1. सिरीरागु त्रिलोचन का
माइआ मोहु मनि आगलड़ा प्राणी जरा मरणु भउ विसरि गइआ ॥
कुट्मबु देखि बिगसहि कमला जिउ पर घरि जोहहि कपट नरा ॥१॥
दूड़ा आइओहि जमहि तणा ॥
तिन आगलड़ै मै रहणु न जाइ ॥
कोई कोई साजणु आइ कहै ॥
मिलु मेरे बीठुला लै बाहड़ी वलाइ ॥
मिलु मेरे रमईआ मै लेहि छडाइ ॥१॥ रहाउ ॥
अनिक अनिक भोग राज बिसरे प्राणी संसार सागर पै अमरु भइआ ॥
माइआ मूठा चेतसि नाही जनमु गवाइओ आलसीआ ॥२॥
बिखम घोर पंथि चालणा प्राणी रवि ससि तह न प्रवेसं ॥
माइआ मोहु तब बिसरि गइआ जां तजीअले संसारं ॥३॥
आजु मेरै मनि प्रगटु भइआ है पेखीअले धरमराओ ॥
तह कर दल करनि महाबली तिन आगलड़ै मै रहणु न जाइ ॥४॥
जे को मूं उपदेसु करतु है ता वणि त्रिणि रतड़ा नाराइणा ॥
ऐ जी तूं आपे सभ किछु जाणदा बदति त्रिलोचनु रामईआ ॥५॥२॥९२॥
2. गूजरी स्री त्रिलोचन जीउ के पदे घरु १ ੴ सतिगुर प्रसादि
अंतरु मलि निरमलु नही कीना बाहरि भेख उदासी ॥
हिरदै कमलु घटि ब्रहमु न चीन्हा काहे भइआ संनिआसी ॥१॥
भरमे भूली रे जै चंदा ॥
नही नही चीन्हिआ परमानंदा ॥१॥ रहाउ ॥
घरि घरि खाइआ पिंडु बधाइआ खिंथा मुंदा माइआ ॥
भूमि मसाण की भसम लगाई गुर बिनु ततु न पाइआ ॥२॥
काइ जपहु रे काइ तपहु रे काइ बिलोवहु पाणी ॥
लख चउरासीह जिन्हि उपाई सो सिमरहु निरबाणी ॥३॥
काइ कमंडलु कापड़ीआ रे अठसठि काइ फिराही ॥
बदति त्रिलोचनु सुनु रे प्राणी कण बिनु गाहु कि पाही ॥४॥१॥५२५-५२६॥
3. गूजरी
अंति कालि जो लछमी सिमरै ऐसी चिंता महि जे मरै ॥
सरप जोनि वलि वलि अउतरै ॥१॥
अरी बाई गोबिद नामु मति बीसरै ॥ रहाउ ॥
अंति कालि जो इसत्री सिमरै ऐसी चिंता महि जे मरै ॥
बेसवा जोनि वलि वलि अउतरै ॥२॥
अंति कालि जो लड़िके सिमरै ऐसी चिंता महि जे मरै ॥
सूकर जोनि वलि वलि अउतरै ॥३॥
अंति कालि जो मंदर सिमरै ऐसी चिंता महि जे मरै ॥
प्रेत जोनि वलि वलि अउतरै ॥४॥
अंति कालि नाराइणु सिमरै ऐसी चिंता महि जे मरै ॥
बदति तिलोचनु ते नर मुकता पीत्मबरु वा के रिदै बसै ॥५॥२॥५२६॥
4. धनासरी बाणी भगतां की त्रिलोचन ੴ सतिगुर प्रसादि
नाराइण निंदसि काइ भूली गवारी ॥
दुक्रितु सुक्रितु थारो करमु री ॥१॥ रहाउ ॥
संकरा मसतकि बसता सुरसरी इसनान रे ॥
कुल जन मधे मिल्यिो सारग पान रे ॥
करम करि कलंकु मफीटसि री ॥१॥
बिस्व का दीपकु स्वामी ता चे रे सुआरथी पंखी राइ गरुड़ ता चे बाधवा ॥
करम करि अरुण पिंगुला री ॥२॥
अनिक पातिक हरता त्रिभवण नाथु री तीरथि तीरथि भ्रमता लहै न पारु री ॥
करम करि कपालु मफीटसि री ॥३॥
अम्रित ससीअ धेन लछिमी कलपतर सिखरि सुनागर नदी चे नाथं ॥
करम करि खारु मफीटसि री ॥४॥
दाधीले लंका गड़ु उपाड़ीले रावण बणु सलि बिसलि आणि तोखीले हरी ॥
करम करि कछउटी मफीटसि री ॥५॥
पूरबलो क्रित करमु न मिटै री घर गेहणि ता चे मोहि जापीअले राम चे नामं ॥
बदति त्रिलोचन राम जी ॥६॥१॥६९५॥