हिंदी कविताएँ : रजनीश्वर चौहान 'रजनीश'

Hindi Poetry : Rajnishwar Chauhan 'Rajnish'



1. ख्वाब आँखों में लिए जो निकले ज़माने में

ख्वाब आँखों में लिए जो निकले ज़माने में कदम-दर-कदम दफन होते रहे फसाने में ज़िन्दगी की ज़मीं पे हम एक मुहाजिर से हैं एक उम्र कट गई, खुदको मनाने-समझाने में ख़्वाब-ए -शब-ओ-रोज़ से अब वास्ता नहीं वह भी कैद हो गए तिलिस्म-ए-अफसाने में था तमनाओं का भी एक छोटा सा आशियाँ घर की ज़रूरतें ही मसरूफ़ रहीं जलाने में एक वक्त था कि बारिश में नहाने निकलते थे आज आँसू बहा लिया करते हैं इसी बहाने में

2. सियासी सिक्के बेकार हो जाते हैं

सियासी सिक्के बेकार हो जाते हैं, हम जो हर बार खुद्दार हो जाते हैं होते हैं बेआबरू हर रोज़ वह बेअदब, हम जो मिलते ही अदबदार हो जाते हैं मिल जाते हैं सस्ते खरीदने को जज़्बात, हम जो उनके लिए बाज़ार हो जाते हैं सजता है जब उनके ग़मों का बाज़ार, हम होकर गिरवी खरीददार हो जाते हैं लुटा देते हैं हर बार खुशियाँ दिलेरी से, हम मिलते ही उनसे सरदार हो जाते हैं देखते हैं जब भी सयानो की नादानी, सोचते हैं तब कि समझदार हो जाते हैं शहर में बिना ज़मीं इमारती हो जाते हैं, जो जाते हैं गाँव तो ज़मींदार हो जाते हैं लेकर इल्ज़ाम का छप्पर तेरे नाम का, ले आज से तेरे किराएदार हो जाते हैं होता है जब भी कभी ज़िक्र वफ़ा का, करके तुझे याद बहुत बेज़ार हो जाते हैं देखते हैं जब भी तेरी भूख का नंगापन, ए आमीरी हम तुझसे शर्मसार हो जाते हैं उठी हैं उँगलियाँ जब भी तेरी चाहत पर, छुपाने को तेरे झूठ के पहरेदार हो जाते हैं हैं हम तो अब भी उसी सफर के मोड़ पर, कोई और होंगे जो सफर में पार हो जाते हैं हँस देते हैं जब घर के बूढ़े खिलखिला के, हम देखते ही दश्त से गुलज़ार हो जाते हैं आता है जब-जब तूफां मेरी ज़िन्दगी में, मेरे माँ-बाप मेरे दर-ओ-दीवार हो जाते हैं करते हैं मोहब्बत से नफरती मर्ज़ की दवा, हम वह हकीम नहीं जो बीमार हो जाते हैं यूँ ही नहीं होते हैं हम बेवजह ही वाइज़ होती है ज़रूरत तो सलाहकार हो जाते हैं बड़े फ़ासले हो गए हैं यार से ' रजनीश ', क्यों न गिले भूल के फिर यार हो जाते हैं

3. है अजब तेरा शहर कि बुलावा नहीं आता

है अजब तेरा शहर कि बुलावा नहीं आता वहाँ गर आ भी जाओ तो रहा नहीं जाता छुपाई है बहुत मगर आह अब रुकती नहीं है कुछ ऐसा दर्द जो अब सहा नहीं जाता मेरे तजुर्बे छीनने लगे हैं ज़बां मेरी मुझसे हाँ एक उम्र के बाद ज़्यादा कहा नहीं जाता किसीकी आरज़ू कर आई होगी क़ैद उसे वरना कौन जहाँ से होकर रिहा नहीं जाता है दस्तूर कि मिलते हैं बिछड़ने वाले यहाँ रास्ते जुदा हो भी जाएं, चौराहा नहीं जाता

4. रगों में ही रखना है तो रखो संभाल के

रगों में ही रखना है तो रखो संभाल के, मिलेगा क्या बेजा अपना लहू उबाल के ज़रूरी है बसेरे को आसमां-ओ-छप्पर यहाँ, ज़रा एहतियात रखना पत्थर उछाल के सब के सब एक ही ज़ुबाँ में हाँकने लगे हैं, कोई गुज़रा तो होगा यहाँ से निवाले डाल के चलो ढूँढ लें अब किसी हुमज़ुबां में ख़ुदको, ख़बर मिलेगी नहीं फ़क़त अपना जिस्म खंगाल के ये सोचकर ख़ामोशी तुझे ज़ुबाँ सौंपी है हमने, अब जवाब जो मिले तो मिले किए बिन सवाल के सुना है आईनो से परहेज़ करने लगा है वो है दिखाया जबसे मैंने उसका अक्स निकाल के हौसला क्या दिया मैंने फैलाकर बाहें अपनी, परिंदे आज़ाद होने लगे सभी उसके जाल के है ज़रूरी कराहट को दबा बोझ उठाना भी वर्ना ख़्वाब मुक्कमल होते नहीं सहे बिन बवाल के ये कहकर न टाल समंदर हम दरिया पसंदों को कि होगा क्या हासिल हमें तुझमें कंकर डाल के संभलना आया भी तो आया बाद बर्बादी के, निकले मेरे ऐब भी हाए कितने कमाल के

5. आओ फिर सहारा दो मुझे

आओ फिर सहारा दो मुझे, गिराओ और सहारा दो मुझे थक गया हूँ रोज़ बहते-बहते, अब कोई किनारा दो मुझे सफ़र में कई नज़ारे छोड़े हैं, रोक लो और नज़ारा दो मुझे बच्चा हो जाने दो आज की रात, तोड़कर कोई सितारा दो मुझे किस्से माँ को सुनाने हैं अब, नानी का वह पिटारा दो मुझे अभी और कई घर बनाने हैं, खेलने को मिट्टी दोबारा दो मुझे

6. करके बेहाल पूछते हैं हाल ज़रूर ज़माने वाले

करके बेहाल पूछते हैं हाल ज़रूर ज़माने वाले, ख़ैरियत पूछते हैं रहकर मगर दूर ज़माने वाले आए दिन ही मेरे कुनबे से टूट गए कई यार मेरे, बचपन रहता तो रहते साथ फ़ितूर निभाने वाले बिन सोचे ही खर्ची है जिसने भी मोहब्बत यहाँ, हुए वही कमाई-ए-मोहब्बत से चूर कमाने वाले जो आये थे कभी इस शहर में ढूँढने को रोशनी, शहर की चकाचौंध से हुए वही नूर गवाने वाले गर इतना आसां होता कभी नशे से गुज़र जाना, होश में लाने को न कहते सुरूर आज़माने वाले हासिल तू न हुआ तो तक़दीर को कोस लिया, निभा लिए अब हमने भी ये दस्तूर ज़माने वाले

7. अब कुछ यूँ कर कि यूँ मिल मुझसे

अब कुछ यूँ कर कि यूँ मिल मुझसे, अबके मिल तो हू-ब-हू मिल मुझसे कब तलक छुपाएगी रुख़ ए हयात, सवाल कई हैं रू-ब-रू मिल मुझसे अरमाँ मेरे मैं निहत्थे लेता आऊँगा, है गर तेरा इरादा-ए-खूँ मिल मुझसे चिरैया आँगन से उड़ी फिर न लौटी, रवाना हुई थी कू-ब-कू मिल मुझसे तू बाग़ मेरा ले जा बस गुल न माँग, वह माँगते हैं रंग-ओ-बू मिल मुझसे पता न ' रजनीश ' मुझे अपना बता, ये कह गई मेरी जुस्तजू मिल मुझसे

8. ज़िन्दगी, ज़िन्दगी नहीं तेरी दुआओं से

ज़िन्दगी, ज़िन्दगी नहीं तेरी दुआओं से, सो मौत माँग, गर मिलती है दुआओं से वादा-शिकन दूर हैं आहिस्ता न सुनेंगे, ऊँचा बोलो, गद्दी हिलती है सदाओं से दर्द में अपने चारागर हो जाता हूँ वर्ना मुझे राहत कहाँ मिलती है दवाओं से छूकर गुज़रती है तो महसूस करता हूँ, सुना है तेरी ख़बर मिलती है हवाओं से चाँद को एक रात बेनूर कह दिया मैंने, अब कुछ रंजिश मिलती है शुआओं से यूँ फ़ासला न रख रोशनी से ' रजनीश ', तेरी आदत नहीं मिलती है ख़लाओं से

9. दौर-ए-सियासत में है बोलबाला खून का

दौर-ए-सियासत में है बोलबाला खून का, सियासत हुनर से देती है हवाला खून का कतरों ने रंगी हैं सियासी दीवारें उसकी, लाशों से हुआ होगा छप्परवाला खून का वसूलती है सूद जनता से बिना कर्ज़ ही, निकाल लेती है हुकूमत दिवाला खून का खा जाती है बस्तीयों को भूखी सीयासत, निगल ले जाती है कतरा-निवाला खून का लेती नहीं है शम'आ से रोशनी सियासत, हिंदू-मुसलमां से करती है उजाला खून का

10. आज तेरे नाम को नाम कर आया हूँ

आज तेरे नाम को नाम कर आया हूँ, मैं तेरे इल्ज़ाम अपने नाम कर आया हूँ देकर अपनी नींद तेरी थकन आँखों में, मैं तेरी उस नींद से आराम कर आया हूँ बनाकर तेरे ग़मो को अपना मयखाना, तेरे आँसुओं को मेरा जाम कर आया हूँ स्याही से तेरे-मेरे उस कागज़ी रिश्ते पर, ज़िन्दगी के हर्फ़ तुझे इनाम कर आया हूँ तेरी जुदाई से ही हुए हैं सभी चर्चे तमाम, मैं नहीं हूँ जो बात सरेआम कर आया हूँ आज खुद ही आज़ाद कर आया हूँ उसे, सोचता था जिसे कि थाम कर आया हूँ

11. रोशनी को यूँ न कर बयाँ की सभी राज़ी हो चले

रोशनी को यूँ न कर बयाँ की सभी राज़ी हो चले, स्याह शहर के क़ाफ़िर तमाम भी नमाज़ी हो चले सफ़ा भर न पढ़ पाए जो किताब-ए-मरासिम का, कर कुनबे को कचहरी आज वही काज़ी हो चले मारते फिरते हैं फूँके सब के सब ये सोचकर यहाँ कि उनके हिस्से की हवा भी कहीं ताज़ी हो चले ग़र दुश्मनी निभाई न गई हमसे कभी ए यार मेरे, हम मिलेंगे फिर से कि फिर वही हमराज़ी हो चले सीख ले इस दौर के पोशाकी तौर-तरीके 'रजनीश', ज़माना वहीं चलता है जहाँ भी लफ़्फ़ाज़ी हो चले

12. ज़ुबाँ-ओ-ग़ज़ल मेरी मसरूफ़ है फिसल जाने में

ज़ुबाँ-ओ-ग़ज़ल मेरी मसरूफ़ है फिसल जाने में, अभी पूरी एक उम्र लगेगी मुझको संभल जाने में मिसाले उफनते दरिया की मैंने मानी नहीं उनकी, जिन्हें खुद ही हिसाब लग जाता है उबल जाने में सिर्फ़ साँसे ही परवान देती है ज़िंदा होने का वहाँ, जहाँ मुद्दे आबोहवा तक नहीं खाते उछल जाने में वो धीमे-धीमे अरसे गुज़ार देते हैं खौफ़ जमाने में, तुम देर भी नहीं लगाते बात-बात पे दहल जाने में हाल ये है कि रख बोझ कांधे दबा देते हैं बचपन, बच्चे मशगूल होते नहीं खिलौनों से बहल जाने में बड़ी अक़ीदत से सींची गई है मिट्टी मेरे वतन की, कई मौसम गुज़रेंगे सियासतदानों फसल जाने में तुमसे न निभेगा ये दौर ऐ मौजज़ा-ए-हुस्न वालों, लगाते हैं दिल भी कीमत अब यहाँ मचल जाने में

13. कुनबा-ए-मंदिर-ओ-मस्जिद कुछ हिल सा उठा है

कुनबा-ए-मंदिर-ओ-मस्जिद कुछ हिल सा उठा है, होकर कोई क़ाफ़िर मज़हबी महफ़िल से उठा है उठी हैं सदाएं सल्तनत को मुद्दत्तों बाद, बनकर हर हर्फ़ बद्दुआ सताए दिल से उठा है बुझाने को आग भी उठेंगे वही खामोश कारिंदे, हो जिन्हें अहसास-ए-राख जो मुस्तक़बिल से उठा है उठेंगे अबके मसीहा भी नफरती मर्ज़ को मिटाने, ज़हर जो घरों तक आ बैठा सियासी बिल से उठा है लाल न सही स्याहनुमा ही रहने दे, रंग जो आज लहू का 'रजनीश' तेरे दिल से उठा है

14. किसीकी कागज़ी शाख़-ए-नरगिस नहीं हूँ मैं

किसीकी कागज़ी शाख़-ए-नरगिस नहीं हूँ मैं, झूठी शान-ओ-शौक़त का वारिस नहीं हूँ मैं संभाल रखी है बक्स-ए-दिल में मोहब्बत तेरी, बाद तेरे जाने के भी मुफ़लिस नहीं हूँ मैं फिर क्यों तुझे न तेरी आज़ादी देता मेरी जान, तेरे मामले में बेजान हूँ, बेहिस नहीं हूँ मैं

15. हम वह बच्चे हुआ करते थे

हम वह बच्चे हुआ करते थे, जो बाद बारिश के निखरते थे बुनते थे कहानियों में आसमां, चाँद-तारे ज़मी पे उतरते थे आँधियाँ भी चुप रहती थीं, फूल ज़िद पर अड़े उभरते थे ऊँची उड़ानों का डर देखिये, परिंदे अपने पर कतरते थे हमको तो सादगी जचती थी, वह न जाने क्यों सँवरते थे समेट लेगा हमें बाहों में कोई, बस यही सोचकर बिखरते थे अच्छा हुआ जीना छोड़ा दिया, वरना यूँ तो रोज़ मरते थे

16. ज़ख़्म अब और लिए नहीं जाते

ज़ख़्म अब और लिए नहीं जाते, चाक बीते लम्हों के सिये नहीं जाते ख़्वाब गर हम-उम्र हों तो फ़क़त लम्हें भर के लिए जिये नहीं जाते टूट के चुभ जाते तुझे, पर क्या करें काम ये भी हमसे किये नहीं जाते मंज़िल की नाकामियों के बदले में, घाव पैरों को तो दिये नहीं जाते दोस्त ऐसे कि ग़मो के प्याले मेरे, दोस्ती ऐसी, कि घूँट पिये नहीं जाते

17. रह गया बूटा आँगन का शजर होते-होते

रह गया बूटा आँगन का शजर होते-होते रह गई वह छाँव मुझे मयस्सर होते-होते मैंने रिवायत निभाई, दवा ले ली और ज़ख्म कुछ रह गए, चारागर होते-होते बीते बरस गया तो गाँव महकता देखा, अबके देख आया उसे शहर होते-होते इश्तिहार इतने बोझिल के उठाये न उठे, दब गई बात फिर कोई ख़बर होते-होते सफर से कितने आबले मिलते हैं, आदमी जान जाता है हमसफर होते-होते दरीचें, दीवारें, माथे की शिकन बताती है, उम्र ले जाता है मकाँ, घर होते-होते

18. सबब कोई पूछता है

सबब कोई पूछता है तो उलझा दिया करता हूँ यहाँ-वहाँ की बातों में, आसां भी तो नहीं होता रिश्तों में पड़ी सीलन की वजह को बयां कर पाना गर होता तो धूप को कोस लेता और बरसात पे इल्ज़ाम धर देता

19. चलते-फिरते बुतों को बुत होने का ख़ुमार बहुत है

चलते-फिरते बुतों को बुत होने का ख़ुमार बहुत है ज़रा ज़हन टटोलो तो जानो, इंसाँ बीमार बहुत है रोया करता है वह भी साथ मेरे, मैं उसे कैसे तोड़ दूँ है घर का पुराना आईना बेशक, पर ग़मगुसार बहुत है राब्ता कहने से अच्छा है कि मिल्कियत कहा जाए, जिसे भी देखो यहाँ हक़दार बहुत है, दावेदार बहुत है इश्क़ बतलाऊँ तो इज़हार बहुत है, इनकार बहुत है बतलाऊँ दोस्त तो जाँनिसार बहुत है, गद्दार बहुत है ये इमारतें, उड़ाने, आसमां, ये बड़ी बातें, मुबारक़ तुम्हें हम पहाड़ों में पले बच्चों के लिए देवदार बहुत है न भूल कि वाइज़ों को नापसंद है मुक्कमल ग़ज़ल तेरी, माना ' रजनीश ' तुझे इश्क़-ए-अशआर बहुत है

20. फिर तमन्ना-ए-जाँ है तो शमशीर बनके लगो

फिर तमन्ना-ए-जाँ है तो शमशीर बनके लगो अब जो मिलो मुझसे तो तीर बनके लगो मुझे भी है शौक जंग की निशानियों का बहुत सो अबकी जंग लगो तो तासीर बनके लगो मोहब्बत में दफ़्न करना है तो राँझा जानो मुझे गर लगना है सीने मिरे तो हीर बनके लगो बड़े फनकारों की महफ़िल भी लुट ही जाएगी शेर तबियत से पढ़ो और मीर बनके लगो

21. जवां ख़्यालों पे सख़्ती सी रहती है कोई

जवां ख़्यालों पे सख़्ती सी रहती है कोई, बड़ी बदगुमां सी इस शहर की हस्ती है कोई सौदा यूँ होता है हर जलसे-सियासी मेले में कि ठेला है ज़िन्दगी, जान भी सस्ती है कोई सफ़र है मजमें से मजमें तक का जीना यहाँ, हर एक उठाए चलता अपनी अस्थि है कोई ग़र शर्त है रोज़ जीने को मरने की तो तौबा लो यूँ मरकर साँस लेना भी ज़बरदस्ती है कोई एक ही राह से बारहा लौटा हूँ यह सोचकर कि उस सम्त भी इंसानों की बस्ती है कोई

22. इरफ़ान के लिए

वक्त भी ज़रा तनकर एक अजीब सी चुभन लिए कहने लगा है ख़फा होकर तुमसे, " अपनी साँसों को मेरे साथ-साथ थोड़ा और चलने देते मैं ही खुद ठहर जाता खुद से मात खाकर ताकि देखता रह सकता चलता हुआ तुम्हें मुझसे कुछ पहर आगे तो निकल जाते क्योंकि जब दौड़ के खेल में फासला रहता है तो जीतना थोड़ा कठिन हो जाता है ...पर बड़े सयाने निकले तुम वाकिफ़ मेरे झूठ बोलने के हुनर से चुपचाप चल दिए बिन रुके ही जैसे चलता हूँ मैं भी हर बार के झूठे हौसले दिए बिन रुके, बिन मात खाए मेरे चलते रहने के उसूलों के साथ... " ' खुद पर इस क़दर भी नवाज़िशें नहीं हुआ करतीं जो ख़्वाहिशें ही टूट जाएं तो ख़्वाहिशें नहीं हुआ करतीं जहाँ आँसू ही नम कर दिया करते हैं ज़मी को ऐ बादल, वहाँ हद से ज़्यादा भी बारिशें नहीं हुआ करतीं आज से बा-हुनर सर रखेंगे ज़िन्दगी तेरे इस झूठ को कि ख़िलाफ़ फ़नकारों के कभी साज़िशें नहीं हुआ करतीं नहीं निशां छोड़ेंगे तुम्हारे गुज़र जाने का ये याद रखना, ज़िंदा रहने वालों की आख़िरी तारीखें नहीं हुआ करतीं ' ज़्यादा कुछ तो नहीं बस शब्दों से बुना ये हल्का सा लिहाफ़ दे रहा हूँ शायद किसी रोज़ इसे ओढ़ कर इसकी सिलवटों से जान जाओगे कि चाहने वालों की कतार में एक चाहने वाला और भी है...

23. जिनकी ख़ातिर वाइज़ भी अपने सर मुंडवाते हैं

जिनकी ख़ातिर वाइज़ भी अपने सर मुंडवाते हैं ये कहाँ के ख़ुदा हैं जो इबादत करवाते हैं करो जो सवाल इन अक़ीदतमंदों से खुदाई का ये मुँह फेर लेते हैं जब हक़ीक़त पाते हैं अजब कायदे हैं ज़रूरतमंदों के लिए यहाँ कि बाज़ार चुप रहते हैं, शाह कीमत लगाते हैं वतन की दुहाई देनेवाले वतन के सौदागरों वफ़ा उन कुत्तों से जानो जो सोहबत लगाते हैं सहूलियत से आते हैं, सहूलियत से जाते हैं लोग भी न कैसे-कैसे मोहब्बत निभाते हैं मेरे चाहने वाले जब भी मुझसे मिलने आते हैं तदबीरें तो नहीं लाते, आफ़त लाते हैं अपना हाल तेरे आगे क्या बताएं कि हम तुझे याद कर-करके ख़ुदको अज़ीयत दिलाते हैं मेरे घर के रास्ते पे खड़ा है एक पुराना मकाँ जहाँ डाकिए आज भी ख़त पहुँचाते हैं अपने दोस्त भी होने लगे हैं रिश्तेदारों से अब ये मेरे हाल पे अपनी-अपनी तबियत बताते हैं उसकी याद-ओ-तलब बहुत बुरी है ' रजनीश ', सो चलो चाँद को तकने की आदत बनाते हैं

24. जहाँ का हरेक हर्फ़ लिखता बस एक वफ़ा बच जाता

जहाँ का हरेक हर्फ़ लिखता बस एक वफ़ा बच जाता मैं तुझको और लिखता गर जो सफ़ा बच जाता कापी में दफ़्न हुए मेरे अज़ीज़ मिसरे का ग़म क्या करूँ वह बस थोड़ा और जीता जो इस दफ़ा बच जाता बड़ा फायदा था ज़िन्दगी में आदमी को पढ़ने का भी मैं सिर्फ़ और सिर्फ़ किताबें न पढ़ता तो नफ़ा बच जाता

25. वक्त ऐसा भी नहीं कि मेहरबाँ होने नहीं देता

वक्त ऐसा भी नहीं कि मेहरबाँ होने नहीं देता बस जहाँ ज़रूरत हो, वहाँ होने नहीं देता आदम की तरक़्क़ी का भी अजब जलवा है ये पानी, ज़मीं और आसमाँ होने नहीं देता इस जहाँ की यही रीत है कि अपनी जवानी में चमन भी बागबाँ को बागबाँ होने नहीं देता ये " अपना मज़हब, अपना अदब ", क्या है जो आदमी-आदमी को हमज़बाँ होने नहीं देता ज़माने की अपनी रफ्तार है, ये काँधा तो क्या ठहरने वालों के लिए कारवाँ होने नहीं देता सुनो, तुम जान जाया करो तजुर्बों से अपने मैं मेरा हाल चेहरे से बयाँ होने नहीं देता

26. नादानी में हाथ से फिसलकर गया था

नादानी में हाथ से फिसलकर गया था वह पत्थर आसमाँ में उछलकर गया था बड़ी उदास-वीरान सी रहने लगी थीं सड़कें हर शख़्स वहाँ से आँखें मलकर गया था क़बाएँ पहनने लगे हैं अब इस शहर में लोग अच्छा हुआ मैं यहाँ से जलकर गया था शाम होते-होते वापस चला आया मैं सुबह घर से तो निकलकर गया था बहुत देर तक आदत रही ऐ मंज़िल मुझे मैं सीधे रास्तों पर भी संभल कर गया था

27. यूँ दश्त-बा-दश्त बवण्डर हो जाना

यूँ दश्त-बा-दश्त बवण्डर हो जाना ज़रूरी तो है मेरा समंदर हो जाना इन ग़मगीन स्याह सर्द रातों में मेरा आसां नहीं लिहाफ के अंदर हो जाना ठुकरायें वह क्या कि खुद ही चले आए अच्छा है बंदिशों से दर-ब-दर हो जाना उम्र न सही चंद दिन ही अता हो गए बेहतर था रिश्ते में कैलेंडर हो जाना निकले हो शाही महफ़िल से ' रजनीश ', अब इतना आसाँ न होगा कलंदर हो जाना

28. कोई मेरा अपना मेरी बात पे बस सर हिलाए कभी

कोई मेरा अपना मेरी बात पे बस सर हिलाए कभी न समझाए, बस सुने और हौसला दिलाए कभी कितनी दूरी पे बस्ता है भारत ये बताने के लिए कोई बच्चों को पगडण्डियों पे चलना सिखाए कभी ये जो दीवाली रोशन करते हैं सच्चाई के नाम पर बाकी की अमावसों में भी दिया जलाए कभी देती है आग बराबर की वहशत ये बात बताने को घर जलाने वालों की सम्त भी तो हवा जाए कभी ज़द में आए मासूम दरख़्त इसी आस में जीते रहे कि हवा फिर लौट आए और जला बुझाए कभी खुद जान जाएंगे क़दर छोटे कंधों की अतालिक बस एक मर्तबा बस्तों का बोझा उठाए कभी माना कि आप नए-नए खुदा हुए बैठे हैं हुज़ूर पर क़ुबूल लिया कीजे जो कोई दुआ लगाए कभी

29. जान, जान लगे सो कुछ यूँ किया करती है नींद

जान, जान लगे सो कुछ यूँ किया करती है नींद आँखों को नमी, जिगर को खूँ दिया करती है नींद ख़्वाब मनचाहा आए तो खुशमिज़ाजी दिया करती है, गर न आए तो अहसास-ए-निगूँ दिया करती है नींद सहर, दिन-दोपहरी, शाम ख़यालों से थकाये रखती है रात जो आँख लगे तो मज़मूँ दिया करती है नींद यूँ तो मिलता है यकसर माँ की थपकियाँ से आराम उसपे और न जाने बेससब ही क्यूँ दिया करती है नींद एक नर्म जान को सोता देख आज ये जाना ' रजनीश ', तकने वाले तक को भी सुकूँ दिया करती है नींद

30. इन्तेहा ख़ैर कि मेरे सर तेरे ख़यालों का बसर होता है

इन्तेहा ख़ैर कि मेरे सर तेरे ख़यालों का बसर होता है वरना तेरा साथ होना कहाँ किसीको मयस्सर होता है न पहले, न बाद, न रात, न सहर सुकूँ मुख़्तसर होता है किसी से मिलना-बिछड़ना भी कितना बा-असर होता है किस किनारे बैठें, किसे ताकें, किस से लिपटा करें अब यहाँ न दरिया, न फूल, न वो, न भँवर होता है कहे माने पे है ये अपना चलना, ठहरना, ये जिये जाना सुनते हैं तक़दीर बदलती है, सुनते हैं मुक़द्दर होता है काँधे, आसन-ए-बाज़ू पर से कहाँ जाना गया हमसे जब खुद राह निकले तो जाना कि क्या सफ़र होता है चार बातें हाज़िर जवाबी को सीख लेंगे ऐ दिल-ए-नाकाम ऐसा होता है, वैसा होता है, अगर होता है, मगर होता है क्या सर चढ़ाएं ' रजनीश ', क्या ग़म करें कामयाबी का ये ख़िताब-ए-ज़िन्दगी है, कभी इधर, कभी उधर होता है

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