ग़ज़लें - रजनीश्वर चौहान 'रजनीश'
Ghazlein : Rajnishwar Chauhan 'Rajnish'
1. सच बता देते तुम तो क्या होता
सच बता देते तुम तो क्या होता हद से हद ये कि मैं ख़फ़ा होता यारों हम सब तो साथ वाले थे कोई तो साथ भी रहा होता प्यार तो काम था मेरा पर मैं आदमी भी तो काम का होता फ़ाख़्ता या तो मेरे होते पंख या तो तुझ में ही हौसला होता बेशक उसने कहानी पढ़ ली थी काश उनवान भी पढ़ा होता ख़्वाब ही ने जगा के रक्खा है वर्ना आदम तो सो चुका होता बिन मोहब्बत के जी रहे थे हम अपना होता भी कुछ तो क्या होता क़ैस लैला का कौन होता जो वो दुनिया-दारी में फँस गया होता वैसे चिड़िया को गोद लेने से अच्छा ये था उड़ा दिया होता
2. ये ख़ुशी है वो पलट के आ रहे हैं
ये ख़ुशी है वो पलट के आ रहे हैं दुख ये है कुछ बदले-बदले आ रहे हैं बिन बुलाए आइए ना ऐ मसीहा दर्द भी तो बिन बुलाए आ रहे हैं धूप से भागे नहीं ये सोचकर हम पेड़ पर कुछ सब्ज़ पत्ते आ रहे हैं आसमाँ से क्या गिला-शिकवा किया जाए हम परिंदे ही क़फ़स से आ रहे हैं ज़ात पूछी पानी देते वक़्त मैंने तब से ख़्वाबों में वो प्यासे आ रहे हैं रात भर बूढ़ों के घर में रौशनी थी गाँव में चर्चा थी बेटे आ रहे हैं प्यार की वो डोर नाज़ुक पड़ रही है उसको अब हर रोज़ रिश्ते आ रहे हैं
3. चल अब दुनिया के जैसा सोचते हैं
चल अब दुनिया के जैसा सोचते हैं मेरे दिल हम भी अपना सोचते हैं ज़रा सा सोचने वाले जहाँ, जा तुझे हम भी ज़रा सा सोचते हैं मिलन पर सोचते रहते हैं क्या-क्या बिछड़ते वक़्त हम क्या सोचते हैं दिमाग़ इतना वहाँ किस काम का था मोहब्बत में तो थोड़ा सोचते हैं परों के बा'द अब ये ज़ेहन बाँधो हम इस से आसमाँ का सोचते हैं कफ़न की बात भी छिड़ ही गई थी मरीज़ इक दिन में कितना सोचते हैं ये जो घर छुट्टियों में भी न पहुँचे ज़ियादा तो ये घर का सोचते हैं किसी इक घोंसले को घर बताना फ़क़त बच्चे ही ऐसा सोचते हैं
4. कहीं ख़ुद को नहीं बाँटा अभी तक
कहीं ख़ुद को नहीं बाँटा अभी तक तेरा ही है तेरा हिस्सा अभी तक तेरे बिन ख़ाक गुज़रेगी मेरी उम्र तेरे बिन दिन नहीं गुज़रा अभी तक तेरे होते हुए भी दुनिया देखी इन आँखों ने भी क्या देखा अभी तक मैं सच नंगा हूँ अब भी पर तू ये देख नहीं झूठा लिबास ओढ़ा अभी तक रक़ीब इस वास्ते सुन गया राय जहाँ वो है वहाँ मैं था अभी तक उसे मुझ से ज़ियादा ग़म है उस ने एक आँसू भी नहीं ख़र्चा अभी तक लगी थी प्यास तो पानी लगा साफ़ अगरचे था तो ये गदला अभी तक जलाती धूप का दिन और बचा है मेरे ही साथ है साया अभी तक न कोस इन रास्तों को मान 'रजनीश' तुझे चलना नहीं आया अभी तक
5. अपना जो दुख है दूर खड़ा है
अपना जो दुख है दूर खड़ा है उस के दुख का ये रुत्बा है ख़ुशियों ने मेहनत तो बहुत की रंज मगर अव्वल आया है दोस्त तेरा ग़म अच्छा है, तू ग़म में मुझे अपना कहता है अपना इश्क़ भरम है होगा मुझ को भरम में ही जीना है एक अँधेरे घर में हैं हम जिस का दरीचा कुछ छोटा है अपनी मोहब्बत के सहरा में मैं प्यासा हूँ वो दरिया है बर्क़ गिराई अब्र ने लेकिन लोगों ने बस शोर सुना है कैसे सफ़र पे जाने दूँ यार जब मुझ को रस्ते का पता है मुझ को बेचैनी होती है बाक़ी सब बिल्कुल बढ़िया है बस बर्बादी हाथ लगी है और अना से क्या मिलता है
6. मुश्किल से तो इक शख़्स से
मुश्किल से तो इक शख़्स से रिश्ता था हमारा और उस से भी हर रोज़ से झगड़ा था हमारा हम को ही नहीं आया हुनर चलने का वर्ना क़िस्मत ने कभी हाथ तो पकड़ा था हमारा रात आ के बता कर गई है हम को हक़ीक़त दिन तो किसी धोके में ही ग़ुज़रा था हमारा सुन लेते थे हम दूसरों के दुख को कई बार ख़ुश रहने का इक ये भी तरीक़ा था हमारा हद तो ये है फिर भी नहीं हो पाई मोहब्बत इस बार का तो शख़्स भी पूरा था हमारा सोचा तो हमेशा तेरे पास आने का हम ने रस्ते में मगर पहले घर आता था हमारा फिर उस ने हमें छोड़ना तो था ही ना रजनीश जब रोज़ किसी और ही का रोना था हमारा
7. चलो तुम्हें तो जुदा करूँगा
चलो तुम्हें तो जुदा करूँगा तुम्हारी यादों का क्या करूँगा क़फ़स नहीं दिल बड़ा करूँगा मैं पंछियों को रिहा करूँगा अभी अज़ाब आया ही कहाँ है अभी तो मैं हौसला करूँगा अब अपने पास इक मैं ही बचा हूँ सो ख़ुद से ख़ुद ही मिला करूँगा मैं ख़ुद भी शामिल हूँ मुश्किलों में मैं ख़ुद का भी सामना करूँगा सलीक़े से तो निकाल दिल से वगरना दिल में चुभा करूँगा उदास ग़ज़लों उसे लगा था मैं उस पे नज़्में लिखा करूँगा मैं ख़्वाब ही बन गया हूँ और अब बस आँखों में ही रहा करूँगा
8. ये जो पूरी मोहब्बत भी नहीं है
ये जो पूरी मोहब्बत भी नहीं है क़ज़ा है ये अज़िय्यत भी नहीं है हमें रोना है और हम ठहरे लड़के हमें तो ये सहूलत भी नहीं है मैं काफ़िर हूँ यहीं जी ले मेरे साथ मेरे हिस्से में जन्नत भी नहीं है मु'आफ़ी और दग़ा-बाज़ी पे मिल जाए ये इतनी छोटी हरकत भी नहीं है
9. ये हम जो हँस रहे हैं
ये हम जो हँस रहे हैं बेबसी पर हमारा तंज़ है इस ज़िंदगी पर हुआ ऐसा अमावस-रात थी वो और अपने को यक़ीं था चाँदनी पर नज़र तो हम भी आ जाते उसे जो बराबर रौशनी पड़ती सभी पर नए तो हैं यक़ीनन इसलिए आप भरोसा कर रहे हैं ख़ुद-कुशी पर अभी जीवन से तू महरूम है यार तभी इतरा रहा है मय-कशी पर सितम अब ये है वो लौट आया है और हमारा आ गया है दिल किसी पर किसी से तुम मोहब्बत कर लो वर्ना सवाल उठता रहेगा दोस्ती पर
10. अच्छा तो तुम आने-जाने वाले हो
अच्छा तो तुम आने-जाने वाले हो मुझे लगा था साथ निभाने वाले हो जैसे तुम ने हाथ को कस कर पकड़ा था जान गया था हाथ छुड़ाने वाले हो बिल्कुल भी न लगे दिल इतना ध्यान रहे मुझ से अगर तुम दिल बहलाने वाले हो ख़्वाब के बा'द भी सोचा है क्या कुछ तुम ने चलो अभी तो ख़्वाब दिखाने वाले हो बुज़दिल हो तुम शहज़ादे और वो लड़की सोचती है तुम हाथ बढ़ाने वाले हो थोड़ा हाल तो ठीक करो 'रजनीश' अपना आईने से गर्द हटाने वाले हो
11. कितने मुश्किल हैं ये रस्ते देख लो
कितने मुश्किल हैं ये रस्ते देख लो और हम इन ही पे चलेंगे देख लो तुम अँधेरे पे ही क्यूँ करते हो ग़ौर चाँद देखो या सितारे देख लो फेंक दो औरों के चश्मों को कहीं और मुझे अपनी नज़र से देख लो कुछ दिनों की अक़्ल तो आ जाती है गर मोहब्बत में तमाशे देख लो ये हक़ीक़त भी हो जाते हैं कभी इसलिए भी थोड़े सपने देख लो रात कैसे सोने दे सकती है फिर चाँद को गर दिन-दहाड़े देख लो तुम से तो सूरज बस इतना कहना है मेरे घर के भी दरीचे देख लो वक़्त-ए-रुख़्सत है नहीं रोऊँगा मैं क्या पता तुम पीछे मुड़ के देख लो आँखें होकर भी नहीं देखेंगे लोग सो हम अंधों से कहेंगे देख लो
12. और तो हुआ ही क्या मुझ से
और तो हुआ ही क्या मुझ से हुनर हुआ ज़ाया' मुझ से शहर सदा देते थे मगर छूटा नहीं शिमला मुझ से कुछ तो प्यास ही कम थी कुछ दूर भी था दरिया मुझ से वक़्त था वो भी आख़िर का क्या ही हो पाता मुझ से मैं तो मैं था आइना भी हाल छुपाता था मुझ से ठेस तो ऐसी लगा ज़ालिम हो पाए रोना मुझ से छोड़ गया ये बात भी छोड़ मिल कर तो जाता मुझ से वो मेरा ही जंगल था जिस का पेड़ कटा मुझ से जीत में अब सर झुकता है वो ऐसे हारा मुझ से तन्हा हो पर कैसे हो ये क्या पूछ लिया मुझ से
13. मैं क़िस्से को लिए बैठा हुआ था
मैं क़िस्से को लिए बैठा हुआ था कोई बस पूछ लेता क्या हुआ था मोहब्बत तो बड़ी बाज़ी है फिर भी मैं तो यारी में भी हारा हुआ था उसी को जानने में लग गई उम्र जिसे नज़दीक-तर रक्खा हुआ था मैं साया कैसे समझाऊँ उसे अब कि सूरज सर पे ही आया हुआ था वो रिश्ता मुफ़्त में टूटा है जिस को बनाने में बहुत ख़र्चा हुआ था नई पीढ़ी भी ये कह कर बँटी है कि बूढ़ों में भी बँटवारा हुआ था कोई तितली चमन में आई थी पर गुल अपने सोज़ में डूबा हुआ था अब आकर क्या ही शायर से सुनोगे तब आते जब वो याद आया हुआ था कोई रोया तो याद आया है मुझ को वो सारा वक़्त जो गुज़रा हुआ था ज़रा सा और ही रो लेते 'रजनीश' ज़माने बा'द तो रोना हुआ था
14. हम निकलने के तरीक़े जानते हैं
हम निकलने के तरीक़े जानते हैं क़ैद-ख़ाने पर कहाँ ये जानते हैं उन परिंदों ने भरोसा कर लिया पर हम इन इंसानो के झाँसे जानते हैं तुम ने जो सब कुछ किताबों में पढ़ा है हम वो सब कुछ तजरबे से जानते हैं क्यूँ भटकते फिर रहे हैं इस तरह हम सच बताना आप रस्ते जानते हैं इसलिए बाज़ार में मन मार आए क्यूँकि घर का हाल बच्चे जानते हैं तुम से अब ग़ज़लों में ही मिलना पड़ेगा प्यार के दुश्मन ठिकाने जानते हैं क्यूँ न रखवाली करें तालाब की हम जब मछेरे के इरादे जानते हैं
15. बेसबब कब गिला किया मैं ने
बेसबब कब गिला किया मैं ने बस बुरे को बुरा कहा मैं ने मुझ को लोगों ने राही मान लिया जबकि पहला क़दम रखा मैं ने अब सफ़र का तो आप ही जानो हाल-ए-रस्ता सुना दिया मैं ने वक़्त हर बार ये बताता है बीते लम्हों में क्या किया मैं ने इम्तिहाँ में वही न काम आया सब सेे ज़्यादा जिसे पढ़ा मैं ने क्या पता फिर से तेरे काम आऊँ ख़ुद को थोड़ा बचा लिया मैं ने चल अँधेरे मुक़ाबला कर ले रख दिया ताक पर दिया मैं ने
16. हमारे दिल का इक रस्ता बना है
हमारे दिल का इक रस्ता बना है मगर ये जान लो आधा बना है हम ऐसे पेड़ हैं जिनका निगहबाँ यहीं छाँ में लकड़हारा बना है परिंदे कूच करते जा रहे हैं शिकारी जबसे हम सेाया बना है हम उनवाँ ही अब उस को प्यास देंगे जिस इक तस्वीर में दरिया बना है तुम अपना ध्यान पर्दे पे ही रखना मेरा किरदार कुछ कच्चा बना है बड़ी दीवार को गरियाने वाले कभी सोचा कि दरवाज़ा बना है सहारा देगा या ज़ख़्मी करेगा मेरा वो यार पत्थर का बना है खिलौना आपका है जैसे खेलो बस इतना सोचना प्यारा बना है ज़रा अफ़सोस कर कुछ सोच 'रजनीश' तू ख़ुद को देख क्या से क्या बना है
17. पहले क़ाबिल बनाएँगे ये हाथ
पहले क़ाबिल बनाएँगे ये हाथ फिर तेरे हाथ पे रखेंगे हाथ हमने क्या तेरे दर को खोलना था बस निशाँ के लिए लगाए हाथ तू ज़बाँ खोल कुछ क़दम तो उठा कब तलक यूँ उठेंगे उस के हाथ चाँद तुझ को पकड़ तो लेते हम पर वहाँ तक नहीं पहुँचते हाथ तू ने ही भीड़ को नहीं देखा वर्ना मैं ने हिलाए तो थे हाथ तुम भी पैदा करो हया ख़ुद में हम ही क्यों आँख पे धरें ये हाथ मान ले है जुदाई क़िस्मत में छोड़ दे अब दिखाने अपने हाथ जब ज़रूरत है तो अकेले हैं क्या करें थामें ही पराए हाथ याद बे-होशी की वो ही है मुझे जब जबीं पे रखा था माँ ने हाथ
18. तभी वो बहस में जीती हुई है
तभी वो बहस में जीती हुई है कि बस उसने वकालत की हुई है सही है मशवरा पर आप रखिए कलाई आपने काटी हुई है बदलना तो मुझे बस वक़्त को है घड़ी तो ठीक से पहनी हुई है न बंजर देखी जाती है न ज़रख़ेज़ ये जो हमने ज़मीं छोड़ी हुई है मिटेंगी दूरियाँ कैसे कि हम ने ग़लत-फ़हमी भी तो पाली हुई है वो जो इक राय है ना काम की, बस वही हम ने नहीं मानी हुई है बस इक सूरत है ले दे के मेरे पास ये भी माँ ने मुझे बख़्शी हुई है
19. मैं उसे बेकसी में जुदा कर गया
मैं उसे बेकसी में जुदा कर गया ये बहाना बताकर तो मन भर गया सब यहाँ दिल की आदत से मजबूर हैं तुझ को भी तो नहीं जाना था, पर गया हम भी उस दिल के रस्ते पे सुनते तो हैं हम से पहले कोई एक लश्कर गया मेरे अंदर फ़क़त अब तमाशाई है वो जो गुम-सुम था इक आदमी मर गया
20. इक मुक़द्दर छीनने वाले का
इक मुक़द्दर छीनने वाले का जल्वा देखता मैं हवा से जेब तक जाता वो सिक्का देखता ज़िन्दगी तू नक़्ल की मोहलत अगर देती मुझे मैं कसौटी पे तेरी धोखे का पर्चा देखता कुछ दिनों तक कोई पागल बैठता था दार पे जो हज़ारों मर्तबा सुनसान रस्ता देखता मैं उसे हर बार मेहमाँ बोलता था और वो मेज़बानी देखता था और कमरा देखता आसमाँ पे चाँद उस शब आ गया था बा'द में यार तू वो आख़िरी बादल तो छँटता देखता
21. देख ले यार ये भी
देख ले यार ये भी हम कर तो सकते हैं दोनों गले मिल कर भी जुदा हो सकते हैं नम कर सकते हैं रिश्ते की चादर को आँसू गुनाह के दाग़ नहीं धो सकते हैं उस को दिलासे की उम्मीद है हम से और हम ऐसे हैं कि दुख सुन कर रो सकते हैं दीवाने हैं हम सो हमें दो दर्द और ग़म अहल-ए-हवस ये बोझ कहाँ ढो सकते हैं नींद से पहले देख लिए हों जिन ने ख़्वाब ख़्वाब की ख़ातिर वो कैसे सो सकते हैं बच्चों की मानिंद हैं अपनी दुनिया में हाथ न पकड़े कोई तो हम खो सकते हैं दिल की ज़मीं ज़रख़ेज़ नहीं आँखों की है आप उम्मीद के बीज इस में बो सकते हैं
22. ग़लत था आइना ऐसा नहीं था
ग़लत था आइना ऐसा नहीं था हमीं ने ठीक से देखा नहीं था मुझे सुनकर सुनाने लग गए तुम बताया था तुम्हें पूछा नहीं था ग़नीमत है मोहब्बत आई मुझ तक वगरना हाथ कुछ लगता नहीं था नया मेहबूब चारागर था लेकिन हमारा ज़ख़्म था, भरता नहीं था मैं उसकी आँखों में क्या देखता हूँ मेरा चेहरा मेरा चेहरा नहीं था ज़ियादा बोझ उठा कर अव्वल आया वो, जिसका पीठ पर बस्ता नहीं था
23. बस इक बार तुम दिल को
बस इक बार तुम दिल को पत्थर बना दो मेरी बात मानो मुझे रास्ता दो तभी हाल अपना छुपाता हूँ तुम से कहीं ये न हो तुम भी बाछें खिला दो मेरे घर से क्यूँकर अँधेरा मिटेगा मैं कहता ही ख़ुद हूँ उजाला हटा दो सितम ये है मुझ को न सुनने से पहले तुम्हीं बोलते थे बता दो बता दो
24. दग़ा मिलने पे भी उस शख़्स को
दग़ा मिलने पे भी उस शख़्स को रुसवा नहीं करना मुझे इस बात का तो इल्म है अब क्या नहीं करना ज़रूरी है मोहब्बत क़ैस या फ़रहाद के जैसी यही कोशिश करो वैसी ही हो वरना नहीं करना अजब सी कशमकश में हूँ लिए इक मसअला ग़म का बताना भी है सब कुछ और मन हल्का नहीं करना चला आता मैं चौखट पे तेरी शायद कभी लेकिन तुझे तेरे मकाँ का रास्ता पक्का नहीं करना तेरा सर क्यूँ झुका 'रजनीश' फिर से इश्क़ के आगे तू जब ये ठान कर आया था फिर सजदा नहीं करना
25. ये तो मैंने तुझे दिलाई याद
ये तो मैंने तुझे दिलाई याद वर्ना तुझ को क़सम कहाँ थी याद फिर से मैं तेरा हो गया होता काश आती न बेवफ़ाई याद उसने हर जन्मदिन मनाया था तुम को बच्चों रही न बरसी याद क्या रटाती है ज़िंदगी तू भी मैंने तेरी किताब कर ली याद बढ़ तो जाता ज़रा सा आगे पर रोक लेती थी मुझ को तेरी याद अब जो 'रजनीश' हो गया तन्हा आ गई तुझ को शा'इरी की याद