हिन्दी कविताएँ : सूर्य प्रकाश शर्मा

Hindi Poetry : Surya Prakash Sharma


1. नया साल

है नया साल पर, इस नए साल पर। कुछ नया तो नहीं, कुछ नया तो नहीं। है नया साल पर, इस नए साल पर। सुख मिला तो नहीं, दुःख गया तो नहीं॥ ज़िन्दगी है हमारी पुरानी-सी ही, इसमें रंगत कोई-सी नई भी नहीं। आई सुख की सुहानी किरण भी नहीं। सर्द रातें तो दुःख की गई भी नहीं । गुज़री है रात तो, पर हमें अब तलक, नव सुबह का संदेशा मिला तो नहीं । है नया साल पर, इस नए साल पर। कुछ नया तो नहीं, कुछ नया तो नहीं। वो ही पत्तों से गिरती हुई ओस है, जिसको पीकर के सूरज भी मदहोश है। धूम्र है, है कुहासा, औ' सन्नाटा है, प्रकृति को ना जाने क्या अफ़सोस है! आज की शाम ने, देवता काम ने, साज अपनी प्रिया का किया तो नहीं । है नया साल पर, इस नए साल पर। कुछ नया तो नहीं, कुछ नया तो नहीं। है नया साल पर, इस नए साल पर। सुख मिला तो नहीं, दुःख गया तो नहीं॥

2. अपना हिन्दोस्तां

जिसकी माटी भी मलयज से कमतर नहीं, देश जिससे यहाँ कोई बेहतर नहीं । जिसके मस्तक पे हिमगिरि सुशोभित रहे, जिसके चरणों को छूकर के सागर बहे। जिसमें पर्वत हैं, नदियाँ हैं, जंगल भी हैं, जितना है उष्ण, उतना ही शीतल भी है। जिसके कण-कण में ईश्वर का आभास है, पूरे संसार में ये बहुत ख़ास है। जिसमें उजियारी पूनम, अंधेरी अमा, है ये प्यारा चमन, अपना हिन्दोस्ताँ॥ जिसमें सीता भी हैं, जिसमें हैं राम भी, जिसमें राधा भी हैं, जिसमें हैं श्याम भी। जिसमें गौतम, महावीर का ज्ञान भी, जिसमें दादू हैं, रैदास, रसखान भी। जिसमें तुलसी हैं, नानक, कबीरा भी हैं। जिसमें हैं सूर भी, जिसमें मीरा भी हैं। जिसमें संतों की, गुरुओं की वाणी भी है। देश की संस्कृति की कहानी भी है। कोई होगा भला ऐसा भी गुलसिताँ ? है ये प्यारा चमन, अपना हिन्दोस्ताँ। जिसमें झाँसी की रानी की तलवार है। जिसमें सुखदेव, अशफ़ाक, सरदार हैं। जिसमें गांधी भी हैं, जिसमें आज़ाद हैं। हमको मंगल, तिलक अब तलक याद है, 'तुम मुझे खून दो...' हर तरफ़ गूँजता। सारा भारत जिन्हें गर्व से पूजता। जिसमें नेहरू हैं, वल्लभ हैं, अम्बेडकर। क्रांतिवीरों ने खुद को किया है अमर। उन शहीदों ने बुझने ना दी ये समाँ। ये ये प्यारा वतन अपना हिन्दोस्ताँ।

3. शिमला के प्रति

हिमगिरि भारत माँ का किरीट, तुम उस किरीट के एक रत्न। शोभित हो माता का मस्तक, करते रहते तुम यही यत्न॥ उन तुंग पर्वतों को देखो, हैं चूम रहे वो आसमान । सूरज को भी शीतल कर दे, ऐसा है इनका तापमान ॥ अद्भुत सुंदर पुष्पों से करती, प्रकृति इसका श्रृंगार । हैं बढ़ा रहे इसकी शोभा, वो चीड़, बान और देवदार॥ मोनाल, तेंदुआ, जुजुराना, हैं इस कविता के अलंकार। ईश्वर ने इसको निर्मित कर, दिखलाया अद्भुत चमत्कार॥ हिम से आच्छादित भूधर पर, सूरज की स्वर्णिम पड़ी किरण। लगता है दण्डक से चलकर, आ गया यहाँ वो स्वर्ण हिरण॥ प्रकृति गागर में भरकर के, सुन्दरता ले आयी न्यारी। इस जगह प्रकृति ने पल भर में झलका दी सुन्दरता सारी॥ सुन्दरता, शांति, मधुरता का, है अद्भुत यहाँ एक संगम । इतनी ऊर्जा है यहाँ, कि— स्थावर हो जाते हैं जंगम॥ इस धरती पर बसने वाले, हे देवलोक! हे स्वर्गधाम! अंतर्मन की गहराई से, 'हे श्यामालय!' तुमको प्रणाम॥

4. नारियां

इस धरा पर ईश की, सबसे बड़ी सौगात क्या है? बेटियाँ हैं, बहन भी हैं। प्रेमिका है और माँ है। इस धरा के संतुलन को नारियाँ ही हैं सँजोतीं। पुरुष के समतुल्य, घर का– भार महिलाएँ भी ढोतीं॥ इक पुरुष की पूर्णता में नारियों की भूमिका है। इस धरा पर ईश की, सबसे बड़ी सौगात क्या है? नारियाँ इस सृष्टि में कितने तरह के रंग भरतीं ठान लें यदि नारियाँ हो काम कोई, पूर्ण करतीं। उनका दृढ़ संकल्प हो, तो - (हो, जो सावित्री-सी दृढ़ता) काल की औकात क्या है? इस धरा पर ईश की, सबसे बड़ी सौगात क्या है?

5. मानव युग

हे इन्द्र ! सँभालो सिंहासन, सिंहासन जाने वाला है। पहुंचा है मानव अंतरिक्ष अब स्वर्ग पहुँचने वाला है॥ अपनी सेना तैयार करो जितना हो ज़ोर लगा लेना। जो मद्यपान कर सोये है, उनको झकझोर जगा लेना ॥ शक्ति ही दिखलानी होगी अप्सरा काम ना आयेगी। तप करते विश्वामित्र नहीं जो साधना भंग हो जायेगी ॥ विज्ञान हमारा अस्त्र, तुम्हारा वज्र ध्वस्त हो जायेगा। प्रक्षेपास्त्रों के देख, तुम्हारा - ऐरावत गुम हो जायेगा ॥ जो कभी नही सध सकते थे, उनको मानव ने साथ लिया। अग्नि को, वायु और वरूण को, अपने बन्धन में बाँध लिया ॥ क्या मानव की शक्ति देख, सिंहासन, स्वर्ग नहीं डोले? या फिर मदिरा पीकर के, तुमने- अपने नेत्र नहीं खोले ? तुम मानव की हुँकार सुनो, वो स्वर्ग जीतने वाला है। हे इन्द्र। तुम्हारे शासन का अब समय बीतने वाला है॥ तुम चाहे शिव या विष्णु से, कर जोड़ प्रार्थना कर लेना । 'हे प्रभु । करो रक्षा' कहकर, तुम नेत्र अश्रु से भर लेना ॥ क्योंकि तुमको प्राचीन काल से, इतना ही करना आता है। तुम शक्तिहीन बस नेत्रों में अश्रु ही भरना आता है ॥ तुम कर्महीन, कायर, भोगी नित सोम पान तुम करते हो। अप्सरा बुलाकर स्वर्ग लोक में, नृत्य गान तुम करते हो ॥ शिव, विष्णु भी ये कह देंगे ''तुम स्वर्ग लोक व के योग्य नहीं। जो परिश्रमी व कर्मशील हैं स्वर्गलोक के योग्य वही ॥" मानव की इच्छाशक्ति ही मानव को श्रेष्ठ बनाती है। वो देवों और दानवों से मानव को ज्येष्ठ बनाती है॥ कान खोलकर सुनो, तुम्हारा - शासन जाने वाला। देवों का युग हुआ बहुत 'मानव युग' आने वाला है॥

6. ग्रामीण परिवेश

गाँवों का परिवेश देखिए, वह अत्यन्त निराला है। शीतलता व शान्ति और आनन्द भी देने वाला है ॥ गाँवों की हरियाली, मखमल - घासों से है बिछी हुई । मेघों के वर्षण के द्वारा इसकी भूमि सिंची हुई ॥ गाँवों में पेड़ों की छाया, शीतलता जो देती है। कितनी भी थकान हो, लेकिन - क्षण भर में हर लेती है॥ आमों के पेड़ों पर बैठी कोयल की मीठी वाणी। पेड़ों पर चढ़-चढ़कर करते बन्दर कितनी शैतानी ॥ पके हुए गेहूं की खुशबू, सबका मन हर लेती है। शीतल, मन्द, सुगन्धित वायु आनन्दित कर देती है। वृक्षों पर सबको स्वादिष्ट, मधुर फल सबको खूब लुभाते हैं । वृक्ष मधुर फल खिला- खिलाकर, सबकी क्षुधा मिटाते हैं ॥ गाँवों की हर वस्तु का प्रकृति से गहरा नाता है। गाँवों के अंचल में जाकर खग दल भी आश्रय पाता है॥ गाँवों में सावन के झूले, सबको खूब झुलाते हैं। प्रकृति के प्रत्येक घटक पंथी को पास बुलाते हैं॥ गाँवों में जन-जन के मन में, प्रेम व भाईचारा है। पृथ्वी, प्रकृति, भारत माँ को यह प्राणोपम प्यारा है॥

7. अज़ीम हिन्दोस्तां

बता कैसे कहूँ आख़िर – ‘है हिन्दुस्ताँ अज़ीम’, यहाँ बे-ईमान लोगों की क़तारें हैं बहुत । सभी की इक़्तिज़ा है मुल्क में हमको मिले हक़, मग़र बे-फर्ज़ रहना चाहते हैं । हमें नाचीज़ लगता मुल्क का आज़ाद होना, शाइ’द ग़ुलामी फ़िर से सहना चाहते हैं ! नज़र को खोलकर देखोगे जब तुम इक दफ़ा, तो जानोगे कि गद्दारी के नज़ारे हैं बहुत । बता कैसे कहूँ आख़िर – ‘है हिन्दुस्ताँ अज़ीम’, यहाँ बे-ईमान लोगों की क़तारें हैं बहुत । यहाँ है मुल्क आख़िर में, हैं पहले ज़ात-मज़हब, वतन से इश्क़, ज़्यादातर, नुमाइश । फ़िगारों से नहीं हमको है मतलब, रहे ख़ुद का– मकाँ, इतनी सी ख़्वाहिश । नहीं इस्लाह अब तक किया हमने, कड़ी ज़ंजीर के भी दिन गुज़ारे हैं बहुत। बता कैसे कहूँ आख़िर – ‘है हिन्दुस्ताँ अज़ीम’, यहाँ बे-ईमान लोगों की क़तारें हैं बहुत । यहाँ के हुक्मराँ मौकापरस्ती के शहंशाह, औ’ शाइ’र लूटते बस वाहवाही । बिखरना, फ़िर से, मुस्तक़बिल है अपना, अलैहिदगी-पसंद देते गवाही । हक़ीक़त मा’लूम है? बहार-ए-गुलशन की जगह, ख़िजाँ की सन्नाटे-भरी चीखें पुकारें हैं बहुत, बता कैसे कहूँ आख़िर – ‘है हिन्दुस्ताँ अज़ीम’, यहाँ बे-ईमान लोगों की क़तारें हैं बहुत ।