हिन्दी कविताएँ : शीलव्रत पटेरिया

Hindi Poetry : Sheelvrat Pateriya


किससे किस्से कहूं मेरे दिल के ?

किससे किस्से कहूं मेरे दिल के ? कोई मेरी न सुनता है जिन्हे भूलना चाहूँ, वही यादें , वो बार बार धुनता है | चाहता हूँ उनसे प्यार करना , पर वो बातें हमेशा नफरती करता है | कर रहा हूँ कोशिशें मसल्सल पर वो है कि ज़मीन बनने ही नहीं देता है | मैंने सर झुकाया, गिड़गिड़ाया,पर वो है कि मेरी बातों को कोई तवज्जो नहीं देता है | इन हालातों में कैसे नजदीक आये हम नजदीकी के लिए कुछ तो करना पड़ता है| प्यार नहीं जब दरमियां, तो बताओ इन हालातों में कौन सा रिश्ता टिकता है ?

तन्हा हूँ मैं

भीड़ से घिरा हूँ पर तन्हा हूँ मैं , चेहरे पर मुस्कराहट पर अकेला हूँ मैं, सोती है जब दुनिया , तब जागता हूँ मैं , स्याह काली रात में आसमान निहारता हूँ मैं , अँधेरे से मुहब्बत , रौशनी से भागता हूँ मैं , धरती के इस रंगमंच पर अपना वज़ूद तलाशता हूँ मैं , छुप छुप कर कोने में कराहता हूँ मैं , जागती है दुनिया मुस्कुराता हूँ मैं , शांत रहकर ज़हर पी जाता हूँ मैं , बुरा हूँ न, कुछ नहीं बोल पाता हूँ मैं ||

आओ जिंदगी संवारें

रौंदकर अपनी तकलीफों को आओ जिंदगी जियें पीसकर अपने दुखों को आओ ज़िंदगी जियें चूरकर नफरतों को आओ गले लग जाएँ भूलकर वेदनाओं को आओ जरा खिलखिलाएं सुनकर कोयल की बोली ज़रा मुस्कुराएं चहकते बचपन को यादकर आओ गम भुलाएं काम को परे हटाकर कुछ वक़्त साथ गुज़ारें मैं की ओढ़ी चादर को बदन से हटा लें दर्द को दफ़न कर कुछ कदम साथ बढ़ाएं डर को डराकर सफलता छीन लाएं आज मिलकर बैठकर हम ज़िंदगी संवारें आओ आज स्वर्ग को ज़मीन पर उतारें |

वही सुबहें , वही शामें

रात हो गयी है, अब मुझे मेरी ज़िंदगी जी लेने दो, नौकरी हुई पूरी , अब तो मुझे मेरी मर्जी कर लेने दो| सुबह 9 से शाम 5 बजे तक तुम्हारी ही बातें सुनता हूँ , अब रात 8 बजे मुझे मेरे दिल की सुन लेने दो | दिन रात सिर्फ तुम्हारी , दूसरों की कही ही करता हूँ, मैं स्वयं कौन मुझे खुद के साथ भी जरा रह लेने दो | वही सुबहें , वही शामें , सब एक सी ही तो हैं, सोच अपनी बदलकर मुझे अपने दिन रात बदलने दो | कहाँ कोई नया है आसपास ? वही सब पुराने चेहरे ही तो हैं, नज़रिया अपना बदलकर मुझे कोई नया साथी ढूंढ़ लेने दो | सब ऐसा ही तो था बरसों पहले , वही चाँद , वही सूरज , वही पर्वत , वही नदियाँ , वही मिट्टी , वही हवायें, मुझे अपने भीतर जाकर आया जन्म ले लेने दो | ऐसा न किया तो ऊबकर सारा जीवन उबासी बासा हो जाएगा , कुछ देर ठहरकर , अंतर्मुखी होकर मुझे इसी जीवन को नया कर लेने दो|

नर हूँ, निराश होता हूँ!

सुबह से शाम सतत कर्म कर अपेक्षित फल की प्राप्ति न होने पर उदास होता हूँ, नर हूँ निराश होता हूँ। सुबह सूरज को फलक पर आता देख मैं भी उठ खड़ा होता हूं, लक्ष्य को सामने रख फिर दौड़ना शुरू करता हूं। शाम तक लक्ष्य न मिलने पर थक कर उदास होता हूँ, नर हूँ, निराश होता हूँ। आशा - निराशा का यह द्वंद - चक्र मसलसल चलता रहता है, कभी आशा जीतती है, कभी निराशा पर फिर भी, मैं जीता हूं, उम्मीद में कि कल तो बेहतर होगा। वो कल अभी तक तो आया नहीं, पर उम्मीद है कि टूटती नहीं, उम्मीद टूट जाएगी, तो कोई विकल्प भी नहीं, विकल्प ही नहीं ! मुझु उम्मीद बनाये रखते हुये, चित्त को शांत रखते हुये दौड़ना होगा प्रतिदिन, अपने आज को बेहतर बनाने के लिये। मेरा आज बेहतर होगा, तो कल भी बेहतर होगा। नर हूँ, निराश होता हूँ, पर लम्बे समय के लिये नहीं, जल्दी ही आशान्वित होकर फिर चल पड़ता हूँ। मगर हां, यह सच है कि नर हूँ, निराश होता हूँ।

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