हिन्दी कविताएँ : शकुंतला अग्रवाल 'शकुन'

Hindi Poetry : Shakuntala Agrwal Shakun


सीख

!!मनहरण घनाक्षरी!! गुरु की बातें गुन लो,मात-पिता की सुन लो, स्वप्न जीत के बुन लो,चलो सद्-राह पे। धर्म-पथ पर चले,फिर चाहे पाँव जले, जिंदगी का पुष्प खिले,लगाम हो डाह पे। यहाँ कोई नहीं सगा,घावों पे सीवन लगा, सोयी किस्मत तू जगा,अंकुश हो चाह पे। मद से रहना दूर ,सुख होंगे भरपूर, मत करना गुरूर,झूठी वाह - वाह पे।

आशा

शबरी जैसी हो प्रीत,मीराँ-सा हो प्रेम-गीत, शिव - सा हो मनमीत,महकेगी जिंदगी। रख मृदु- व्यवहार,यह सुख का आधार, धर मन में संस्कार,आएगी संजीदगी। ले आशा मधुपान की,लगा दे बाजी जान की, करले भगवान की,प्रतिदिन बंदगी। मंजिल के पग चूम,खुशियाँ जाएँगी लूम, जिंदगी जाएगी झूम, रहे दुनिया ठगी।

अल-मस्त

देखो पीकर पराग,गए भूल अनुराग, कली पे लगाके दाग,भौंरे अल-मस्त हैं । टूटी है आशा की डोर, महकती कैसे भोर? छूमंतर हुआ चोर,सपने भी पस्त हैं। बोलो कैसा है दुर्योग? समझ न पाएँ लोग, विरहा की पीड़ा भोग, कलियाँ भी त्रस्त हैं। मधु पल में पी गये,घाव अपने सी गये | देखो,सदियाँ जी गये,अलि, सिद्ध-हस्त हैं।

सौगात

गीता से लेता जो ज्ञान, करता है सुधा-पान, हर लेते भगवान,दामन से शूल भी। सत्कर्मों की ही ठाँव, देती है शीतल-छाँव, मंजिल को चूमे पाँव, खिल जाते फूल भी। जिस मन में हैं धर्म,जिन आँखों में है शर्म, जीवन में वो सत्कर्म, देता है वो तूल भी। जहाँ सत्य की हो ढाल,रहे जग खुशहाल, सुख से हो मालामाल,दुख जाता भूल भी।

भ्रष्टाचार

संसद बहाए नीर, बनी द्रोपदी शरीर, खींच रहे दुष्ट चीर, प्रभु झट आइए। ठग, चोर दगाबाज,देख रहे राज-काज, कैसे आएगा सुराज,आप ही बताइए। चारों ओर भ्रष्टाचार, जनता भी गई हार, आकर तारणहार, राह तो सुझाइए। मंदमति हमें जान, दे कर प्रभु जी!ज्ञान, भारत की आन-बान, आप ही बचाइए।

शकुन के दोहे-विषय : पर्यावरण

तरुवर हैं सहमे हुए,पंछी सभी उदास। दाँव लगी है जिन्दगी, दुश्मन बना विकास।।1 नदिया सागर से कहे,मत तकना अब बाट। मेघ हुए हैं बेवफा, सूख गए हैं घाट।।2 कुंजों से झरती रही, कनक सुनहरी धूप। धरणी ने भी धर लिया, तभी दुल्हन का रूप।।3 फुनगी पर ठहरी प्रभा,पिला रही है जाम। ठुमक-ठुमक ठुमके पवन,महके आठों याम।।4 बंजारन-सी धूप अब,रही चिकोटी काट। बतियाती अब फुनगियाँ,रोशन है सब घाट।।5 जल विहीन सरिता हुई, निर्जन सारे घाट। मेघ बसो किस देश में,हर पल जोऊँ बाट।।6 नदी हुई अब बेवफा, कौन मिटाए प्यास। सागर आहें भर रहा, रूठ गया मधुमास।।7 मंजर महके आम्र पर,कोयल छेड़े राग। दहका टेसू कर रहा, प्रकृति खेलती फाग।।8 चलकर मस्त समीर जब,गाती मंगलाचार। सरसित होकर तब धरा,खूब लुटाती प्यार।।9 तरुवर-तरुवर से कहे, चलती आरी देख। प्रभु ने दुख में ही लिखी,अपनी किस्मत रेख।।10 फुनगी चूमी ओस ने,नाचे डाल विभोर। तरुवर इतराने लगा, देख सुहानी भोर।।11 महक गई है यामिनी,पाकर शशि का प्यार। महुआ महका संग में,महका हरसिंगार।।12 किश्ती लहरों से कहे,ले मत अधिक उछाल। टूटेंगे तटबन्ध तो, लेगा कौन सम्भाल।।13 यामा घूँघट काढ़ कर,जाती प्रीतम-देश। भानु करे अठखेलियाँ,पहन सुनहरा वेश।।14 दम-दम दमके दामिनी,सघन घटा के बीच। झम-झम बरसे मेघ भी,अपना प्रेम उलीच।।15 हौले-हौले ढल गया, जब दिनकर का तेज। विधु,तारों को यामिनी,देती पाती भेज।।16 शीतल-मंद-समीर से, प्रमुदित है मधुमास। वसुधा होकर बावरी,खूब रचाती रास।।17 होकर व्याकुल प्यास से बैठा पथिक उदास। दूर तलक होता नहीं,पानी का अनुभास।।18 एक झलक पा सूर्य की, घूँघट खोले रात। नटखट किरणें कर गई,दीवाना हर पात।।19 पवन नशीली हो गई, मिल ऋतुपति के संग। टेसू पर यौवन चढ़ा,महुआ आम मलंग।।20 नील-गगन रोने लगा,बंजर वसुधा देख। मेघों ने पल में लिखे, प्रेम -भरे आलेख।।21 मेघों को जब-जब मिला, वसुधा का संदेश नीलाम्बर पर छा गए,धर कजरारा वेश।।22 लेकर कुमकुम थाल जब,प्राची आई द्वार। धरती ले आगोश में,चूमे बारम्बार।।23 ऋतुपति की पदचाप सुन,हर्षित है हर शाख। खिलकर प्रेम-पलाश ने,किया वैर का नाश।।24 देखो सावन ने किया,जग में खूब धमाल। चुल्हा पानी पी गया, कैसे पकती दाल।।25 पतझड़ बैठा पाल पर,छीन विटप के पात। दिखलाता मधुमास ही,पतझड़ को औकात।।26 पुष्प प्रभाती गा रहे, भ्रमर करे मनुहार। आया देख बसंत अब, बाँट रहे सब प्यार।।27 पर्वत,सरिता अरु धरा,करते रोज गुहार। रौंदो मत अब तो हमें, होता दर्द अपार।।28 जब-जब मेघ उँड़ेलते,घट भर-भर मृदु-रंग। केशर-क्यारी -सा खिले,वसुधा का हर-अंग।।29 आँख दिखाने जब लगी,सकल जगत को शीत। भास्कर जी भी सो गए , ओढ़ रजाई मीत।।30 बंजर धरती कर रही,हमसे यही सवाल। बोलो मेरा क्यों किया, विधवा जैसा हाल।।31 वृक्षों से जीवन मिले,मिलती शितल -छाँव। धन-दौलत की भूख पर,इन्हें लगा मत दाँव।।32 धरती मेघों से करे, गुपचुप-गुपचुप बात। पलभर में होने लगी, नेह भरी बरसात।।33 नयन मिलाकर फाग से, महक रहा कचनार। खुशियों के टेसू खिले, आई मस्त-बहार।।34 छ्लकाता है माघ जब,घट भर-भर कर प्यार। खिल उठती है फुनगियाँ, छू कर प्रेम-तुषार।।35 देख कुहासा व्योम में,सूरज दादा आज। ओढ़ रजाई सो गए,रख सिरहाने ताज।।36 पंख पसारे शीत ने,पकड़ माघ का हाथ। तब से मंजर मौत का,देख रहा फुटपाथ।।37 सागर सरि की चाह में,लेता तट को चूम। असमय लहरों में तभी,मच जाती है धूम।।38 प्राणवायु देते हमें,विटप धरा की शान। मनुज चलाता आरियाँ,यह कैसा प्रतिदान।।39

माहिया

माहिया छंद:- मात्रिक छंद है पहली व तीसरी पंक्ति में 12,12 मात्राएँ दूसरी पंक्ति में 10 मात्राएँ हों।दो लघु को एक गुरु मान सकते हैं लेकिन लघु की जगह लघु ही होने चाहिए। 2211222 211222 2211222 1) जब प्यार करेंगे हम। भूल जहाँ को फिर, हर दर्द सहेंगे हम।। 2) औकात दिखाई है। शत्रु तभी माना, जब धूल चटाई है।। 3) मन दीप जलाओ तुम। प्रीति जगाके फिर, तम दूर भगाओ तुम।। 4) वो रात कहाँ अबतो? प्यार भरी जग में, सौगात कहाँ अबतो? 5) तुम पाप नहीं करना। कष्ट मिले तो फिर, संताप नहीं करना।। 6) विश्वास दिया हमको। जाल बिछा के फिर, यूँ फाँस लिया हमको।। 7) क्यों नैन सदा बहते? पास नहीं अपने, हम दर्द सदा सहते।। 8) प्रिय! मौत नही देना। प्रीत जताके फिर, प्रिय! सौत नहीं देना।। 9) धन एक छलावा है। बात पते की है, सब एक दिखावा है।। 10) हिय प्रेम दया रखता। ताव नही खाता, घर द्वार तभी सजता।। 11) क्यों चाह रखे हम तो छोड़ चले जाना क्यों? डाह रखें हमतो। 12) झंकार लिखूँ मैं तो। बात जरा हट के, शृंगार लिखूं मैं तो।। 13) क्यों?आस रखी मैंने? संग चलोगे तुम, मन प्यास रखी मैंने।। 14) तन गौण हुआ मेरा। प्रीत समाई जब, मन मौन हुआ मेरा।। 15) जब रूठ गए अपने। टूट गया दिल भी, सब लूट गए सपने।।

अट्टाहस करे दानवता

मन-आँगन हुआ विरान। भूल गया आदमी, अपनी ही पहचान। कचोटने लगी तन्हाइयाँ, नहीं देती दस्तक, अपनों की परछाइयाँ। पतझर से पीले पड़े अरमान। गली-कुचडो में, सिसकती मानवता। कौड़ियों के मोल बिकती लाज, महलों में रंगीन,गलती रात, अट्टहास करे दानवता। गहराई दुखों की खान। कलियुग दिखाने लगा असर, बाकी नहीं रखी कोई कसर। पापी हुए मस्त-कलन्दर, सत्यवादी सहते नश्तर। रिसते घावों से कोई, कैसे चढ़े परवान?

खाली झोली

कनक रश्मियों की, सूरज ने गठरी खोली। फुदकने लगी आँगन में, गौरय्या भोली। सोई गृहणियाँ चादर तान, बासी आँगन करे गुहार। अब तो दो मुझको बुहार। कैसा आया जमाना? साँझ-ढले,जाम चढ़ते। रातें रोशन हैं, दिवस है गमगीन, सूरज शीश चढ़े,मनुज तब उठते। टकटकी लगाए देखे, ठाँवड़े आस से। आहें भरते, संस्कारों के ह्रास से। मोगरे की महक, चौखट को चूम रही। मस्त-समीर चहुँओर घूम रही। जाग मनुज जाग, जो सोया रहे। उसकी रहे खाली झोली। चीं-चीं कर गोरैया बोली।

न जाने क्यों?

भूरी-भूरी रेत पर बैठी अपलक निहारती हूँ मैं। सागर को न जाने क्यों? लुभाता है सागर का शांत चितवन रूप मुझको। कभी मचती है उठा-पटक लहरों में, तब अंतर मन के तार छेड़ जाती है जाने क्यों? कुछ मन को कचोटने लगा। भिगोया था कभी उसने मुझको अपने नेह से। बिसरा गया वही मेरी प्रीत को, न जाने क्यों? क्षणिक ख्याल मात्र से, विदीर्ण हो जाता है हृदय गहरे, अंतस में खींचातानी होने लगी। साधे रही मैं मौन, टकराकर शिला से लौट आयी लहरें। उदासीन रहा तट, भरा नहीं मृदुपाश में। फिर भी मिलन की आस पाले है। लहरें न जाने क्यों? लहर के किसी झोंके ने, तट पर चुंबन धरा जब-जब मन चीत्कार कर उठा तब-तब ईश्वर से करूँ गुहार पीड़ा हर लो मेरी। पथ उडिगते-उडिगते थकी। बिछोह का गरल पीती रही मैं न जाने क्यों?

आधुनिक व्यस्तताएं

महत्वाकांक्षाओं के बोझ तले, मानव के अरमान पले। रहते मोबाईल में आँखें गढ़ाए। अपनों के लिए फुर्सत नही, टी वी से करली हमने यारी, तबसे रिश्ते लगते भारी, निन्यानवें के फेर में चक्कर- घिन्नी सा घूमता, नौबत आए तो पापियों के पाँव चूमता। व्यस्तता के रहते, बच्चों को करते अनदेखा, पार करे तभी बच्चे लक्ष्मण रेखा, पुरुष तो क्या? नारी को भी फुर्सत नही, किसी को नौकरी से, किसी को किट्टी पार्टी से। दूरियाँ आयी रिश्तों में, मिलना भी होता अब किश्तों में। अपनों से ज्यादा दौलत है प्यारी, धन- दौलत के फेर में जिंदगी हारी, अति-व्यस्तता से तन हुआ रोगी, दवा-गटकते दिन-रात भोगी, मर्यादाएं हुयी लुप्त, उसूल पड़े हैं सुप्त, भौतिकता ने खुशियाँ हर ली, लोगों ने जिंदगी नरक, कर ली।

पछुआ हवाएँ

बटोरे थे हमने महकते सुमन, किस्मत का फेर, वो कागज के निकले, तूफां के अंदेशे से ज्यों नाविक के, अरमान लगे काँपने अब। वक्त की अंगीठी पर, जली-रोटियों-से-स्वप्न, धौंकनी सी साँसें, लगी उनको ढाँपने अब। बोले करेले-सी-वाणी, मर गया आँखों का पाणी, ठूँठ हुआ मन-दरख्त अपने ही लगे हम को जाँचने अब। पछुआ पवन का उन्माद, उड़ा ले गया लाज का घूँघट, रीता मर्यादाओं का घट, अमूल्य घड़ियां बीत गयी, ढाई आखर नहीं बाँचने अब।

उघड़ी फटी बिवाई

कच्ची उम्र में टटके पत्तों की, पीर तो डाली को सहनी है। कच्ची- नींव तो ढहनी है। अँखियों को कैसे रोकें बहने से? जमी हृदय-पटल पर, निज-स्वार्थ की काई। मानवता लगी फिसलने, बालू के घरोंदे से रिश्तों को, कैसे रोकें ढहने से? भेडिए की खाल सी मोटी, दौलत की परत चढ़ाई, मगर उघड़ी हुयी है फटी बिवाई, अब कैसे रोकें उन्हें? आहें भरने से। सींच रहे नागफनी को, तुलसी आहें भरे। क्षण-क्षण चुभते शूल, घाव को कैसे रोकें बहने से?

मर्यादा चिकोटी काटे

बदले-बदले नारी के तेवर। गुमा लाज-शर्म का जेवर। लगाकर स्वछंदता के पर, नापने लगी है गगन। संस्कारों का पाठ कौन पढ़ाए? संस्कृति कल म्यूजियम में सजेगी। मानवता किताबों में दिखेगी, आहें भरे आँगन में तुलसी का बिरवा, कहो, अब उसे कौन बचाए? माया की झील में, प्रीत की जमी बर्फ। तन-मन को रास आयी भौतिकता, बाकी रहा बस नंगापन, खार सागर में, मानव नित डुबकी लगाए। मर्यादा चिकोटी काटे, महत्वाकांक्षा तलवे चाटे, सत्यम् -शिवम्- सुन्दरम् आहें भरे संस्कृति ताके आस लगाए।

तुलसी सहे रुसवाईयाँ

नागफनी शोभित द्वार पर, तुलसी सहे रुसवाईयाँ, उस आँगन का क्या बखान करें? जहाँ मर्यादाएँ रहीं कराह। गुमनामियों में खोया आँचल, जींस-टॉप लुभाए अब नारी को। लाज-शर्म खूंटी टँगी, संस्कारों की होली जली, दौलत भरी हैं अथाह। बेटा बाप को धूने, अँखियाँ लगी है चूने. जिसे चलना सिखाया, वही दिखाए वृद्धाश्रम की राह। महानगरों का हाल खस्ता। सिसकता बचपन, कंधे पर लादे बस्ता, बात बड़ी अजब-गजब, यामिनी के आँचल में, करे अदला-बदली जोरू की। शील की उड़े धज्जियाँ, घटे नहीं काम-पिपासा। साधु-संत बने व्यभिचारी। कष्ट भोगे संस्कारी। कौन रोपे उसूलों का दरख्त? कौन करे संस्कृति की परवाह?

नहीं कोई कदर

बाज के मुख में गौरय्या,त्राही-त्राही करें हैवान को छूटे हँसी। दशहत में है सारा शहर। मानव खून में घुला जबसे जहर, साँपों ने डसना छोड़ा। सदमें में है गिरगिट, जबसे रंग बदल,बदल कर मनुज ढहाने लगा अपनों पर कहर। मजबूर है हर कोई लालच का गरल पीने को, आतंक के साये में जीने को, छाप छोड़ रहा कलियुग का हर पहर। सीलन भरी लकड़ी धूँ-धूँ कर जले, अध सिकी रोटी अटकी गले में, ईमान की दुनिया में, अब नहीं कोई कदर।

स्त्री सौंदर्य

प्रभु की अनुपम-कृति है,स्त्री! तन-मन से है कोमलांगी। विपदा में है वसुधा-सी सख्त। सबकुछ जज्ब करके सागर सी,रहती सदा मस्त। गंगा यह प्रेम की अनवरत बहती। आये तूफान लाख,उफ नहीं करती। लुटाती सबको नेह, महकाती पूरा -गेह। पति की सावित्री,बच्चों की पन्ना धाय,वो। मातृ-भूमि वास्ते,रानी लक्ष्मीबाई वो। भाँति-भाँति की माटी से,इसको बनाया है। जाने कितने रूपों से इसको सजाया है? फिर भी पुरुष ने इसको अहं पर बलि चढ़ाया है। महकाती दुनिया को, प्रेम-रस -धार से। करता क्यों आहत पुरुष,क्रूर-व्यभिचार से? नव -सृजन की स्वामिनी, सदा यही कामिनी, बीज-अंकुरण की सहकर पीर। रखती नारी मन में धीर। तभी तो चल रही इससे सृष्टि सारी, शत-शत नमन है तुझको, हे!नारी।

नारी

प्रति पल पावन प्रीति-पगी। कंगन करधनी करतब करें। पिउ-पिउ पुकारे पायल प्रिये! हँस -हँस हरे हमको हमीं से, मनमोहिनी मचले मनचली। हर्षित ह्रदय है हरक हरीतिमा। छलती छबीली छप्पन-छुरी। सुंदर सजीली सुघड़ सुहासिनी। चंचल चकोरी चित्त चढ़ी। चाहे चकोरा चक चाँदनी। कच्ची कली कचनार की नारी नमः नारायणी।

बेबस नहीं हूँ

बेबस होकर जीना, मेरा स्वभाव नहीं। अंतस में कभी,पाला दुराव नहीं। बुनती हूँ प्रीत के धागे। उनके आगे पल में, विपदा भागे। फिर क्यों छली गयी, हर युग में स्त्री? कभी परम्पराओं पर कोख उजड़ी। कभी दहेज पर उछली, लाचार बाप की पगड़ी। बेबस नहीं हूँ, नहीं लाचार हूँ। फिर भी, कर्तव्यों का लम्बा पर्चा, पर अधिकार नहीं, क्या देगें वो मुझे? जिनकी ही औकात नहीं। नहीं भीगा हो लिहाफ, ऐसी कोई रात नहीं। तोड़ बेड़ियों को, गगन नापना है। पुरुष की बनाई परिधि को तोड़ तभी। मेरे सपनों ने उड़ान भरी है अभी-अभी। अब जो टोकेंगे, मुझको रोकेंगे, औंधे गिरेंगे सभी।

परिधि

बीत गए वो जमाने, जब औरत पुरुष की, बनाई परिधि में, पल-पल सिसकती थी। पति को मान परमेश्वर, खुद दासी बनके, आजीवन खपती थी। मिले लाख जख्म उसे, सिलकर जख्मों को, जबरन अधरों पर, मुस्कान धरती थी। सपनों की रोड़ी में, कहीं कोई अरमान उग आये, आस लगा हर टीस सहती थी। फर्ज की गठरी तले, अपना अस्तित्व उसकी नजरें, हर क्षण तलाशती रहती थी। बीत गए वो जमाने, आज उड़ती है नारी उन्मुक्त गगन में, रखकर मन में हौंसला, आज की नारी लक्ष्य भेदती है।

चूड़ी वाले हाथ

चूड़ी वाले हाथ को, मत समझो कमजोर। दुर्गा का रूप धरकर, इन हाथों ने शस्त्र उठा लिए तो, चहुँ-दिश मच जाएगा शोर। कोख को लज्जित करने वालों, तुम भी किसी कोख में ही पले हो। कोख पर भगवान ने जड़ दिया जो ताला, सृष्टि रुक जाएगी सालों। चमड़ी के भूखे भेड़ियों सुनलो, स्त्री प्रेम की मूरत है। पावन घर की जरुरत है। कभी मीरा बन विष पी जाती है कभी सावित्री बन यमदूत से भिड़ आती है। सीता के बिन राम अधूरे। राधा के बिन श्याम अधूरे। समझ ले इस बात को जान ले निज औकात को? बिन लक्ष्मी तेरा गुजारा नहीं, क्या तूने तनिक विचारा नहीं? रुष्ट जो ये हो गई, मानों किस्मत सो गई। जीवन मरुस्थल हो जाएगा। फिर कैसे जी पाएगा?

गरल का पान

चढ़ा दिए भेंट,पुरुष के अहं पर नारी ने निज-अरमान। चढ़कर कन्यादान पर बलि, बड़ा दिया बाबुल का मान। पग धर साजन के अँगना, सहर्ष किया किया सर्वस्व अर्पण। गूँजी किलकारी जब आँचल में, उसको साँसों में बसा लिया, गरल का पान भी, ताउम्र सुधा मान किया। गुजर गयी जिंदगी, धर्म निभाते-निभाते। अपनों को नेह भरा, निवाला खिलाते-खिलाते। आज वही माँ पड़ गई, औलाद के लिए भारी, लुटाकर यौवन जिसने सींची क्यारी। लगती है अब वो बेचारी। बिलख रही ममता, वृद्धाश्रम की देहरी?।

तुम ही वैतरणी हो

तुम ही से चलती मेरी हर श्वांस है। तुम ही से खिलता मधुमास है। तुम ही अँखियों का ख्वाब हो। तुम ही हर सवाल का जवाब हो। तुम ही मन-आँगन का सावन हो। तुम गंगा सी पावन हो। तुम ही से जीवन में संगीत है तुम ही से महकते गीत है। तुम ही गांडीव की टँकार हो। तुम ही मर्यादा की धार हो। तुम ही श्यामा की भक्ति हो। तुम ही शिव की शक्ति हो। हर मुश्किल हँसकर सहती हो। तुम ही मलय-पवन बन बहती हो। तुम ही प्रणय की आस हो। तुम ही प्रेम-भरा हर अहसास हो। तुम ही बगिया की माली हो। विपदा में बन जाती, काली हो। तुम ही सबके जख्मों की दवा हो। तुम ही जग की प्राण-हवा हो। तुम जीवन की सिंदूरी-शाम हो। तुम ही जग में चारों-धाम हो। तुम ही जग के दुख-हरणी हो। तुम ही वैतरणी हो। तुम ही से है घर चमन। नारी! तुझको सत-सत नमन।

मर्यादा चिकोटी काटे

बदले-बदले नारी के तेवर। गुमा लाज-शर्म का जेवर। लगाकर स्वछंदता के पर, नापने लगी है गगन। संस्कारों का पाठ कौन पढ़ाए? संस्कृति कल म्यूजियम में सजेगी। मानवता किताबों में दिखेगी, आहें भरे आँगन में तुलसी का बिरवा, कहो, अब उसे कौन बचाए? माया की झील में, प्रीत की जमी बर्फ। तन-मन को रास आयी भौतिकता, बाकी रहा बस नंगापन, खार सागर में, मानव नित डुबकी लगाए। मर्यादा चिकोटी काटे, महत्वाकांक्षा तलवे चाटे, सत्यम् -शिवम्- सुन्दरम् आहें भरे संस्कृति ताके आस लगाए।

नारी ऐसी होती है

खूब लुटाती है नेह, नित्य जलाकर अपनी देह। बनकर शीतल पावन मेह, सींचती है साजन का गेह। नारी!ऐसी ही होती है। हर-दिन प्रीत ही बोती है। हौले से सरका देती संदूक में सपनों की बाँध पोटली, बन जाती है ओखली। नारी ऐसी ही होती है। स्वर्ण-प्रभा -सी महकती , गोरैया- सी चहकती। एक दिन वही मिली अलाव-सी दहकती। जीवन की साँझ ढले, तन-मन उपले सा जले। जर्जर है तृषित काया। फिर भी रोष नहीं आया। नींद उचटी तो, खुदको वृद्धाश्रम के आँगन पाया। तब ओढ़ भक्ति का दुकूल, मनवा सरसाया। नारी ऐसी ही होती है। दुर्गम अब कोई राह नहीं। शिलाभूत होते हैं वही, जिसको गत व आगत की परवाह नहीं। नारी ऐसी ही होती है।

  • मुख्य पृष्ठ : शकुंतला अग्रवाल 'शकुन' - हिंदी कविताएँ
  • मुख्य पृष्ठ : शकुंतला अग्रवाल शकुन : हिन्दी एकांकी, कहानियाँ और अन्य गद्य रचनाएँ
  • मुख्य पृष्ठ : हिन्दी कविता वेबसाइट (hindi-kavita.com)