हिन्दी ग़ज़लें : कुमार विनोद
Hindi Ghazals : Kumar Vinod


गोद में उसकी वो छिपकर सो जाती थी

गोद में उसकी वो छिपकर सो जाती थी नन्ही चिड़िया पेड़ की बिटिया जैसी थी ख़ुद से बातें करना उसने सीख लिया दीवारों के बीच अकेली खिड़की थी आँसू पलकों पर ही रक्खे रहते थे वो हँसती भी बिल्कुल बच्चों जैसी थी मुफ़्त सफ़र का भेद खुल गया है यारो ख़ुशबू हवा की उंगली थामे रखती थी अब के तितली जमकर होली खेलेगी फूलों की क्यारी में 'रयूमर' फैली थी

बच्चा सच्ची बात लिखेगा

बच्चा सच्ची बात लिखेगा जीवन है सौगात, लिखेगा जब वो अपनी पर आएगा मरुथल में बरसात लिखेगा उसकी आँखों में जुगनू हैं सारी - सारी रात लिखेगा नन्हे हाथों को लिखने दो बदलेंगे हालात, लिखेगा उसके सहने की सीमा है मत भूलो, प्रतिघात लिखेगा बिना प्यार की ख़ुशबू वाली रोटी को ख़ैरात लिखेगा जा उसके सीने से लग जा वो तेरे जज़्बात लिखेगा

कहाँ दरकार सूरज को

कहाँ दरकार सूरज को किसी छुट्टी की रहती है नदी को भी कहाँ फुर्सत वो संडे को भी बहती है हिला देता है सर अपना , मचलकर झूम जाता है गिलहरी पेड़ के कानों में आख़िर कुछ तो कहती है मिलेगी अब ख़ुशी मुझसे तो उससे पूछ ही लूँगा किराए का मकाँ उसका या अपने घर में रहती है पिता अब भी हैं कल जैसे, ज़रा गुस्सैल , अकडू - से कहाँ बदली है माँ अब भी, वही , चुपचाप रहती है

मत कहो बेजान इनमें भी है जाँ

मत कहो बेजान इनमें भी है जाँ खिड़कियों से साँस लेते हैं मकाँ खिड़कियों की शान गर परदों से है पेंटिंग दीवार को रक्खे जवाँ ईंट गारा तो फ़क़त है नाम का प्यार से ही तो बने है घर मियाँ चाँद की अच्छी हो गर आबो हवा हम बना लेंगे वहाँ भी आशियाँ प्यार से तुमने जो स्वैटर बुन दिया अब नहीं मुझको डराती सर्दियाँ

ख़ुशी के साथ थोड़ा-सा उसे

ख़ुशी के साथ थोड़ा-सा उसे डर भी सताता है किसी दिन फूल तितली को डिनर पे जो बुलाता है शिकायत आसमाँ को है समंदर से फ़क़त इतनी बिना टॉवल लपेटे क्यों वो बारिश में नहाता है कभी ऐसा भी होता है ग़ज़ल आकाश लिखता है सितारे झूम उठते हैं उसे जब चाँद गाता है उदासी बेसबब कोई मुझे जब घेर लेती है मेरे होंठों पे बरबस ही तुम्हारा नाम आता है अगर दिन है यहाँ अब तो कहीं पर रात भी होगी नहीं सच सिर्फ़ उतना ही नज़र हमको जो आता है

हवा का भी कोई चेहरा हुआ होता

हवा का भी कोई चेहरा हुआ होता, तो क्या होता किसी दिन फूल ख़ुशबू से ख़फ़ा होता, तो क्या होता उफ़क़ के मानी क्या होते, क्षितिज फिर किसको कहते हम गगन सचमुच ही धरती पर झुका होता, तो क्या होता टंगा जो काँधे पे टॉवल , उसी को ढूँढ़ते रहना मज़ा गर बेखुदी में ना छिपा होता, तो क्या होता ज़माना मेल का है और तुम ख़त पर ही अटके हो जो ग़ालिब को भी इंटरनेट मिला होता, तो क्या होता ज़माने भर से यारी में, निकलती उम्र है सारी अगरचे ख़ुद से भी मिलना हुआ होता, तो क्या होता इसी के घूमने से चल रहा संसार है सारा कभी जो वक़्त का पहिया रुका होता, तो क्या होता वो कहने को मेरी पत्नी है लेकिन दोस्त है ज्यादा ना ऐसा हमसफ़र मुझको मिला होता, तो क्या होता

आस्था का जिस्म घायल

आस्था का जिस्म घायल रूह तक बेज़ार है क्या करे कोई दुआ जब देवता बीमार है । तीरगी अब भी मज़े में है यहाँ पर दोस्तो इस शहर में जुगनुओं को रोशनी दरकार है भूख से बेहाल बच्चों को सुनाकर चुटकुले जो हँसा दे , आज का सबसे बड़ा फ़नकार है । मैं मिटा के ही रहूँगा मुफ़लिसी के दौर को बात झूठी रहनुमा की है, मगर दमदार है वो रिसाला या कोई नॉवल नहीं है दोस्तो पढ़ रहा हूँ मैं जिसे, वो दर्द का अख़बार है । ख़ूबसूरत जिस्म हो या सौ टका ईमान हो बेचने की ठान लो तो हर तरफ़ बाज़ार है रास्ते ही रास्ते हों जब शहर की कोख में मंज़िलों को याद रखना और भी दुश्वार है

इक अदद पहचान का संकट

इक अदद पहचान का संकट सभी के रूबरू ख़ामख़ा की शान का संकट सभी के रूबरू कौन इसको कब, कहाँ , कैसे, किधर को ले गया गुमशुदा ईमान का संकट सभी के रूबरू सिरफिरे राजा हुए अंधेर नगरी में सभी बेतुके फ़रमान का संकट सभी के रूबरू देखने में तो बड़ी आसान लगती है ग़ज़ल है मगर औज़ान का संकट सभी के रूबरू आइना भी चाहता है झूठ अब तो बोलना इक नई पहचान का संकट सभी के रूबरू हम इसी दुविधा में डूबे, साथ दें या रो पड़ें हँस रहे शैतान का संकट सभी के रूबरू