हिन्दी कविताएँ : महेन्द्र मद्धेशिया

Hindi Poetry : Mahendra Maddheshiya


मंज़िल की ओर

खुली आँखों के सपनों को साकार किया जाए घर से निकले हैं, तो बस घर का मान बढ़ाया जाए। माता-पिता की आशाओं को बहन-भाइयों की अभिलाषाओं को नव-नव आकार दिया जाए। भ्रम को जीवन में लाकर भ्रमित नहीं होना है निराशा आए यदि तो संयम नहीं खोना है निराशा के क्षणों में लक्ष्य एक रखा जाए। जीत रहे तो प्रतिमान बनकर हार रहे तो मेहमान बनकर प्रतिपल मंज़िल की ओर इस क़दर बढ़ा जाए।

विकास के नीचे दबा आदमी

फुटपाथ पर लेटा है वह आदमी, नज़रें टिकाए हैं उस होर्डिंग पर, जहाँ लिखा है सबको मिलेगा पक्का मकान और तस्वीर में मुस्कुरा रहे हैं कुछ मंत्री। सिरहाने रखे हैं कुछ टूटे हुए खिलौने, जिनसे अब उसकी बेटी नहीं खेलती, क्योंकि वह नींद में भी भीग जाती है। हर बूँद बारिश की उसे नींद से जगा देती है। कभी टपकती छत की बात होती थी, अब तो छत होना ही एक सपना है। झुग्गियाँ हटा दी गईं साफ़-सफ़ाई के नाम पर, और कहा गया विकास ज़रूरी है। वह सोचता है, क्या मैं विकास में बाधा हूँ? या फिर बस इतना कमज़ोर हूँ कि मेरी चुप्पी को सबने मौन समर्थन मान लिया। रात को नींद नहीं आती, क्योंकि सड़कें सख़्त होती हैं और सपने भी। पास से गुज़रती कारें धूल छोड़ती हैं, दया नहीं। सरकार कहती है योजना चल रही है, पर पेट की तरह इंतज़ार भी रोज़ खाली सोता है। और वह आदमी, अपने बदन को दीवार समझकर हर तूफ़ान को रोकने की कोशिश करता है।

परीक्षा कक्ष

कमरे में कई पंक्तियाँ हैं। हर पंक्ति में लकड़ी से बनी दोनों ओर से घिरी कुछ डेस्क। डेस्क के सामने कुर्सियाँ, और कुर्सियों पर बैठे हैं अंतर्द्वंद्व से जूझते विद्यार्थी। सभी शांत हैं, इतने शांत कि पड़ोसी की भी सांसों की आहट तक सुनाई दे। पर भीतर, अंतर्द्वंद्व का शोर इतना तीव्र कि किसी और की आवाज़ कानों तक पहुँचती ही नहीं। ऐसा लगता है जैसे हर कोई अकेला है, और इस मरुभूमि जैसे कमरे से छुटकारा चाहता है। पर मरुभूमि और विद्यार्थियों से भरे इस बंद कमरे में एक अंतर है— तपिश तो एक-सी है, पर आशाएँ भिन्न। मरुभूमि में फसल लहराए या न लहराए, पर इस बंद कमरे में बैठे विद्यार्थियों के बीच उम्मीदें सदैव जीवित रहती हैं, नए कीर्तिमान स्थापित करने की।

संशय के धनुष पर

कमरे में पंक्तियाँ नहीं, रणभूमि की रेखाएँ हैं। हर डेस्क एक युद्धस्थल, हर विद्यार्थी अर्जुन, धनुष थामे, पर संशय में डूबा। कुर्सियाँ नहीं, तपासन हैं, जहाँ बैठा है एक थका हुआ योगी अपने ही मन को साधने की चेष्टा में। बाहर मौन है, इतना घना कि जैसे समय ठहर गया हो। पर भीतर, मन के भीतर एक चक्रव्यूह घूम रहा है, प्रश्न पत्र नहीं, जैसे धर्म का प्रश्न है। यह कोई परीक्षा नहीं, यह कर्म का परीक्षण है। यहाँ अंक नहीं बाँटते, यहाँ निर्णय होते हैं, कौन टिकेगा संघर्ष में, कौन बचेगा आत्म-संशय में। आशाएँ केवल अंक नहीं चाहतीं, वे स्वत्व की पुष्टि चाहती हैं, कि मैं हूँ, और मैं बढ़ सकता हूँ। यह परीक्षा कक्ष नहीं, यह भीतर का कुरुक्षेत्र है, जहाँ हर विद्यार्थी अपने ही संशयों से एक महाभारत लड़ रहा है।

उसके बाद का घर

जब से गई है बेटी, घर के आँगन ने हरियाली ओढ़ना छोड़ दिया है। दीवारें अब भी खड़ी हैं, पर कोई रंग उनसे बात नहीं करता। उसके बिना रसोई में बस भाप उठती है, सुगंध नहीं। गिलहरी अब भी आती है आम के पेड़ पर, पर कोई नहीं कहता, “देखो, फिर आ गई!” बर्तन वैसे ही रखे हैं, जैसे उसने सहेज दिए थे विदा होते समय। रोटियाँ अब गोल नहीं बनती, जैसे माँ के हाथों ने परिपूर्णता को याद करना छोड़ दिया हो। पिता हर शाम बैठते हैं उसी चौखट पर, जहाँ बेटी ने पहली बार उनका नाम पढ़ना सीखा था। बेटियाँ घर छोड़ती नहीं, वे अपने साथ घर का दिल भी ले जाती हैं।

भूख का खेल

जंगल में रात ने अपनी काली चादर बिछा दी है हवा में सर्दी और नमी का खेल, पत्तियों की सरसराहट और टहनियों की खनक हर ध्वनि को डरावनी बना रही है। चाँद की सफेद किरणें झील की सतह पर झिलमिला रही हैं जैसे किसी अनजाने दृश्य की कहानी कह रही हों। साँप धीरे-धीरे सरक रहा है, धरती की ठंडी मिट्टी पर अपनी चाल टिकाते हुए। हर पत्ता, हर शाख, हर दरार उसकी आँखों में जल रही है। उसकी जीभ बार-बार बाहर झलमला रही है, हवा की हल्की सरसराहट भी उसकी चाल नहीं रोक सकती। छोटा मेंढक, नन्हा और मासूम, झील के किनारे कूद रहा है, पानी की ठंडी लहरों में नहा रहा है। अंधेरी रात में उसकी हर खुशी साँप की निगाह में निशाना बन रही है। हर कूद, हर हलचल साँप के लिए भूख का मार्गदर्शन है। साँप अब और नज़दीक, मिट्टी की कंकड़ों में समा गया। उसकी छाया, जैसे रात की आत्मा, धीरे-धीरे मेंढक के चारों ओर फैल रही है। मेंढक ने एक और छलांग लगाई, पानी की ठंडी लहरों में उछल गया। लेकिन साँप ने अपनी चाल तेज कर दी है। हर कदम, हर हलचल उसके लिए भूख और शक्ति का प्रतीक बन गए। अचानक एक झपट्टा, मेंढक की आँखों में डर की चमक, साँप के दाँतों की छाया उसके चारों ओर फैली। एक पल की चुप्पी। जंगल की हर आवाज़ थम गई। साँप ने शिकार को अपने घेरे में समेटा, भूख का खेल जीत लिया। लेकिन जंगल की रात अभी खत्म नहीं हुई है। दूर, एक लोमड़ी अपनी बिल की ओर भागी। जंगल के छोटे जीव डर और सावधानी में लिपटे। चमगादड़ हवा में मंडराते हुए जंगल के अंधेरों में अपनी कहानी गूँजाते। हर जीव अपनी जगह सुरक्षित रखने की कोशिश कर रहा है, लेकिन साँप की निगाहें अभी भी सजीव हैं। साँप धीरे-धीरे अंधेरे में लुप्त हो गया, अपने शिकार के साथ संतुष्ट। लेकिन जंगल जानता है, हर रात वही खेल दोहराया जाएगा। छोटे जीव, बड़े खतरे, साँप और उसकी भूख, और अंधेरी रात का अंतहीन भय। जंगल की खामोशी में अब भी हर पत्ता, हर शाख़, हर हवा का झोंका किसी नई कहानी की उम्मीद जगाता है। रात बीत जाएगी, सूरज उगेगा, लेकिन साँप की भूख और छोटे जीवों का डर हमेशा की तरह नए अध्याय के लिए जंगल में इंतजार करेगा।

धरती की पुकार

अब जंगल सिर्फ़ आँकड़ों में बचे हैं नदियाँ मानचित्र में टेढ़ी लकीर हो गईं हवा, जो कभी गीत थी आज शोर है… दम घोंटता हुआ। शहर की धमनियों में धुआँ बह रहा है रक्त बनकर और गाँव की आँखों में सूखा उतर आया है। धरती बार-बार चेताती है पर हम उसके कानों में और मशीनें ठूँस देते हैं। आने वाली पीढ़ियाँ हमसे हिसाब माँगेंगी और हम सिर्फ़ बहाने बचा पाएँगे धरती नहीं।

अस्तित्व और बदलाव

शहरों की धूल में बिखरते हैं कुछ चेहरे हर दिन बिखरते हैं कई-कई वजहों से रोज़गार से महँगाई से अपेक्षाओं से और दबावों की आँधी से मैं देखता हूँ उन्हें टूटते हुए फिर अपना ही बोझ उठाते उठाते थककर खामोश हो जाते हुए यहाँ जीवन और संघर्ष एक-दूसरे का पर्याय हैं सब कुछ बदलता है फिर भी जड़ें ज्यों की त्यों रहती हैं अवसर की मिट्टी और अन्याय का पानी मिलकर एक अजीब-सी काई बनाते हैं जिसमें फिसलना बेहद आसान है पर फिर भी उम्मीद कभी हारती नहीं समय से देर-सबेर हर टूटा व्यक्ति अपना नया रूप रच ही लेता है यही शुरुआत है और यही अंत भी एक निरंतर बदलते अस्तित्व का।

शिक्षा के दो किनारे

शहर के कोने में एक सरकारी स्कूल है जिसकी दीवारों पर पिछले साल के सपने उखड़े हुए टँगे हैं और दूसरी तरफ एक चमचमाती इमारत जहाँ किताबें भी एयर-कंडीशन हवा में सांस लेती हैं मैं दोनों देखता हूँ और सोचता हूँ क्या शिक्षा सच में समानता सिखाती है या पहले ही दिन असमानता का पहला अध्याय पढ़ा देती है कई बच्चे बस्ते से भारी अपनी परिस्थितियाँ ढोते हैं और कई सुविधाओं के बीच बुनियादी संवेदनाओं से खाली होते जाते हैं फिर भी इन दोनों दुनियाओं में एक चीज समान है बच्चों का मौन संघर्ष जो शब्दों में नहीं उनकी आँखों में लिखा होता है शिक्षा का अर्थ सिर्फ़ पाठ्यक्रम नहीं बल्कि वह पुल है जो इन दो विरोधी किनारों को जोड़ सकता है मगर यह पुल बनता तभी है जब समाज अंक नहीं अंतर देखना सीखता है और बच्चे रटकर नहीं सोचकर सीखने लगते हैं यही परिवर्तन शिक्षा का सबसे सच्चा पाठ है जो किताबों में नहीं संवेदनाओं में लिखा होता है।

ख़ामोशी के दस्तावेज़

कुछ लोगों के पास शब्द हैं पर बोलने की इजाज़त नहीं कुछ के पास मंच है पर कहने को कुछ नहीं जो सबसे ज़्यादा बोलते हैं वे सबसे कम सुनते हैं और जो सच को समझते हैं वे चुप रहना सीख लेते हैं ये शहर सवालों से नहीं शोर से चलता है यहाँ तर्क नहीं सिर्फ़ नारे बिकते हैं यहाँ भूख समस्या नहीं मानी जाती उसे आँकड़ों में बदल दिया गया है और आँकड़ों को तालियों में यहाँ इतिहास हर पाँच साल में ज़रूरत के हिसाब से लिखा जाता है और स्मृति हर दिन थोड़ी-थोड़ी मिटा दी जाती है ये लोग काँच की दीवारों के पीछे बैठकर लोहे जैसी कठोर बातें करते हैं और हमें सहनशीलता का पाठ पढ़ाते हैं ये समय एक फैलती बीमारी की तरह है जो हर सवाल को साज़िश कहता है और हर इलाज को खतरा हम जो अब भी लिखते हैं सवाल पूछते हैं या बेहतर भविष्य के सपने देखते हैं संक्रमित घोषित कर दिए गए हैं यह कविता किसी क्रांति का ऐलान नहीं यह सिर्फ़ उस समय का एक छोटा-सा दस्तावेज़ है जब खामोशी को सबसे सुरक्षित विकल्प बताया गया।

अम्मा के नाम

अभी-अभी तो सपने लेकर घर से बाहर आए हैं, थोड़ी-सी पहचान की खातिर खुद को दाँव पर लगाए हैं। रास्तों ने बहुत सिखाया है, धूप ने हद से ज़्यादा जलाया है, हर चेहरे ने अपना मतलब हँस-हँस कर समझाया है। भीड़ में रहकर भी अम्मा कितनी बार अकेले रहे, अपनी बात कहने से पहले हज़ार सवाल सहते रहे। पैसों ने रिश्ते तौले हैं, वक़्त ने सपने रोके हैं, नींद उधार लेकर अम्मा हमने दिन भर ढोए हैं। अब जो भी है, सादा है, झूठा कुछ भी भारी नहीं, कम में जीना सीख लिया, ख़्वाहिश अब लाचारी नहीं।

हक़ की आवाज़

वे सोचते हैं डर की रस्सी से सपनों की गर्दन मोड़ देंगे पर उन्हें कौन समझाए हक़ की आवाज़ फाँसी से ऊँची होती है जो आज चुप हैं वे पत्थर नहीं बीज हैं वक़्त आने पर दरारें चीरकर बोलेंगे लाठियाँ थक जाती हैं ज़ुल्म की उम्र सीमित होती है पर सच हर हार के बाद और सीधा खड़ा हो जाता है दिन बदलेगा हिसाब लिखा जाएगा और इतिहास पूछेगा यह नहीं कि तुम शक्तिशाली थे या नहीं बल्कि यह कि इंसाफ़ से तुम कब तक भागते रहे?

ख़ामोशी के विरुद्ध

वे कहेंगे सब ठीक है सवाल मत उठाओ वे कहेंगे चुप रहना समझदारी है वे कहेंगे हालात ऐसे हैं अब कुछ बदल नहीं सकता वे कहेंगे सच बोलना मुसीबत को बुलाना है पर हम जानते हैं चुप्पी जब हद से बढ़ती है तो अपराध बन जाती है हम जानते हैं डर की आदत हक़ की हत्या करती है जो आँखें अन्याय देखकर भी झुक जाती हैं वे समय की अदालत में गुनहगार ठहरती हैं इसलिए हम बोलेंगे टूटे स्वर में सही पर सच के साथ क्योंकि इतिहास गवाह है बदलाव हमेशा आवाज़ से जन्म लेता है चुप्पी से नहीं।

मैं उस समाज के पक्ष में हूँ

मैं उस समाज के पक्ष में हूँ जहाँ सबसे पहले सबसे कमज़ोर की सुनी जाए, और सबसे अंत में सबसे शक्तिशाली की। जहाँ निर्णय ताक़त की मेज़ पर नहीं, अनुभव की धूल में बैठकर हों। जहाँ बहुमत की गिनती से पहले अल्पसंख्यक का भय गिना जाए। जहाँ भूख आँकड़ों में नहीं, खाली थाल की खनक में पहचानी जाए। जहाँ आँसू कमज़ोरी नहीं, मानव होने का प्रमाण माने जाएँ। मैं उस व्यवस्था के पक्ष में हूँ जहाँ ऊँचाई सीढ़ियों से नहीं, झुकने की क्षमता से मापी जाए। जहाँ सत्ता आदेश नहीं देती, उत्तरदायित्व ओढ़ती है। क्योंकि धरती केवल विजेताओं की नहीं, यह उन सबकी है जो गिरकर भी दूसरे को उठाना नहीं भूलते। जो दौड़ में रुककर पीछे छूटे कदमों का इंतज़ार करते हैं, जो अपनी रोटी आधी कर लेते हैं पर आँखें पूरी रखते हैं। यह धरती उन हाथों की है जिनमें शक्ति से अधिक संवेदना है, उन कंधों की है जो बोझ उठाते हैं पर किसी को कुचलते नहीं। और यदि कभी समाज को अपना चेहरा चुनना हो, तो वह शीशे में नहीं, सबसे कमज़ोर की आँखों में झाँककर चुने। क्योंकि जिस दिन सबसे अंत की आवाज़ सबसे पहले सुनी जाएगी, उसी दिन यह समाज वास्तव में सामाजिक कहलाएगा।

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