हिम तरंगिणी : माखनलाल चतुर्वेदी
Him Tarangini Makhanlal Chaturvedi
जो न बन पाई तुम्हारे
तुम मन्द चलो
खोने को पाने आये हो
जागना अपराध
यह किसका मन डोला
चलो छिया-छी हो अन्तर में
गो-गण सँभाले नहीं जाते मतवाले नाथ
सूझ का साथी
सुनकर तुम्हारी चीज हूँ
वे तुम्हारे बोल
धमनी से मिस धड़कन की
भाई, छेड़ो नही, मुझे
उड़ने दे घनश्याम गगन में
जिस ओर देखूँ बस
जब तुमने यह धर्म पठाया
बोल तो किसके लिए मैं
बोल राजा, बोल मेरे
बोल राजा, स्वर अटूटे
उस प्रभात, तू बात न माने
ऊषा के सँग, पहिन अरुणिमा
मन धक-धक की माला गूँथे
चल पडी चुपचाप सन-सन-सन हुआ
नाद की प्यालियों, मोद की ले सुरा
सुलझन की उलझन है
कौन? याद की प्याली में
हरा हरा कर, हरा
दूर न रह, धुन बँधने दे
मत झनकार जोर से
जहाँ से जो ख़ुद को
माधव दिवाने हाव-भाव
तुम्हीं क्या समदर्शी भगवान
उठ अब, ऐ मेरे महाप्राण
मधुर-मधुर कुछ गा दो मालिक
आज नयन के बँगले में
मार डालना किन्तु क्षेत्र में
महलों पर कुटियों को वारो
मैंने देखा था, कलिका के
यह अमर निशानी किसकी है?
सजल गान, सजल तान
यह चरण ध्वनि धीमे-धीमे
आते-आते रह जाते हो
दुर्गम हृदयारण्य दण्ड का
हे प्रशान्त, तूफान हिये
अपना आप हिसाब लगाया
आ मेरी आंखों की पुतली
वह टूटा जी, जैसा तारा
कैसे मानूँ तुम्हें प्राणधन
मचल मत, दूर-दूर, ओ मानी
मैं नहीं बोला, कि वे बोला किये
पुतलियों में कौन
हाँ, याद तुम्हारी आती थी
अपनी जुबान खोलो तो
तुही है बहकते हुओं का इशारा
गुनों की पहुँच के
पत्थर के फर्श, कगारों में