एकांत-संगीत : हरिवंशराय बच्चन
Ekant Sangeet : Harivansh Rai Bachchan
1. एकांत संगीत (कविता)
तट पर है तरुवर एकाकी,
नौका है, सागर में,
अंतरिक्ष में खग एकाकी,
तारा है, अंबर में,
भू पर वन, वारिधि पर बेड़े,
नभ में उडु खग मेला,
नर नारी से भरे जगत में
कवि का हृदय अकेला!
2. अब मत मेरा निर्माण करो
अब मत मेरा निर्माण करो!
तुमने न बना मुझको पाया,
युग-युग बीते, मैं न घबराया;
भूलो मेरी विह्वलता को, निज लज्जा का तो ध्यान करो!
अब मत मेरा निर्माण करो!
इस चक्की पर खाते चक्कर
मेरा तन-मन-जीवन जर्जर,
हे कुंभकार, मेरी मिट्टी को और न अब हैरान करो!
अब मत मेरा निर्माण करो!
कहने की सीमा होती है,
सहने की सीमा होती है;
कुछ मेरे भी वश में, मेरा कुछ सोच-समझ अपमान करो!
अब मत मेरा निर्माण करो!
3. मेरे उर पर पत्थर धर दो
मेरे उर पर पत्थर धर दो!
जीवन की नौका का प्रिय धन
लुटा हुआ मणि-मुक्ता-कंचन
तो न मिलेगा, किसी वस्तु से इन खाली जगहों को भर दो!
मेरे उर पर पत्थर धर दो!
मंद पवन के मंद झकोरे,
लघु-लघु लहरों के हलकोरे
आज मुझे विचलित करते हैं, हल्का हूँ, कुछ भारी कर दो!
मेरे उर पर पत्थर धर दो!
पर क्यों मुझको व्यर्थ चलाओ?
पर क्यों मुझको व्यर्थ बहाओ?
क्यों मुझसे यह भार ढुलाओ? क्यों न मुझे जल में लय कर दो!
मेरे उर पर पत्थर धर दो!
4. मूल्य दे सुख के क्षणों का
मूल्य दे सुख के क्षणों का!
एक पल स्वच्छंद होकर
तू चला जल, थल, गगन पर,
हाय! आवाहन वही था विश्व के चिर बंधनों का!
मूल्य दे सुख के क्षणों का!
पा निशा की स्वप्न छाया
एक तूने गीत गाया,
हाय! तूने रुद्ध खोला द्वार शत-शत क्रंदनों का!
मूल्य दे सुख के क्षणों का!
आँसुओं से ब्याज भरते
अनवरत लोचन सिहरते,
हाय! कितना बढ़ गया ॠण होंठ के दो मधुकणों का!
मूल्य दे सुख के क्षणों का!
5. कोई गाता, मैं सो जाता
कोई गाता, मैं सो जाता!
संसृति के विस्तृत सागर पर
सपनों की नौका के अंदर
सुख-दुख की लहरों पर उठ-गिर बहता जाता मैं सो जाता!
कोई गाता मैं सो जाता!
आँखों में भरकर प्यार अमर,
आशीष हथेली में भरकर
कोई मेरा सिर गोदी में रख सहलाता, मैं सो जाता!
कोई गाता मैं सो जाता!
मेरे जीवन का खारा जल,
मेरे जीवन का हालाहल
कोई अपने स्वर में मधुमय कर बरसाता, मैं सो जाता!
कोई गाता मैं सो जाता!
6. मेरा तन भूखा, मन भूखा
मेरा तन भूखा, मन भूखा!
इच्छा, सब सत्यों का दर्शन,
सपने भी छोड़ गये लोचन!
मेरे अपलक युग नयनों में मेरा चंचल यौवन भूखा!
मेरा तन भूखा, मन भूखा!
इच्छा, सब जग का आलिंगन,
रूठा मुझसे जग का कण-कण!
मेरी फैली युग बाहों में मेरा सारा जीवन भूखा!
मेरा तन भूखा, मन भूखा!
आँखें खोले अगणित उडुगण,
फैला है सीमाहीन गगन!
मानव की अमिट विभुक्षा में क्या अग-जग का कारण भूखा?
मेरा तन भूखा, मन भूखा!
7. व्यर्थ गया क्या जीवन मेरा
व्यर्थ गया क्या जीवन मेरा?
प्यासी आँखें, भूखी बाँहें,
अंग-अंग की अगणित चाहें;
और काल के गाल समाता जाता है प्रति क्षण तन मेरा!
व्यर्थ गया क्या जीवन मेरा?
आशाओं का बाग लगा है,
कलि-कुसुमों का भाग जगा है;
पीले पत्तों-सा मुर्झाया जाता है प्रति पल मन मेरा!
व्यर्थ गया क्या जीवन मेरा?
क्या न किसी के मन को भाया,
दिल न किसी का बहला पाया?
क्या मेरे उर के अंदर ही गूँज मिटा उर क्रंदन मेरा?
व्यर्थ गया क्या जीवन मेरा?
8. खिड़की से झाँक रहे तारे
खिड़की से झाँक रहे तारे!
जलता है कोई दीप नहीं,
कोई भी आज समीप नहीं,
लेटा हूँ कमरे के अंदर बिस्तर पर अपना मन मारे!
खिड़की से झाँक रहे तारे!
सुख का ताना, दुख का बाना,
सुधियों ने है बुनना ठाना,
लो, कफ़न ओढाता आता है कोई मेरे तन पर सारे!
खिड़की से झाँक रहे तारे!
अपने पर मैं ही रोता हूँ,
मैं अपनी चिता संजोता हूँ,
जल जाऊँगा अपने कर से रख अपने ऊपर अंगारे!
खिड़की से झाँक रहे तारे!
9. नभ में दूर-दूर तारे भी
नभ में दूर-दूर तारे भी!
देते साथ-साथ दिखलाई,
विश्व समझता स्नेह-सगाई;
एकाकी पन का अनुभव, पर, करते हैं ये बेचारे भी!
नभ में दूर-दूर तारे भी
उर-ज्वाला को ज्योति बनाते,
निशि-पंथी को राह बताते,
जग की आँख बचा पी लेते ये आँसू खारे भी!
नभ में दूर-दूर तारे भी
अंधकार से मैं घिर जाता,
रोना ही रोना बस भाता
ध्यान मुझे जब जब यह आता-
दूर हृदय से कितने मेरे, मेरे जो सबसे प्यारे भी
नभ में दूर-दूर तारे भी
10. मैं क्यों अपनी बात सुनाऊँ
मैं क्यों अपनी बात सुनाऊँ?
जगती के सागर में गहरे
जो उठ-गिरतीं अगणित लहरें,
उनमें एक लहर लघु मैं भी, क्यों निज चंचलता दिखलाऊँ?
मैं क्यों अपनी बात सुनाऊँ?
जगती के तरुवर में प्रति पल
जो लगते-गिरते पल्लव-दल,
उनमें एक पात लघु मैं भी, क्यों निज मरमर-गायन गाऊँ?
मैं क्यों अपनी बात सुनाऊँ?
मुझ-सा ही जग भर का जीवन,
सब में सुख-दुख, रोदन-गायन,
कुछ बतला, कुछ बात छिपा क्यों एक पहेली व्यर्थ बुझाऊँ?
मैं क्यों अपनी बात सुनाऊँ?
11. छाया पास चली आती है
छाया पास चली आती है!
जड़ बिस्तर पर पड़ा हुआ हूँ,
तम-समाधि में गड़ा हुआ हूँ;
तन चेतनता-हीन हुआ है, साँस महज चलती जाती है!
छाया पास चली आती है!
तन सफ़ेद है, पट सफ़ेद है,
अंग-अंग में भरा भेद है,
निकट खिसकती देख इसे धकधक करती मेरी छाती है!
छाया पास चली आती है!
हाथों में कुछ है प्याला-सा,
प्याले में कुछ है काला-सा,
जान गया क्या मुझे पिलाने यह साकीबाला लाती है!
छाया पास चली आती है!
12. मध्य निशा में पंछी बोला
मध्य निशा में पंछी बोला!
ध्वनित धरातल और गगन है,
राग नहीं है, यह क्रंदन है,
टूटे प्यारी नींद किसी की, इसने कंठ करुण निज खोला!
मध्य निशा में पंछी बोला!
निश्चित गाने का अवसर है,
सीमित रोने को निज घर है,
ध्यान मुझे जग का रखना है, धिक मेरा मानव तन चोला!
मध्य निशा में पंछी बोला!
कितनी रातों को मन मेरा,
चाहा, कर दूँ चीख सबेरा,
पर मैंने अपनी पीड़ा को चुप-चुप अश्रुकणों में घोला!
मध्य निशा में पंछी बोला!
13. जा कहाँ रहा है विहग भाग
जा कहाँ रहा है विहग भाग?
कोमल नीड़ों का सुख न मिला,
स्नेहालु दृगों का रुख न मिला,
मुँह-भर बोले, वह मुख न मिला, क्या इसीलिये, वन से विराग?
जा कहाँ रहा है विहग भाग?
यह सीमाओं से हीन गगन,
यह शरणस्थल से दीन गगन,
परिणाम समझकर भी तूने क्या आज दिया है विपिन त्याग?
जा कहाँ रहा है विहग भाग?
दोनों में है क्या उचित काम?
मैं भी लूँ तेरा संग थाम,
या तू मुझसे मिलकर गाए जीवन-अभाव का करुण राग!
जा कहाँ रहा है विहग भाग?
14. जा रही है यह लहर भी
जा रही है यह लहर भी!
चार दिन उर से लगाया,
साथ में रोई, रुलाया,
पर बदलती जा रही है आज तो इसकी नजर भी!
जा रही है यह लहर भी!
हाय! वह लहरी न आती,
जो सुधा का घूँट लाती,
जो न आकर लौटती फिर, कर मुझे देती अमर भी!
जा रही है यह लहर भी!
वो गई तृष्णा जगाकर,
वह गई पागल बनाकर,
आँसुओं से यह भिगाकर,
क्यों लहर आती नहीं है जो पिला जाती जहर भी!
जा रही है यह लहर भी!
15. प्रेयसि, याद है वह गीत
प्रेयसि, याद है वह गीत?
गोद में तुझको लेटाकर,
कंठ में उन्मत्त स्वर भर,
गा जिसे मैंने लिया था स्वर्ग का सुख जीत!
प्रेयसि, याद है वह गीत?
है न जाने तू कहाँ पर,
कंठ सूखा, क्षीणतर स्वर,
सुन जिसे मैं आज हो उठता स्वयं भयभीत!
प्रेयसि, याद है वह गीत?
तू न सुनने को रही जब,
राग भी जब वह गया दब,
तब न मेरी जिंदगी के दिन गये क्यों बीत!
प्रेयसि, याद है वह गीत?
16. कोई नहीं, कोई नहीं
कोई नहीं, कोई नहीं!
यह भूमि है हाला-भरी,
मधुपात्र-मधुबाला-भरी,
ऐसा बुझा जो पा सके मेरे हृदय की प्यास को-
कोई नहीं, कोई नहीं!
सुनता, समझता है गगन,
वन के विहंगों के वचन,
ऐसा समझ जो पा सके मेरे हृदय- उच्छ्वास को-
कोई नहीं, कोई नहीं!
मधुऋतु समीरण चल पड़ा,
वन ले नए पल्लव खड़ा,
ऐसा फिरा जो ला सके मेरे लिए विश्वास को-
कोई नहीं, कोई नहीं!
17. किसलिये अंतर भयंकर
किसलिये अंतर भयंकर?
चाहता मैं गान मन का,
राग बन जाता गगन का,
किंतु मेरा स्वर मुझी में लीन हो मिटता निरंतर!
किसलिये अंतर भयंकर?
चाहता वह गीत गाना,
सुन जिसे हो खुश जमाना,
किंतु मेरे गीत मुझको ही रुला जाते निरंतर!
किसलिये अंतर भयंकर?
चाहता मैं प्यार मेरा,
विश्व का बनता बसेरा,
किंतु अपने आप को ही मैं घृणा करता निरंतर!
किसलिये अंतर भयंकर?
18. अब तो दुख दें दिवस हमारे
अब तो दुख दें दिवस हमारे!
मेरा भार स्वयं ले करके,
मेरी नाव स्वयं खे करके,
दूर मुझे रखते जो श्रम से, वे तो दूर सिधारे!
अब तो दुख दें दिवस हमारे!
रह न गये जो हाथ बटाते,
साथ खेवाकर पार लगाते,
कुछ न सही तो साहस देते होकर खड़े किनारे!
अब तो दुख दें दिवस हमारे!
डूब रही है नौका मेरी,
बंद जगत हैं आँखें तेरी,
मेरी संकट की घड़ियों के साखी नभ के तारे!
अब तो दुख दें दिवस हमारे!
19. मैंने गाकर दुख अपनाए
मैंने गाकर दुख अपनाए!
कभी न मेरे मन को भाया,
जब दुख मेरे ऊपर आया,
मेरा दुख अपने ऊपर ले कोई मुझे बचाए!
मैंने गाकर दुख अपनाए!
कभी न मेरे मन को भाया,
जब-जब मुझको गया रुलाया,
कोई मेरी अश्रु धार में अपने अश्रु मिलाए!
मैंने गाकर दुख अपनाए!
पर न दबा यह इच्छा पाता,
मृत्यु-सेज पर कोई आता,
कहता सिर पर हाथ फिराता-
’ज्ञात मुझे है, दुख जीवन में तुमने बहुत उठाये!
मैंने गाकर दुख अपनाए!
20. चढ़ न पाया सीढ़ियों पर
चढ़ न पाया सीढ़ियों पर!
प्रात आया, भक्त आए,
पुष्प-जल की भेंट लाए,
देव-मंदिर पहुँच पाए,
औ’ उन्हें देखा किया मैं लोचनों में नीर भर-भर!
चढ़ न पाया सीढ़ियों पर!
साँझ आई, भक्त लौटे,
भक्ति से अनुरक्त लौटे,
जान पाए-चाह मेरी वे गए कितनी कुचलकर!
चढ़ न पाया सीढ़ियों पर!
सब गए जब, रात आई,
पंथ-रज मैंने उठाई,
देवता मेरे मिले मुझको उसी रज से निकलकर!
चढ़ न पाया सीढ़ियों पर!
21. क्या दंड के मैं योग्य था
क्या दंड के मैं योग्य था!
चलता रहूँ यह चाह दी,
पर एक ही तो राह दी,
किस भाँति होती दूसरी इस देह-यात्रा की कथा!
क्या दंड के मैं योग्य था!
तेरी रजा पर मैं चला,
तब क्या बुरा, तब क्या भला,
फिर भी मुझे मिलती सजा, तेरी निराली है प्रथा!
क्या दंड के मैं योग्य था!
यह दंड तेरे हाथ का
है चिह्न तेरे साथ का
इस दंड से मैं मुक्त हो जाता कभी का, अन्यथा!
क्या दंड के मैं योग्य था?
22. मैं जीवन में कुछ न कर सका
मैं जीवन में कुछ न कर सका!
जग में अँधियारा छाया था,
मैं ज्वाला लेकर आया था
मैंने जलकर दी आयु बिता, पर जगती का तम हर न सका!
मैं जीवन में कुछ न कर सका!
अपनी ही आग बुझा लेता,
तो जी को धैर्य बँधा देता,
मधु का सागर लहराता था, लघु प्याला भी मैं भर न सका!
मैं जीवन में कुछ न कर सका!
बीता अवसर क्या आएगा,
मन जीवन भर पछताएगा,
मरना तो होगा ही मुझको, जब मरना था तब मर न सका!
मैं जीवन में कुछ न कर सका!
23. कुछ भी नहीं, कुछ भी नहीं
कुछ भी नहीं, कुछ भी नहीं!
उर में छलकता प्यार था,
दृग में भरा उपहार था,
तुम क्यों ड़रे, था चाहता मैं तो प्रणय-प्रतिकार मे-
कुछ भी नहीं, कुछ भी नहीं!
मुझको गये तुम छोड़कर,
सब स्वप्न मेरा तोड़कर,
अब फाड़ आँखें देखता अपना वृहद संसार में-
कुछ भी नहीं, कुछ भी नहीं!
कुछ मौन आँसू में गला,
कुछ मूक श्वासों में ढला,
कुछ फाड़कर निकला गला,
पर, हाय, हो पाई कमी मेरे हृदय के भार में-
कुछ भी नहीं, कुछ भी नहीं!
24. जैसा गाना था, गा न सका
जैसा गाना था, गा न सका!
गाना था वह गायन अनुपम,
क्रंदन दुनिया का जाता थम,
अपने विक्षुब्ध हृदय को भी मैं अब तक शांत बना न सका!
जैसा गाना था, गा न सका!
जग की आहों को उर में भर
कर देना था, मुझको सस्वर,
निज आहों के आशय को भी मैं जगती को समझा न सका!
जैसा गाना था, गा न सका!
जन-दुख-सागर पर जाना था,
डुबकी ले थाह लगाना था,
निज आँसू की दो बूँदों में मैं कूल-किनारा पा न सका!
जैसा गाना था, गा न सका!
25. गिनती के गीत सुना पाया
गिनती के गीत सुना पाया!
जब जग यौवन से लहराया,
दृग पर जल का पर्दा छाया,
फिर मैंने कंठ रुँधा पाया,
जग की सुषमा का क्षण बीता मैं कर मल-मलकर पछताया!
गिनती के गीत सुना पाया!
संघर्ष छिड़ा अब जीवन का,
कवि के मन का, पशु के तन का,
निर्द्वंद-मुक्त हो गाने का अब तक न कभी अवसर आया!
गिनती के गीत सुना पाया!
जब तन से फुरसत पाऊँगा,
नभ-मंड़ल पर मँडराऊँगा,
नित नीरव गायन गाऊँगा,
यदि शेष रही मन की सत्ता मिटने पर मिट्टी की काया!
गिनती के गीत सुना पाया!
26. किसके लिए? किसके लिए
किसके लिए? किसके लिए?
जीवन मुझे जो ताप दे,
जग जो मुझे अभिशाप दे,
जो काल भी संताप दे, उसको सदा सहता रहूँ,
किसके लिए? किसके लिए?
चाहे सुने कोई नहीं,
हो प्रतिध्वनित न कभी कहीं,
पर नित्य अपने गीत में निज वेदना कहता रहूँ,
किसके लिए? किसके लिए?
क्यों पूछता दिनकर नहीं,
क्यों पूछता गिरिवर नहीं,
क्यों पूछता निर्झर नहीं,
मेरी तरह, चलता रहूँ, गलता रहूँ, बहता रहूँ
किसके लिए? किसके लिए?
27. बीता इकतीस बरस जीवन
बीता इकतीस बरस जीवन!
वे सब साथी ही हैं मेरे,
जिनको गृह-गृहिणी-शिशु घेरे,
जिनके उर में है शान्ति बसी, जिनका मुख है सुख का दर्पण!
बीता इकतीस बरस जीवन!
कब उनका भाग्य सिहाता हूँ,
उनके सुख में सुख पाता हूँ,
पर कभी-कभी उनसे अपनी तुलना कर उठता मेरा मन!
बीता इकतीस बरस जीवन!
मैं जोड़ सका यह निधि सयत्न-
खंड़ित आशाएँ, स्वप्न भग्न,
असफल प्रयोग, असफल प्रयत्न,
कुछ टूटे फूटे शब्दों में अपने टूटे दिल का क्रंदन!
बीता इकतीस बरस जीवन!
28. मेरी सीमाएँ बतला दो
मेरी सीमाएँ बतला दो!
यह अनंत नीला नभमंडल,
देता मूक निमंत्रण प्रतिपल,
मेरे चिर चंचल पंखों को इनकी परिमित परिधि बता दो!
मेरी सीमाएँ बतला दो!
कल्पवृक्ष पर नीड़ बनाकर
गाना मधुमय फल खा-खाकर!
स्वप्न देखने वाले खग को जग का कडुआ सत्य चखा दो!
मेरी सीमाएँ बतला दो!
मैं कुछ अपना ध्येय बनाऊँ,
श्रेय बनाऊँ, प्रेय बनाऊँ;
अन्त कहाँ मेरे जीवन का एक झलक मुझको दिखला दो!
मेरी सीमाएँ बतला दो!
29. किस ओर मैं? किस ओर मैं
किस ओर मैं? किस ओर मैं?
है एक ओर असित निशा,
है एक ओर अरुण दिशा,
पर आज स्वप्नों में फँसा, यह भी नहीं मैं जानता-
किस ओर मैं? किस ओर मैं?
है एक ओर अगम्य जल,
है एक ओर सुरम्य थल,
पर आज लहरों से ग्रसा, यह भी नहीं मैं जानता-
किस ओर मैं? किस ओर मैं?
है हार एक तरफ पड़ी,
है जीत एक तरफ खड़ी,
संघर्ष-जीवन में धँसा, यह भी नहीं मैं जानता-
किस ओर मैं? किस ओर मैं?
30. जन्म दिन फिर आ रहा है
जन्म दिन फिर आ रहा है!
हूँ नहीं वह काल भूला,
जब खुशी के साथ फूला
सोचता था जन्मदिन उपहार नूतन ला रहा है!
जन्म दिन फिर आ रहा है!
वर्षदिन फिर शोक लाया,
सोच दृग में नीर छाया,
बढ़ रहा हूँ-भ्रम मुझे कटु काल खाता जा रहा है!
जन्म दिन फिर आ रहा है!
वर्षगाँठों पर मुदित मन,
मैं पुनः पर अन्य कारण-
दुखद जीवन का निकटतर अंत आता जा रहा है!
जन्म दिन फिर आ रहा है!
31. क्या साल पिछला दे गया
क्या साल पिछला दे गया?
कुछ देर मैं पथ पर ठहर,
अपने दृगों को फेरकर,
लेखा लगा लूँ काल का जब साल आने को नया!
क्या साल पिछला दे गया?
चिंता, जलन, पीड़ा वही,
जो नित्य जीवन में रहीं,
नव रूप में मैंने सहीं,
पर हो असह्य उठीं कई परिचित निगाहों की दया!
क्या साल पिछला दे गया?
दो-चार बूँदें प्यार की
बरसीं, कृपा संसार की,
(हा, प्यास पारावार की)
जिनके सहारे चल रही है जिंदगी यह बेहया!
क्या साल पिछला दे गया?
32. सोचा, हुआ परिणाम क्या
सोचा, हुआ परिणाम क्या?
जब सुप्त बड़वानल जगा,
जब खौलने सागर लगा,
उमड़ीं तरंगे ऊर्ध्वगा,
लें तारकों को भी डुबा, तुमने कहा-हो शीत, जम!
सोचा, हुआ परिणाम क्या?
जब उठ पड़ा मारुत मचल
हो अग्निमय, रजमय, सजल,
झोंके चले ऐसे प्रबल,
दे पर्वतों को भी उड़ा, तुमने कहा-हो मौन, थम!
सोचा, हुआ परिणाम क्या?
जब जग पड़ी तृष्णा अमर,
दृग में फिरी विद्युत लहर,
आतुर हुए ऐसे अधर,
पी लें अतल मधु-सिंधु को, तुमने कहा-मदिरा खतम!
सोचा, हुआ परिणाम क्या?
33. फिर वर्ष नूतन आ गया
फिर वर्ष नूतन आ गया!
सूने तमोमय पंथ पर,
अभ्यस्त मैं अब तक विचर,
नव वर्ष में मैं खोज करने को चलूँ क्यों पथ नया।
फिर वर्ष नूतन आ गया!
निश्चित अँधेरा तो हुआ,
सुख कम नहीं मुझको हुआ,
दुविधा मिटी, यह भी नियति की है नहीं कुछ कम दया।
फिर वर्ष नूतन आ गया!
दो-चार किरणें प्यार कीं,
मिलती रहें संसार की,
जिनके उजाले में लिखूँ मैं जिंदगी का मर्सिया।
फिर वर्ष नूतन आ गया!
34. यह अनुचित माँग तुम्हारी है
यह अनुचित माँग तुम्हारी है!
रोएँ-रोएँ तन छिद्रित कर
कहते हो, जीवन में रस भर!
हँस लो असफलता पर मेरी, पर यह मेरी लाचारी है।
यह अनुचित माँग तुम्हारी है!
कोना-कोना दुख से उर भर,
कहते हो, खोल सुखों के स्वर!
मानव की परवशता के प्रति यह व्यंग तुम्हारा भारी है।
यह अनुचित माँग तुम्हारी है!
समकक्षी से परिहास भला,
जो ले बदला, जो दे बदला,
मैं न्याय चाहता हूँ केवल जिसका मानव अधिकारी है।
यह अनुचित माँग तुम्हारी है!
35. क्या ध्येय निहित मुझमें तेरा
क्या ध्येय निहित मुझमें तेरा?
जन-रव में घुल मिल जाने से,
जन की वाणी में गाने से
संकोच किया क्यों करता है यह क्षीण, करुणतम स्वर मेरा?
क्या ध्येय निहित मुझमें तेरा?
जग-धारा में बह जाने से,
अपना अस्तित्व मिटाने से
घबराया करता किस कारण दो कण खारा आँसू मेरा?
क्या ध्येय निहित मुझमें तेरा?
क्यों भय से उठता सिहर-सिहर,
जब सोचा करता हूँ पल-भर,
उन कलि-कुसुमों की टोली पर,
जो आती संध्या को, प्रातः को कूच किया करती ड़ेरा?
क्या ध्येय निहित मुझमें तेरा?
36. मैं क्या कर सकने में समर्थ
मैं क्या कर सकने में समर्थ?
मैं आधि-ग्रस्त, मैं व्याधि ग्रस्त,
मैं काल-त्रस्त, मैं कर्म-त्रस्त,
मैं अर्थ ध्येय में रख चलता, मुझसे हो जाता है अनर्थ!
मैं क्या कर सकने में समर्थ?
मुझसे विधि, विधि की सृष्टि क्रुद्ध,
मुझसे संसृति का क्रम विरुद्ध,
इसलिए व्यर्थ मेरे प्रयत्न, इस कारण सब प्रार्थना व्यर्थ!
मैं क्या कर सकने में समर्थ?
निर्जीव पंक्ति में निर्विवेक,
क्रंदन रख रचना पद अनेक-
क्या यह भी जग का कर्म एक?
मुझको अब तक निश्चित न हुआ, क्या मुझसे होगा सिद्ध अर्थ!
मैं क्या कर सकने में समर्थ?
37. पूछता, पाता न उत्तर
पूछता, पाता न उत्तर!
जब चला जाता उजाला,
लौटती जब विहग-माला
"प्रात को मेरा विहग जो उड़ गया था, लौट आया?"
पूछता, पाता न उत्तर!
जब गगन में रात आती,
दीप मालाएँ जलाती,
"अस्त जो मेरा सितारा था हुआ, फिर जगमगाया?"
पूछता, पाता न उत्तर!
पूर्व में जब प्रात आता,
भृंग-दल मधुगीत गाता,
"मौन जो मेरा भ्रमर था हो गया, फिर गुनगुनाया?"
पूछता, पाता न उत्तर!
38. तब रोक न पाया मैं आँसू
तब रोक न पाया मैं आँसू!
जिसके पीछे पागल होकर
मैं दौड़ा अपने जीवन-भर,
जब मृगजल में परिवर्तित हो मुझपर मेरा अरमान हँसा!
तब रोक न पाया मैं आँसू!
जिसमें अपने प्राणों को भर
कर देना चाहा अजर-अमर,
जब विस्मृति के पीछे छिपकर मुझ पर वह मेरा गान हँसा!
तब रोक न पाया मैं आँसू!
मेरे पूजन-आराधन को,
मेरे संपूर्ण समर्पन को,
जब मेरी कमजोरी कहकर मेरा पूजित पाषाण हँसा!
तब रोक न पाया मैं आँसू!
39. गंध आती है सुमन की
गंध आती है सुमन की!
किस कुसुम का श्वास छूटा?
किस कली का भाग्य फूटा?
लुट गयी सहसा खुशी इस कालिमा में किस चमन की?
गंध आती है सुमन की!
आज कवि का हृदय टूटा,
आज कवि का कंठ फूटा,
विश्व समझेगा हुई क्षति आज क्या मेरे भवन की!
गंध आती है सुमन की!
अल्प गंध, विशाल आँगन,
गीत क्षीण, प्रचंड़ क्रंदन,
है असंभव गमक, गुंजन,
एक ही गति है कुसुम के प्राण की, कवि के वचन की!
गंध आती है सुमन की!
40. है हार नहीं यह जीवन में
है हार नहीं यह जीवन में!
जिस जगह प्रबल हो तुम इतने,
हारे सब हैं मानव जितने,
उस जगह पराजित होने में है ग्लानि नहीं मेरे मन में!
है हार नहीं यह जीवन में!
मदिरा-मज्जित कर मन-काया,
जो चाहा तुमने कहलाया,
क्या जीता यदि जीता मुझको मेरी दुर्बलता के क्षण में!
है हार नहीं यह जीवन में!
सुख जहाँ विजित होने में है,
अपना सब कुछ खोने में है,
मैं हारा भी जीता ही हूँ जग के ऐसे समरांगण में!
है हार नहीं यह जीवन में!
41. मत मेरा संसार मुझे दो
मत मेरा संसार मुझे दो!
जग की हँसी, घृणा, निर्ममता
सह लेने की तो दो क्षमता,
शांति भरी मुस्कानों वाला यदि न सुखद परिवार मुझे दो!
मत मेरा संसार मुझे दो!
ज्योति न को ऐसी तम घन में,
राह दिखा, दे धीरज मन में,
जला मुझे जड़ राख बना दे ऐसे तो अंगार मुझे दो!
मत मेरा संसार मुझे दो!
योग्य नहीं यदि मैं जीवन के,
जीवन के चेतन लक्षण के,
मुझे खुशी से दो मत जीवन, मरने का अधिकार मुझे दो!
मत मेरा संसार मुझे दो!
42. मैंने मान ली तब हार
मैंने मान ली तब हार!
पूर्ण कर विश्वास जिसपर,
हाथ मैं जिसका पकड़कर,
था चला, जब शत्रु बन बैठा हृदय का गीत,
मैंने मान ली तब हार!
विश्व ने बातें चतुर कर,
चित्त जब उसका लिया हर,
मैं रिझा जिसको न पाया गा सरल मधुगीत,
मैंने मान ली तब हार!
विश्व ने कंचन दिखाकर
कर लिया अधिकार उसपर,
मैं जिसे निज प्राण देकर भी न पाया जीत,
मैंने मान ली तब हार!
43. देखतीं आकाश आँखें
देखतीं आकाश आँखें!
श्वेत अक्षर पृष्ठ काला,
तारकों की वर्णमाला,
पढ़ रहीं हैं एक जीवन का जटिल इतिहास आँखें!
देखतीं आकाश आँखें!
सत्य यों होगी कहानी,
बात यह समझी न जानी,
खो रही हैं आज अपने आप पर विश्वास आँखें!
देखतीं आकाश आँखें!
छिप गये तारे गगन के,
शून्यता आगे नयन के,
किस प्रलोभन से करातीं नित्य निज उपहास आँखें!
देखतीं आकाश आँखें!
44. तेरा यह करुण अवसान
तेरा यह करुण अवसान!
जब तपस्या-काल बीता,
पाप हारा, पूण्य जीता,
विजयिनी, सहसा हुई तू, हाय, अंतर्धान!
तेरा यह करुण अवसान!
जब तुझे पहचान पाया,
देवता को जान पाया,
खींच तुझको ले गया तब काल का आह्वान!
तेरा यह करुण अवसान!
जब मिटा भ्रम का अँधेला,
जब जगी वरदान-बेला,
तू अनंत निशीथ-निद्रा में हुई लयमान!
तेरा यह करुण अवसान!
45. बुलबुल जा रही है आज
बुलबुल जा रही है आज!
प्राण सौरभ से भिदा है,
कंटकों से तन छिदा है,
याद भोगे सुख-दुखों की आ रही है आज!
बुलबुल जा रही है आज!
प्यार मेरा फूल को भी,
प्यार मेरा शूल को भी,
फूल से मैं खुश, नहीं मैं शूल से नाराज!
बुलबुल जा रही है आज!
आ रहा तूफान हर-हर,
अब न जाने यह उड़ाकर,
फेंक देगा किस जगह पर!
तुम रहो खिलते, महकते कलि-प्रसून-समाज!
बुलबुल जा रही है आज!
46. जब करूँ मैं काम
जब करूँ मैं काम!
प्रेरणा मुझको नियम हो,
जिस घड़ी तक बल न कम हो,
मैं उसे करता रहूँ यदि काम हो अभिराम!
जब करूँ मैं काम!
जब करूँ मैं गान,
हो प्रवाहित राग उर से,
हो तरंगित सुर मधुर से,
गति रहे जब तक न इसका हो सके अवसान!
जब करूँ मैं गान!
जब करूँ मैं प्यार,
हो न मुझपर कुछ नियंत्रण,
कुछ न सीमा, कुछ न बंधन,
तब रुकूँ जब प्राण प्राणों से करे अभिसार!
जब करूँ मैं प्यार!
47. मिट्टी दीन कितनी, हाय
मिट्टी दीन कितनी, हाय!
हृदय की ज्वाला जलाती,
अश्रु की धारा बहाती,
और उर-उच्छ्वास में यह काँपती निरुपाय!
मिट्टी दीन कितनी, हाय!
शून्यता एकांत मन की,
शून्यता जैसे गगन की,
थाह पाती है न इसका मृत्तिका असहाय!
मिट्टी दीन कितनी, हाय!
वह किसे दोषी बताए,
और किसको दुख सुनाए,
जब कि मिट्टी साथ मिट्टी के करे अन्याय!
मिट्टी दीन कितनी, हाय!
48. घुल रहा मन चाँदनी में
घुल रहा मन चाँदनी में!
पूर्णमासी की निशा है,
ज्योति-मज्जित हर दिशा है,
खो रहे हैं आज निज अस्तित्व उडुगण चाँदनी में!
घुल रहा मन चाँदनी में!
हूँ कभी मैं गीत गाता,
हूँ कभी आँसू बहाता,
पर नहीं कुछ शांति पाता,
व्यर्थ दोनों आज रोदन और गायन चाँदनी में!
घुल रहा मन चाँदनी में!
मौन होकर बैठता जब,
भान-सा होता मुझे तब,
हो रहा अर्पित किसी को आज जीवन चाँदनी में!
घुल रहा मन चाँदनी में!
49. व्याकुल आज तन-मन-प्राण
व्याकुल आज तन-मन-प्राण!
तन बदन का स्पर्श भूला,
पुलक भूला, हर्ष भूला,
आज अधरों से अपरिचित हो गई मुस्कान!
व्याकुल आज तन-मन-प्राण!
मन नहीं मिलता किसी से,
मन नहीं खिलता किसी से,
आज उर-उल्लास का भी हो गया अवसान!
व्याकुल आज तन-मन-प्राण!
आज गाने का न दिन है,
बात करना भी कठिन है,
कंठ-पथ में क्षीण श्वासें हो रहीं लयमान!
व्याकुल आज तन-मन-प्राण
50. मैं भूला-भूला-सा जग में
मैं भूला-भूला-सा जग में!
अगणित पंथी हैं इस पथ पर,
है किंतु न परिचित एक नजर,
अचरज है मैं एकाकी हूँ जग के इस भीड़ भरे मग में।
मैं भूला-भूला-सा जग में!
अब भी पथ के कंकड़-पत्थर,
कुश, कंटक, तरुवर, गिरि गह्वर,
यद्यपि युग-युग बीता चलते, नित नूतन-नूतन ड़ग-ड़ग में!
मैं भूला-भूला-सा जग में!
कर में साथी जड़ दण्ड़ अटल,
कंधों पर सुधियों का संबल,
दुख के गीतों से कंठ भरा, छाले, क्षत, क्षार भरे पग में!
मैं भूला-भूला-सा जग में!
51. खोजता है द्वार बन्दी
खोजता है द्वार बन्दी!
भूल इसको जग चुका है,
भूल इसको मग चुका है,
पर तुला है तोड़ने पर तीलियाँ-दीवार बन्दी!
खोजता है द्वार बन्दी!
सीखचे ये क्या हिलेंगे,
हाथ के छाले छिलेंगे,
मानने को पर नहीं तैयार अपनी हार बन्दी!
खोजता है द्वार बन्दी!
तीलियो, अब क्या हँसोगी,
लाज से भू में धँसोगी,
मृत्यु से करने चला है अब प्रणय-अभिसार बन्दी!
खोजता है द्वार बन्दी!
52. मैं पाषाणों का अधिकारी
मैं पाषाणों का अधिकारी!
है अग्नि तपित मेरा चुंबन,
है वज्र-विनिंदक भुज-बंधन,
मेरी गोदी में कुम्हलाईं कितनी वल्लरियाँ सुकुमारी!
मैं पाषाणों का अधिकारी!
दो बूँदों से छिछला सागर,
दो फूलों से हल्का भूधर,
कोई न सका ले यह मेरी पूजा छोटी-सी, पर भारी!
मैं पाषाणों का अधिकारी!
मेरी ममता कितनी निर्मम,
कितना उसमें आवेग अगम!
(कितना मेरा उस पर संयम!)
असमर्थ इसे सह सकने को कोमल जगती के नर-नारी!
मैं पाषाणों का अधिकारी!
53. तू देख नहीं यह क्यों पाया
तू देख नहीं यह क्यों पाया?
तारावलियाँ सो जाने पर,
देखा करतीं तुझको निशि भर,
किस बाला ने देखा अपने बालम को इतने लोचन से?
तू देख नहीं यह क्यों पाया?
तुझको कलिकाएँ मुसकाकर,
आमंत्रित करती हैं दिन भर,
किस प्यारी ने चाहा अपने प्रिय को ऐसे उत्सुक मन से?
तू देख नहीं यह क्यों पाया?
तरुमाला ने कर फैलाए,
आलिंगन में बस तू आए,
किसने निज प्रणयी को बाँधा इतने आकुल भुज-बंधन में?
तू देख नहीं यह क्यों पाया?
54. दुर्दशा मिट्टी की होती
दुर्दशा मिट्टी की होती!
कर आशा, विचार, स्वप्नों से,
भावों से श्रृंगार,
देख निमिष भर लेता कोई सब श्रृंगार उतार!
आज पाया जो, कल खोती!
मिट्टी ले चलती है सिर पर,
सोने का संसार,
मंजिल पर होता है मिट्टी पर मिट्टी का भार!
भार यह क्यों इतना ढोती!
प्रति प्रभात का अंत निशा है,
प्रति रजनी का, प्रात,
मिट्टी सहती तोम तिमिर का, किरणों का आघात!
सुप्त हो जगती, जग सोती!
दुर्दशा मिट्टी की होती!
55. क्षतशीश मगर नतशीश नहीं
क्षतशीश मगर नतशीश नहीं!
बनकर अदृश्य मेरा दुश्मन,
करता है मुझपर वार सघन,
लड़ लेने की मेरी हवसें मेरे उर के ही बीच रहीं!
क्षतशीश मगर नतशीश नहीं!
मिट्टी है अश्रु बहाती है,
मेरी सत्ता तो गाती है;
अपनी? ना-ना, उसकी पीड़ा की ही मैंने कुछ बात कही!
क्षतशीश मगर नतशीश नहीं!
चोटों से घबराऊँगा कब,
दुनिया ने भी जाना है जब,
निज हाथ-हथौड़े से मैंने निज वक्षस्थल पर चोट सही!
क्षतशीश मगर नतशीश नहीं!
56. यातना जीवन की भारी
यातना जीवन की भारी!
चेतनता पहनाई जाती
जड़ता का परिधान,
देव और पशु में छिड़ जाता है संघर्ष महान!
हार की दोनों की बारी!
तन मन की आकांक्षाओं का
दुर्बलता है नाम,
एक असंयम-संयम दोनों का अंतिम परिणाम!
पूण्य-पापों की बलिहारी!
ध्येय मरण है, गाओ पथ पर
चल जीवन के गीत,
जो रुकता, चुप होता, कहता जग उसको भयभीत!
बड़ी मानव की लाचारी!
यातना जीवन की भारी!
57. दुनिया अब क्या मुझे छलेगी
दुनिया अब क्या मुझे छलेगी!
बदली जीवन की प्रत्याशा,
बदली सुख-दुख की परिभाषा,
जग के प्रलोभनों की मुझसे अब क्या दाल गलेगी!
दुनिया अब क्या मुझे छलेगी!
लड़ना होगा जग-जीवन से,
लड़ना होगा अपने मन से,
पर न उठूँगा फूल विजय से और न हार खलेगी!
दुनिया अब क्या मुझे छलेगी!
शेष अभी तो मुझमें जीवन,
वश में है तन, वश में है मन,
चार कदम उठ कर मरने पर मेरी लाश चलेगी!
दुनिया अब क्या मुझे छलेगी!
58. त्राहि, त्राहि कर उठता जीवन
त्राहि, त्राहि कर उठता जीवन!
जब रजनी के सूने क्षण में,
तन-मन के एकाकीपन में
कवि अपनी विह्वल वाणी से अपना व्याकुल मन बहलाता,
त्राहि, त्राहि कर उठता जीवन!
जब उर की पीड़ा से रोकर,
फिर कुछ सोच-समझ चुप होकर
विरही अपने ही हाथों से अपने आँसू पोछ हटाता,
त्राहि, त्राहि कर उठता जीवन!
पंथी चलते-चलते थककर
बैठ किसी पथ के पत्थर पर
जब अपने ही थकित करों से अपना विथकित पाँव दबाता,
त्राहि, त्राहि कर उठता जीवन!
59. चाँदनी में साथ छाया
चाँदनी में साथ छाया!
मौन में डूबी निशा है,
मौन-डूबी हर दिशा है,
रात भर में एक ही पत्ता किसी तरु ने गिराया!
चाँदनी में साथ छाया!
एक बार विहंग बोला,
एक बार समीर डोला,
एक बार किसी पखेरू ने परों को फड़फड़ाया!
चाँदनी में साथ छाया!
होठ इसने भी हिलाए,
हाथ इसने भी उठाए,
आज मेरी ही व्यथा के गीत ने सुख संग पाया!
चाँदनी में साथ छाया!
60. सशंकित नयनों से मत देख
सशंकित नयनों से मत देख!
खाली मेरा कमरा पाकर,
सूखे तिनके पत्ते लाकर,
तूने अपना नीड़ बनाया कौन किया अपराध?
सशंकित नयनों से मत देख!
सोचा था जब घर आऊँगा,
कमरे को सूना पाऊँगा,
देख तुझे उमड़ा पड़ता है उर में स्नेह अगाध!
सशंकित नयनों से मत देख!
मित्र बनाऊँगा मैं तुझको,
बोल करेगा प्यार न मुझको?
और सुनाएगा न मुझे निज गायन भी एकाध!
सशंकित नयनों से मत देख!
61. ओ गगन के जगमगाते दीप
ओ गगन के जगमगाते दीप!
दीन जीवन के दुलारे
खो गये जो स्वप्न सारे,
ला सकोगे क्या उन्हें फिर खोज हृदय समीप?
ओ गगन के जगमगाते दीप!
यदि न मेरे स्वप्न पाते,
क्यों नहीं तुम खोज लाते
वह घड़ी चिर शान्ति दे जो पहुँच प्राण समीप?
ओ गगन के जगमगाते दीप!
यदि न वह भी मिल रही है,
है कठिन पाना-सही है,
नींद को ही क्यों न लाते खींच पलक समीप?
ओ गगन के जगमगाते दीप!
62. ओ अँधेरी से अँधेरी रात
ओ अँधेरी से अँधेरी रात!
आज गम इतना हृदय में,
आज तम इतना हृदय में,
छिप गया है चाँद-तारों का चमकता गात!
ओ अँधेरी से अँधेरी रात!
दिख गया जग रूप सच्चा
ज्योति में यह बहुत अच्छा,
हो गया कुछ देर को प्रिय तिमिर का संघात!
ओ अँधेरी से अँधेरी रात!
प्रात किरणों के निचय से,
तम न जाएगा हृदय से,
किसलिए फिर चाहता मैं हो प्रकाश-प्रभात!
ओ अँधेरी से अँधेरी रात!
63. मेरा भी विचित्र स्वभाव
मेरा भी विचित्र स्वभाव!
लक्ष्य से अनजान मैं हूँ,
लस्त मन-तन-प्राण मैं हूँ,
व्यस्त चलने में मगर हर वक्त मेरे पाँव!
मेरा भी विचित्र स्वभाव!
कुछ नहीं मेरा रहेगा,
जो सदा सबसे कहेगा,
वह चलेगा लाद इतना भाव और अभाव!
मेरा भी विचित्र स्वभाव!
उर व्यथा से आँख रोती,
सूज उठती, लाल होती,
किन्तु खुलकर गीत गाते हैं हृदय के घाव!
मेरा भी विचित्र स्वभाव!
64. डूबता अवसाद में मन
डूबता अवसाद में मन!
यह तिमिर से पीन सागर,
तल-तटों से हीन सागर,
किंतु हैं इनमें न धाराएँ, न लहरें औ’, न कम्पन!
डूबता अवसाद में मन!
मैं तरंगों से लड़ा हूँ,
और तगड़ा ही पड़ा हूँ,
पर नियति ने आज बाँधे हैं हृदय के साथ पाहन!
डूबता अवसाद में मन!
डूबता जाता निरंतर,
थाह तो पाता कहीं पर,
किंतु फिर-फिर डूब उतराते उठा है ऊब जीवन!
डूबता अवसाद में मन!
65. उर में अग्नि के शर मार
उर में अग्नि के शर मार!
जब कि मैं मधु स्वप्नमय था,
सब दिशाओं से अभय था,
तब किया तुमने अचानक यह कठोर प्रहार,
उर में अग्नि के शर मार!
सिंह-सा मृग को गिराकर,
शक्ति सारे अंग की हर,
सोख क्षण भर में लिया निःशेष जीवन सार,
उर में अग्नि के शर मार!
हाय, क्या थी भूल मेरी?
कौन था निर्दय अहेरी,
पूछते हैं व्यर्थ उर के घाव आँखें फाड़!
उर में अग्नि के शर मार!
66. जुए के नीचे गर्दन डाल
जुए के नीचे गर्दन डाल!
देख सामने बोझी गाड़ी,
देख सामने पंथ पहाड़ी,
चाह रहा है दूर भागना, होता है बेहाल?
जुए के नीचे गर्दन डाल!
तेरे पूर्वज भी घबराए,
घबराए, पर क्या बच पाए,
इसमें फँसना ही पड़ता है, यह विचित्र है जाल!
जुए के नीचे गर्दन डाल!
यह गुरु भार उठाना होगा,
इस पथ से ही जाना होगा;
तेरी खुशी-नाखुशी का है नहीं किसी को ख्याल!
जुए के नीचे गर्दन डाल!
67. दुखी-मन से कुछ भी न कहो
दुखी-मन से कुछ भी न कहो!
व्यर्थ उसे है ज्ञान सिखाना,
व्यर्थ उसे दर्शन समझाना,
उसके दुख से दुखी नहीं हो तो बस दूर रहो!
दुखी-मन से कुछ भी न कहो!
उसके नयनों का जल खारा,
है गंगा की निर्मल धारा,
पावन कर देगी तन-मन को क्षण भर साथ बहो!
दुखी-मन से कुछ भी न कहो!
देन बड़ी सबसे यह विधि की,
है समता इससे किस निधि की?
दुखी दुखी को कहो, भूल कर उसे न दीन कहो?
दुखी-मन से कुछ भी न कहो!
68. आज घन मन भर बरस लो
आज घन मन भर बरस लो!
भाव से भरपूर कितने,
भूमि से तुम दूर कितने,
आँसुओं की धार से ही धरणि के प्रिय पग परस लो,
आज घन मन भर बरस लो!
ले तुम्हारी भेंट निर्मल,
आज अचला हरित-अंचल;
हर्ष क्या इस पर न तुमको-आँसुओं के बीच हँस लो!
आज घन मन भर बरस लो!
रुक रहा रोदन तुम्हारा,
हास पहले ही सिधारा,
और तुम भी तो रहे मिट, मृत्यु में निज मुक्ति-रस लो!
आज घन मन भर बरस लो!
69. स्वर्ग के अवसान का अवसान
स्वर्ग के अवसान का अवसान!
एक पल था स्वर्ग सुन्दर,
दूसरे पल स्वर्ग खँडहर,
तीसरे पल थे थकिर कर स्वर्ग की रज छान!
स्वर्ग के अवसान का अवसान!
ध्यान था मणि-रत्न ढेरी
से तुलेगी राख मेरी,
पर जगत में स्वर्ग तृण की राख एक समान!
स्वर्ग के अवसान का अवसान!
राख मैं भी रख न पाया,
आज अंतिम भेंट लाया,
अश्रु की गंगा इसे दो बीच अपने स्थान!
स्वर्ग के अवसान का अवसान!
70. यह व्यंग नहीं देखा जाता
यह व्यंग नहीं देखा जाता!
निःसीम समय की पलकों पर,
पल और पहर में क्या अंतर;
बुद्बुद की क्षण-भंगुरता पर मिटने वाला बादल हँसता!
यह व्यंग नहीं देखा जाता!
दोनों अपनी सत्ता में सम,
किसमें क्या ज्यादा, किसमें कम?
पर बुद्बुद की चंचलता पर बुद्बुद जो खुद चंचल हँसता!
यह व्यंग नहीं देखा जाता!
बुद्बुद बादल में अन्तर है,
समता में ईर्ष्या का डर है,
पर मेरी दुर्बलताओं पर मुझसे ज्यादा दुर्बल हँसता!
यह व्यंग नहीं देखा जाता!
71. तुम्हारा लौह चक्र आया
तुम्हारा लौह चक्र आया!
कुचल चला अचला के वन घन,
बसे नगर सब निपट निठुर बन,
चूर हुई चट्टान, क्षार पर्वत की दृढ़ काया!
तुम्हारा लौह चक्र आया!
अगणित ग्रह-नक्षत्र गगन के
टूट पिसे, मरु-सिसका-कण के
रूप उड़े, कुछ घुवाँ-घुवाँ-सा अंबर में छाया!
तुम्हारा लौह चक्र आया!
तुमने अपना चक्र उठाया,
अचरज से निज मुख फैलाया,
दंत-चिह्न केवल मानव का जब उस पर पाया!
तुम्हारा लौह चक्र आया!
72. हर जगह जीवन विकल है
हर जगह जीवन विकल है!
तृषित मरुथल की कहानी,
हो चुकी जग में पुरानी,
किंतु वारिधि के हृदय की प्यास उतनी ही अटल है!
हर जगह जीवन विकल है!
रो रहा विरही अकेला,
देख तन का मिलन मेला,
पर जगत में दो हृदय के मिलन की आशा विफल है!
हर जगह जीवन विकल है!
अनुभवी इसको बताएँ,
व्यर्थ मत मुझसे छिपाएँ;
प्रेयसी के अधर-मधु में भी मिला कितना गरल है!
हर जगह जीवन विकल है!
73. जीवन का विष बोल उठा है
जीवन का विष बोल उठा है!
मूँद जिसे रक्खा मधुघट से,
मधुबाला के श्यामल पट से,
आज विकल, विह्वल सपनों के अंचल को वह खोल उठा है!
जीवन का विष बोल उठा है!
बाहर का श्रृंगार हटाकर
रत्नाभूषण, रंजित अंबर,
तन में जहाँ-जहाँ पीड़ा थी कवि का हाथ टटोल उठा है!
जीवन का विष बोल उठा है!
जीवन का कटु सत्य कहाँ है,
यहाँ नहीं तो और कहाँ है?
और सबूत यही है इससे कवि का मानस ड़ोल उठा है!
जीवन का विष बोल उठा है!
74. अग्नि पथ! अग्नि पथ! अग्नि पथ
अग्नि पथ! अग्नि पथ! अग्नि पथ!
वृक्ष हों भले खड़े,
हों घने, हों बड़े,
एक पत्र-छाँह भी माँग मत, माँग मत, माँग मत!
अग्नि पथ! अग्नि पथ! अग्नि पथ!
तू न थकेगा कभी!
तू न थमेगा कभी!
तू न मुड़ेगा कभी! -कर शपथ! कर शपथ! कर शपथ!
अग्नि पथ! अग्नि पथ! अग्नि पथ!
यह महान दृश्य है-
चल रहा मनुष्य है
अश्रु-स्वेद-रक्त से लथपथ, लथपथ, लथपथ!
अग्नि पथ! अग्नि पथ! अग्नि पथ!
75. जीवन भूल का इतिहास
जीवन भूल का इतिहास!
ठीक ही पथ को समझकर,
मैं रहा चलता उमर भर,
किंतु पग-पग पर बिछा था भूल का छल पाश!
जीवन भूल का इतिहास!
काटतीं भूलें प्रतिक्षण,
कह उन्हें हल्का करूँ मन,-
कर गया पर शीघ्रता में शत्रु पर विश्वास!
जीवन भूल का इतिहास!
भूल क्यों अपनी कही थी,
भूल क्या यह भी नहीं थी,
अब सहो विश्वासघाती विश्व का उपहास!
जीवन भूल का इतिहास!
76. नभ में वेदना की लहर
नभ में वेदना की लहर!
मर भले जाएँ दुखी जन,
अमर उनका आर्त क्रंदन;
क्यों गगन विक्षुब्ध, विह्वल, विकल आठों पहर?
नभ में वेदना की लहर!
वेदना से ज्वलित उडुगण,
गीतमय, गतिमय समीरण,
उठ, बरस, मिटते सजल घन;
वेदना होती न तो यह सॄष्टि जाती ठहर।
नभ में वेदना की लहर!
बन गिरेगा शीत जलकण,
कर उठेगा मधुर गुंजन,
ज्योतिमय होगा किरण बन,
कभी कवि-उर का कुपित, कटु और काला जहर?
नभ में वेदना की लहर!
77. छोड़ मैं आया वहाँ मुस्कान
छोड़ मैं आया वहाँ मुस्कान!
स्वार्थ का जिसमें न था कण,
ध्येय था जिसका समर्पण,
जिस जगह ऐसे प्रणय का था हुआ अपमान!
छोड़ मैं आया वहाँ मुस्कान!
भाग्य दुर्जम और दुर्गम
हो कठोर, कराल, निर्मम,
जिस जगह मानव प्रयासों पर हुआ बलवान!
छोड़ मैं आया वहाँ मुस्कान!
पात्र सुखियों की खुशी का,
व्यंग का अथवा हँसी का,
जिस जगह समझा गया दुखिया हृदय का गान!
छोड़ मैं आया वहाँ मुस्कान!
78. जीवन शाप या वरदान
जीवन शाप या वरदान?
सुप्त को तुमने जगाया,
मौन को मुखरित बनाया,
करुन क्रंदन को बताया क्यों मधुरतम गान?
जीवन शाप या वरदान?
सजग फिर से सुप्त होगा,
गीत फिर से गुप्त होगा,
मध्य में अवसाद का ही क्यों किया सम्मान?
जीवन शाप या वरदान?
पूर्ण भी जीवन करोगे,
हर्ष से क्षण-क्षण भरोगे,
तो न कर दोगे उसे क्या एक दिन बलिदान?
जीवन शाप या वरदान?
79. जीवन में शेष विषाद रहा
जीवन में शेष विषाद रहा!
कुछ टूटे सपनों की बस्ती,
मिटने वाली यह भी हस्ती,
अवसाद बसा जिस खँडहर में, क्या उसमें ही उन्माद रहा!
जीवन में शेष विषाद रहा!
यह खँडहर ही था रंगमहल,
जिसमें थी मादक चहल-पहल,
लगता है यह खँडहर जैसे पहले न कभी आबाद रहा!
जीवन में शेष विषाद रहा!
जीवन में थे सुख के दिन भी,
जीवन में थे दुख के दिन भी,
पर, हाय हुआ ऐसा कैसे, सुख भूल गया, दुख याद रहा!
जीवन में शेष विषाद रहा!
80. अग्नि देश से आता हूँ मैं
अग्नि देश से आता हूँ मैं!
झुलस गया तन, झुलस गया मन,
झुलस गया कवि-कोमल जीवन,
किंतु अग्नि-वीणा पर अपने दग्ध कंठ से गाता हूँ मैं!
अग्नि देश से आता हूँ मैं!
स्वर्ण शुद्ध कर लाया जग में,
उसे लुटाता आया मग में,
दीनों का मैं वेश किए, पर दीन नहीं हूँ, दाता हूँ मैं!
अग्नि देश से आता हूँ मैं!
तुमने अपने कर फैलाए,
लेकिन देर बड़ी कर आए,
कंचन तो लुट चुका, पथिक, अब लूटो राख लुटाता हूँ मैं!
अग्नि देश से आता हूँ मैं!
81. सुनकर होगा अचरज भारी
सुनकर होगा अचरज भारी!
दूब नहीं जमती पत्थर पर,
देख चुकी इसको दुनिया भर,
कठिन सत्य पर लगा रहा हूँ सपनों की फुलवारी!
सुनकर होगा अचरज भारी!
गूँज मिटेगा क्षण भर कण में,
गायन मेरा, निश्चय मन में,
फिर भी गायक ही बनने की कठिन साधना सारी!
सुनकर होगा अचरज भारी!
कौन देवता? नहीं जानता,
कुछ फल होगा, नहीं मानता,
बलि के योग्य बनूँ, इसकी मैं करता हूँ तैयारी!
सुनकर होगा अचरज भारी!
82. जीवन खोजता आधार
जीवन खोजता आधार!
हाय, भीतर खोखला है,
बस मुलम्मे की कला है,
इसी कुंदन के ड़ले का नाम जग में प्यार!
जीवन खोजता आधार!
बूँद आँसू की गलाती,
आह छोटी-सी उड़ाती,
नींद-वंचित नेत्र को क्या स्वप्न का संसार!
जीवन खोजता आधार!
विश्व में वह एक ही है,
अन्य समता में नहीं हैं,
मूल्य से मिलता नहीं, वह मृत्यु का उपहार!
जीवन खोजता आधार!
83. हा, मुझे जीना न आया
हा, मुझे जीना न आया!
नेत्र जलमय, रक्त-रंजित,
मुख विकृत, अधरोष्ठ कंपित
हो उठे तब गरल पीकर भी गरल पीना न आया!
हा, मुझे जीना न आया!
वेदना से नेह जोड़ा,
विश्व में पीटा ढिंढोरा,
प्यार तो उसने किया है, प्यार को जिसने छिपाया!
हा, मुझे जीना न आया!
संग मैं पाकर किसी का
कर सका अभिनय हँसी का,
पर अकेले बैठकर मैं मुसकरा अब तक न पाया!
हा, मुझे जीना न आया!
84. अब क्या होगा मेरा सुधार
अब क्या होगा मेरा सुधार!
तू ही करता मुझसे बिगाड़,
तो मैं न मानता कभी हार,
मैं काट चुका अपने ही पग अपने ही हाथों ले कुठार!
अब क्या होगा मेरा सुधार!
संभव है तब मैं था पागल,
था पागल, पर था क्या दुर्बल,
चोटों में गाया गीत, समझ तू इसको निर्बल की पुकार!
अब क्या होगा मेरा सुधार!
फिर भी बल संचित करता हूँ,
मन में दम साहस भरता हूँ,
जिसमें न आह निकले मुख से जब हो तेरा अंतिम प्रहार!
अब क्या होगा मेरा सुधार!
85. मैं न सुख से मर सकूँगा
मैं न सुख से मर सकूँगा!
चाहता जो काम करना,
दूर है मुझसे सँवरना,
टूटते दम से विफल आहें महज मैं भर सकूँगा!
मैं न सुख से मर सकूँगा!
गलतियाँ-अपराध, माना,
भूल जाएगा जमाना,
किंतु अपने आपको कैसे क्षमा मैं कर सकूँगा!
मैं न सुख से मर सकूँगा!
कुछ नहीं पल्ले पड़ा तो,
थी तसल्ली मैं लड़ा तो,
मौत यह आकर कहेगी अब नहीं मैं लड़ सकूँगा!
मैं न सुख से मर सकूँगा!
86. आगे हिम्मत करके आओ
आगे हिम्मत करके आओ!
मधुबाला का राग नहीं अब,
अंगूरों का बाग नहीं अब,
अब लोहे के चने मिलेंगे दाँतों को अजमाओ!
आगे हिम्मत करके आओ!
दीपक हैं नभ के अंगारे,
चलो इन्हीं के साथ सहारे,
राह? नहीं है राह यहाँ पर, अपनी राह बनाओ!
आगे हिम्मत करके आओ!
लपट लिपटने को आती है,
निर्भय अग्नि गान गाती है,
आलिंगन के भूखे प्राणी, अपने भुज फैलाओ!
आगे हिम्मत करके आओ!
87.
मुँह क्यों आज तम की ओर?
कालिमा से पूर्ण पथ पर
चल रहा हूँ मैं निरंतर,
चाहता हूँ देखना मैं इस तिमिर का छोर!
मुँह क्यों आज तम की ओर!
ज्योति की निधियाँ अपरिमित
कर चुका संसार संचित,
पर छिपाए है बहुत कुछ सत्य यह तम घोर!
मुँह क्यों आज तम की ओर!
बहुत संभव कुछ न पाऊँ,
किंतु कैसे लौट आऊँ,
लौटकर भी देख पाऊँगा नहीं मैं भोर!
मुँह क्यों आज तम की ओर!
88. विष का स्वाद बताना होगा
विष का स्वाद बताना होगा!
ढाली थी मदिरा की प्याली,
चूसी थी अधरों की लाली,
कालकूट आने वाला अब, देख नहीं घबराना होगा!
विष का स्वाद बताना होगा!
आँखों से यदि अश्रु छनेगा,
कटुतर यह कटु पेय बनेगा,
ऐसे पी सकता है कोई, तुझको हँस पी जाना होगा!
विष का स्वाद बताना होगा!
गरल पान करके तू बैठा,
फेर पुतलियाँ, कर-पग ऐंठा,
यह कोई कर सकता, मुर्दे, तुझको अब उठ गाना होगा!
विष का स्वाद बताना होगा!
89. कोई बिरला विष खाता है
कोई बिरला विष खाता है!
मधु पीने वाले बहुतेरे,
और सुधा के भक्त घनेरे,
गज भर की छातीवाला ही विष को अपनाता है!
कोई बिरला विष खाता है!
पी लेना तो है ही दुष्कर,
पा जाना उसका दुष्करतर,
बडा भाग्य होता है तब विष जीवन में आता है!
कोई बिरला विष खाता है!
स्वर्ग सुधा का है अधिकारी,
कितनी उसकी कीमत भारी!
किंतु कभी विष-मूल्य अमृत से ज्यादा पड़ जाता है!
कोई बिरला विष खाता है!
90. मेरा जोर नहीं चलता है
मेरा जोर नहीं चलता है!
स्वप्नों की देखी निष्ठुरता,
स्वप्नों की देखी भंगुरता,
फिर भी बार-बार आ करके स्वप्न मुझे निशिदिन छलता है!
मेरा जोर नहीं चलता है!
सूनेपन के सुंदरपन को,
कैसे दृढ़ करवा दूँ मन को!
उतनी शक्ति नहीं है मुझमें जितनी मन में चंचलता है!
मेरा जोर नहीं चलता है!
ममता यदि मन से मिट पाती,
देवों की गद्दी हिल जाती!
प्यार, हाय, मानव जीवन की सबसे भारी दुर्बलता है!
मेरा जोर नहीं चलता है!
91. मैंने शान्ति नहीं जानी है
मैंने शान्ति नहीं जानी है!
त्रुटि कुछ है मेरे अंदर भी,
त्रुटि कुछ है मेरे बाहर भी,
दोनों को त्रुटि हीन बनाने की मैंने मन में ठानी है!
मैंने शान्ति नहीं जानी है!
आयु बिता दी यत्नों में लग,
उसी जगह मैं, उसी जगह जग,
कभी-कभी सोचा करता अब, क्या मैंने की नादानी है!
मैंने शान्ति नहीं जानी है!
पर निराश होऊँ किस कारण,
क्या पर्याप्त नहीं आश्वासन?
दुनिया से मानी, अपने से मैंने हार नहीं मानी है!
मैंने शान्ति नहीं जानी है!
92. अब खँडहर भी टूट रहा है
अब खँडहर भी टूट रहा है!
गायन से गुंजित दीवारें,
दिखलाती हैं दीर्घ दरारें,
जिनसे करुण, कर्णकटु, कर्कश, भयकारी स्वर फूट रहा है!
अब खँडहर भी टूट रहा है!
बीते युग की कौन निशानी,
शेष रही थी आज मिटानी?
किंतु काल की इच्छा ही तो, लुटे हुए को लूट रहा है!
अब खँडहर भी टूट रहा है!
महानाश में महासृजन है,
महामरण में ही जीवन है,
था विश्वास कभी मेरा भी, किंतु आज तो छूट रहा है!
अब खँडहर भी टूट रहा है!
93. प्राथर्ना मत कर, मत कर, मत कर
प्राथर्ना मत कर, मत कर, मत कर!
युद्धक्षेत्र में दिखला भुजबल,
रहकर अविजित, अविचल प्रतिपल,
मनुज-पराजय के स्मारक हैं मठ, मस्जिद, गिरजाघर!
प्राथर्ना मत कर, मत कर, मत कर!
मिला नहीं जो स्वेद बहाकर,
निज लोहू से भीग-नहाकर,
वर्जित उसको, जिसे ध्यान है जग में कहलाए नर!
प्राथर्ना मत कर, मत कर, मत कर!
झुकी हुई अभिमानी गर्दन,
बँधे हाथ, नत-निष्प्रभ लोचन
यह मनुष्य का चित्र नहीं है, पशु का है, रे कायर!
प्राथर्ना मत कर, मत कर, मत कर!
94. कुछ भी आज नहीं मैं लूँगा
कुछ भी आज नहीं मैं लूँगा!
जिन चीजों की चाह मुझे थी,
जिनकी कुछ परवाह मुझे थी,
दीं न समय से तूने, असमय क्या ले उन्हें करूँगा!
कुछ भी आज नहीं मैं लूँगा!
मैंने बाँहों का बल जाना,
मैंने अपना हक पहचाना,
जो कुछ भी बनना है मुझको अपने आप बनूँगा!
कुछ भी आज नहीं मैं लूँगा!
व्यर्थ मुझे है अब समझाना,
व्यर्थ मुझे है अब फुसलाना,
अंतिम बार कहे देता हूँ, रूठा हूँ, न मनूँगा!
कुछ भी आज नहीं मैं लूँगा!
95. मुझे न सपनों से बहलाओ
मुझे न सपनों से बहलाओ!
धोखा आदि-अंत है जिनका,
क्या विश्वास करूँ मैं इनका;
सत्य हुआ मुखरित जीवन में, मत सपनों का गीत सुनाओ!
मुझे न सपनों से बहलाओ!
जग का सत्य स्वप्न हो जाता,
सपनों से पहले खो जाता,
मैं कर्तव्य करूँगा लेकिन मुझमें अब मत मोह जगाओ!
मुझे न सपनों से बहलाओ!
सच्चे मन से मैं कहता हूँ,
नहीं भावना में बहता हूँ,
मैं उजाड़ अब चला, विश्व तुम अपना सुख-संसार बसाओ!
मुझे न सपनों से बहलाओ!
96. मुझको प्यार न करो, डरो
मुझको प्यार न करो, डरो!
जो मैं था अब रहा कहाँ हूँ,
प्रेत बना निज घूम रहा हूँ,
बाहर से ही देख न आँखों पर विश्वास करो!
मुझको प्यार न करो, डरो!
मुर्दे साथ चुके सो मेरे,
देकर जड़ बाहों के फेरे,
अपने बाहु पाश में मुझको सोच-विचार भरो!
मुझको प्यार न करो डरो!
जीवन के सुख-सपने लेकर,
तुम आओगी मेरे पथ पर,
है मालूम कहूँगा क्या मैं, मेरे साथ मरो
मुझको प्यार न करो डरो!
97. तुम गये झकझोर
तुम गये झकझोर!
कर उठे तरु-पत्र मरमर,
कर उठा कांतार हरहर,
हिल उठा गिरि, गिरि शिलाएँ कर उठीं रव घोर!
तुम गये झकझोर!
डगमगाई भूमि पथ पर,
फट गई छाती दरककर,
शब्द कर्कश छा गया इस छोर से उस छोर!
तुम गये झकझोर!
हिल उठा कवि का हृदय भी,
सामने आई प्रलय भी,
किंतु उसके कंठ में था गीतमय कलरोर!
तुम गये झकझोर!
98. ओ अपरिपूर्णता की पुकार
ओ अपरिपूर्णता की पुकार!
शत-शत गीतों में हो मुखरित,
कर लक्ष-लक्ष उर में वितरित,
कुछ हल्का तुम कर देती हो मेरे जीवन का व्यथा-भार!
ओ अपरिपूर्णता की पुकार!
जग ने क्या मेरी कथा सुनी,
जग ने क्या मेरी व्यथा सुनी,
मेरी अपूर्णता में आई जग की अपूर्णता रूप धार!
ओ अपरिपूर्णता की पुकार!
कर्मों की ध्वनियाँ आएँगी,
निज बल पौरुष दिखलाएँगी,
पर्याप्त, अखिल नभ मंड़ल में तुम गूँज उठी हो एक बार!
ओ अपरिपूर्णता की पुकार!
99. सुखमय न हुआ यदि सूनापन
सुखमय न हुआ यदि सूनापन!
मैं समझूँगा सब व्यर्थ हुआ-
लंबी-काली रातों में जग
तारे गिनना, आहें भरना, करना चुपके-चुपके रोदन,
सुखमय न हुआ यदि सूनापन!
मैं समझूँगा सब व्यर्थ हुआ-
भीगी-ठंढी रातों में जग
अपने जीवन के लोहू से लिखना अपना जीवन-गायन,
सुखमय न हुआ यदि सूनापन!
मैं समझूँगा सब व्यर्थ हुआ-
सूने दिन, सूनी रातों में
करना अपने बल से बाहर संयम-पालन, तप-व्रत-साधन,
सुखमय न हुआ यदि सूनापन!
100. अकेला मानव आज खड़ा है
अकेला मानव आज खड़ा है!
दूर हटा स्वर्गों की माया,
स्वर्गाधिप के कर की छाया,
सूने नभ, कठोर पृथ्वी का ले आधार अड़ा है!
अकेला मानव आज खड़ा है!
धर्मों-संस्थाओं के बन्धन
तोड़ बना है वह विमुक्त-मन,
संवेदना-स्नेह-संबल भी खोना उसे पड़ा है!
अकेला मानव आज खड़ा है!
जब तक हार मानकर अपने
टेक नहीं देता वह घुटने,
तब तक निश्चय महाद्रोह का झंड़ा सुदृढ़ गड़ा है!
अकेला मानव आज खड़ा है!
101. कितना अकेला आज मैं
कितना अकेला आज मैं!
संघर्ष में टूटा हुआ,
दुर्भाग्य से लूटा हुआ,
परिवार से छूटा हुआ, कितना अकेला आज मैं!
कितना अकेला आज मैं!
भटका हुआ संसार में,
अकुशल जगत व्यवहार में,
असफल सभी व्यापार में, कितना अकेला आज मैं!
कितना अकेला आज मैं!
खोया सभी विश्वास है,
भूला सभी उल्लास है,
कुछ खोजती हर साँस है, कितना अकेला आज मैं!
कितना अकेला आज मैं!