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लावा जावेद अख़्तर
Lava Javed Akhtar
ज़बान
जिधर जाते हैं सब, जाना उधर अच्छा नहीं लगता
कभी-कभी मैं ये सोचता हूँ कि मुझको तेरी तलाश क्यों है
ये खेल क्या है
कल जहाँ दीवार थी, है आज इक दर देखिए
हमने ढूँढे भी तो ढूँढे हैं सहारे कैसे
आँसू
यक़ीन का अगर कोई भी सिलसिला नहीं रहा
बज़ाहिर क्या है जो हासिल नहीं है
कायनात
जीना मुश्किल है कि आसान ज़रा देख तो लो
तू किसी पे जाँ को निसार कर दे
एतेराफ़
मिसाल इसकी कहाँ है कोई ज़माने में
यही हालात इब्तेदा से रहे
ख़ुदा हाफ़ज़
जब आइना कोई देखो इक अजनबी देखो
सारी हैरत है मिरी सारी अदा उसकी है
परस्तार
निगल गए सब की सब समुंदर
दर्द अपनाता है पराए कौन
अजीब क़िस्सा है
शुक्र है ख़ैरियत से हूँ साहब
खुला है दर प तिरा इंतेज़ार जाता रहा
दश्ते-जुनूँ वीरानियाँ, क़ह्ते-सुकूँ हैरानियाँ
दिल
जाने किसकी तलाश उनकी आँखों में थी
बरसों की रस्मो-राह थी इक रोज़ उसने तोड़ दी
प्यास की कैसे लाए ताब कोई
बरगद
शबाना
दस्तबरदार अगर आप ग़ज़ब से हो जाएं
मैं कब से कितना हूँ तन्हा तुझे पता भी नहीं
गलियाँ
घर में बैठे हुए क्या लिखते हो
दिल का हर दर्द खो गया जैसे
अभी ज़मीर में थोड़ी-सी जान बाक़ी है
ये मुझसे पूछते हैं चारागर क्यों
ज़िंदगी की आँधी में ज़हन का शजर तन्हा
वो ज़माना गुज़र गया कब का
ये दुनिया तुमको रास आए तो कहना
बरवक़्त एक और ख़याल
अजीब आदमी था वो
आज मैंने अपना फिर सौदा किया
मेले
मोनताज
किसलिए कीजे बज़्म-आराई
न ख़ुशी दे तो कुछ दिलासा दे
पन्द्रह अगस्त
मैं ख़ुद भी कब ये कहता हूँ कोई सबब नहीं
हमसाये के नाम
हमारे दिल में अब तल्ख़ी नहीं है
याद उसे भी एक अधूरा अफ़साना तो होगा
दर्द कुछ दिन तो मेह्माँ ठहरे
पेड़ से लिपटी बेल