हिन्दी कविताएँ : मुनीश जस्सल
Hindi Kavita : Munish Jassal
1. तो क्या हुआ, वो एक ख़्वाब ही तो था
तो क्या हुआ, वो एक ख़्वाब ही तो था
अच्छा था या बुरा, क्या फर्क पड़ता है।
वो नींद में ही तो आया था,
आंख खुलते ही कहीं चला गया।
जब आया था तो एक हाथ में कुछ बातें थी
और दूसरे हाथ में कुछ चेहरे थे।
जैसे जैसे रात आगे बढ़ रही थी,
वो भी धीरे धीरे नींद के साथ कदम मिला के चल रहा था।
सफर में उसके साथ मेरी गुफ्तगू भी हुई।
चेहरे और किस्सों के अलावा उसके पास ख़ौफ़ भी था
जो वो अपने कंधों पे लिए चल रहा था।
कहीं से रात को सुबह का इशारा हुआ।
रात गुजर चुकी थी और सुबह का सफर शुरू हो गया था।
नींद से जब आँखे खुली तो जहन में सिर्फ ख़ौफ़ था
जो शायद उस ख्वाब ने मुझे दिया है।
उसके लम्स से मेरी सांसे सहम सी गयी थी।
मगर तो क्या हुआ, वो एक ख्वाब ही तो था
अच्छा था या बुरा, क्या फर्क पड़ता है।
2. ये बातें जो तेरी मेरी हो रही हैं
ये बातें जो तेरी मेरी हो रही हैं,
ये बातें कभी खत्म न हो।
जैसे हमारे बीच मचलती हवा बह रही है
ये हवा का बहना कभी खत्म न हो।
ये बातें जो तेरी मेरी हो रही हैं
ये बातें कभी खत्म न हो।
जैसे सागर में पल पल लहरें बन रहीं हैं
ये लहरों का बनना कभी खत्म न हो।
ये बातें जो तेरी मेरी हो रही हैं
ये बातें कभी खत्म न हो।
जैसे हर दिन रात सूरज चाँद का निकलना तय है
ये इनका आना और जाना कभी खत्म न हो।
ये बातें जो तेरी मेरी हो रही हैं
ये बातें कभी खत्म न हो।
3. कितना खुद को मैं तुमसे छिपाता रहूंगा
कितना खुद को मैं तुमसे छिपाता रहूंगा ।
कब तलक तेरे साथ लुकाछुपी खेलता रहूँगा ।
तू भी तो बाहर तन्हा भटक रही है ।
सफेद धुंए के छल्लों में खूब मटक रही है ।
तू भी कहाँ हर दिन हर महीने यहां आती है ।
दिसंबर जनबरी फरबरी ही तो तुझे भाती है ।
अब आयी हो तुम तो कुछ पल साथ बिताते हैं ।
मेरे बदन कोई कपड़ा नहीं, आ बिन रुकावट के हम एक दूसरे में समाते हैं ।
अपनी मुलाकात का कोई सबूत मत छोड़ना मेरे जिस्म पर
लोग अक्सर जुकाम बुखार को जल्द पहचान जाते हैं ।