1. कत जाईऐ रे घर लागो रंगु (शब्द - गुरु ग्रंथ साहिब)
रामानंद जी घरु १ ੴ सतिगुर प्रसादि ॥
कत जाईऐ रे घर लागो रंगु ॥
मेरा चितु न चलै मनु भइओ पंगु ॥१॥ रहाउ ॥
एक दिवस मन भई उमंग ॥
घसि चंदन चोआ बहु सुगंध ॥
पूजन चाली ब्रहम ठाइ ॥
सो ब्रहमु बताइओ गुर मन ही माहि ॥१॥
जहा जाईऐ तह जल पखान ॥
तू पूरि रहिओ है सभ समान ॥
बेद पुरान सभ देखे जोइ ॥
ऊहां तउ जाईऐ जउ ईहां न होइ ॥२॥
सतिगुर मै बलिहारी तोर ॥
जिनि सकल बिकल भ्रम काटे मोर ॥
रामानंद सुआमी रमत ब्रहम ॥
गुर का सबदु काटै कोटि करम ॥੩॥੧॥1195॥
शब्दार्थ: (कत = और कहाँ?, रे = हे भाई!, रंगु = आनन्द, घर = हृदय-रूप घर में ही, न चलै = भटकता नहीं है, पंगु = लंगड़ा, दिवस = दिन, उमंग = इच्छा, घसि = घिस कर, चोआ = इत्र, बहु = कई, सुगंध = सुगंधी, ब्रहम ठाइ = ठाकुर द्वारे, जोइ = खोज कर, तह = वहां, जल पखान = [तीर्थों पर] पानी, [मन्दिरों में] पत्थर, समान = एक जैसा, ऊहां = तीर्थों और मंदिरों की तरफ, तउ = तो ही, जउ = अगर, ईहां = यहाँ हृदय में, बलिहारी तोर = तुझपर सदके, जिनि = जिस ने, बिकल = कठिन, भ्रम = शंका, मोर = मेरे, रामानंद सुआमी = रामानन्द का प्रभु, रमत = सब जगह मौजूद है, कोटि = करोड़ों, करम = [किये हुए मंदे] काम)
