ग़ज़लें बृज नारायण चकबस्त
Ghazals in Hindi Brij Narayan Chakbast
1. अगर दर्द-ए-मोहब्बत से न इंसाँ आश्ना होता
अगर दर्द-ए-मोहब्बत से न इंसाँ आश्ना होता
न कुछ मरने का ग़म होता न जीने का मज़ा होता
बहार-ए-गुल में दीवानों का सहरा में परा होता
जिधर उठती नज़र कोसों तलक जंगल हरा होता
मय-ए-गुल-रंग लुटती यूँ दर-ए-मय-ख़ाना वा होता
न पीने की कमी होती न साक़ी से गिला होता
हज़ारों जान देते हैं बुतों की बेवफ़ाई पर
अगर उन में से कोई बा-वफ़ा होता तो क्या होता
रुलाया अहल-ए-महफ़िल को निगाह-ए-यास ने मेरी
क़यामत थी जो इक क़तरा इन आँखों से जुदा होता
ख़ुदा को भूल कर इंसान के दिल का ये आलम है
ये आईना अगर सूरत-नुमा होता तो क्या होता
अगर दम भर भी मिट जाती ख़लिश ख़ार-ए-तमन्ना की
दिल-ए-हसरत-तलब को अपनी हस्ती से गिला होता
2. उन्हें ये फ़िक्र है हर दम नई तर्ज़-ए-जफ़ा क्या है
उन्हें ये फ़िक्र है हर दम नई तर्ज़-ए-जफ़ा क्या है
हमें ये शौक़ है देखें सितम की इंतिहा क्या है
(पाठांतर)
उसे यह फ़िक्र है हरदम, नया तर्जे-जफ़ा क्या है?
हमें यह शौक देखें, सितम की इंतहा क्या है?
गुनह-गारों में शामिल हैं गुनाहों से नहीं वाक़िफ़
सज़ा को जानते हैं हम ख़ुदा जाने ख़ता क्या है
ये रंग-ए-बे-कसी रंग-ए-जुनूँ बन जाएगा ग़ाफ़िल
समझ ले यास-ओ-हिरमाँ के मरज़ की इंतिहा क्या है
नया बिस्मिल हूँ मैं वाक़िफ़ नहीं रस्म-ए-शहादत से
बता दे तू ही ऐ ज़ालिम तड़पने की अदा क्या है
चमकता है शहीदों का लहू पर्दे में क़ुदरत के
शफ़क़ का हुस्न क्या है शोख़ी-ए-रंग-ए-हिना क्या है
उमीदें मिल गईं मिट्टी में दौर-ए-ज़ब्त-ए-आख़िर है
सदा-ए-ग़ैब बतला दे हमें हुक्म-ए-ख़ुदा क्या है
3. कभी था नाज़ ज़माने को अपने हिन्द पे भी
कभी था नाज़ ज़माने को अपने हिन्द पे भी
पर अब उरूज वो इल्म-ओ-कमाल-ओ-फ़न में नहीं
रगों में ख़ूँ है वही दिल वही जिगर है वही
वही ज़बाँ है मगर वो असर सुख़न में नहीं
वही है बज़्म वही शम्अ' है वही फ़ानूस
फ़िदा-ए-बज़्म वो परवाने अंजुमन में नहीं
वही हवा वही कोयल वही पपीहा है
वही चमन है प वो बाग़बाँ चमन में नहीं
ग़ुरूर-ए-जेहल ने हिन्दोस्ताँ को लूट लिया
ब-जुज़ निफ़ाक़ के अब ख़ाक भी वतन में नहीं
4. कुछ ऐसा पास-ए-ग़ैरत उठ गया इस अहद-ए-पुर-फ़न में
कुछ ऐसा पास-ए-ग़ैरत उठ गया इस अहद-ए-पुर-फ़न में
कि ज़ेवर हो गया तौक़-ए-ग़ुलामी अपनी गर्दन में
शजर सकते में हैं ख़ामोश हैं बुलबुल नशेमन में
सिधारा क़ाफ़िला फूलों का सन्नाटा है गुलशन में
गराँ थी धूप और शबनम भी जिन पौदों को गुलशन में
तिरी क़ुदरत से वो फूले-फले सहरा के दामन में
हवा-ए-ताज़ा दिल को ख़ुद-बख़ुद बेचैन करती है
क़फ़स में कह गया कोई बहार आई है गुलशन में
मिटाना था उसे भी जज़्बा-ए-शौक़-ए-फ़ना तुझ को
निशान-ए-क़ब्र-ए-मजनूँ दाग़ है सहरा के दामन में
ज़माना में नहीं अहल-ए-हुनर का क़दर-दाँ बाक़ी
नहीं तो सैकड़ों मोती हैं इस दरिया के दामन में
यहाँ तस्बीह का हल्क़ा वहाँ ज़ुन्नार का फंदा
असीरी लाज़मी है मज़हब-ए-शैख़-ओ-बरहमन में
जिन्हें सींचा था ख़ून-ए-दिल से अगले बाग़बानों ने
तरसते अब हैं पानी को वो पौदे मेरे गुलशन में
दिखाया मो'जिज़ा हुस्न-ए-बशर का दस्त-ए-क़ुदरत ने
भरी तासीर तस्वीर-ए-गिली के रंग-ओ-रोग़न में
शहीद-ए-यास हूँ रुस्वा हूँ नाकामी के हाथों से
जिगर का चाक बढ़ कर आ गया है मेरे दामन में
जहाँ में रह के यूँ क़ाएम हूँ अपनी बे-सबाती पर
कि जैसे अक्स-ए-गुल रहता है आब-ए-जू-ए-गुलशन में
शराब-ए-हुस्न को कुछ और ही तासीर देता है
जवानी के नुमू से बे-ख़बर होना लड़कपन में
शबाब आया है पैदा रंग है रुख़्सार-ए-नाज़ुक से
फ़रोग़-ए-हुस्न कहता है सहर होती है गुलशन में
नहीं होता है मुहताज-ए-नुमाइश फ़ैज़ शबनम का
अँधेरी रात में मोती लुटा जाती है गुलशन में
मता-ए-दर्द-ए-दिल इक दौलत-ए-बेदार है मुझ को
दुर-ए-शहवार हैं अश्क-ए-मोहब्बत मेरे दामन में
न बतलाई किसी ने भी हक़ीक़त राज़-ए-हस्ती की
बुतों से जा के सर फोड़ा बहुत दैर-ए-बरहमन में
पुरानी काविशें दैर-ओ-हरम की मिटती जाती है
नई तहज़ीब के झगड़े हैं अब शैख़-ओ-बरहमन में
उड़ा कर ले गई बाद-ए-ख़िज़ाँ इस साल उस को भी
रहा था एक बर्ग-ए-ज़र्द बाक़ी मेरे गुलशन में
वतन की ख़ाक से मर कर भी हम को उन्स बाक़ी है
मज़ा दामान-ए-मादर का है इस मिट्टी के दामन में
5. ज़बाँ को बंद करें या मुझे असीर करें
ज़बाँ को बंद करें या मुझे असीर करें
मिरे ख़याल को बेड़ी पिन्हा नहीं सकते
ये कैसी बज़्म है और कैसे उस के साक़ी हैं
शराब हाथ में है और पिला नहीं सकते
ये बेकसी भी अजब बेकसी है दुनिया में
कोई सताए हमें हम सता नहीं सकते
कशिश वफ़ा की उन्हें खींच लाई आख़िर-कार
ये था रक़ीब को दा'वा वो आ नहीं सकते
जो तू कहे तो शिकायत का ज़िक्र कम कर दें
मगर यक़ीं तिरे वा'दों पे ला नहीं सकते
चराग़ क़ौम का रौशन है अर्श पर दिल के
उसे हवा के फ़रिश्ते बुझा नहीं सकते
6. दर्द-ए-दिल पास-ए-वफ़ा जज़्बा-ए-ईमाँ होना
दर्द-ए-दिल पास-ए-वफ़ा जज़्बा-ए-ईमाँ होना
आदमियत है यही और यही इंसाँ होना
नौ-गिरफ़्तार-ए-बला तर्ज़-ए-वफ़ा क्या जानें
कोई ना-शाद सिखा दे उन्हें नालाँ होना
रोके दुनिया में है यूँ तर्क-ए-हवस की कोशिश
जिस तरह अपने ही साए से गुरेज़ाँ होना
ज़िंदगी क्या है अनासिर में ज़ुहूर-ए-तरतीब
मौत क्या है इन्हीं अज्ज़ा का परेशाँ होना
हम को मंज़ूर है ऐ दीदा-ए-वहदत-आगीं
एक ग़ुंचे में तमाशा-ए-गुलिस्ताँ होना
जिस तरह ख़ुम किसी जाम का टुकड़ा निकले
यूँही गर्दूं से मह-ए-नौ का नुमायाँ होना
सर में सौदा न रहा पाँव बेड़ी न रही
मेरी तक़दीर में था बे-सर-ओ-सामाँ होना
सफ़्हा-ए-दहर में मोहर-ए-यद-ए-क़ुदरत समझो
फूल का ख़ाक के तूदे से नुमायाँ होना
हो बयाज़-ए-सहर-ए-नूर पे दिल क्या माइल
याद है दफ़्तर-ए-अंजुम का परेशाँ होना
कल भी वो कल जो है फ़र्दा-ए-क़यामत ज़ाहिद
और फिर उस के लिए आज परेशाँ होना
पाँव ज़ंजीर के मुश्ताक़ हैं ऐ जोश-ए-जुनूँ
है मगर शर्त तिरा सिलसिला-जुम्बाँ होना
दफ़्तर-ए-हुस्न पे मोहर-ए-यद-ए-क़ुदरत समझो
फूल का ख़ाक के तोदे से नुमायाँ होना
दिल असीरी में भी आज़ाद है आज़ादों का
वलवलों के लिए मुमकिन नहीं ज़िंदाँ होना
गुल को पामाल न कर लाल-ओ-गुहर के मालिक
है उसे तुर्रा-ए-दस्तार-ए-ग़रीबाँ होना
है मिरा ज़ब्त-ए-जुनूँ जोश-ए-जुनूँ से बढ़ कर
नंग है मेरे लिए चाक-गरेबाँ होना
क़ैद यूसुफ़ को ज़ुलेख़ा ने किया कुछ न किया
दिल-ए-यूसुफ़ के लिए शर्त था ज़िंदाँ होना
7. दिल किए तस्ख़ीर बख़्शा फ़ैज़-ए-रूहानी मुझे
दिल किए तस्ख़ीर बख़्शा फ़ैज़-ए-रूहानी मुझे
हुब्ब-ए-क़ौमी हो गया नक़्श-ए-सुलैमानी मुझे
मंज़िल-ए-इबरत है दुनिया अहल-ए-दुनिया शाद हैं
ऐसी दिल-जमई से होती है परेशानी मुझे
जाँचता हूँ वुसअत-ए-दिल हमला-ए-ग़म के लिए
इम्तिहाँ है रंज-ओ-हिरमाँ की फ़रावानी मुझे
हक़-परस्ती की जो मैं ने बुत-परस्ती छोड़ कर
बरहमन कहने लगे इल्हाद का बानी मुझे
कुल्फ़त-ए-दुनिया मिटे भी तो सख़ी के फ़ैज़ से
हाथ धोने को मिले बहता हुआ पानी मुझे
ख़ुद-परस्ती मिट गई क़द्र-ए-मोहब्बत बढ़ गई
मातम-ए-अहबाब है तालीम-ए-रूहानी मुझे
क़ौम का ग़म मोल ले कर दिल का ये आलम हुआ
याद भी आती नहीं अपनी परेशानी मुझे
ज़र्रा ज़र्रा है मिरे कश्मीर का मेहमाँ-नवाज़
राह में पत्थर के टुकड़ों ने दिया पानी मुझे
लखनऊ में फिर हुई आरास्ता बज़्म-ए-सुख़न
बाद मुद्दत फिर हुआ ज़ौक़-ए-ग़ज़ल-ख़्वानी मुझे
8. नए झगड़े निराली काविशें ईजाद करते हैं
नए झगड़े निराली काविशें ईजाद करते हैं
वतन की आबरू अहल-ए-वतन बरबाद करते हैं
हवा में उड़ के सैर-ए-आलम-ए-ईजाद करते हैं
फ़रिश्ते दंग हैं वो काम आदम-ज़ाद करते हैं
नया मस्लक नया रंग-ए-सुख़न ईजाद करते हैं
उरूस-ए-शेर को हम क़ैद से आज़ाद करते हैं
मता-ए-पास-ए-ग़ैरत बुल-हवस बरबाद करते हैं
लब-ए-ख़ामोश को शर्मिंदा-ए-फ़र्याद करते हैं
हवा-ए-ताज़ा पा कर बोस्ताँ को याद करते हैं
असीरान-ए-क़फ़स वक़्त-ए-सहर फ़रियाद करते हैं
ज़रा ऐ कुंज-ए-मरक़द याद रखना उस हमिय्यत को
कि घर वीरान कर के हम तुझे आबाद करते हैं
हर इक ख़िश्त-ए-कुहन अफ़्साना-ए-देरीना कहती है
ज़बान-ए-हाल से टूटे खंडर फ़रियाद करते हैं
बला-ए-जाँ हैं ये तस्बीह और ज़ुन्नार के फंदे
दिल-ए-हक़-बीं को हम इस क़ैद से आज़ाद करते हैं
अज़ाँ देते हैं बुत-ख़ाने में जा कर शान-ए-मोमिन से
हरम के नारा-ए-नाक़ूस हम ईजाद करते हैं
निकल कर अपने क़ालिब से नया क़ालिब बसाएगी
असीरी के लिए हम रूह को आज़ाद करते हैं
मोहब्बत के चमन में मजमा-ए-अहबाब रहता है
नई जन्नत इसी दुनिया में हम आबाद करते हैं
नहीं घटती मिरी आँखों में तारीकी शब-ए-ग़म की
ये तारे रौशनी अपनी अबस बरबाद करते हैं
थके-माँदे मुसाफ़िर ज़ुल्मत-ए-शाम-ए-ग़रीबाँ में
बहार-ए-जल्वा-ए-सुब्ह-ए-वतन को याद करते हैं
दिल-ए-नाशाद रोता है ज़बाँ उफ़ कर नहीं सकती
कोई सुनता नहीं यूँ बे-नवा फ़रियाद करते हैं
जनाब-ए-शैख़ को ये मश्क़ है याद-ए-इलाही की
ख़बर होती नहीं दिल को ज़बाँ से याद करते हैं
नज़र आती है दुनिया इक इबादत-गाह-ए-नूरानी
सहर का वक़्त है बंदे ख़ुदा को याद करते हैं
सबक़ उम्र-ए-रवाँ का दिल-नशीं होने नहीं पाता
हमेशा भूलते जाते हैं जो कुछ याद करते हैं
ज़माने का मोअल्लिम इम्तिहाँ उन का नहीं करता
जो आँखें खोल कर ये दर्स-ए-हस्ती याद करते हैं
अदब ता'लीम का जौहर है ज़ेवर है जवानी का
वही शागिर्द हैं जो ख़िदमत-ए-उस्ताद करते हैं
न जानी क़द्र तेरी उम्र-ए-रफ़्ता हम ने कॉलेज में
निकल आते हैं आँसू अब तुझे जब याद करते हैं
9. न कोई दोस्त दुश्मन हो शरीक-ए-दर्द-ओ-ग़म मेरा
न कोई दोस्त दुश्मन हो शरीक-ए-दर्द-ओ-ग़म मेरा
सलामत मेरी गर्दन पर रहे बार-ए-अलम मेरा
लिखा ये दावर-ए-महशर ने मेरी फ़र्द-ए-इसयाँ पर
ये वो बंदा है जिस पर नाज़ करता है करम मेरा
कहा ग़ुंचा ने हँस कर वाह क्या नैरंग-ए-आलम है
वजूद गुल जिसे समझे हैं सब है वो अदम मेरा
कशाकश है उम्मीद-ओ-यास की ये ज़िंदगी क्या है
इलाही ऐसी हस्ती से तो अच्छा था अदम मेरा
दिल-ए-अहबाब में घर है शगुफ़्ता रहती है ख़ातिर
यही जन्नत है मेरी और यही बाग़-ए-इरम मेरा
मुझे अहबाब की पुर्सिश की ग़ैरत मार डालेगी
क़यामत है अगर इफ़शा हुआ राज़-ए-अलम मेरा
खड़ी थीं रास्ता रोके हुए लाखों तमन्नाएँ
शहीद-ए-यास हूँ निकला है किस मुश्किल से दम मेरा
ख़ुदा ने इल्म बख़्शा है अदब अहबाब करते हैं
यही दौलत है मेरी और यही जाह-ओ-हशम मेरा
ज़बान-ए-हाल से ये लखनऊ की ख़ाक कहती है
मिटाया गर्दिश-ए-अफ़्लाक ने जाह-ओ-हशम मेरा
किया है फ़ाश पर्दा कुफ़्र-ओ-दीं का इस क़दर मैं ने
कि दुश्मन है बरहमन और अदू शैख़-ए-हरम मेरा
10. फ़ना का होश आना ज़िंदगी का दर्द-ए-सर जाना
फ़ना का होश आना ज़िंदगी का दर्द-ए-सर जाना
अजल क्या है ख़ुमार-ए-बादा-ए-हस्ती उतर जाना
अज़ीज़ान-ए-वतन को ग़ुंचा ओ बर्ग ओ समर जाना
ख़ुदा को बाग़बाँ और क़ौम को हम ने शजर जाना
उरूस-ए-जाँ नया पैराहन-ए-हस्ती बदलती है
फ़क़त तम्हीद आने की है दुनिया से गुज़र जाना
मुसीबत में बशर के जौहर-ए-मर्दाना खुलते हैं
मुबारक बुज़दिलों को गर्दिश-ए-क़िस्मत से डर जाना
वो तब्-ए-यास-परवर ने मुझे चश्म-ए-अक़ीदत दी
कि शाम-ए-ग़म की तारीकी को भी नूर-ए-सहर जाना
बहुत सौदा रहा वाइज़ तुझे नार-ए-जहन्नम का
मज़ा सोज़-ए-मोहब्बत का भी कुछ ऐ बे-ख़बर जाना
करिश्मा ये भी है ऐ बे-ख़बर इफ़्लास-ए-क़ौमी का
तलाश-ए-रिज़्क़ में अहल-ए-हुनर का दर-ब-दर जाना
अजल की नींद में भी ख़्वाब-ए-हस्ती गर नज़र आया
तो फिर बेकार है तंग आ के इस दुनिया से मर जाना
वो सौदा ज़िंदगी का है कि ग़म इंसान सहता है
नहीं तो है बहुत आसान इस जीने से मर जाना
चमन-ज़ार-ए-मोहब्ब्बत में उसी ने बाग़बानी की
कि जिस ने अपनी मेहनत को ही मेहनत का समर जाना
सिधारी मंज़िल-ए-हस्ती से कुछ बे-ए'तिनाई से
तन-ए-ख़ाकी को शायद रूह ने गर्द-ए-सफ़र जाना
11. फ़ना नहीं है मुहब्बत के रंगो बू के लिए
फ़ना नहीं है मुहब्बत के रंगो बू के लिए
बहार आलमे-फ़ानी रहे रहे न रहे ।
जुनूने हुब्बे वतन का मज़ा शबाब में है
लहू में फिर ये रवानी रहे रहे न रहे ।
रहेगी आबो-हवा में ख़याल की बिजली
ये मुश्ते-ख़ाक है फ़ानी रहे रहे न रहे ।
जो दिल में ज़ख़्म लगे हैं वो ख़ुद पुकारेंगे
ज़बाँ की सैफ़ बयानी रहे रहे न रहे ।
मिटा रहा है ज़माना वतन के मन्दिर को
ये मर मिटों की निशानी रहे रहे न रहे ।
दिलों में आग लगे ये वफ़ा का जौहर है
ये जमाँ ख़र्च ज़बानी रहे रहे न रहे ।
जो माँगना हो अभी माँग लो वतन के लिए
ये आरज़ू की जवानी रहे रहे न रहे ।
(फ़ना=मृत्यु, आलमे-फ़ानी=नाशवान संसार,
जुनूने हुब्बे वतन=स्वदेश प्रेम का उन्माद,
शबाब=जवानी, आबो-हवा=जलवायु,
मुश्ते-ख़ाक=मुट्ठी भर मिट्टी, सैफ-बयानी=तेजी)
)
12. मिटने वालों को वफ़ा का यह सबक याद रहे
मिटने वालों को वफ़ा का यह सबक याद रहे,
बेड़ियां पांवों में हों और दिल आज़ाद रहे।
एक साग़र भी इनायत न हुआ याद रहे,
साक़िया जाते हैं, महफ़िल तेरी आबाद रहे।
आप का हम से हुया था कभी समाने वफ़ा,
जालम मगर वो हुया था भी घड़ी याद रहे।
बाग में ले के जनम हम ने असीरी झेली,
हम से अच्छे रहे जंगल में जो आज़ाद रहे।
मुझ को मिल जाए चहकने के लिए शाख़ मेरी,
कौन कहता है कि गुलशन में न सय्याद रहे।
हुकम माली का है यह फूल न खिलने पाएं,
चुप रहे बाग में कोयल अगर आज़ाद रहे।
बाग़बाँ दिल से वतन को ये दुआ देता है,
मैं रहूँ या न रहूँ ये चमन आबाद रहे।
13. मिरी बे-ख़ुदी है वो बे-ख़ुदी कि ख़ुदी का वहम-ओ-गुमाँ नहीं
मिरी बे-ख़ुदी है वो बे-ख़ुदी कि ख़ुदी का वहम-ओ-गुमाँ नहीं
ये सुरूर-ए-साग़र-ए-मय नहीं ये ख़ुमार-ए-ख़्वाब-ए-गिराँ नहीं
जो ज़ुहूर-ए-आलम-ए-ज़ात है ये फ़क़त हुजूम-ए-सिफ़ात है
है जहाँ का और वजूद क्या जो तिलिस्म-ए-वहम-ओ-गुमाँ नहीं
ये हयात आलम-ए-ख़्वाब है न गुनाह है न सवाब है
वही कुफ़्र-ओ-दीं में ख़राब है जिसे इल्म-ए-राज़-ए-जहाँ नहीं
न वो ख़ुम में बादे का जोश है न वो हुस्न जल्वा-फ़रोश है
न किसी को रात का होश है वो सहर कि शब का गुमाँ नहीं
वो ज़मीं पे जिन का था दबदबा कि बुलंद अर्श पे नाम था
उन्हें यूँ फ़लक ने मिटा दिया कि मज़ार तक का निशाँ नहीं
14. हम सोचते हैं रात में तारों को देख कर
हम सोचते हैं रात में तारों को देख कर
शमएँ ज़मीन की हैं जो दाग़ आसमाँ के हैं
जन्नत में ख़ाक बादा-परस्तों का दिल लगे
नक़्शे नज़र में सोहबत पीर-ए-मुग़ाँ के हैं
अपना मक़ाम शाख़-ए-बुरीदा है बाग़ में
गुल हैं मगर सताए हुए बाग़बाँ के हैं
इक सिलसिला हवस का है इंसाँ की ज़िंदगी
इस एक मुश्त-ए-ख़ाक को ग़म दो-जहाँ के हैं
15. जहाँ में आँख जो खोली फ़ना को भूल गये
जहाँ में आँख जो खोली फ़ना को भूल गये
कुछ इब्तदा ही में हम इन्तहा को भूल गये
निफ़ाक़ गब्रो-मुसलमां का यूँ मिटा आखिर
ये बुत को भूल गए वो खुदा को भूल गये
ज़मीं लरज़ती है बहते हैं ख़ून के दरिया
ख़ुदी के जोश में बन्दे खुदा को भूल गये
( फ़ना=मौत, इब्तदा=शुरुआत, इन्तहा=अंत,
निफ़ाक़=दुश्मनी, गब्रो-मुसलमां=
हिन्दू-मुसलमान)