हिन्दी कविताएँ : शिवराज आनंद

Hindi Poetry : Shivraj Anand


यहां उनका भी दिल जोड़ दो

यहां उनका भी दिल जोड़ दो जिनके दिल टूटे हैं चलते कदम थमे हैं, वो जीना जानते हैं । ना जख्मों को सीना जानते हैं ।। प्यारे तुम उन्हें भी अपना लो मेरी बात मान विश्व बंधुत्व का भाव लेकर, जन- जन से बैर भाव छोड दो । "यहाँ उनका भी दिल जोड़ दो"।। हम सब के ओ प्यारे,किस कदर हैं दूर किनारे जीत की भी आस रखते हैं वे मन मारे ? ये मन मैले नहीं निर्मल हैं,सबल न सही निर्बल हैं, समझते हैं हम जिन्हें नीचे हैं, वे कदम दो कदम ही पीछे हैं, जो हिला दे उन्हें ऐसी आंधी का रुख मोड़ दो । यहाँ उनका भी दिल जोड़ दो ।। दिल बिना क्या यह महफ़िल है, क्या जीने के सपने हैं, बेगाना कोई नहीं सब अपने हैं. ये सब मन के अनुभव हैं, नहीं हूँ अभी वो, पहले मैं था जो, सुना था मैंने मरना ही दुखद है, पर देखा लालसाओं के साथ जीना, महा दुखद है. फिर क्या है सुख ? क्या जीवन सार ? सुख है सब के हितार्थ में, जीवन - सार है अपनत्व में, ऐसा अपनत्व जो एक दूजे का दिल जोड़ दे। कोई गुमनाम न हो नाम जोड़ दे ।। वरना सब असार है चोला, सब राम रोला भई सब राम रोला ।।

हम कलियुग के प्राणी हैं

सतयुग, त्रेता न द्वापर के हम कलयुग के प्राणी हैं । हम सा प्राणी हैं किस युग में, हम अधमदेह धारी हैं।। हमारा युग तोप-तलवार जन-विद्रोह का है। सामंजस्य-शांति का नहीं, भेद-संघर्ष का है।। हमनें सदियों वासुधैव कुटुंबकम् की भावना छोड़ दिया। और कलि के द्वेष - पाखंड से नाता जोड़ लिया।। हम काम, क्रोध, लोभ में कुटिल हैं। पर धन, पर नारी निंदा में लीन हैं।। हम दुर्गुणों के समुंद्र में कुबुद्धि के कामी में हैं। सतयुग, त्रेता न द्वापर के हम कलयुग के प्राणी हैं।। हमारा हस्त खूनी पंजों का, क्या वे हमसे भिन्न स्वतंत्र रह पाएंगे। जब सुर सजेगा बम धमाकों का, मृत उनमृत के लघु गीत गाएंगे।। हमें तुम्हारे नारद की वीणा अलापते नहीं लगती। हमें तुम्हारे मोहन की मुरली सुनाई नहीं देती।। तुम कहते हो हमें अबंधन जीने दो। अन्न जल सर्व प्रकृत का आनंद रस पीने दो।। नहीं हम ही इस कलिकाल में सुबुद्धि के प्राणी हैं। सतयुग त्रेता न द्वापर के हम कलयुग के प्राणी हैं।।

उठो युवा तुम उठो ऐसे

उठो युवा तुम उठो ऐसे चक्रवात में तूफां उठता है जैसे ।। हां, अब कौन युवा,तुम्हारे सिवा? रक्षक प्यारे देश का । तूं चाहते तो तांडव मचे, देर है तेरे उस वेष का ।। अब तो सब से आस भी टूटी । लगने लगी 'अब दुनिया भी झूठी ।। कैसी जननी? कि कैसा लाल? जो जनकर भी जना क्या लाल? जो देश की गरिमा बचा सके । ध्वंस कर रावण - राज धरा से एक आदर्श राम - राज्य बना सके ।। तुम देश के आन हो । हिन्दू हो या मुसलमान हो । किसी मजहब के नहीं, "तुम मातृभूमि के लाल हो "।। तुम कालो के भी महाकाल हो फिर क्यों अन्जान हो? क्या नेता - मंत्रियों से परेशान हो? ओह ! कही विलीन न हो मेरे सपनों का भारत ! हे महारथ! तुझमें है सामर्थ ...रोक दे ए अनर्थ ...। अगर है मोहब्बत ...तो अपनी यौवन - शक्ति जगा दे । आज अपने युग। से भ्रष्टाचार मिटा दो।।

मानवता के डगर पे

मानवता के डगर पे प्यारे तुम मुझे भी लो । ग़ुमराह हूं कोई राह बता दो। युं ना छोडो एकाकी अभिमन्यु सा रण पे। मुझे भी साथले चलो मानवता की डगर पे।। वहां बडे बडे सतवादी है। सत्य -अहिंसा केपुजारी हैं।। वे रावण के अत्याचार को मिटा देते हैं। हो गर हाहाकार तो सिमटा देते है।। इस पथ मे कोई ज़ंजीर नही जो बांधकर जकड़ सके। पथ मे कोई विध्न नही जो रोककर अकड़ सके।। है ऐ मानवता की डगर निराली। जीत ले जो प्रेम वही खिलाडी।। यहां मजहब न भेद-भाव,सर्व धर्म समभाव से जिया ...है। वक्त आए तो हस के जहर पीया करते है।। फिर तो स्वर्ग यहीं है नर्क यहीं है। मानव - मानव ही है, सोच का फ़र्क है।। ओ प्यारे !इस राह से हम न हो किनारे ... न हताश हो न निराश हो। मन मे आश व विश्वास हो।। फिर आओ जग मे जीकर जीवन -ज्योत जला दें। सुख-शांति के नगर को स्वर्ग सा सजा दें।। आज भी राम है कण - कण में भारत - भारती के जन जन को बता दें।।

मां की महिमा

माँ ! हम आये तेरे शरण में ,नित छुएं चरण, मम निवेदन स्वीकार करो ! है यही भाव- भजन, मन लगी- लगन, मम-जीवन निर्माण करो ! हम सब बाल पौधे माँ ! तू माँ मालिन साथ है | तू जननी !हम लाल , सब तेरे हाथ हैं || जग सृजनी ! दे तूं जैसी आकृत, सब तेरा प्रत्युपकार हैं | हम सब कच्ची मिटटी, तू सबका कुम्भकार है || तू भू की रानी! ,तू अम्बर की न्यारी माँ | तुझमे बसी दुनिया सारी। तुझमे तरी दुनिया सारी माँ ।। हे स्नेहमयी माँ ! तेरी गोद में हमने सोया | तुझ संग मिलकर हमने रोया तेरी आचंल में हमने खेला! तेरी आँचल में हमने खाया ! तूने हमे कहा - आँखों का तारा ! हमने तुझे कहा – ध्रुव का तारा !! ' राम-कृष्ण, भीष्म –युधिष्ठिर तूने बनाया || सच है की कर्ण – अर्जुन, बुध्द-महावीर तूने ही बनाया | तेरी महिमा अपार माँ ! तेरी महिमा अपार हे नित्य माता ! तूने ही शंकर – रामानुजन, गाँधी – मालवीय, हिय का अमीरस पिलाया || तेरी महिमा अपार माँ ! तेरी महिमा अपार........ हे माँ ! हमे भी शरण दो, मन की कुबुद्धि हर दो | हे वर दायिनी वर दो , जीवन धीर – वीर कर दो | माँ ! मेरे जीवन की बगिया, नित् खिलती रहे | तुझ से बनी सांसों की डोरियाँ चलती रहें || माँ ! तू बस इतना करम कर दे| निज वत्स का इतना धरम कर दे || हमे झुकाएं शीश, तूं हमें शुभाशीष दे ||

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