अर्चना सूर्यकान्त त्रिपाठी निराला
Archana Suryakant Tripathi Nirala
अट नहीं रही है
अनमिल-अनमिल मिलते
अलि की गूँज चली द्रुम कुँजों
आज प्रथम गाई पिक पंचम
आशा आशा मरे
आंख बचाते हो तो क्या आते हो
आंख लगाई
और न अब भरमाओ
उनसे-संसार, भव-वैभव-द्वार
क्या सुनाया गीत, कोयल
क्यों मुझको तुम भूल गये हो
कठिन यह संसार, कैसे विनिस्तार
कनक कसौटी पर कढ़ आया
काम के छवि-धाम
किरणों की परियां मुसका दीं
किशोरी, रंग भरी किस अंग भरी हो
कुंज-कुंज कोयल बोली है
केशर की, कलि की पिचकारी
कैसे हुई हार तेरी निराकार
कौन गुमान करो जिन्दगी का
कौन फिर तुझको बरेगा
खुल कर गिरती है
खेलूंगी कभी न होली
खोले अमलिन जिस दिन
गगन गगन है गान तुम्हारा
गवना न करा
गिरते जीवन को उठा दिया
गीत गाने दो मुझे तो
गीत-गाये हैं मधुर स्वर
घन आये घनश्याम न आये
घन तम से आवृत धरणी है
चरण गहे थे, मौन रहे थे
चलीं निशि में तुम आई प्रात
चंग चढ़ी थी हमारी
छाँह न छोड़ी
छोड़ दो, न छेड़ो टेढ़े
जननी मोह की रजनी
जिनकी नहीं मानी कान
तन की, मन की, धन की हो तुम
तन, मन, धन वारे हैं
तपन से घन, मन शयन से
तपी आतप से जो सित गात
तरणि तार दो अपर पार को
तिमिरदारण मिहिर दरसो
तुम आये, कनकाचल छाये
तुम जो सुथरे पथ उतरे हो
तुमने स्वर के आलोक-ढले
तुमसे जो मिले नयन
तुम्हारी छांह है, छल है
तुम ही हुए रखवाल
तू दिगम्बर विश्व है घर
दीप जलता रहा
दुरित दूर करो नाथ
दे न गये बचने की साँस
दो सदा सत्संग मुझको
धीरे धीरे हँसकर आईं
नयन नहाये
नव जीवन की बीन बजाई
नव तन कनक-किरण फूटी है
निविड़-विपिन, पथ अराल
नील जलधि जल
पथ पर बेमौत न मर
प्रथम बन्दूँ पद विनिर्मल
प्रिय के हाथ लगाये जागी
पंक्ति पंक्ति में मान तुम्हारा
पतित पावनी, गंगे
पतित हुआ हूँ भव से तार
पाप तुम्हारे पांव पड़ा था
पार संसार के
पैर उठे, हवा चली
फूटे हैं आमों में बौर
बन जाय भले शुक की उक से
बाँधो न नाव इस ठाँव, बंधु
बीन वारण के वरण घन
भजन कर हरि के चरण, मन
भज, भिखारी, विश्व-भरणा
भव अर्णव की तरणी तरुणा
भव-सागर से पार करो हे!
मधुर स्वर तुमने बुलाया
मानव का मन शान्त करो हे
माँ अपने आलोक निखारो
मुक्तादल जल बरसो, बादल
मुदे नयन, मिले प्राण
ये दुख के दिन काटे हैं जिसने
रमण मन के मान के तन
लगी लगन, जगे नयन
लघु-तटिनी, तट छाईं कलियां
लिया-दिया तुमसे मेरा था
वन-वन के झरे पात
वासना-समासीना, महती जगती दीना
विपद-भय-निवारण करेगा वही सुन
वे कह जो गये कल आने को
वेदना बनी मेरी अवनी
श्याम-श्यामा के युगल पद
शिविर की शर्वरी
समझा जीवन की विजया हो
सरल तार, नवल गान
सहज-सहज कर दो
साध पुरी, फिरी धुरी
साधो मग डगमग पग
सुरतरु वर शाखा
सोईं अँखियाँ
हरि का मन से गुणगान करो
हरिण-नयन हरि ने छीने हैं
हंसो अधर-धरी हंसी
हार गई मैं तुम्हें जगाकर
हार तुमसे बनी है जय
हुए पार द्वार-द्वार
हे जननि, तुम तपश्चरिता
Archana Suryakant Tripathi Nirala