1. भ्रमत फिरत बहु जनम बिलाने तनु मनु धनु नही धीरे
भ्रमत फिरत बहु जनम बिलाने तनु मनु धनु नही धीरे ॥
लालच बिखु काम लुबध राता मनि बिसरे प्रभ हीरे ॥१॥ रहाउ ॥
बिखु फल मीठ लगे मन बउरे चार बिचार न जानिआ ॥
गुन ते प्रीति बढी अन भांती जनम मरन फिरि तानिआ ॥१॥
जुगति जानि नही रिदै निवासी जलत जाल जम फंध परे ॥
बिखु फल संचि भरे मन ऐसे परम पुरख प्रभ मन बिसरे ॥२॥
गिआन प्रवेसु गुरहि धनु दीआ धिआनु मानु मन एक मए ॥
प्रेम भगति मानी सुखु जानिआ त्रिपति अघाने मुकति भए ॥३॥
जोति समाइ समानी जा कै अछली प्रभु पहिचानिआ ॥
धंनै धनु पाइआ धरणीधरु मिलि जन संत समानिआ ॥४॥१॥੪੮੭॥
शब्दार्थ: (भ्रमत = भटकते, बिलाने = गुज़र गए, नही धीरे = नहीं टिकता, बिखु = जहर, लुबध = लोभी, राता = रंगा हुआ, चार = सुंदर, अन भांती = और और किस्म की, जलत = जलते, अघाने = जी भर गया, अछली = जो छला न जा सके)
