ग़ज़ल - लफ़्ज़ बनकर आलम-ऐ-दिल जब निकला
लफ़्ज़ बनकर आलम-ऐ-दिल जब निकला
कोई क़तरा आँख से बेसबब निकला ।
दूर तक नज़रों के हिस्से सूनापन
जाने वो इस रास्ते से कब निकला ।
हर कोई चेहरा तेरा चेहरा मिला
अपना चेहरा ढूँढने जब जब निकला ।
कोशिशें नाकाम तो होती रहीं
हौसला फिर भी मगर बेहद निकला ।
बेवज़ह बरसों रहा वो बोलता
चुप हुआ तो दिल में जो था सब निकला ।
जाते जाते मुड़कर मुझको देखना
उसका हर अंदाज़ बेमतलब निकला ।
