हिंदी कविताएँ : पूर्णिमा वर्मन
Hindi Poetry : Purnima Varman
1. स्वर्ण हिरण
स्वर्ण हिरण छलता है
पग-पग पर
राम और सीता को फिर मारीच दलता है
इच्छाएँ उड़ती हैं
तितली-सी क्षणभंगुर
बार-बार
रंगों को यहाँ वहाँ चमकाती
मन है कि आवारा
मोह के बवंडर में ओर छोर जलता है
स्वर्ण हिरण छलता है
निराशाएँ छाती हैं
मकड़ी के जालों-सी
तार-तार
सब अदृश्य जहाँ तहाँ फैलाती
जीव है कि बेचारा
होनी के बंधन में सर्प-सा मचलता है
स्वर्ण हिरण छलता है
मौसम बदलते हैं
विजयपर्व संग लिए
दिशा-दिशा
उत्सव को घर-घर में बिखराते
आस दीप उजियारा
दुख के अंधियारे में जगर मगर जलता है
सुख सुहाग पलता है
सब अनिष्ट टलता है
2. झरती हुई नीम
नीम नीम धरती है नीम नीम छत
फूल फूल बिखरी है बाँटती रजत
तितली सी उड़ती है दूर तक हवाओं में
चैत की छबीली है छिटकती छटाओं में
उत्सव के रेले हैं
पात पात मेले हैं
हुरियारी बगिया ने
खूब रंग खेले हैं
लेकिन यह श्वेत वर्ण फूल फूल बिखरी है
नीम नीम झरती है नीम नीम ठहरी है
टाँकती दिशाओं में
रेशमी नखत
जाने क्या कहती है सड़कों के कानों में
सर सर स्वर भरती है फागुन के गानों में
खुशियों में खोना है
नीम नीम होना है
दूर तलक इसी तरह
जाना है होना है
आकर के करतल पर पल भर को ठहरी है
अँगुली के पोरों पर धुन कोई लहरी है
थिरकेगी तारों पर मंद्र
कोई गत
3. पलाश गमलों में
बाँध दिया इसके विलास को
मुट्ठी में भर के विकास को
बैठक में इसको ले आया
बंधन में रख के क्या पाया
जो खिलता है मुक्त गगन में
उसको
बात बात में टोके
छाया मिले न रंग फाग के
मौसम सूने गए बाग के
अब न जंगलों खिलती आग
कैसे उठे दिलों में राग
स्वारथ हवस चढ़ा आँखों पर
अब क्या
खड़ा बावरा सोचे
नवता नए व्याकरण खोले
परंपरा के उठे खटोले
आभिजात्य की नई दुकान
बोनसाई के ऊँचे दाम
हम चुप पड़े देखते ऐसे
जैसे हों
कागज के खोखे
4. बाग वाला दिन
उदासी में खुशी की
आस वाला दिन
आज फिर बाग वाला दिन
मधुर छनती
झर रही यह धूप सर्दी की
याद आती चाय
अदरक और हल्दी की
पाँव के नीचे
नरम है दूब मनभावन
चुभ रही फिर भी
हवाएँ कड़क वर्दी सी
बरोसी में सुलगती
आग वाला दिन
आज फिर बाग वाला दिन
खींच कर
आराम कुर्सी एक कोने में
तान दी लंबी दुपहरी
सुस्त होने में
रह गए यों ही पड़े
जो काम करने थे
गुम रहे हम अपने भीतर
आप होने में
सुगंधों में उमगती
याद वाला दिन
आज फिर बाग वाला दिन
5. एक गीत और कहो
सरसों के रंग सा
महुए की गंध सा
एक गीत और कहो
मौसमी वसंत का।
होठों पर आने दो रुके हुए बोल
रंगों में बसने दो याद के हिंदोल
अलकों में झरने दो गहराती शाम
झील में पिघलने दो प्यार के पैगाम
अपनों के संग सा
बहती उमंग सा
एक गीत और कहो
मौसमी वसंत का।
मलयानिल झोंकों में डूबते दलान
केसरिया होने दो बाँह के सिवान
अंगों में खिलने दो टेसू के फूल
साँसों तक बहने दो रेशमी दुकूल
तितली के रंग सा
उड़ती पतंग सा
एक गीत और कहो
मौसमी वसंत का।
6. आवारा दिन
दिन कितने आवारा थे
गली गली और
बस्ती बस्ती
अपने मन
इकतारा थे
माटी की
खुशबू में पलते
एक खुशी से
हर दुख छलते
बाड़ी, चौक, गली अमराई
हर पत्थर गुरुद्वारा थे
हम सूरज
भिनसारा थे
किसने बड़े
ख़्वाब देखे थे
किसने ताज
महल रेखे थे
माँ की गोद, पिता का साया
घर घाटी चौबारा थे
हम घर का
उजियारा थे
7. कोयलिया बोली
शहर की हवाओं में
कैसी आवाज़ें हैं
लगता है
गाँवों में कोयलिया बोली
नीलापन हँसता है
तारों में
फँसता है
संध्या घर लौट रहा
इक पाखी तकता है
गगन की घटाओं में
कैसी रचनाएँ हैं
लगता है
धरती पर फगुनाई होली
सड़कों पर नीम झरी
मौसम की
उड़ी परी
नई पवन लाई है
मलमल की ये कथरी
धरती के आँचल में
हरियल मनुहारें हैं
लगता है
यादों ने कोई गाँठ खोली
8. खोया खोया मन
जीवन की आपाधापी में
खोया खोया मन लगता है
बड़ा अकेलापन
लगता है
दौड़ बड़ी है समय बहुत कम
हार जीत के सारे मौसम
कहाँ ढूंढ पाएँगे उसको
जिसमें -
अपनापन लगता है
चैन कहाँ अब नींद कहाँ है
बेचैनी की यह दुनिया है
मर खप कर के-
जितना जोड़ा
कितना भी हो कम लगता है
सफलताओं का नया नियम है
न्यायमूर्ति की जेब गरम है
झूठ बढ़ रहा-
ऐसा हर पल
सच में बौनापन लगता है
खून ख़राबा मारा मारी
कहाँ जाए जनता बेचारी
आतंकों में-
शांति खोजना
केवल पागलपन लगता है
9. चोंच में आकाश
एक पाखी
चोंच में आकाश लेकर
उड़ रहा है
एक राजा प्रेम का
इक रूपरानी
झूलती सावन की
पेंगों-सी कहानी
और रिमझिम
खोल सिमसिम
मन कहीं सपनों सरीखा
जुड़ रहा है
एक पाखी
पंख में उल्लास लेकर
उड़ रहा है
जो व्यथा को
पार कर पाया नहीं
वह कथा में सार
भर पाया नहीं
छोड़ हलचल
बस उड़ा चल
क्यों उदासी की डगर में
मुड़ रहा है
एक पाखी
साँस में विश्वास लेकर
उड़ रहा है
10. ताड़ों की क्या बात
हाथ ऊपर को उठाए
माँगते सौगात
निश्चल,
ताड़ों की क्या बात!
गहन ध्यान में लीन
हवा में
धीरे-धीरे हिलते
लंबे लंबे रेशे बिलकुल
जटा जूट से मिलते
निपट पुराना वल्कल पहने
संत पुरातन कोई न गहने
नभ तक ऊपर उठे हुए हैं
धरती के अभिजात
निश्चल,
ताड़ों की क्या बात!
हरसिंगार से श्वेत
रात भर
धीरे धीरे झरते
वसुधा की श्यामल अलकों में
मोती चुनकर भरते
मंत्र सरीखे सर सर बजते
नवस्पंदन से नित सजते
मरुभूमि पर रखे हुए है
हरियाली का हाथ
निश्चल,
ताड़ों की क्या बात!
11. तितलियों के दल
ग्रीष्म का आतप
बहकती तितलियों के दल
दोपहर की गुनगुनाहट
रहट की आहट
पी रहे
एकांत में यह ग्राम्य कोलाहल
बहकती तितलियों के दल
एक टुकड़ा धूप पर
चमका सुबह का नाम
डाल पंखुरी फूल पर
लिखता हुआ पैगाम
हवा का अनुमान
बादलों के
रंग का कोई गीत निश्छल
गा रहे हैं फिर -
बहकती तितलियों के दल
दोपहर के शांत खेतों में
बिखरते छंद
शहर के तूफान में फिर
ढूँढ़ते मकरंद
पल कोई स्वच्छंद
खुल सकें
जिसमें हृदय के बोल कुछ बेकल
कह रहे हैं फिर-
बहकती तितलियों के दल
12. माया में मन
दिन भर गठरी
कौन रखाए
माया में मन कौन रमाए
दुनिया ये आनी जानी है
ज्ञानी कहते हैं फ़ानी है
चलाचली का-
खेला है तो
जग में डेरा कौन बनाए
माया में मन कौन रमाए
कुछ न जोड़े संत फ़कीरा
बेघर फिरती रानी मीरा
जिस समरिधि में-
इतनी पीड़ा
उसका बोझा कौन उठाए
माया में मन कौन रमाए
13. एक दीपक
जूझ कर कठिनाइयों से
कर सुलह परछाइयों से
एक दीपक रातभर जलता रहा
लाख बारिश आँधियों
ने सत्य तोड़े
वक्त ने कितने दिए पटके झिंझोड़े
रौशनी की आस पर
टूटी नहीं
आस्था की डोर भी
छूटी नहीं
आत्मा में डूब कर के
चेतना अभिभूत कर के
साधना के मंत्र को जपता रहा
एक दीपक
रातभर जलता रहा
जगमगाहट ने बुलाया
पर न बोला
झूठ से उसने कोई भी सच न तौला
वह सितारे देख कर
खोया नहीं
दूसरों के भाग्य पर
रोया नहीं
दिन महीने साल
निर्मम
कर सतत अपना परिश्रम
विजय के इतिहास को रचता रहा
एक दीपक
रातभर जलता रहा
14. एक दीप मेरा
दुनिया के
मेले में एक दीप मेरा
ढेर से धुँधलके में ढूँढता सवेरा
वंदन अभिनंदन में
खोया उजियारा
उत्सव के मंडप में
आभिजात्य सारा
भरा रहा शहर रौशनी से हमारा
मन में पर छिपा रहा
जूना अँधियारा
जिसने
अँधियारे का साफ़ किया डेरा
जिसने उजियारे का रंग वहाँ फेरा
एक दीप मेरा
सड़कों पर
भीड़ बहुत सूना गलियारा
अँजुरी भर पंचामृत
बाकी जल खारा
सप्त सुर तीन ग्राम अपना इकतारा
छोटे से मंदिर का
ज्योतित चौबारा
जिसने
कल्याण तीव्र मध्यम में टेरा
जिससे इन साँसों पर चैन का बसेरा
एक दीप मेरा
15. आओ मिल कर दीप जलाएँ
आओ मिल कर दीप जलाएँ
जगती के सूने सीने में
नई उमंग जगाएँ
मंदिर में दीपक बाला हो, अंजुरी में महकी माला हो
धूप सुगंधित हर आला हो, गोधूली की मंगल वेला
दीपावली सजाएँ
थाली भर हों खील बताशे, अतिशबाजी खेल तमाशे
गीत गूज़री ढोल औ' ताशे, आम अशोक बाँध डोरी में
बंदनवार बनाएँ
दीवारों पर जगर मगर हो, ज्योतित जन तन मन अंतर हो
उत्सव-उत्सव घर बाहर हो, नव संवत की सुखद सुमंगल
शुभकामना मनाएँ
16. दिया
दिया दिया दिया
मुठ्ठी भर माटी,
चुटकी भर स्नेह
जगमग जग किया।
दिया और बाती
स्नेह रंग राँची
औ' मन उजास पाती
गई रात बाँची।
चौक-चौक चंदन
स्वस्तिक और दिया,
कलाई में कलावा
हर्ष-हर्ष हिया।
सोने के कंगन
माटी का दिया,
द्वारे पर तोरण
चौबारे पिया।
खील और बताशे
घर घर में बाँटे,
हर मन दीवाली
हर मुंडेर दिया।
17. मंदिर दियना बार
मंदिर दियना बार सखी री
मंदिर दियना बार!
बिनु प्रकाश घट घट सूनापन
सूझे कहीं न द्वार!
कौन गहे गलबहियाँ सजनी
कौन बँटाए पीर
कब तक ढोऊँ अधजल घट यह
रह-रह छलके नीर
झंझा अमित अपार सखी री
आँचल ओट सम्हार
चक्रों पर कर्मो के बंधन
स्थिर रहे न धीर
तीन द्वीप और सात समंदर
दुनियाँ बाजीगीर
जर्जर मन पतवार सखी री
भव का आर न पार!
अगम अगोचर प्रिय की नगरी
स्वयम प्रकाशित कर यह गगरी
दिशा-दिशा उत्सव का मंगल
दीपावलि छायी है सगरी
छुटे चैतन्य अनार सखी री
फैला जग उजियार!