गाऊँ ! मुझको सोते युग बीते, तुमको यों लोरी गाते; अब आओ मैं पलकों में स्वप्नों से सेज बिठाऊँ ! प्रिय ! तेरे नभ-मंदिर के मणि-दीपक बुझ-बुझ जाते; जिनका कण कण विद्युत है मैं ऐसे प्रान जलाऊँ ! क्यों जीवन के शूलों में प्रतिक्षण आते जाते हो ? ठहरो सुकुमार ! गला कर मोती पथ में फैलाऊँ ! पथ की रज में है अंकित तेरे पदचिह्न अपरिचित; मैं क्यों न इसे अंजन कर आँखों में आज बसाऊँ ! जब सौरभ फैलाता उर तब स्मृति जलती है तेरी; लोचन कर पानी पानी मैं क्यों न उसे सिंचवाऊँ । इन भूलों में मिल जाती, कलियां तेरी माला की; मैं क्यों न इन्ही काँटों का संचय जग को दे जाऊँ ? अपनी असीमता देखो, लघु दर्पण में पल भर तुम; मैं क्यों न यहाँ क्षण क्षण को धो धो कर मुकुर बनाऊँ ? हंसने में छुप जाते तुम, रोने में वह सुधि आती; मैं क्यों न जगा अणु अणु को हंसना रोना सिखलाऊँ !

8. रश्मि (कविता)

चुभते ही तेरा अरुण बान! बहते कन कन से फूट फूट, मधु के निर्झर से सजल गान। इन कनक रश्मियों में अथाह, लेता हिलोर तम-सिन्धु जाग; बुदबुद से बह चलते अपार, उसमें विहगों के मधुर राग; बनती प्रवाल का मृदुल कूल, जो क्षितिज-रेख थी कुहर-म्लान। नव कुन्द-कुसुम से मेघ-पुंज, बन गए इन्द्रधनुषी वितान; दे मृदु कलियों की चटक, ताल, हिम-बिन्दु नचाती तरल प्राण; धो स्वर्णप्रात में तिमिरगात, दुहराते अलि निशि-मूक तान। सौरभ का फैला केश-जाल, करतीं समीरपरियां विहार; गीलीकेसर-मद झूम झूम, पीते तितली के नव कुमार; मर्मर का मधु-संगीत छेड़, देते हैं हिल पल्लव अजान! फैला अपने मृदु स्वप्न पंख, उड़ गई नींदनिशि क्षितिज-पार; अधखुले दृगों के कंजकोष-- पर छाया विस्मृति का खुमार; रंग रहा हृदय ले अश्रु हास, यह चतुर चितेरा सुधि विहान!

9. कहाँ रहेगी चिड़िया

कहाँ रहेगी चिड़िया? आंधी आई जोर-शोर से, डाली टूटी है झकोर से, उड़ा घोंसला बेचारी का, किससे अपनी बात कहेगी? अब यह चिड़िया कहाँ रहेगी ? घर में पेड़ कहाँ से लाएँ? कैसे यह घोंसला बनाएँ? कैसे फूटे अंडे जोड़ें? किससे यह सब बात कहेगी, अब यह चिड़िया कहाँ रहेगी ?

10. कोयल

डाल हिलाकर आम बुलाता तब कोयल आती है। नहीं चाहिए इसको तबला, नहीं चाहिए हारमोनियम, छिप-छिपकर पत्तों में यह तो गीत नया गाती है! चिक्-चिक् मत करना रे निक्की, भौंक न रोजी रानी, गाता एक, सुना करते हैं सब तो उसकी बानी। आम लगेंगे इसीलिए यह गाती मंगल गाना, आम मिलेंगे सबको, इसको नहीं एक भी खाना। सबके सुख के लिए बेचारी उड़-उड़कर आती है, आम बुलाता है, तब कोयल काम छोड़ आती है। (नंदन-मई, 2005)

11. आओ प्यारे तारो आओ

आओ, प्यारे तारो आओ तुम्हें झुलाऊँगी झूले में, तुम्हें सुलाऊँगी फूलों में, तुम जुगनू से उड़कर आओ, मेरे आँगन को चमकाओ।

12. तितली से

मेह बरसने वाला है मेरी खिड़की में आ जा तितली। बाहर जब पर होंगे गीले, धुल जाएँगे रंग सजीले, झड़ जाएगा फूल, न तुझको बचा सकेगा छोटी तितली, खिड़की में तू आ जा तितली! नन्हे तुझे पकड़ पाएगा, डिब्बी में रख ले जाएगा, फिर किताब में चिपकाएगा मर जाएगी तब तू तितली, खिड़की में तू छिप जा तितली।

13. स्वप्न से किसने जगाया (वसंत)

स्वप्न से किसने जगाया? मैं सुरभि हूँ। छोड़ कोमल फूल का घर ढूँढती हूं कुंज निर्झर। पूछती हूँ नभ धरा से- क्या नहीं ऋतुराज आया? मैं ऋतुओं में न्यारा वसंत मै अग-जग का प्यारा वसंत। मेरी पगध्वनि सुन जग जागा कण-कण ने छवि मधुरस माँगा। नव जीवन का संगीत बहा पुलकों से भर आया दिगंत। मेरी स्वप्नों की निधि अनंत मैं ऋतुओं में न्यारा वसंत।

14. अग्नि-गान

१ हव्यवाह ! नित ज्वलनदीप्त तुम यजनशील के दूत समान, बल-जन्मा ! तुमसे यजनों में होता देवोंका आह्वान ! रचते हो तुम आहुतियों से नित्य दिव्य अर्चना-विधान, करते हो तुम अन्तरिक्ष में आलोकित पथ का निर्माण ! वेगवती लपटें लगती हैं जैसे हों तुरंग चंचल, नभ के मेघों के समान ही उनका है सुमन्द्र गर्जन ! आयुध सी इन दीप्त शिखाओं- से सज्जित समीर-प्रेरित, बली बृषभ से अग्नि वनों में बाधारहित तुम्हीं धावित ! व्यापक अन्तरिक्ष में रहते प्रभा-पुत्र तुम अंतर्हित, सभी चलाचल हो जाते हैं वेग तुम्हारे से कम्पित ! दीप्त स्वर्ग के तुम मस्तक हो तुम पृथिवी की नाभि अनूप, दिव्य लोक, धरती दोनों में तुम रहते हो अधिपति रूप ! एक सूर्य में ज्यों हो जाते लीन किरण के जाल समस्त, हे वैश्वानर ! वैसे ही हैं तुम में सारी निधियां न्यस्त ! २ आज यज्ञशाला का खोलो द्वार ! द्वार वही जो यजन-विवर्द्धन, द्वार वही आलोकित निर्जन करो वहीं एकत्र यज्ञसम्भार ! हे त्वष्ट्रा ! हे अग्रज ॠतमय ! कामरूप हे अग्नि निरामय ! करो हमारे हेतु मंगलाचार ! देव वनस्पति ! करो हृष्टमन, देवों को यह हव्य समर्पण, होता को हो प्राप्त दिव्य उपहार । आज यज्ञशाला का खोलो द्वार ! ३ हम मनुष्य अपनी रक्षा हित, करते हैं आहूत, हमें ओजमय करो अग्नि, तुम दिव्य लोक के दूत ! छूट धनुष से फैल गये, जैसे दिशि दिशि में बाण, त्यों फैले स्फुलिंग तुम्हारे, अहे अर्चि-सन्धान ! करते हो अपनी ऊष्मा से, तुम मर्त्यों में वास, आलोकित हों मंगलमय हों, ये धरती आकाश ! (ऋग्वेद)

15. भू-वन्दना

सत्य महत, संकल्प, यज्ञ, तप, ज्ञान, अचल ऋतु, जिस पृथिवी को धारण करते रहते अविरत, भूत और भवितव्य हमारा जिससे अधिकृत, वह धरती दे हमें लोक-हित आंगन विस्तृत । जिसके हैं बहु भाग समुन्नत अवनत, समतल, नहीं मानवों के समूह से बाधित, संकुल, विविध शक्तिमय औषधियों की वृद्धि-विधायक, यह पृथिवी नित रहे हमें स्थिति-मंगलदायक । आश्रित जिस पर सभी सरित-सर-सागर के जल, लहराता है जहां शस्य का शोभन अंचल, जिस पर यह चल प्राणि-जगत् है जीवित, स्पन्दित, वही धरा दे हमें पूर्वजों का श्रेयस् नित । फैलीं चारों ओर दिशाएँ दूर अबाधित, जिस पर होते विविध अन्न कृषियाँ उत्पादित, जो सयत्न करती बहुधा जीवन का पोषण, वही हमारी भूमि शस्य दे औ' दे गोधन । सृष्टि पूर्व जो रही सिन्धु में जलमय तन से, ऋषियों ने की प्राप्त सिद्धि के अक्षय धन से, परम व्योम वह अमर सत्य-तेजस्-आच्छादित जिसका उर है वही धरा दे शक्ति अपरिमित । अप्रमाद, सेवारत्, औ' समभाव निरन्तर- प्रवहमान हैं निशिदिन जलधारायें जिस पर, वह बहु धारावती हमारी धरती प्लावित, दे हमको वर्चस्व और कर दे आप्यायित । मापा करते जिसे दिवाकर - निशिकर - अश्विन, रखकर जिस पर चरण विष्णु कर रहा संचरण । रहित शत्रु, जिसको करता है इन्द्र प्रबलतम, दे हमको वह भूमि पयस्, सुत को माता सम । शोभित जिस पर अचल, हिमाचल, बन सुषमाकर, अक्षत अमर अजेय खड़े हम उस वसुधा पर ! श्यामल गैरिक अखिल रूपमय मधवा-रक्षित, उसी भूमि पर रहें सदा हम सुख से विचरित । जो तुझसे उत्पन्न शक्ति औ' बल का आकर, हमें उसी के बीच प्रतिष्ठित कर दे सत्वर, पूत हमें कर धरापुत्र हम तुझसे लालित, रसदायक पर्जन्य पिता से भी हों पालित । हम सबके हित महत सदन बनकर तू रहती, महत वेग, संचलन महत, कम्पन भी महती ! रहे महत निस्तन्द्र इन्द्र-छाया में ऐसी, स्वर्णधरा तू, पर न हमें देना विद्वेषी । तेरा जो शुभ गन्ध मिला ओषधि, जल कण में, अप्सरियां गन्धर्व जिसे रखते निज तन में, उस सौरभ से गात हमारा तू सुरभित कर, पड़े किसी की द्वेष-दृष्टि जो जननि न हम पर । जिस परिमल से नीलोत्पल के कोष रहें भर, जिसे लगाते अमर, उषा के लग्न-पर्व पर, उसी गन्ध से भूमि ! हमारा कर आलेपन, हो न हमारी ओर किसी का द्वेष भरा मन । नारी में, नर में तेरा जो गन्ध समुज्जवल, वीरों में, मृग-हस्ति-अश्व में जो बनता बल, कन्या में जो कान्ति उसी सौरभ से चर्चित कर दे हमको जननि ! न चाहे कोई अनहित ! भू ही तो पाषाण, शिला, औ' धूलि पटल में, थामे सबको वही अंक अपने निश्चल में! तेरा उर है हमें राशि सोने की अभिमत, देते हैं हे भूमि तुझे हम आज नयन शत ! तेरे पावस औ' निदाघ तेरे मधु - पतझर, तुझ पर रहतीं शरद, शिशिर सब, ऋतुयें निर्भर, तुझसे होते सदा दिवस औ' रजनी निर्मित, ओ पृथिवी यह रहें हमारे ही सुख के हित । जिसके उर पर विविध वनस्पतियां औ' तरुवर, पाते ही रहते विकास ध्रुव और निरन्तर । धरा हुई जो धारण करके यह जग सारा, उसका वन्दन आज कर रहा गान हमारा । (अथर्ववेद)

16. अबला

आता है अब ध्यान कभी हम भी थीं देवी । उन्नति गौरव रहे हमारे ही पद सेवी ।। अधिकृत हमसे हुई शक्तियां सारी दैवी । पाती थीं हम मान बनी वसुधा की देवी ।। शोभित हमसे हुई भूमि भारत की पावन । सुरभित हमसे हुआ प्रकृति उद्यान सुहावन ।। नलिनी सम हम रहीं विश्व-सर बीच लुभावन । मंडित हमने किया मातृ का सुंदर आनन ।। विद्या विद्याधरी सुगुण मंडित कमला सी । दुर्गासिंहारूढ़ वीर जननी विदुला सी ।। सीता सी पतिव्रता प्रेम प्रतिमा विमला सी । थी हम ही में हुयी सुभारत कीर्ति कला सी ।। आज हमारी दशा हुई हा ! अनवत दीना । क्षमता समता गई हुईं हम गौरव हीना ।। कीर्ति कौमुदी हुई राहु से ग्रसित मलीना । जीवन का आदर्श दैव निष्ठुर ने छीना ।। ज्ञान तजा अज्ञान हृदय में आन बसाया । अपना पहिला स्वत्व और कर्तव्य भुलाया ।। पहिला स्वर्गिक प्रेम नेम हमने बिसराया । निष्प्रभ जीवन हुआ मान-सम्मान गंवाया ।। क्या है अपनी दीन-हीन अवनति का कारण । क्यों हमने कर लिया कलेवर उलटा धारण ।। क्यों अब करती नहीं सत्य पर जीवन वारण । सोचो तो हे बंधु देश के कष्ट निवारण ।। शेष न गौरव रहा न पहिले सी समता है । शुष्क हुआ वह सुमन न पहिली कोमलता है ।। रत्न हो गया काँच न वैसी मंजुलता है । समझो इसका हेतु बंधु तव निर्दयता है ।। प्यासे मृग के हेतु लखो मृगतृष्णा जैसी । अगम सिंधु के बीच भीत बालू की जैसी ।। राज्य-भोग की प्राप्ति स्वप्न में सुखकर जैसी । बिना हमारा साथ देश की उन्नति वैसी ।। आओ निद्रा छोड़ ज्ञान के नेत्र उघारें । अपना-अपना आज सत्य कर्तव्य विचारें ।। परिवर्तित हो स्वयं देश का कष्ट निवारें । सत्यव्रती बन मातृ-भूमि पर लोचन वारें ।। दिखला देवें आज हमीं सुखदा कमला हैं । निश्छल महिमा-मूर्ति सत्य-प्रतिमा सरला हैं ।। जीवन पथ पर स्थिर सभी विधि हम सबला हैं । धर्म-भीरुता हेतु बनी केवल अबला हैं ।। ('चाँद', जनवरी, 1923 ई.)

17. विधवा

क्यों व्याकुल हो विरहाकुल हो, शोकाकुल हो प्यारी भगिनी । संतापित हो अविकासित हो, सर भारत की न्यारी नलिनी ।। आश नहीं अभिलाष नहीं, नि:सार तुम्हारे जीवन में । क्यों तोष नहीं परितोष नहीं, निर्दोष दुखारे जीवन में ।। पावनता की पूर्ति अहो, मृतप्राय हुई वैधव्य हनी । करुणोत्पादक मूर्ति लखो, अति दीन हुई दुखरूप बनी ।। हा हन्त हुई यह दीन दशा, फिर स्वार्थ दली दुर्दैव छली । नव कोमल जीवन की कलिका, हा सूख चली बिन पूर्ण-खिली ।। अंबर तन जीर्ण मलीन खुले, कच रुक्ष हुए श्रृंगार नहीं । मधुराधर पै मुस्कान नहीं, उर में आशा संचार नहीं ।। ............................................................... दीन हुई श्रीहीन हुई, मझधार वही भवसागर में । आधार गया सुखसार गया, और आश रही करुणाकर में ।। देशबंधु यदि नहीं कभी तुम, इनकी ओर निहारोगे । दैव पीड़िता विधवायों का, दारुण कष्ट निवारोगे ।। पाप मूर्ति बन जाएँगी, हैं जो पावनता-पूर्ति अभी । तुम भी होगे हीन, नहीं पावोगे उन्नति कीर्ति कभी ।। ('चाँद', जनवरी, 1923 ई.)

18. मधुर मधु-सौरभ जगत् को

मधुर मधु-सौरभ जगत् को स्वप्न में बेसुध बनाता वात विहगों के विपिन के गीत आता गुनगुनाता ! मैं पथिक हूँ श्रांत, कोई पथ प्रदर्शक भी न मेरा ! चाहता अब प्राण अलसित शून्य में लेना बसेरा ! (जापानी कवि योनेजिरो नोगुचि की कविता का अनुवाद) (चाँद-1937 ई.)

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