बच्चों की भूख बाप की दस्तार खा गई
बच्चों की भूख बाप की दस्तार खा गई
ये मुफ़लिसी गरीब का किरदार खा गई
इंसान का वजूद सड़क पर बिखर गया
इंसा को अब के दौर की रफ़्तार गई
सदियों से नाज़ था हमें जिस इततहाद पर
वो इततहाद सहन की दीवार खा गई
लाशों को जैसे नोच के खाते रहे दरिंद
मेरे वतन को इस तरह सरकार खा गई
बेटी किसी ग़रीब की शिददत में भूख की
रोटी समझ के आज का अख़बार खा गई
बहुत उदास बहुत बेकरार बैठे हैं
बहुत उदास बहुत बेकरार बैठे हैं
चले भी आओ पए इंतज़ार बैठे हैं
हमारे दिल की तबाही का ग़म उन्हें होता
मगर वो सात समुंदर के पार बैठे हैं
न जाने जोश में कब चश्म ए करम आए
हम इंतज़ार में परवरदिगार बैठे हैं
अभी से आप की आंखों में बेबसी क्यूँ है
अभी तो आप के ख़िदमतगुज़ार बैठे हैं
गुरूर जिन को था कल अपनी ज़ो फिशानी पर
चराग़ खोके वो अपना वकार बैठे हैं
बहार सहन ए गुलिस्तां में आई है लेकिन
जब इंतज़ार की मुद्दत गुज़ार बैठे हैं
रफ़ूग़रों से कोई इतना कह दे ए पैकर
तुम्हारी बज़्म मे सीना फिगार बैठे हैं