Aangan Ke Par Dwar Agyeya
आँगन के पार द्वार अज्ञेय
आँगन के पार द्वार अज्ञेय
अन्तःसलिला
चक्रांत शिला
- यह महाशून्य का शिविर
- वन में एक झरना बहता है
- सुनता हूँ गान के स्वर
- किरण अब मुझ पर झरी
- एक चिकना मौन
- रात में जागा
- हवा कहीं से उठी, बही
- जितनी स्फीति इयत्ता मेरी झलकाती है
- जो बहुत तरसा-तरसा कर
- धुँध से ढँकी हुई
- तू नहीं कहेगा ?
- अरी ओ आत्मा री
- अकेली और अकेली
- वह धीरे-धीरे आया
- जो कुछ सुन्दर था, प्रेम, काम्य
- मैं कवि हूँ
- न कुछ में से वृत्त यह निकला
- अंधकार में चली गई है
- उस बीहड़ काली एक शिला पर बैठा दत्तचित्त
- ढूह की ओट बैठे
- यही, हाँ, यही
- ओ मूर्त्ति !
- व्यथा सब की
- उसी एकांत में घर दो
- सागर और धरा मिलते थे जहाँ
- आँगन के पार
- दूज का चाँद
