तमिल कविता हिन्दी में : सुब्रह्मण्य भारतीTamil Poetry in Hindi : Subramania Bharati


यह है भारत देश हमारा

चमक रहा उत्तुंग हिमालय, यह नगराज हमारा ही है। जोड़ नहीं धरती पर जिसका, वह नगराज हमारा ही है। नदी हमारी ही है गंगा, प्लावित करती मधुरस धारा, बहती है क्या कहीं और भी, ऎसी पावन कल-कल धारा? सम्मानित जो सकल विश्व में, महिमा जिनकी बहुत रही है अमर ग्रन्थ वे सभी हमारे, उपनिषदों का देश यही है। गाएँगे यश ह्म सब इसका, यह है स्वर्णिम देश हमारा, आगे कौन जगत में हमसे, यह है भारत देश हमारा। यह है भारत देश हमारा, महारथी कई हुए जहाँ पर, यह है देश मही का स्वर्णिम, ऋषियों ने तप किए जहाँ पर, यह है देश जहाँ नारद के, गूँजे मधुमय गान कभी थे, यह है देश जहाँ पर बनते, सर्वोत्तम सामान सभी थे। यह है देश हमारा भारत, पूर्ण ज्ञान का शुभ्र निकेतन, यह है देश जहाँ पर बरसी, बुद्धदेव की करुणा चेतन, है महान, अति भव्य पुरातन, गूँजेगा यह गान हमारा, है क्या हम-सा कोई जग में, यह है भारत देश हमारा। विघ्नों का दल चढ़ आए तो, उन्हें देख भयभीत न होंगे, अब न रहेंगे दलित-दीन हम, कहीं किसी से हीन न होंगे, क्षुद्र स्वार्थ की ख़ातिर हम तो, कभी न ओछे कर्म करेंगे, पुण्यभूमि यह भारत माता, जग की हम तो भीख न लेंगे। मिसरी-मधु-मेवा-फल सारे, देती हमको सदा यही है, कदली, चावल, अन्न विविध अरु क्षीर सुधामय लुटा रही है, आर्य-भूमि उत्कर्षमयी यह, गूँजेगा यह गान हमारा, कौन करेगा समता इसकी, महिमामय यह देश हमारा। (रूपांतरकार: अज्ञात)

जय भारत

कभी बुद्धिमत्ता से अपनी जीते थे शत देश महान विजित बहादुर उन देशों के करते थे तेरा जय-गान कभी धीरता गरिमा और शौर्य भी धर्म निज खो बैठी हो फिर भी धर्म अटल जननी जय हो, तेरी सदैव जय हो॥१॥ रचना हुई कोटि ग्रंथों की, शत देशों के प्रतिनिधि पंडित आए विषय-ज्ञान पाने को अतिशय मन:कामना मंडित कभी ज्ञान का स्तर गिरने पर परम अधोगति भी पाई हो। फिर भी शाश्वत सत्य पर अटल-- माँ तेरी जय हो, जय हो॥२॥ कुंठित हुई शक्ति जब वीरों के असि की क्षमता अतुलित घटी, ज्ञानप्रद सद्ग्रंथों की रचना-शक्ति हुई शिथिलित ऐसे विषम समय में भी तुम नहीं प्रकंपित होती हो उपयोगी सद्ग्रंथों की-- रक्षक, माता तेरी जय हो॥३॥ देवगगणों के लिए स्वादमय, मधुरिम अमृत कुंभ समान। माँ, तेरा ऐश्वर्य रहे पूरा सागर की भाँति पापी हृदय शक्ति तेरी हरने का सदा यत्न करता हो। फिर भी अक्षुण्ण निधिधारी माता मेरी, तेरी जय हो॥४॥ इस भू को उत्कृष्ट किया कर, सुखप्रद उद्योगों-धंधों को तुमने जन्म दिया आनंद- प्रदायक कितने ही धर्मों को-- सत्य खोजने जो आए हैं उनको सत्य दान में दी हो हमको भी स्वतंत्रता के प्रति आकांक्षा दी, तेरी जय हो॥५॥ मूल शीर्षक : 'जय भारत (रूपांतरकार: नागेश्वर सुंदरम्, विश्वनाथ सिंह विश्वासी)

सब शत्रुभाव मिट जाएँगे

भारत देश नाम भयहारी, जन-जन इसको गाएँगे। सब शत्रुभाव मिट जाएँगे॥ विचरण होगा हिमाच्छन्न शीतल प्रदेश में, पोत संतरण विस्तृत सागर की छाती पर। होगा नव-निर्माण सब कहीं देवालय का- पावनतम भारतभू की उदार माटी पर। यह भारत है देश हमारा कहकर मोद मनाएँगे। सब शत्रुभाव मिट जाएँगे॥1॥ हम सेतुबंध ऊँचा कर मार्ग बनाएँये, पुल द्वारा सिंहल द्वीप हिंद से जोड़ेंगे। जो वंग देश से होकर सागर में गिरते, उन जल-मार्गों का मुख पश्चिम को मोड़ेंगे। उस जल से ही मध्य देश में अधिक अन्न उपजाएँगे। सब शत्रुभाव मिट जाएँगे॥2॥ खोल लिया जाएगा, सोने की खानों को, खोद लिया जाएगा, स्वर्ण हमारा होगा। आठ दिशाओं में, दुनियाँ के हर कोने में सोने का अतुलित निर्यात हमारा होगा। स्वर्ण बेचकर अपने घर में नाना वस्तु मंगाएँगे। सब शत्रुभाव मिट जाएँगे॥3॥ डुबकी लगा करेगी नित दक्षिण सागर में लेंगी मुक्ताराशि निकाल हमारी बाँहें मचलेंगे दुनियाँ के व्यापारी, पश्चिम के- तट पर खड़े देखते सदा हमारे राहें कृपाकांक्षी बनकर वे हर वस्तु वाँछित लाएँगे। सब शत्रुभाव मिट जाएँगे॥4॥ सिंधु नदी की इठलाती उर्मिल धारा पर- उस प्रदेश की मधुर चाँदनीयुत रातों में। केरलवासिनि अनुपमेय सुदरियों के संग- हम विचरेंगे बल खाती चलती नावों में कर्णमधुर होते हैं तेलुगु गीत उन्हें हम गाएँगे। सब शत्रुभाव मिट जाएँये॥5॥ खूब उपजता गेहूँ गंगा के कछार में, तांबूल अच्छे हैं कावेरी के तट के, तांबूल दे विनिमय कर लेंगे गेहूँ का- सिंह समान मरहठों की ओजस् कविता के- पुरस्कार में उनको हम केरल-गजदंत लुटाएँगे। सब शत्रुभाव मिट जाएँगे॥6॥ ऐसे यंत्र बनेंगे, काँचीपुरम बैठकर- काशी के विद्वज्जन का संवाद सुनेंगे। लेंगे खोद स्वर्ण सब कन्नड प्रदेश का- जिसका स्वर्णपदक के हेतु प्रयोग करेंगे। राजपूतवीरों को हम ये स्वर्णपदक दे पाएँगे सब शत्रुभाव मिट जाएँगे॥7॥ यहाँ रेशमी वस्त्र बनाकर उन वस्त्रों की- एक बहुत ऊँची-सी ढेर लगा देंगे हम। इतना सूती वस्त्र यहाँ निर्माण करेंगे- वस्त्रों का ही एक पहाड़ बना देंगे हम। बेचेंगे काशी वणिकों को अधिक द्रव्य जो लाएँगे। सब शत्रुभाव मिट जाएँगे॥8॥ अस्त्र-शस्त्र का, कागज का उत्पादन होगा, सदा सत्य वचनों का हम व्यवहार करेंगे। औद्योगिक, शैक्षणिक शालाएँ निर्मित होंगी- कार्य में कभी रंच मात्र विश्राम न लेंगे। कुछ न असंभव हमें, असंभव को संभव कर पाएँगे। सब शत्रुभाव मिट जाएँगे॥9॥ छतरी बाड़े से, खीले से वायुयान तक- अपने घर में ही तैयार कराएँगे हम। कृषि के उपयोगी यंत्रों के साथ-साथ ही- इस धरती पर वाहन भव्य बनाएँगे हम। दुनियाँ को कंपित कर दें, ऐसे जलयान चलाएँगे। सब शत्रुभाव मिट जाएँगे॥10॥ मंत्र-तंत्र सीखेंगें, नभ को भी नापेंगे, अतल सिंधु के तल पर से होकर आएँगे। हम उड़ान भर चंद्रलोक में चंद्रवृत का- दर्शन करके मन को आनंदित पाएँगे। गली-गली के श्रमिकों को भी शस्त्रज्ञान सिखलाएँगे। सब शत्रुभाव मिट जाएँगे॥11॥ सरस काव्य की रचना होगी और साथ ही- कर देंगे चित्रित अति सुंदर चित्र चितेरे। हरे-भरे, होंगे वन-उपवन, छोटे धंधे- सुई से, बढ़ई तक के होंगे घर मेरे। जग के सब उद्योग यहाँ पर ही स्थापित हो जाएँगे। सब शत्रुभाव मिट जाएँगे॥12॥ मात्र जातियाँ दो, नरनारी अन्य न कोई, सद्वचनों से मार्गप्रदर्शक मात्र श्रेष्ठ है। अन्य सभी हैं तुच्छ कभी जो पथ न दिखलाते चिर सुकुमारी अपनी मधुर तमिल वरिष्ठ है। इसके अमृत के समान वचनों को हम अपनाएँगे। सब शत्रुभाव मिट जाएँगे॥13॥ मूल शीर्षक : 'भारत देशम्‌' (रूपांतरकार: नागेश्वर सुंदरम्, विश्वनाथ सिंह विश्वासी)

चलो गाएँ हम

हमारा नभ-चुंबी नगराज, विश्व में इतना ऊँचा कौन? हमारी ही भागीरथी पवित्र, नदी इतनी गौरवमय कौन? हमारे ही उपनिषद्‌ महान, श्रेष्ठतम कहे विश्व हो मौन। जहाँ की धरती ही दिन-रात स्वर्णकिरणों की चमक रही। चलो गाएँ हम 'भारत की समता में कोई देश नहीं'॥1॥ देश जो ऋषियों की तपभूमि, जहाँ पर उपजे वीर महान, जहाँ गूँजे नारद के गीत, जहाँ सद्विषयों का सम्मान जहाँ पर अतुल ज्ञान है भरा, दिए उपदेश बुद्ध भगवान। हिंद से अधिक, विश्व में कोई देश कहीं प्राचीन नहीं॥ चलो गाएँ हम 'भारत की समता में कोई देश नहीं'॥2॥ विघ्न-बाधाओं से क्यों डरें? दीन बन कष्ट न भोगें कभी। स्वार्थ में नीच कर्म क्यों करें? निराश न हों इस भू पर कभी। मूल, फल, कदली, पय, मधु, धान, भरे-पूरे भारत में सभी। आर्यजन की इस धरा समान, समुन्तत धरा न दूजी कहीं। चलो गाएँ हम 'भारत की समता में कोई देश नहीं'॥3॥ मूल शीर्षक : 'एंगल नाडु' (रूपांतरकार: नागेश्वर सुंदरम्, विश्वनाथ सिंह विश्वासी)

वन्देमातरम

आओ गाएँ 'वन्देमातरम'। भारत माँ की वन्दना करें हम । ऊँच-नीच का भेद कोई हम नहीं मानते, जाति-धर्म को भी हम नहीं जानते । ब्राह्मण हो या कोई और, पर मनुष्य महान है इस धरती के पुत्र को हम पहचानते । आओ गाएँ 'वन्देमातरम'। भारत माँ की वन्दना करें हम । वे छोटी जाति वाले क्यों हैं क्यों तुम उन्हें कहते अछूत इसी देश के वासी हैं वे, यही वतन, यहीं उनका वज़ूद चीनियों की तरह वे, क्या लगते हैं तुम्हें विदेशी ? क्या हैं वे पराए हमसे, नहीं हमारे भाई स्वदेशी ? आओ गाएँ 'वन्देमातरम'। भारत माँ की वन्दना करें हम । भारत में है जात-पाँत और हज़ारों जातियाँ पर विदेशी हमलावरों के विरुद्ध, हम करते हैं क्रांतियाँ हम सब भाई-भाई हैं, हो कितनी भी खींचतान रक्त हमारा एक है, हम एक माँ की हैं संतान आओ गाएँ 'वन्देमातरम'। भारत माँ की वन्दना करें हम । हम से है ताक़त हमारी, विभिन्नता में एकता शत्रु भय खाता है हमसे, एकजुटता हमारी देखता सच यही है, जान लो, यही है वह अनमोल ज्ञान दुनिया में बनाएगा जो, हमें महान में भी महान आओ गाएँ 'वन्देमातरम'। भारत माँ की वन्दना करें हम । हम रहेंगे साथ-साथ, तीस कोटि साथ-साथ डाल हाथों में हाथ, तीस कोटि हाथ साथ हम गिरेंगे साथ-साथ, हम मरेंगे साथ-साथ हम उठेंगे साथ-साथ, जीवित रहेंगे साथ-साथ आओ गाएँ 'वन्देमातरम'। भारत माँ की वन्दना करें हम । (रूपांतरकार: (कृष्णा की सहायता से), अनिल जनविजय)

रे विदेशियो! भेद न हममें

हम बंदे मातरम्‌ कहेंगे। बार-बार हाँ, बार-बार भारतभू की वंदना करेंगे। हम वंदे मातरम्‌ कहेंगे॥ ब्राह्मण कुल का हो या अछूत, जो भी है इस भू पर प्रसूत, है जन्मजात ही वह महान, सब जाति-धर्म, सब जन समान। ऊँच-नीच का भेद भुलाकर, जाति-धर्म का दम न भरेंगे। हम वंदे मातरम्‌ कहेंगे॥१॥ जो भी अछूत, क्या व्यर्थ सभी ? जन-जीवन में सार्थक न कभी ? क्‍या वे चीनी बन जाएँगे? हमको कुछ क्षति पहुँचाएँगे? यह नितांत दुःसाध्य, असंभव, ये न विदेशी कभी बनेंगे। हम वंदे मातरम्‌ कहेंगे॥२॥ सहस्र जातियों का देश हमारा, चाहेगा संबल न तुम्हारा। माँ के एक गर्भ से जन्मे, रे विदेशियो ! भेद न हममें। मनमुटाव से क्‍या होता है, हम भाई-भाई ही रहेंगे। हम वंदे मातरम्‌ कहेंगे॥३॥ वैर भाव है हममें जब तक, अध:पतन ही होगा तब तक। जीवन मधुमय बना रहेगा, यदि हममें संगठन रहेगा। यही ज्ञान यदि आ जाए तो, और अधिक हम क्या चाहेंगे? हम वंदे मातरम्‌ कहेंगे॥४॥ लेकर सबका सबल सहारा, होगा पूर्णोत्थान हमारा। ऊँचा जितना माथ रहेगा, उसमें सबका हाथ रहेगा। साथ रहेंगे तीस कोटि हम, साथ जिएँगे, साथ मरेंगे। हम वंदे मातरम्‌ कहेंगे॥५॥ दास वृत्ति करते आए हैं, नीच दास हम कहलाए हैं। गत जीवन पर लज्जित होएँ, चिर कलंक मस्तक का धोएँ। कर लें यह संकल्प कि पहले सरिस न हम परतंत्र रहेंगे। बार-बार हाँ, बार-बार भारतभू की वंदना करेंगे। हम वंदे मातरम्‌ कहेंगे॥६॥ मूल शीर्षक : 'वंदे मातरम्‌' (रूपांतरकार: नागेश्वर सुंदरम्, विश्वनाथ सिंह विश्वासी)

निर्भय

निर्भय, निर्भय, निर्भय ! चाहे पूरी दुनिया हमारे विरुद्ध हो जाए, निर्भय, निर्भय,निर्भय ! चाहे हमें अपशब्द कहे कोई, चाहे हमें ठुकराए, निर्भय, निर्भय,निर्भय ! चाहे हम से छीन ली जाएँ जीवन की सुविधाएँ निर्भय, निर्भय,निर्भय ! चाहे हमें संगी-साथी ही विष देने लग जाएँ निर्भय, निर्भय,निर्भय ! चाहे सर पर आसमान ही क्यों न फटने लग जाए निर्भय, निर्भय,निर्भय ! (रूपांतरकार: (कृष्णा की सहायता से), अनिल जनविजय)

वंदे मातरम्‌

जय भारत, जय वंदे मातरम्‌॥ जय-जय भारत जय-जय भारत, जय-जय भारत, वंदे मातरम्‌। जय भारत, जय वंदे मातरम्‌॥ एक वाक्य है केवल, जिसको दुहराना है, आर्यभूमि की आर्य नारियों नर सूर्यों को : वंदे मातरम्‌। जय भारत, जय वंदे मातरम्‌॥ एक वाक्य है केवल, जिसको दुहराना है, घुट-घुटकर मरते भी अति पीड़ित जन-जन को : वंदे मातरम्‌। जय भारत जय वंदे मातरम्‌॥ प्राण जाएँ पर चिर नूतन उमंग से भरकर केवल एक वाक्य गाएँगे हम सब मिलकर : वंदे मातरम्‌। जय भारत, जय वंदे मातरम्‌॥ जय-जय भारत, जय-जय भारत, जय-जय भारत, वंदे मातरम्‌। जय भारत, जय वंदे मातरम्‌॥ मूल शीर्षक : 'वंदे मातरम्‌' (रूपांतरकार: नागेश्वर सुंदरम्, विश्वनाथ सिंह विश्वासी)

नमन करें इस देश को

इसी देश में मातु-पिता जनमे पाए आनंद अपार, और हजारों बरसों तक पूर्वज भी जीते रहे-- अमित भाव फूले-फले जिनके चिंतन में यहीं। मुक्त कंठ से वंदना और प्रशंसा हम करें-- कहकर वंदे मातरम्, नमन करें इस देश को॥1॥ इसी देश में जीवन पाया, हमको बौद्धिक शक्ति मिली, माताओं ने सुख लूटा है, जीवन का वात्सल्य भरे-- मोद मनाया है यहीं जुन्हाई में हंसकर क्वाँरेपन का। घाटों पर, नदियों के पोखर के क्रीड़ाओं की आनंदभरी कहकर वंदे मातरम्, नमन करें इस देश को॥2॥ गार्हस्थ्य को यहाँ नारियों ने पल्लवित किया है, गले लगाया है जनकर सोने के-से बेटों को-- भरे पड़े हैं नभचुंबी देवालय भी इस देश में। निज पितरों की अस्थियाँ इस माटी में मिल गईं- कहकर वंदे मातरम्, नमन करें इस देश को॥3॥ मूल शीर्षक : 'नाट्टु वणक्कम्‌' (रूपांतरकार: नागेश्वर सुंदरम्, विश्वनाथ सिंह विश्वासी)

भारत सर्वोत्कृष्ट देश है

भारत स्वोत्कृष्ट देश है। निखिल विश्व में, अपना सर्वोत्कृष्ट देश है। भारत सर्वोत्कृष्ट देश है। भक्ति, विराग, प्रचंड ज्ञान में, स्व-गौरव में, अन्न-दान में अमृतवर्षक काव्य गान में भारत सर्वोत्कृष्ट देश है॥1॥ धैर्यशक्ति में, सैन्य शक्ति में परोपकार, उदार भाव में, सार शास्त्रों के ज्ञान-दान में-- भारत सर्वोत्कृष्ट देश है॥2॥ नेकी में, तन की क्षमता में संस्कृति में, अपनी दृढ़ता में स्वर्ण-मयूरी पतिव्रता में-- भारत सर्वोत्कृष्ट देश है॥3॥ नव रचनात्यक कार्यों में रत उद्योगों में परमोत्साहित, भुजबल और पराक्रममंडित- भारत सर्वोत्कृष्ट देश है॥4॥ अति महान आदर्शोंवाला, अवनीरक्षा का मतवाला, सिंधु सदृश बृहद्‌ अनी वाला- भारत सर्वोत्कृष्ट देश है॥5॥ मेधाशक्ति, मनोदृढ़ता में, शुभ संकल्प, कार्यक्षमता में, सत्य भावमय ध्रुव कविगण में-- भारत सर्वोत्कृष्ट देश है॥6॥ याग-यज्ञ में, तपस्‌ तेज में; ईशोपासन, योग- भोग में; उत्तम दैवप्रदत्त ज्ञान में- भारत सर्वोत्कृष्ट देश है॥7॥ वृक्षराशि, वन भाग के लिए, अधिक उपज, फलप्राप्ति के लिए, अक्षुण्ण निधि आगार के लिए-- भारत सर्वोत्कृष्ट देश है॥8॥ मूल शीर्षक : भारत नाडु (रूपांतरकार: नागेश्वर सुंदरम्, विश्वनाथ सिंह विश्वासी)

जयगान

हम करेंगे आज भारत देश का जयगान। द्वेध दुख का अंत होगा, अब न त्रास दुरंत होगा, अब फहरेगा हमारा एक विजय निशान! हम करेंगे आज भारत देश का जयगान ! यश का गान ! रजत श्रंग तुषार शेखर, तुंग यह हिमवान गिरिवर, हम यहां निर्दवंद्व होकर, बनेंगे गतिवान ! हम करेंगे आज भारत भूमि का जयगान ! यश का गान ! पोत-दल शत शत तरेंगे, पश्चिमी सागर भरेंगे, गर्जना में ध्वनित होगा, देश गौरव मान ! हम करेंगे आज भारत देश का जयगान ! यश का गान! बने विद्या भवन शोभन, देव मंदिर से सुपावन हम करेंगे देश भारत, ज्ञान वृद्ध महान ! हम करेंगे आज भारत देश का जयगान ! यश का गान ! (शब्दार्थ: द्वेध-दो प्रकार के, त्रास-दुख, तुषार शेखर-बर्फ का घर , हिमालय, पोत दल-नौकादल, रजत श्रृंग-चांदी जैसी चमकीली चोटियां, निर्द्वन्द्व-जिसका कोई विरोधी न हो।)

आज़ादी का एक 'पल्लु'

(वह लोकगीत, जो शोषित ’पल्लु जाति के लोग गाते हैं।) आज़ादी ले ली है हमने, इसकी ख़ुशी मनाएँ आओ नाचें और पल्लु गाएँ । वे दिन अब दूर हुए जब ब्राह्मण मालिक कहलाता जब गोरी चमड़ी वाला कोई बनता था हमारा आका जब झुकना पड़ता था हमको उन नीचों के आगे धोखे से गुलाम बनाकर हम पर जो गोली दागे आओ नाचें और पल्लु गाएँ आज़ादी ले ली है हमने, इसकी ख़ुशी मनाएँ आओ नाचें और पल्लु गाएँ । आज़ादी ली है हमने, बात हमारे हक़ की अब हम सभी बराबर हैं, यह बात हो गई पक्की विजयघोष का शंख बजाकर चलो, विश्व को बतलाएँ आज़ादी ले ली है हमने, इसकी ख़ुशी मनाएँ आओ नाचें और पल्लु गाएँ आज़ादी ले ली है हमने, इसकी ख़ुशी मनाएँ आओ नाचें और पल्लु गाएँ । बहा पसीना तन का अपने, जो खेतों में मरता उठा हथौड़ा, कर मज़दूरी, उद्योगों में खटता उसकी जय-जयकार करेंगे, हम उस पर सब कुछ वारें जो हराम की खाता है, उसको हम धिक्कारें नहीं झुकेंगे, नहीं सहेंगे, शोषण को मार भगाएँ आओ नाचें और पल्लु गाएँ आज़ादी ले ली है हमने, इसकी ख़ुशी मनाएँ आओ नाचें और पल्लु गाएँ । अब यह धरती हमारी ही है, हम ही इसके स्वामी इस पर काम करेंगे हम सब, हम हैं इसके हामी अब न दास बनेंगे हम, न दबना, न सहना जल-थल-नभ का स्वामी है जो, उसके होकर रहना केवल उसको मानेंगे हम, उसको ही अपनाएँ आओ नाचें और पल्लु गाएँ आज़ादी ले ली है हमने, इसकी ख़ुशी मनाएँ आओ नाचें और पल्लु गाएँ । (तमिल से अनुवाद (कृष्णा की सहायता से) : अनिल जनविजय)

जा, जर्जरित भारत, जा ! आ, नवभारत, तू आ !

ओ दुर्बल कन्धोंवाले, भारत ! जा जा जा, जा तू भाग ! ओ दबे हुए सीनेवाले, भारत ! जा जा जा, जा तू भाग ! ओ तेजहीन मुखवाले, भारत ! जा जा जा, जा तू भाग ! ओ निष्प्रभ आँखोंवाले, भारत ! जा जा जा, जा तू भाग ! ओ कातर, दीन-हीन वाणी वाले जा जा जा, जा तू भाग ! ओ कान्तिहीन तनवाले भारत ! जा जा जा, जा तू भाग ! ओ भयभीत दिलवाले, भारत ! जा जा जा, जा तू भाग ! ओ ओछी-छूछी हरकतों वाले, भारत ! जा जा जा, जा तू भाग ! आ आ आ, आ तू आ ! कान्तियुक्त आँखों वाले भारत आ ! आ आ आ, आ तू आ ! दृढ़ संकल्पोंवाले भारत आ ! आ आ आ, आ तू आ ! मनमोहक वाणीवाले भारत आ ! आ आ आ, आ तू आ ! ताक़तवर कन्धोंवाले भारत आ ! आ आ आ, आ तू आ ! निर्मल मति-गति वाले भारत आ ! आ आ आ, आ तू आ ! ओछेपन को देख खौलनेवाले भारत आ ! आ आ आ, आ तू आ ! दीनों के दुख में रोनेवाले भारत आ ! आ आ आ, आ तू आ ! वृषभ शान से चलनेवाले भारत आ ! आ आ आ, आ तू आ ! फिर कहीं नहीं जा यहीं रह जा ! (तमिल से अनुवाद (कृष्णा की सहायता से) : अनिल जनविजय)

कन्नम्मा, मेरी प्रिया-1

चान्द और सूरज सी उज्ज्वल हैं तेरी आँखें कन्नम्मा ! आसमान में उड़ने वाला कँवल हैं तेरी पाँखें कन्नम्मा ! इन गोल काली आँखों में समाई आकाश की सारी कालिमा ! मुखड़े पर तेरे फैली सुखदाई सुबह के सूरज की लालिमा ! रत्न जड़ी है वो गहरी नीली रेशम की तेरी कान्तिमय साड़ी ! आधी रात में सितारों भरी जैसे चमक रही आकाशगंगा हमारी ! तेरी मुस्कान में झलक रही है उजली धूप गुनगुनी तेरे कण्ठ से फूटे कोयल की मोहक कूक सी रागिनी तेरे दिल की धड़कन में ज्यों गूँजें महासागर की लहरें सुनाई दे रही हैं मुझको तेरे मन-गीत की सब बहरें ओ सदानीरा, ओ नवयौवना तू मेरी है, प्रिया कन्नम्मा ! आ, तुझे आलिंगन में लूँ ओ सजनी, रसिया, कनम्मा ! (तमिल से अनुवाद (कृष्णा की सहायता से) : अनिल जनविजय)

भारतमाता

जिसने लंका के निशाचरों का हनन किया वह धनु किसका है ? वह धनुष आर्य रानी ! भयंकरी ! अपनी भारत देवी का॥1॥ जिसने दो टुकड़े इंद्रजीत के कर डाला वह धनु किसका है ? वह मंत्रमुग्ध करनेवाली भैरवी! हमारी जननी का॥2॥ 'परब्रह्म एक', हम पुत्र सभी, जग सुखमय तरणी के समान । वेदादि ग्रंथ में लिखनेवाले भारत माँ के कर महान॥3॥ अयं सिद्ध, जग सत्य, चित्त में स्थिर हो जाय तो सब ही- बाधाओं पर पा सके विजय, यह कथन आर्य रानी ही का॥4॥ केहरि शावक के साथ खेल, उज्ज्वल यश भारत रानी का- उज्ज्वलतर करता शकुंतला - शिशु, निज भारत माँ ही का॥5॥ गांडीव पार्थ की चढ़ा, विश्वविजयी पत्थर स्कंध किसका ? जो हम सबका पालन-पोषण करती उस भारतजननी का॥6॥ मरणासन्न समय में भी निज कुंडल दे डाले पर किसके ? वे कर की मधुरिम भाषा में कवि वर्णित निज भारतमाता के॥7॥ युद्धभूमि में ज्ञानमयी गीता का गायक था मुख जिसका ? वह शत्रुता - विनाशक ज्ञानप्रदायक मुख भारतमाता का॥8॥ सुख के लिए पिता के, सुख- शासन का और मोद दारा का- कभी न चाहूँ जग में, कहनेवाला अंतर निज माँ का॥9॥ 'शिव है प्रेम' विश्व-दुख मिट सकता है सारा प्रेम मात्र से- वचन तथागत के निकले थे भारतमाता के ही मुख से॥10॥ मिथिला जलती है सुनकर भी, वेद तत्त्व सुनते विदेह की- निज चिंतन से कार्य करे जो मति, वह मति भारतजननी की॥11॥ यह दैविक शकुंतला नाटक, किसकी मधुर काव्य-रचना है ? यह भारत देवी, सर्वज्ञ हमारी माता की कविता है॥12॥ मूल शीर्षक : 'भारतमाता' (रूपांतरकार: नागेश्वर सुंदरम्, विश्वनाथ सिंह विश्वासी)

भारत माँ की गुरुता

क्षमतामय सर्वज्ञ और जो भूतकाल का ज्ञाता, वह भी सोच नहीं सकता कब जन्मी भारतमाता॥1॥ है इतनी प्राचीन कि कह सकना आसान नहीं है, पर माता जग में चिरकुमारी ही सभी कहीं है॥2॥ तीस कोटि मुख, प्राण एक, यह भारत माँ की गुरुता। एक चिंतन किंतु अठारह भाषाओं की क्षमता॥3॥ वेद-वाक्य जिह्वा पर कर में खड्ग सुमंगलकारी । दुष्ट-दलन, शरणागत रक्षा हित सुबाहु बलधारी॥4॥ निरत धर्मरक्षा में माँ की साठ करोड़ भुजाएँ । टुकड़े-टुकड़े कर देंगी जो शत्रु युद्ध को आएँ॥5॥ सहृदय और सहिष्णु, क्षमा में माँ धरती से आगे । पर चंडीरूपा आक्रामक अन्यायी के आगे॥6॥ चंद्रमौलि तपसी को, सिर पर जटाजूटधारी को- नमन करेगी सप्त लोकपालक सुचक्रपाणि को॥7॥ मानें एक ब्रह्म की सत्ता, अद्वितीय योगिनि है । अनुपमेय ऐश्वर्य समन्वित एक महाभोगिनि है॥8॥ धर्मपाल शासक का भला करेगी करुणा देकर । हो भक्षक तो नृत्य करे आनंदित उसे निगलकर॥9॥ है नगपति की शालिनी तनुजा, फुफकारती रहेगी। मिटे हिमालय की सब शक्ति, न माँ की कभी मिटेगी॥10॥ मूल शीर्षक : 'एंगळ ताय' (रूपांतरकार: नागेश्वर सुंदरम्, विश्वनाथ सिंह विश्वासी)

उन्मादिनी माँ

अति भयावह रूप देखो मातु का है हमारी माँ प्रबल उन्मादिनी । यह करेगी प्यार शिव उन्मत्त को हाथ में जो तीव्र ज्वाला है लिए॥1॥ उस मधुर संगीत सागर की प्रबल- मचलती - सी उर्मियों की बाढ़ में पुलक अवगाहन करेगी डूबकर मोद में गोता लगाएगी सदा॥2॥ अमृतवर्षी कविता उपवन में जहाँ पवन नित दैविकसुगंधि लिए चले। पहन हार परागपूर्ण प्रसून का माँ करेगी नृत्य, कर में जाम ले॥3॥ जान लो, यह वेदध्वनि उच्चारती सत्य का ले शूल नाचेगी सदा । मनन कर पठनीय शास्त्रों को सभी वपन कर देगी जगत के सामने॥4॥ महाभारत युद्ध क्या कुछ खेल है? प्रकट होगी पार्थ की गांडीव में। काट क्षण में कोटि रिपुओं को सदा- माँ मगन डूबी रहेगी रक्त में॥5॥ मूल शीर्षक 'वेरिकोंड ताय' (रूपांतरकार: नागेश्वर सुंदरम्, विश्वनाथ सिंह विश्वासी)

भारतजननी री ! जाग री !

भारतजननी री ! जाग री ! पौ फटी निबिड़तम दूर हुआ, धरती से हम सबके तप से । कनकाभा फैली, बुद्धि-सूर्य भी दीप्त हो उठा है अब से। करके स्तुति पुनः नमन करने के लिए तुम्हें भारत जननी- हैं यहाँ सहस्र स्वयंसेवक भी खड़े प्रतीक्षा में कब से॥ आश्चर्य यही तुम अब भी सोती हो री ! माता जाग री ! भारतजननी री ! जाग री !॥1॥ बज उठे विशाल नगाड़े, पक्षीकुल चहचह कर कूज रहा। हो उठे निनादित धवल शंख, रव स्वतंत्रता का गूँज रहा। आने-जाने हैं लगीं रमणियाँ, पथ मुखरित पदचापों से- ब्राह्मण कुल वेद- निपुण तेरा संकीर्तन सबको सुना रहा॥ हे अमृत वर्षिणि! मातु हमारी, प्राण प्यारी, जाग री ! भारतजननी री ! जाग री !॥2॥ दीपित दिनकर का तेजोमय स्वरूप देखा हमने नभ में। वैसी ही तेरी ज्योति विश्व में देखें यह इच्छा मन में । तेरी पद सेवा हेतु पके फल-सा मृदु अंतर ले आए- तुमसे सुसंस्कृति कोटि शास्त्र एवं श्रुतियाँ पाई जग में॥ ले शत्रु प्रकंपित करनेवाले शूल निर्मले ! जाग री ! भारतजननी री ! जाग री !॥3॥ क्या नहीं जानती, दृग सौंदर्य देखने को हे माँ तेरे- कितनी आकांक्षाएँ उमड़ा करतीं अंतर्मन में मेरे। हे कनक वर्णवाली माता, धवलित हिमगिरि की तपजाया- कितने युग तप करके भी लाले होंगे तव कृपा के रे? क्या सत्य ही अब तक है तू सोई प्राणप्यारी जग री ! भारतजननी री ! जाग री !॥4॥ क्या उचित कि हम शिशु जगा रहे, लेकिन री जननी तू सोती ? भू-अधिष्ठात्री ! तुतली वाणी पर न द्रवित जो माँ होती ? गो-मातु ! देशवाणी !! करते स्तुति अठारहों भाषाओं में अपना कर देती कृतार्थ तो सबकी मनस्तृप्ति होती । क्या नहीं सुन रही तुम यह सब, वात्सल्य भरी माँ जाग री ! भारतजननी री ! जाग री !॥5॥ मूल शीर्षक : 'भारतमाता तिरुप्पळ्ळि ऍळूच्चि' (रूपांतरकार: नागेश्वर सुंदरम्, विश्वनाथ सिंह विश्वासी)

भारत माँ के पवित्र दशांक

1. नामकरण हरित वर्णवाले प्रिय तोते! उस माता का नाम बता, जिसने मुझ से पापी को भी श्रेष्ठ योग का ज्ञान दिया। पूर्ण ज्ञान का कीर्तिरूप दीपक जिसने प्रज्ज्वलित किया- इस धरती पर भारतमाता ही वह माता है, तू गा । 2. देश मृदुल कंठवाले तोते! उस स्वर्ण देश का नाम बता, देवी मेरे लिए जहाँ की बनी प्रकट आनंद समान । नभचुंबी नगराज हिमालय से कन्याकुमारी तक- फैला विस्तृत आर्य देश ही है वह देश, इसे तू जान । 3. नगर तुतली वाणीवाले शुक! हम सबकी प्राणप्यारी माँ, हम सबके क्षेमार्थ व्यस्त नित किस नगरी में रहती है ? प्राप्त अहं ब्रह्मास्मि ज्ञान को, योगी जहाँ विचरते हैं- प्राणों से बढ़कर प्रिय काशी नगरी ही, वह नगरी है। 4. नदी अरे रँगीले तोते! वंदे माँ कहकर स्तुति करें अगर- तो विनाश से बचा, क्षेमदायक सरिता है कौन कहो ? निज पथ पर सत्कार्य और सद्धर्म, स्वर्ण उपजानेवाली, गंगा यहाँ गगन से आई, उसका गुणगान करो । 5. पर्वत हे वाटिकाविहारी तोते! इतना तो तू मुझे बता - निज तनुजा को अंक समेटे, चतुर्वेदधारी गिरि कौन ? अद्वितीय जग के शृंगों में, सबसे उच्च गगनचुंबी । कांतियुक्त द्युति धवल, हिमालय ही वह गिरि है देखो । 6. वाहन तोते बता प्रमत्त शान में और परम ऐश्वर्य में पगी- मातु हमारी किस वाहन पर चढ़कर मार्ग चला करती है रथ पर अथवा अश्व पर नहीं, विश्व प्रंकपित करनेवाले- केहरि पर होकर आरुढ़ सदा पर्यटन किया करती है। 7. सेना शुक रे! माता अति कृपालु है, फिर भी कभी कुपित होनेपर, शत्रु समूल संहार करे जो, उसकी वह वाहिनी कौन है ? केवल अपने दृष्टिपात से, निज प्रतिद्वंद्वी आक्रामक कर; उसे समूच विनष्ट करे जो, ऐसा ही वह वज्रायुध है। 8. नगाड़ा प्यारे तोते! निज माता के यहाँ सदा प्रशस्त आँगन में- यह निनाद करता रहता है, मुझे बता कौन नगाड़ा ? सत्यवद, धर्मम्चर ऐसे शब्दों से गुंजायमान जो- जीव मुक्ति देनेवाला वह वेदस्वरूप विशाल नगाड़ा। 9. माला आओ ! शुक! बतलाओ निज भक्तों को अतुलित सुख की दाता- माता सदय, कंबु ग्रीवा में कौन माल धारण करती है ? रिपुओं से पार्थक्य, मात्र मुस्क्यान पसार, मिटानेवाली- जननी, कनक कमल की माला पहन सदैव जगमगाती है । 10. पताका मोती सदृश वर्णवाले शुक ! कह शत्रुता और अन्याय, खंडित करनेवाली माँ की कौन समुज्ज्वलविजय ध्वजा ? परिपालन हित शिष्ट जनों के, दुष्ट जनों के निग्रह हित- वज्र सदृश जाज्वल्यमान जो ध्वजा, वही वह अटल ध्वजा । मूल शीर्षक : 'भारत देवियिन् तिरुत्दशांगम्' (रूपांतरकार: नागेश्वर सुंदरम्, विश्वनाथ सिंह विश्वासी)

भारतमाता की नवरत्नमाला

मंगलाचरण तीस कोटि वीरों की जननी, भारत माँ के कमल चरणों में, मैं यह नव रत्नों की माला सादर अर्पित करता हूँ। शिव के रत्नपुत्र ! मेरी भव बाधाओं को दूर करे । 1 आँखों की पुतली हे भारत! तेरे नामोच्चारण से, उत्तम नग-सा कांतियुक्त तन, धर्मनिष्ठ मति, चिंतन शक्ति, और अनेकानेक लाभ हम प्राप्त करेंगे बिना प्रयास । 2 नील सिंधुरूपा त्रिनेत्र, जो सेतु बनाती समयसिंधु पर, उसका पादस्पर्श करें तो हमसे यम कँपाएगा थर-थर । भयाक्रांत यम को काया, पर जोड़ेगी, भग जाएगी, कहाँ शत्रुता में क्षमता, जो हमसे आँख लड़ाएगी ? 3 मोती से विशुद्ध मणि वचनों को कहकर सबके पास तुमने रचे पुराण, उपनिषद, वेद और अनगिन इतिहास कितने ज्ञानयुक्त शास्त्रों का सृजन किया री ! महासमर्थ हम जिनकी स्तुति और प्रशंसा करने में भी हैं असमर्थ देखो माँ, सब ज्योतिपुंज बन यत्र-तत्र जगमगा रहे हैं ये वास्तविक विजय विभुवर के, काल से परे, अमर देन हैं। 4 धवल शंख फूँकों सब जय-जयकार करो सदा ज्ञानियों से यह वसुंधरा रक्षित है, सुनो, मानते रहे आज तक वीर अधर्मी बुद्धि वास्तविक कार्य बुद्धिमानों के जग में, शीर्ष मुकुट में धारण करना अनाचार को- और बनाकर रखना दास मनुष्य मात्र को । नीच शासकों ने कलंकिनी शैन्य शक्ति से- ओछे न्यायविधान घर पर रच डाले थे। किंतु आज भारत ने दुनियाँ के समक्ष यह नया धर्म प्रस्तुत कर हमें चेतना दी है। कान खोलकर सुनो, ध्यान दो उन वचनों पर- मधुर प्रवालों-सी कविता के सर्जनकर्ता विश्व कवींद्र रवींद्र ने कहा था जिन्हें, गांधी अवतरित हुए हैं आदर्श पुरुष के रूप में। पावन भारत धरती पर धर्मावतार के रूप में। राजनीति के धर्म में पथनिर्देशक मान, वेदवाक्य इनका सुन, 'केवल सत्य महान' राजनीति के परे भी जितने जग के काम- सदा विजय पाता है, उनमें सत्य ललाम ! वेदनाद जो अधर से बापू के झरते रहे। पालन उनका अंत तक अक्षरशः करते रहे। हम देखेंगे शीघ्र ही, रक्षा संभव विश्व की- सदा ज्ञानियों से हुई, आगे होती रहेगी। रक्षक केवल धर्म है, सैन्य शक्ति असमर्थ, चूर-चूर हो जाएगी, हो जाएगी व्यर्थ । धवल शंख फूँको सब जय-जय नाद करो । सदा ज्ञानियों से यह वसुंधरा रक्षित है। 5 जयध्वनि बोलो मनोवांछा नभ में गूँज उठे। धर्म, बृहद् नादों से हवा निनादित लहर उठे॥ कांतियुक्त मणिक्य अहिंसा और सत्य के । धर्म रूप में हमने अपनाए हैं बढ़के॥ हमें न अब पीड़ा सहनी है, यह निश्चित है। हमें प्राप्त होगी स्वतंत्रता, यह निश्चित है॥ 6 सुदृढ़ जान लो अपने मन में, मन की बात हमारी । शपथ कृष्ण केपादकमल की मरकत छायाधारी॥ दूषित नहीं, अगर जन-जन का मन पवित्र है । स्वतंत्रता उपलब्ध हमें होगी निश्चित है॥ 7 हम स्वतंत्रता प्राप्त करेंगे, जय पाएँगे अहिंसात्मक क्रांति बढ़ाता रहा बोलकर, पतन और शैथिल्य नहीं सेवक को जैसे- उष्ण-शीत का भान नहीं होता आत्मा को । धर्मयुद्ध के लिए कटिबद्ध रहो तुम कहता रहता सबसे यही प्रतिज्ञा साधी करता रहता है जयनाद सभी के आगे- गौमेतक सा महत् हमारा नेता गांधी । 8 फेरे कृपा, कटाक्ष खड़ी, स्वर्णिम भारत पर, करती सदा निवास कांतियुत जो देवी श्री- पदमराग मणि सदृश सुगंधित पुष्पराशि में। भूल ही गए नर, शैथिल्य और निज भय को— क्योंकि सभी ने गांधी का जयघोष सुना है। 9 ज्वालामय वैदूर्य सदृश आँखों से शोभित— सिंह पर सदा विचरण करनेवाली माता । क्षण-भर के ही लिए हमारे सम्मुख आओ । कृपाकांक्षी देशों की कर दूर यातना दिव्यस्वरूपा, मुस्क्याकर आनंद सिंधु में हमें डुबाओ । मूल शीर्षक : 'भारतमाता नवरत्तिन मालै' (रूपांतरकार: नागेश्वर सुंदरम्, विश्वनाथ सिंह विश्वासी)

भारत माँ की ध्वजा

यह बहुमूल्य ध्वजा भारत माँ की है देखो आओ। सब मिल करके श्रद्धा और विनय से शीश झुकाओ॥ कितना ऊँचा ध्वज स्तंभ है यह वंदे मातरम् लिखित है- चमक रहा जो, फ़हर रही किस गति से दृष्टि टिकाओ । सब मिल करके श्रद्धा और विनय से शीश झुकाओं॥1॥ यह न मात्र रेशमी वस्त्र है। झंझावातों से न त्रस्त है - तूफानों से भी अविचल उड़ती है मोद मनाओ। सब मिल करके श्रद्धा और विनय से शीश झुकाओ॥2॥ यहाँ इंद्र का वज्रायुध है। यहाँ तुरक का अर्धचंद्र है- वंदे माँ है मध्य, अमित गति का अनुमान लगाओ। सब मिल करके श्रद्धा और विनय से शीश झुकाओ॥3॥ देखो ध्वजास्तंभ के नीचे अद्भुत जन-समूह दृग मीचे ये योद्धा कहते तन देकर ध्वज की आन बचाओ । सब मिल करके श्रद्धा और विनय से शीश झुकाओ॥4॥ पंक्तिबद्ध यह दृश्य मनोहर, युद्ध कवच शोभित छाती पर - वीर शौर्यमय कितने चित्ताकर्षक हमें बताओ। सब मिल करके श्रद्धा और विनय से शीश झुकाओ॥5॥ मधुर तमिलभाषी नर योद्धा, रक्तिम आँखों वाले क्षत्रिय केरल वीर, मातृपद सेवक तुळुभाषी, तैलंग युद्धप्रिय॥6॥ यम को त्रास दिखानेवाले- वीर मरहठे, रेड्डी - कन्नड । जिनकी देव प्रशंसा करते- वे हिंदी भाषी योद्धा गण॥7॥ जब तक धरती, धर्म-युद्ध है, हिंदी नारियों में सतीत्व है। वे राजपूत अटल जिनकी इस- भू पर तब तक अमर कीर्ति है॥8॥ वीर सिंधुवासी जिनको - अभिमान 'पार्थ की भू पर रहते ' वंगनिवासी जो न भूलते- माँ की सेवा मरते-मरते॥9॥ ये सब देखो यहाँ खड़े हैं। करके दृढ संकल्प अड़े हैं। इनकी शक्ति और सबसे पूजित ध्वज की जय गाओ । सब मिल करके श्रद्धा और विनय से शीश झुकाओ॥10॥ मूल शीर्षक : 'तायिन् मणिक्कोडि' (रूपांतरकार: नागेश्वर सुंदरम्, विश्वनाथ सिंह विश्वासी)

वर्तमान भारतीय

देख आज के जन की हालत, हृदय फटा जाता है। भय के कारण दुनियाँ में जीते - जो मरा करेंगे। कोई ऐसी वस्तु नहीं जो देखे नहीं डरेंगे । उनके दिन दंभ, प्रतिकार, कपट के दैत्य खड़े हैं। इस तरुवर, उस तरुवर, उस खंडहर में छिपे पड़े हैं॥ यही सोच करके मानव अब क्लांत हुआ जाता है। देख आज के जन की हालत, हृदय फटा जाता है॥1॥ तांत्रिक का तो नाम मात्र सुनकर घबरा जाएँगे । 'ओझा' और 'मदारी', 'जादूगर' सुन थर्राएँगे । शक्ति हमारी ले हम पर ही शासन जो करते हैं। मानव ऐसे राजनीतिज्ञों से भी अब डरते हैं। उनको भूत समझकर जिनका खून सूख जाता है। देख आज के जन की हालत, हृदय फटा जाता है॥2॥ देख सिपाही, चौकीदार, दिल धड़क-धड़क जाएँगे । कोई ले बंदूक चले तो घर में छिप जाएँगे । देखें यदि अति दूर सुसज्जित किसी व्यक्ति को आते। भय के मारे हाथ जोड़कर स्वयं खड़े हो जाते। सबके आगे भीगी बिल्ली बन जाया करता है। देख आज के जन की हालत, हृदय फटा जाता है॥3॥ फटता हृदय कहूँ क्या, हमें कितने भेद यहीं हैं। एक कोटि यदि कहा जाय तो कुछ अत्युक्ति नहीं है। पुत्र अगर कहता है, है नागेश पाँच सिरवाला । और पिता कह दे छः सिर, भारी अंतर कर डाला । इतने अंतर से ही उनमें वैर बढ़ा जाता है। देख आज के जन की हालत, हृदय फटा जाता है॥4॥ शास्त्र न पढ़, दंभी शास्त्री पिशाच का मत मानेंगे। अंतर पड़ने पर स्वगोत्र को गाली दे डालेंगे। छली, प्रपंची कपट की वे सेवा तक करते हैं। मुक्त कंठ से करें प्रशंसा और नमन करते हैं। व्यक्ति-व्यक्ति वह शैव, अमुक वैष्णव कहता लड़ता है। देख आज के जन की हालत, हृदय फटा जाता है॥5॥ हृदय फटा जाता है पर मैं घृणा नहीं कर पाता । हाय ! अभागों को न अन्न, भर पेट कभी मिल पाता । ये कारण जानने के लिए यत्न नहीं करते हैं। जहाँ देखिए है अकाल, सब तड़प-तड़प मरते हैं। उनके कष्ट-हरण का पथ ही दृष्टि नहीं आता है। देख आज के जन की हालत, हृदय फटा जाता है॥6॥ शक्ति नहीं चलने की, ग्रस्त सदा रहते रोगों से । पर वे दिखाए पथ पर चलते शिशु-से, अंधों-से । चार हजार करोड़ से अधिक रंग-बिरंगी मधुर कलाएँ- जनमीं जिस भारतभू पर, जिन पर सब जग में गर्व मनाएँ । उसमें व्यक्ति विवेकहीन पशु-सा जीवन जीता है। देख आज के जन की हालत, हृदय फटा जाता है॥7॥ मूल शीर्षक : 'भारत जनंगाकिन् तरकाल निलैमै' (रूपांतरकार: नागेश्वर सुंदरम्, विश्वनाथ सिंह विश्वासी)

जानेवाला भारत : आनेवाला भारत

जानेवाले भारत के प्रति कटुवचन निर्बल कंधों वाले भारत! तू जा जा जा । दुर्बल मानसवाले भारत! तू जा जा जा । हे कांतिरहित मुखवाले भारत! तू जा जा जा । तू हे निस्तेज नेत्रवाले! तू जा जा जा । कुंठित तेरा है कंठ हिंद ! तू जा जा जा । है क्षीण तुम्हारी कांति हिंद ! तू जा जा जा । तुम शंकाकुल अंतरवाले हो, जा जा जा । तुम सदा दासता के इच्छुक हो, जा जा जा॥1॥ मान और अपमान-शून्य कुत्ते के जैसा- आज तुम्हारा जीवन भारत ! जा जा जा । भय के कारण कर न सकी कृतज्ञता ज्ञापित- चाटुकारिता करनेवाले, जा जा जा। बीते जीवन के असत्य को सत्य मानकर उसकी मुक्त प्रशंसा करते जा जा जा । जगत्प्रसिद्ध सत्य को प्रबल असत्य बताकर दुनियाँ के सम्मुख ला धरते, जा जा जा॥2॥ दुनियाँ की अनगिन भाषाओं को सीखोगे- किंतु न सीखोगे निज भाषा, जा जा जा । पढ़ डालोगे ग्रंथ सैकड़ों, किंतु एक भी— ग्रंथ सत्यभाषी न पढ़ोगे, जा जा जा। पाँच सैकड़े मत-मतांतरों की चर्चा में- सदा व्यस्त रखोगे निज को, जा जा जा । तू असंख्य दुर्गंध और कीचड़ ला- लाकर अपने घर में भर डालोगे, जा जा जा॥3॥ सैकड़ों जातियाँ कहनेवाले, जा जा जा, एक तू धर्म स्थापित न करेगा, जा जा जा । करके चर्चा सैकड़ों उचित आदर्शों की- पैसे के कारण पाँव पड़ेगा, जा जा जा । अत्याचारी बन नहीं डरेगा सम्मुख ही अत्याचारों को देख भगेगा, जा जा जा । तू ज्योतिर्मय माणिक्य के सदृश है भारत- पर समय चक्र में धूल-धूसरित, जा जा जा॥4॥ आनेवाले भारत की प्रशस्ति कांतियुक्त आँखों वाले, आ आ आ । भारत ! सुदृढ़ हृदय वाले तू आ आ आ । अमृत के समान मृदुभाषी, आ आ आ। वज्र स्कंधयुक्त भारत, तू आ आ आ। भारत परम शुद्ध मति वाले, आ आ आ । देख नीचता खौल उठेगा आ आ आ । पिघल उठेगा देख दीनता आ आ आ। वृषभ चाल वाले भारत, तू आ आ आ॥5॥ सत्ययुक्त ग्रंथों को ही वेद मानकर - उनकी स्तुति करता जाएगा आ आ आ । तू असत्य से डरनेवाला, आ आ आ । फेंकेगा अश्लील ग्रंथ, तू आ आ आ । तू शैथिल्य रहित चिंतनमय! आ आ आ । हे आरोग्य तन वाले भारत, आ आ आ । इस धरती से देव श्राप को दूर हटाकर- अति उत्कृष्ट बनानेवाले, आ आ आ॥6॥ आओ अरे युवक भारत ! तू आ आ आ । अद्वितीय बलशाली भारत! आ आ आ । यह निस्तेज देश है, इसमें प्रातसूर्य-सी- प्रतिमा लेकर ज्योतिर्मय, तू आ आ आ कांतिरहित यह देश, अपरिमित रूप में इसे- कांतिदान करनेवाले, तू आ आ आ । पार्थ के सदृश, घटित सभी घटनाओं को निज- नेत्रों में दिखलानेवाले आ आ आ॥7॥ जयी हाथ वाले भारत! तू आ आ आ । विनययुक्त जिह्वावाले, तू आ आ आ । पूरण ब्रह्म भारत ! रे आ आ आ। निखिल पदार्थों के प्रतीक, तू आ आ आ । प्राप्त ज्ञान के सार्थक कर्ता आ आ आ । मनोनुकूल रूप-निर्माता आ आ आ। अद्वितीय है कार्य देश को एक बनाना- इसको सफल बनानेवाले, आ आ आ॥8॥ मूल शीर्षक : 'पोकिन्र भारतमुम्, वरुकिन्र भारत्मुम्' (रूपांतरकार: नागेश्वर सुंदरम्, विश्वनाथ सिंह विश्वासी)

भारत समुदाय

रहो चिरंजीव भारत समुदाय, तुम्हारी जय हो, जय हो । तीस कोटि जन का समान अधिकार यहाँ की सब संपत पर, अद्वितीय यह रूप देश का होगा जग के रंगमंच पर : तेरी जय हो । रहो चिरंजीवि भारत समुदाय, तुम्हारी जय हो, जय हो॥ मुँह का ग्रास छीनने का दिन अब भी क्या रह पाएगा? कष्ट देखकर एक व्यक्ति का दूजा हर्ष मनाएगा ? सुभग वाटिका, हरे-भरे खेतों से भरा अपना- क्या इसमें अब आगे भी कामुक जीवन रह जाएगा ? भरा हुआ है कोने-कोने में अतुलित धन-धान्य यहाँ, कंद-मूल-फल हमको यह देगा सदैव, देगा सदैव : तेरी जय हो । रहो चिरंजीवि भारत समुदाय, तुम्हारी जय हो, जय हो॥1॥ विनय दूसरे का न रहेगा । अपना स्वयं विधान बनेगा। तन-मन-धन से उसे देश का - बच्चा-बच्चा वरण करेगा॥ क्षुधित दिख गया अगर कभी भी- भारतभू का एक व्यक्ति भी- हम विनष्ट कर देंगे, शाश्वत- रह न सकेगा विश्व यह कभी : तेरी जय हो । रहो चिरंजीवि भारत समुदाय, तुम्हारी जय हो॥2॥ गीता का यह आप्त वचन- जिससे प्लावित है जन-जन- 'जीवनं सर्वभूतेषू'- वासुदेव का सत्य कथन व्यक्ति नहीं असमर्थ नितांत- सम्मुख जग के परम अशांत- रक्खेगा, हाँ हाँ, रक्खेगा- हिंद अमरता का सिद्धांत : तेरी जय हो । रहो चिरंजीवि भारत समुदाय, तुम्हारी जय हो, जय हो॥3॥ हम सब एक वंशवाले हैं। हम सब एक वंशवाले हैं। व्यक्ति-व्यक्ति में भेद न कोई, हम सब भारत के वासी हैं। अंतर नहीं मूल्य के स्तर के । भाव न यहाँ सेव्य-सेवक के सब स्वामी हाँ, सब स्वामी- हाँ, सभी यहाँ स्वामी भारत के : तेरी जय हो । रहो चिरंजीवि भारत समुदाय, तुम्हारी जय हो, जय हो॥4॥ मूल शीर्षक : 'भारत समुदायम्' (रूपांतरकार: नागेश्वर सुंदरम्, विश्वनाथ सिंह विश्वासी)

स्वतंत्रता की चाहत

जिनके उर में चाह सदा अमृत पीने की, वे मदपान भूलकर भी क्या क्या कर पाएँगे? जिनके उर में चाह शौर्यमय स्वतंत्रता की, और न कुछ भी वे इस धरती पर चाहेंगे॥1॥ कीर्ति-प्रदायक सद्धमों को सबकुछ मानें, शेष सभी कुछ व्यर्थ यहाँ, ऐसा जो जानें। वे जन दासवृत्ति पर जीवनयापन क्यों करना चाहेंगे? जिनके उर में चाह शौर्यमय स्वतंत्रता की, और न कुछ भी वे धरती पर चाहेंगे॥2॥ 'जिसको जन्म मिला, मरना उसका निश्चित है ' जो इस अटल सत्य से जीवन में परिचित है- छोड़ धर्म को, मर्यादा को, आगे भी जीना चाहेंगे? जिनके उर में चाह शौर्यमय स्वतंत्रता की, और न कुछ भी वे इस धरती पर चाहेंगे॥3॥ मानवजीवन पाता अति दुर्लभ इस भू पर दृष्टि डाल पाए हैं जो इस परम सत्य पर । वे न कभी भी सत्य छोड़कर, सत्यभ्रष्ट जीवन चाहेंगे। जिनके उर में चाह शौर्यमय स्वतंत्रता की, और न कुछ भी वे इस धरती पर चाहेंगे॥4॥ छोड़ निशा में ज्योति प्रदायक रजनीचर को- कौन भला चाहेगा, टिमटिम जुगनूगण को ? आँखों की पुतली स्वतंत्रता, छोड़ नहीं दासत्व करेंगे। जिनके उर में चाह शौर्यमय स्वतंत्रता की, और न कुछ भी वे इस धरती पर चाहेंगे॥5॥ रखकर चाह धरा के सुख की अपने मन में, स्वतंत्रता का गौरव क्या खोएँगे जग में? आँख बेचकर, चित्रों के क्रयकार हँसी के पात्र बनेंगे। जिनके उर में चाह शौर्यमय स्वतंत्रता की, और न कुछ भी वे इस धरती पर चाहेंगे॥6॥ कर लेंगे यदि नमन कभी वंदे माँ कहकर, माथ झुकेगा क्या मायावी असत् वस्तु पर ? 'वंदे मातरम्' एकमात्र उद्धारक यह भूल पाएँगे ? जिनके उर में चाह शौर्यमय स्वतंत्रता की, और न कुछ भी वे इस धरती पर चाहेंगे॥7॥ मूल शीर्षक : 'सुतंदिर पेरुमै ' (रूपांतरकार: नागेश्वर सुंदरम्, विश्वनाथ सिंह विश्वासी)

स्वतंत्रता का पौधा

नहीं नीर से पाला-पोसा, आँखों का जल देकर सींचा। हे सर्वेश देख यह पौधा, मन पिघलेगा क्या ?॥1॥ लाख भावनाएँ घृत बनकर विकसी प्राणों की अवनी पर तल चिराग यह जला, मुझे स्वीकार करेंगे क्या ?॥2॥ 'सत्यमेव जयते' सद्जन का- वचन झूठ हम होने दें क्या? कृत का फल भोगा जो, वह पर्याप्त नहीं है क्या ?॥3॥ श्रममय वर्ष सहस्र बिताए- खोई मणि अपने घर लाए। फिर उसको हम किसी मूल्य पर खो सकते हैं क्या ?॥4॥ कारागृह में चुप पड़े-पड़े, सज्जन घुट-घुट रात-दिन मरे मेधावी पिसते कोल्हू में दृष्टि न आए क्या ?॥5॥ पीड़ा में मसोसते मन को- अनगिन सचरित्र, सज्जन को, अंधे शिशु-सा व्यथित तड़पते देख न पाए क्या ?॥6॥ रौंद मनोबल नवयुवकों के- बिलग मातु-पितु जन से करते, यह अनीति की पराकाष्ठा देख सकोगे क्या ?॥7॥ तव प्रदत्त सब देन प्रकृति की हे प्रभु! मिट जाएगी फिर भी पीड़ाएँ अतिरिक्त तुम्हारे अन्य हरेगा क्या ?॥8॥ हुई तुम्हारी कृपाकांक्षा, मिली हमें प्यारी स्वतंत्रता । करें अपहरण उसका निर्दय पशु, देखोगे क्या ?॥9॥ हम न अगर स्वाधीन बनेंगे- तो क्या अतिशय दीन बनेंगे? बिना गगन-वर्षा के जन-जीवन संभव है क्या ?॥10॥ मन में इच्छाएँ उभरेंगी- तेरे बिना न पूरी होंगी। छल-पाखंडरहित हम सबके उर निरखोगे क्या ?॥11॥ क्या हम व्यर्थ पुकार रहे हैं ? तन-मन-धन सब वार रहे हैं? हम सबका विलाप, यह तड़पन व्यर्थ रहेगी क्या ?॥12॥ तव हित तेरी अनुकंपा से- तेरा हक माँगे दुनियाँ से। हम पर द्रवित तुम्हारा होना, उचित नहीं है क्या ?॥13॥ जो करते प्रार्थना तुम्हारी, नयी नहीं यह विनय हमारी, नहीं पूर्वजों के सुखमय दिन याद करोगे क्या ?॥14॥ अगर धरा पर धर्म सत्य है, तव अस्तित्व अचल शाश्वत है। तो इस दुनियाँ की इच्छाएँ पूर्ण करोगे क्या ?॥15॥ मूल शीर्षक : 'सुतंदिर पयिर' (रूपांतरकार: नागेश्वर सुंदरम्, विश्वनाथ सिंह विश्वासी)

स्वतंत्रता की प्यास

प्यास बुझेगी कब अंतर से स्वतंत्रता की ? पराधीनता के कब तक व्यामोह मिटेंगे ? कब तक टूटेंगी भारत माँ की हथकड़ियाँ ? अब के उत्पीड़न कब बीते स्वप्न बनेंगे ? आर्यजनों के जीवन-रक्षक एकमात्र प्रभु सत्य-विजय के लिए महाभारत में आए। रक्षा, विजय हमारी अब तेरे हाथों में- क्या यह उचित कि भक्त तुम्हारा कष्ट उठाए॥1॥ भुखमरी, पीड़ा क्या तेरे भक्तों को ही, उन्नत जीवन शेष सभी दुनियाँवालों को ? अनुचित किया नहीं क्या अब तक छोड़ निराश्रित- अति पीड़ित, हम आश्रय में आनेवालों को ? ठुकरा सकती है क्या माता अपने शिशु को- अभय दान करना तेरा कर्तव्य नहीं है? भूल गए क्या धर्म, कुकर्मी असुर संहारक । वीर शिखामणि और आर्य उत्तम तू ही है॥2॥ मूल शीर्षक : 'सुतंदिर दाहम्'

स्वतंत्रता देवी की स्तुति

छोड़ भवन सुखमय, कठोरतम— कारावास भुगतने पर भी। खोकर यश, ऐश्वर्य, घृणा - निंदा का पात्र बनूँ मैं तब भी । कोटि कष्ट सहते-सहते ही- मैं विनष्ट हो जाऊँ फिर भी - हे स्वतंत्रते ! भूल न सकता- नमस्कार करना तुम्हें कभी॥1॥ कृपापात्र जो नहीं तुम्हारा- अद्वितीय धनवान क्यों न हो । विद्या - बुद्धि समन्वित नाना- शास्त्रज्ञान में दक्ष क्यों न हो। अगणित महिमा लिए हुए वह - महान व अति महान हो फिर भी उसका जीवन उस शव-सा- जो सुंदर आभूषण पहने हो॥2॥ वह भी कोई देश, जहाँ पर- दिव्य ज्योति तेरी पड़ी नहीं । जीवन और विवेक-बुद्धियुत सृजनात्मक क्षमता वहाँ कहीं ? उत्तम काव्य, कलाएँ और- वेद-शास्त्रों का सृजन न होगा- पापी है जिसको रक्षाहित तेरी कृपा कभी मिली नहीं॥3॥ सदा मरेंगे व्यथित, राग से- मन में नहीं उमंग रहेगी। तुच्छ वन्य पशुओं से बढ़कर नीची उनकी वृत्ति रहेगी। अनुभव कभी अमर सुख का न करेंगे, सुख न स्वप्न में होगा- गौरव अमिट प्रदायिनी माँ ! जिनको न तुम्हारी कृपा मिलेगी॥4॥ यदि मिले बंदीगृह भी उसे- स्वर्ग तुल्य हुआ करता सदा । तव कृपा के लिए देवी नित्य ही- मुदित मन सर्वस्व अर्पण जो करे॥5॥ विश्व सुखपूरित महल, अट्टालिका, विषम कारागृह सरीखी है उसे । माँ ! तुम्हारी जो न महिमा जानता- दासता में मन लगाता है सदा॥6॥ नयी गति पाश्चात्य देशों को मिली- शौर्यमय जयकार तेरी जो किए। कह उठे तन कोटि दे यमराज को- हम तुम्हारी कृपा से लेंगे सदा॥7॥ कीर्ति की स्तुति में तुम्हारी विनय में- गा सकूँ क्या दास मैं, असमर्थ हूँ। छिन्न गौरव, पतन को है प्राप्त जो- अहो ! मैं उस देश में पैदा हुआ॥8॥ देवि हे ! सद्धर्म की संरक्षिका- री विदारिणी, कष्ट, दुख, रोगादि की । ज्योति ! मंगलमय सुधा !! नर शूर की- मैं सदा ही स्मरण रक्खूँगा तुझे॥9॥ मूल शीर्षक : 'सुतंदिर देवियिन स्तुति' (रूपांतरकार: नागेश्वर सुंदरम्, विश्वनाथ सिंह विश्वासी)

स्वतंत्रता

स्वतंत्रता स्वतंत्रता स्वतंत्रता है स्वतंत्रता भंगी और चर्मकारों को। है स्वतंत्रता आदिवासियों, बंजारों को॥ क्षमता के अनुकूल सभी उद्योग चलाएँ । उच्चज्ञान, शिक्षा पा जीवन सुखद बनाएँ । सबको मिली देश में आज स्वतंत्रता॥ स्वतंत्रता स्वतंत्रता स्वतंत्रता॥1॥ बृहद् जाति में नहीं अकिंचन, दास न कोई । अब भारत में नीच व्यक्ति का नाम न कोई॥ शिक्षित हों, समुचित धन धान्य सभा जन पाएँ । आपस में हिलमिल समता का समय बिताएँ । सबको मिली देश में आज स्वतंत्रता॥ स्वतंत्रता स्वतंत्रता स्वतंत्रता॥2॥ जिससे जन नर से नारी को नीचा जाने । हम अपनी वह अज्ञानता दूर कर डालें॥ तोड़ दासता को जीवन को सुखी बनाएँ । 'नर नारी समान है' यह सद्भाव जगाएँ । सबको मिली देश में आज स्वतंत्रता॥ स्वतंत्रता स्वतंत्रता स्वतंत्रता॥3॥ मूल शीर्षक : 'विडुदलै' (रूपांतरकार: नागेश्वर सुंदरम्, विश्वनाथ सिंह विश्वासी)

नाचेंगे हम

नाचेंगे हम आनंदमगन हो नाचेंगे, आनंद स्वराज मिला हमको, हम नाचेंगे। नाचेंगे हम आनंदमन हो नाचेंगे॥ दिन बीत गया है, ब्राह्मण को प्रभु कहने का, गोरे फिरंगियों को हुजूर भी कहने का । हमसे करके याचना हमारे ऊपर ही- शासन करनेवालों की सेवा करने का॥ जिसने हमको अब तक अँधियारे में रखा, उस दगाबाज अन्यायी का दिन बीत गया, हम नाचेंगे॥ नाचेंगे हम आनंदमगन हो नाचेंगे॥1॥ सर्वत्र यही चर्चा है अब हम हैं स्वतंत्र, कंठ यही गाता है अब हम है स्वतंत्र । हैं निर्विवाद भारतभू के जन-जन समान- क्या ऊँच-नीच सब कहते हैं हम सब स्वतंत्र॥ हम शंख फूँककर जय-जय ध्वनि उच्चारेंगे॥ धरणी के कोने-कोने में रव गूँजेगा, हम नाचेंगे। नाचेंगे हम आनंदमगन हो नाचेंगे॥2॥ आया रे ! दिन जब सब समान बन जाएँगे। इस भू से जब छल- दंभ स्वयं मिट जाएँगे । उच्चता नीचता का पैमाना बदल गया- सद्धर्मी, सद्कर्मी महान कहलाएँगे । । जाएँगे अपने आप यहाँ से पाखंडी- वंचक विनष्ट हो जाएँ वह दिन आया है, हम नाचेंगे। नाचेंगे हम आनंदमगन हो नाचेंगे॥3॥ हम मुक्त कंठ से कृषि के वंदन गाएँगे । उद्योगों के मस्तक पर तिलक लगाएँगे । भक्षण करके भरपेट व्यर्थ जो रहते हैं- उनको हम शब्द भर्त्सना भरे सुनाएँगे । । ऊसर धरती में जल-सिंचन से क्या होगा- कोई न व्यर्थ कर्मों में समय गँवाएगा, हम नाचेंगे । नाचेंगे हम आनंदमगन हो नाचेंगे॥4॥ अपना ही है यह देश हुआ है भास हमें, अपना इस पर अधिकार हुआ है भास हमें । परिपूर्ण ब्रह्म की सत्ता के अतिरिक्त किसी- सत्ता पर होगा कभी नहीं विश्वास हमें॥ दासता उसी की केवल कर सकते हैं हम- दूसरा हमें परतंत्र न रखने पाएगा, हम नाचेंगे। नाचेंगे हम आनंदमगन हो नाचेंगे॥5॥ मूलशीर्षक: 'सुतंदिरप्पळ्ळु' (रूपांतरकार: नागेश्वर सुंदरम्, विश्वनाथ सिंह विश्वासी)

तानाशाह ज़ार का पतन

महाकालि की, पराशक्ति की, वहाँ कृपा की दृष्टि हुई है। देखो-देखो, रूस देश में एक महा युगक्रांति हुई है। देख अंत अत्याचारी का, हैं प्रसन्न अत्यधिक देवगण । यह नवीनता देखे दुनियाँ, देख जिसे मरते पिशाचगण॥1॥ अन्यायी हिरण्य-सा क्रूर ज़ार ने अपना राज्य किया था, उस शासन में सद्धर्मी सज्जन, अनाथ बन तड़प रहा था, महामूढ़ था, मान लिया था धर्म तुच्छ, उसके शासन में- मूल पाखंड भरे थे जैसे सर्प भरे होते हैं वन में॥2॥ श्रमी किसानों को न अन्न था, बस बीमारियों का स्वराज था । जो असत्य के आश्रय में थे, उनके घर ऐश्वर्य भरा था। फाँसी थी आसान, सत्यवादी को बंदीगृह की पीड़ा । साइबेरिया के वन में थी मृत्यु बुलाती करती क्रीड़ा॥3॥ हाँ, बोले तो कारावास, मिले वनवास अगर क्यों पूछे। तृप्त हुआ सद्धर्म, अधर्म धर्म था नीच ज़ार के नीचे । पिघला उर माँ का त्रिकाल में, सत्य संघ भक्तों की पालक- कृपादृष्टि फेरी अपनी, यम ज़ार महापापी कुल-घातक॥4॥ गिरा ज़ार - शासन, जैसे हिमालय गिरे धरा पर । धर्मविनाशक असत् वचन से एक-एक कर मिटे समय पर । झंझा के झोंकों में जैसे वृक्ष टूट ईंधन बन जाते । दुनियाँ ने देखा वैसे, अधर्मियों को विनष्ट हो जाते॥5॥ देखो यह जनतंत्र, एक-सा न्याय सभी को मिला है। जन शासन है, पनप न सकती दासवृत्ति, उद्घोष हुआ है। गिरा हुआ कलिकाल, गिरी दीवार, यहाँ ज्यों ठोकर खाकर । खड़ा हो रहा है कृतयुग देखो उसकी टूटी काया पर॥6॥ मूल शीर्षक : 'पुदिय रुशिया' (रूपांतरकार: नागेश्वर सुंदरम्, विश्वनाथ सिंह विश्वासी)

गन्ने के खेत में

गन्ने के खेत, हाँ, गन्ने के खेत में । थके हाथ-पैर इधर लुढ़क जाती है, पछताती हाय-हाय करती चिल्लाती है। हिंदू महिलाओं का खून उबल जाता है- पीड़ा में आठ-आठ आँसू ढुलकाती है॥ इनकी इस पीड़ा की दवा ही नहीं क्या? पिसती है रात-दिन कोल्हू के बैल-सी : गन्ने के खेत में। गन्ने के खेत, हाँ गन्ने के खेत में॥1॥ होता ऐसा प्रभाव नारी के नाम का पिघल पिघल जाता है अंतर शैतान का । पर यह भी होगा क्या नारी के कष्ट देख- द्रवित नहीं होगा अंतर्मन भगवान का ? अश्रु बहाते वे क्या मिट्टी में समा जाएँगी दक्षिण सागर मध्य शेष समय खाएँगी। तड़प रही हैं बहनें अंधे बन, द्वीपों में : गन्ने के खेत में। गन्ने के खेत, हाँ, गन्ने के खेत में॥2॥ कब वे इस धरती की सुधि लेने आएँगी? कब तक निज भारत के दर्शन को आएँगी? मातृभूमि का उनको ध्यान तक नहीं होगा, तुमने तो पवन! आर्तनाद भी सुना होगा ? कहो एक बार जो कहा है तुमसे सबने, दुःखसागर में क्या उत्पीड़न सहतीं बहनें ? फूट-फूट रोने की शक्ति भी नहीं है अब : गन्ने के खेत में। गन्ने के खेत, हाँ, गन्ने के खेत में॥3॥ अन्यायी उत्पीड़न देते ही रहते हैं, बहनों को त्रास दे सतीत्व भंग करते हैं । बेचारी अबलाएँ तड़प-तड़प रहती हैं- शोषण की ज्वाला में घुट-घुटकर मरती हैं॥ क्या ये शोषण, पीड़न, प्रोत्साहन पाएँगे? क्या अब ये आगे भी सहन किए जाएँगे? आओ तुम हे कराल ! चंडी! दुर्गे ! विशालः गन्ने के खेत में, गन्ने के खेत, हाँ, गन्ने के खेत में॥4॥ मूल शीर्षक : ' करूंबुन्तोट्टत्तिले' (रूपांतरकार: नागेश्वर सुंदरम्, विश्वनाथ सिंह विश्वासी)

बेल्जियम की स्तुति

धर्म पर अपने सदा तू अटल था, धर्म के कारण पतन तेरा हुआ। सहन अत्याचार सब कर लिया जो शक्तिशाली विदेशी देते रहे। सूप से जिसने भगाया व्याघ्र को— अति बली उस आदिवासिनी की तरह । साधनों से दीन होते हुए भी- विश्व में कृतकर्म से ऊँचे बने॥1॥ पतन तेरा हुआ बस, औदार्य से, शुत्रसेना सिंधु -सी, दृढ़ शक्तिपुत्र, आक्रमण को बढ़ी ती उस समय भी- रंच मात्र न धैर्य तेरा डिग सका। वीरता से प्राप्त करना प्रशंसा- उचित है, यह मान, मन दृढ़ कर लिया। अटल थे अधिकार के रक्षार्थ तुम- सत्य पर मर मिटे जो, उस देश के॥2॥ स्वाभिमानी था, पतन तेरा हुआ, शत्रु शासक नीच, गर्वित शक्ति पर, अति बलिष्ट रहा तथापि अभाव में- शक्ति के भी, रंच मात्र न डरा तू । नाम मुड़ने का न पीछे लिया तू । यथाशक्ति किया करेंगे सामना । कहा, और बलिष्ठ रिपु के मार्ग में- तू सदा रोड़े बढ़ाता ही रहा॥3॥ वीरता से ही पतन तेरा हुआ- पिल पड़ी जब शत्रु सैन्य पहाड़ - सी । छिप रहें रक्षार्थ अपने मात्र ही- हृदय ने तेरे न स्वीकारा कभी॥ सर्प को ज्यों तुच्छ कीड़ा मान ले, निपट लघु कर लिया इस संघर्ष को । बढ़ रही उस शत्रु सेना का प्रबल, सामना अत्यंत दृढ़ता से किया॥4॥ पतन अगम, अटूट साहस से हुआ, शत्रु की सेना अपरिमित शक्ति में- अहंकारी उगलती आग को- देश के सीमांत पर चढ़ आ गई॥ उस समय भी वचन पर निज दृढ़ रहे, शरण में जाना न स्वीकारा कभी- पराजय तुम मान सकते थे नहीं- टोकते ही रहे अति दल को सदा॥5॥ भय न पास कभी फटकने दिया तू तुच्छ समझ घोरतम आपत्ति को । अति तरंगाकुल नदी की बाढ़-सी- वाहिनी लेकर सबल, अनगिनत जब- शत्रु शासन भयंकर अति दैत्य - सा पिशाची बलयुक्त घुसने लगा था- 'जान जाने पर न आन गँवाएँगे' बोलकर हर बार तू भिड़ता रहा॥6॥ किसी कारण से बढ़ी हो शत्रुता, प्रकट होती हो किसी भी रूप में, देश की सीमा हमारी जब कभी- बिना अनुमति शत्रु कोई लाँघता, और घोषित युद्ध करता देश में चरण धर दे, गर्व, उसका चूरकर- कर समूल विनष्ट दम लेंगे, यही गर्जना करता डटा ही तू रहा॥7॥ यज्ञ में आहुत हुआ बलिपशु सदा- पुनः उत्तम जन्म पाता है—यही वेद का ही वाक्य है, उस तरह ही तुम पराजित हुए, किंतु अवश्य ही क्रांति एक महान होगी देश में- क्षणिक अवनतिप्राप्त तेरा यश पुनः पूर्णत: उत्थान पाएगा कभी॥8॥ मंद होती ज्योति दीपित दीप की जब दिवाकर उदित होता पूर्व से स्वर्ण का भी महल अक्षुण्ण है नहीं- नष्ट होता है समय के चक्र में। तू नहीं भयभीत होता है कभी, शत्रु के अत्यधिक अत्याचार से दृढ़ प्रकृति और सजग मिटने को सदा विघ्न-बाधाएँ उसे क्या करेंगी॥9॥ मूल शीर्षक : 'बेल्जियम नाट्टिर्कु वाळंतु' (रूपांतरकार: नागेश्वर सुंदरम्, विश्वनाथ सिंह विश्वासी)