हिन्दी कविताएँ : डॉ. मुल्ला आदम अली

Hindi Poetry : Dr. Mulla Adam Ali


काश.! मैं वृक्ष होता

रंग बिरंगे पुष्प खिलाता मन भावन खुशबु फैलाता। बिन मांगे ही फल देता कुछ ना अपने लिए बचाता। परोपकार में होता दक्ष काश! मै बन जाऊँ वृक्ष। प्रेम सुधा बरसात सब पर चाहें खग हो, चाहे चौपाया। नव जीवन भर देती सब में मेरी ठंडी, शीतल छाया। करता न्याय होकर निष्पक्ष काश! मै बन जाऊँ वृक्ष।

रुदन करता पेड़

मैनें पेड़ को रोते देखा उसका सब कुछ खोते देखा। भुजा समान उसकी डाली को उससे अलग होते देखा। सिसकी हर पत्ता भरता है मुंह से आह! भी ना करता है। जडों से आंसू बहते हैं दुख की कहानी कहते हैं। अब! तो छोड़ो हमे सताना अब! ना मिलेगा मौसम सुहाना। अपने बच्चों के लिए मैंने, मानव को, दुख का बीज बोते देखा। हां! मैंने पेड़ को रोते देखा उसका सब कुछ खोते देखा।

  • मुख्य पृष्ठ : मुल्ला आदम अली - हिंदी कविताएँ
  • मुख्य पृष्ठ : हिन्दी कविता वेबसाइट (hindi-kavita.com)