ख़लील जिब्रान की कविता हिन्दी में
Khalil Gibran Poetry in Hindi
1. बच्चे
1. तुम्हारे बच्चे, तुम्हारे बच्चे नहीं हैं वह तो जीवन की अपनी आकांक्षा के बेटे बेटियां हैं वह तुम्हारे द्वारा आते हैं लेकिन तुमसे नहीं, वह तुम्हारे पास रहते हैं लेकिन तुम्हारे नहीं तुम उनके शरीरों को घर दे सकते हो तुम उन्हें अपना प्यार दे सकते हो लेकिन अपनी सोच नहीं क्योंकि उनकी अपनी सोच होती है तुम उनके शरीरों को घर दे सकते हो, आत्माओं को नहीं क्योंकि उनकी आत्माएं आने वाले कल के घरों में रहती हैं जहां तुम नहीं जा सकते, सपनों में भी नहीं तुम उनके जैसा बनने की कोशिश कर सकते हो, पर उन्हें अपने जैसा नहीं बना सकते, क्योंकि जिन्दगी पीछे नहीं जाती, न ही बीते कल से मिलती है तीर चलाने वाला निशाना साधता है तुम वह कमान हो जिससे तुम्हारे बच्चे जीवित तीरों की तरह छूट कर निकलते हैं तीर चलाने वाला निशाना साधता है एक असीमित राह पर और अपनी शक्ति से तुम्हें जहां चाहे उधर मोड़ देता है ताकि उसका तीर तेज़ी से दूर जाये स्वयं को उस तीरन्दाज़ की मर्ज़ी पर खुशी से मुड़ने दो, क्योंकि वह उड़ने वाले तीर से प्यार करता है और स्थिर कमान को भी चाहता है ('अमर उजाला' से) 2. तुम्हारे बच्चे तुम्हारे नहीं हैं वे जिन्दगी की खुद की चाहत के बच्चे और बच्चियां हैं वे तुम्हारे पास आये हैं पर वे तुमसे नहीं आये हैं और हालांकि वे तुमसे आये हैं पर तुमसे बावस्ता नहीं हैं तुम उन्हें अपना प्यार दे सकते हो पर अपने विचार नहीं. उनके पास अपने विचार हैं. तुम उनके शरीर को घर दे सकते हो पर उनकी आत्मा को नहीं. उनकी आत्मा आने वाले कल के घर में घूमती है जिसे तुम नहीं देख सकते,अपने सपनों में भी नहीं. तुम उनके जैसा होने की कोशिश कर सकते हो, पर उन्हें अप्ने जैसा नहीं बना सकते. जिन्दगी पीछे नहीं जाती और न ही बीते कल में ठहरती है. तुम एक धनुष हो जिससे तुम्हारे बच्चे जिन्दा तीर की तरह आगे जाते हैं . धनुर्धर अनन्त के रास्ते पर लक्ष्य देखता है, और वह तुम्हें अपनी शक्ति के साथ खेंचता है कि तीर सीधा और दूर तलक जाये. अपने भले के लिये अपने को धनुर्धर के हाथों में सौंप दो. वह जिस तरह खिंचते हुए तीर से प्यार करता है, उतना ही प्यार उस धनुष से भी करता है जो स्थिर रहता है. (अनुवाद:विनीता यशस्वी) 3. आपके बच्चे वास्तव में आपके बच्चे नहीं हैं वे स्वतः प्रवाहित जीवन में पुत्र और पुत्रियाँ हैं वे आए हैं मगर आपसे होकर नहीं आप उन पर अपना स्नेह तो थोप सकते हैं मगर विचार नहीं क्योंकि वे स्वयं भी विचारवान हैं, विवेकशील हैं आप उनकी देह को कैद कर सकते हैं, मगर आत्मा को नहीं क्योंकि उनकी आत्मा आने वाले कल में विचरती है जहाँ तक आप नहीं पहुँच सकते, सपने में भी नहीं. आप उन जैसा बन्ने का प्रयास तो कर सकते हैं लेकिन उन्हें अपने जैसा नहीं बना सकते. क्योंकि समय कभी पीछे मुड़कर नहीं देखता न वह अतीत से रूककर दो बातें करता है. आप वह धनुष हैं, जिस पर आपके बच्चे तीर की भांति चढ़कर भविष्य की और जाते हैं धनुर्धारी अनंत के पथ पर निशाना लगता है और वह पूरी कोशिश करता है कि उसका तीर तेज़ी से दूर और दूर और दूर तक जाये. धनुर्धारी के हाथों में कसे हुए अपने धनुष को खुशियों के लिए कसा रहने दो उस समय भी जब वह तीर को उड़ते देख प्रसन्न हो . क्योंकि वह उस धनुष को भी उतना ही प्यार करता है जो हिले डुले बगैर उसके पास रहता है (अनुवाद: डॉ. पुनीत बिसारिया)
2. प्रेम
1. प्रेम किसी पर नियंत्रण नहीं रखता न ही प्रेम पर किसी का नियंत्रण होता है तब अलमित्रा ने कहा, हमें प्रेम के विषय में बताओ तब उसने अपना सिर उठाया और उन लोगों की ओर देखा उन सबों पर शांति बरस पड़ी फिर उसने गंभीर स्वर में कहा प्रेम का संकेत मिलते ही अनुगामी बन जाओ उसका हालाँकि उसके रास्ते कठिन और दुर्गम हैं और जब उसकी बाँहें घेरें तुम्हें समर्पण कर दो हालाँकि उसके पंखों में छिपे तलवार तुम्हें लहूलुहान कर सकते हैं, फिर भी और जब वह शब्दों में प्रकट हो उसमें विश्वास रखो हालाँकि उसके शब्द तुम्हारे सपनों को तार-तार कर सकते हैं जैसे उत्तरी बर्फीली हवा उपवन को बरबाद कर देती है। क्योंकि प्रेम यदि तुम्हें सम्राट बना सकता है तो तुम्हारा बलिदान भी ले सकता है। प्रेम कभी देता है विस्तार तो कभी काट देता है पर। जैसे वह, तुम्हारे शिखर तक उठता है और धूप में काँपती कोमलतम शाखा तक को बचाता है वैसे ही, वह तुम्हारी गहराई तक उतरता है और जमीन से तुम्हारी जड़ों को हिला देता है अनाज के पूला की तरह, वह तुम्हें इकट्ठा करता है अपने लिए वह तुम्हें यंत्र में डालता है ताकि तुम अपने आवरण के बाहर आ जाओ। वह छानता है तुम्हें और तुम्हारे आवरण से मुक्त करता है तुम्हें वह पीसता है तुम्हें, उज्जवल बनाने को। वह गूँधता है तुम्हें, नरम बनाने तक और तब तुम्हें अपनी पवित्र अग्नि को सौंपता है जहाँ से तुम ईश्वर के पावन भोज की पवित्र रोटी बन सकते हो! प्रेम यह सब तुम्हारे साथ करेगा ताकि तुम हृदय के रहस्यों को समझ सको और इस 'ज्ञान' से ही तुम अस्तित्व के हृदय का अंश हो जाओगे। लेकिन यदि तुम भयभीत हो और तुम प्रेम में सिर्फ शांति और आनंद चाहते हो तो तुम्हारे लिए यही अच्छा होगा कि अपनी 'निजता' को ढक लो और प्रेम के उस यातना-स्थल से बाहर चले जाओ चले जाओ ऋतुहीन उस दुनिया में जहाँ तुम्हारी हँसी में तुम्हारी संपूर्ण खुशी प्रकट नहीं होती न ही तुम्हारे रुदन में तुम्हारे संपूर्ण आँसू ही बहते हैं प्रेम न तो स्वयं के अतिरिक्त कुछ देता है न ही प्रेम स्वयं के अलावा कुछ लेता है प्रेम किसी पर नियंत्रण नहीं रखता न ही प्रेम पर किसी का नियंत्रण होता है चूँकि प्रेम के लिए बस प्रेम ही पर्याप्त है। जब तुम प्रेम में हो, यह मत कहो कि ईश्वर मेरे हृदय में हैं बल्कि कहो कि 'मैं ईश्वर के हृदय में हूँ'। यह मत सोचो कि तुम प्रेम को उसकी राह बता सकते हो बल्कि यदि प्रेम तु्म्हें योग्य समझेगा तो वह स्वयं तुम्हें तुम्हारा रास्ता बताएगा 'स्वयं' की परिपूर्णता के अतिरिक्त प्रेम की कोई और अभिलाषा नहीं लेकिन यदि तुम प्रेम करते हो फिर भी इच्छाएँ हों ही तो उनका रूपांतरण ऐसे करो कि ये पिघलकर उस झरने की तरह बहे जो मधुर स्वर में गा रही हो रात्रि के लिए करुणा के अतिरेक की पीड़ा समझने को प्रेम के बोध से स्वयं को घायल होने दो बहने दो अपना रक्त अपनी ही इच्छा से सहर्ष सुबह ऐसे जागो कि हृदय उड़ने में हो समर्थ और अनुगृहीत हो एक और प्यार-भरे दिन के लिए दोपहर विश्राम-भरा और प्रेम के भावातिरेक से समाधिस्थ हो और शाम को कृतज्ञतापूर्वक घर लौट जाओ इसके उपरांत सो जाना है प्रियतम के लिए हृदय में प्रार्थना और ओठों पर प्रशंसा का गीत लिए हुए । (अनुवाद- विजयलक्ष्मी शर्मा) 2. जब प्रेम तुम्हें बुलाये, उसके साथ जाओ, चाहे उसका मार्ग कठोर और बेहद कठिन ही क्यों न हो। और जब उसके पंख तुम्हें अपने में समेट लें ,उनमें समा जाओ. हालांकि उसके पंखों में छिपी तलवार तुम्हें घायल कर सकती है। और जब वो तुमसे मुखातिब हो , उस पर विश्वास करो चाहे उसकी आवाज़ तुम्हारे सपनों को ऐसे बिखेर क्यों न दे जैसे उत्तरी हवा बागीचे को बर्बाद कर देती है। यदि प्रेम तुम्हे ताज पहनाता है तो यह तुम्हें सलीब पर भी लटकायेगा, यदि यह तुम्हें बड़ा करता है तो यह तुम्हारी काट-छांट भी करेगा। जैसे यह तुम्हारी ऊँचाई तक पहुँच कर सूरज में कांप रही नर्म शाखाओं को सहलाता है, वैसे ही यह तुम्हारी जड़ों तक उतर कर उन्हें ज़मीन से हिला भी देता है. यह तुम्हें मक्के की पूलियों की तरह अपने में समेटता है, निरावरण कर देने के लिये तुम्हें कूटता है। यह तुम्हें तुम्हारे छिलकों से आज़ाद करता है। यह तुम्हें पीसता है उजलेपन के लिये यह तुम्हें तब तक गूंथता है जब तक तुम इकतार नहीं हो जाते। और तब यह तुम्हें उसकी पवित्र आग में झोंक देगा, ताकि तुम भगवान की पवित्र दावत में उसकी पवित्र रोटी बनो। यह सभी चीजें तुम्हें प्रेम देंगी ताकि तुम अपने दिल के राज़ जान सको, और यह ज्ञान ज़िन्दगी के दिल का टुकड़ा बनेगा। पर यदि तुम अपने डर में सिर्फ प्रेम की शांति और प्रेम का सुख तलाशोगे, तब फिर तुम्हारे लिये अच्छा होगा कि तुम अपनी नग्नता को ढक लो और प्यार की पिसने वाली ज़मीन से निकल जाओ। मौसम-विहीन संसार में तुम हँसोगे, पर तुम्हारी सम्पूर्ण हंसी नहीं , और रोओगे, पर तुम्हारे सम्पूर्ण आंसू नहीं प्रेम स्वयं के सिवा कुछ नहीं देगा और कुछ नहीं लेगा स्वयं से। प्रेम नियंत्रण नहीं रखता न ही इसे नियंत्रित किया जा सकता है; प्रेम के लिये प्रेम में होना काफी है। जब तुम प्रेम में होगे तब तुम्हें नहीं कहना चाहिये ‘भगवान मेरे दिल में है’ तुम्हें कहना चाहिये ‘मैं भगवान के दिल में हूँ।’ और यह नहीं सोचो की तुम सीधा प्रेम तक जा सकते हो, प्रेम के लिये, यदि वह तुम्हें अमोल पायेगा तो सीधा तुम तक आ जायेगा। प्रेम की स्वयं को सम्पूर्ण करने के सिवा कोई ख्वाहिश नहीं होती। पर यदि तुम प्रेम करते हो और ख़्वाहिश करना जरूरी हो तो, इन्हें अपनी ख़्वाहिश बनाओ: पिघलो और एक छोटी सी नदी की तरह बहो जो रात को अपना संगीत सुनाती है। बहुत अधिक प्रेम का दर्द जानो। स्वयं के प्रेम की समझ से स्वयं को घायल करो ; और खुशी-खुशी अपने को लहूलुहान कर दो। सुबह उठो खुले दिल के साथ और एक और अच्छे दिन के लिये शुक्रिया कहो ; शाम को आराम करते हुए और प्रेम के आनन्द का ध्यान करते हुए ; अहसान के साथ घर वापस लौटो ; और फिर सो जाओ एक प्रार्थना के साथ उन प्रियजनों के लिये जो तुम्हारे दिलों में रहते हैं और अपने होंठों पर प्रेम का गाना गाते हुए। (अनुवाद: विनीता यशस्वी)
3. आंसू और मुस्कान
(A Tear and A Smile) नहीं करूंगा आदान-प्रदान अपने हृदय के दुखों का सामूहिक सुखों से नहीं परिवर्तित होने दूंगा अपने प्रत्यंग से बहती उदासी से उपजे आंसुओं को अट्टाहस में मैं चाहता हूँ मेरे जीवन में शेष रहे बस एक आंसू और एक मुस्कान ! एक आंसू, मेरे हृदय को शुद्ध करने और जीवन की रहस्यमयी गूढ़ बातों को समझने के लिए एक मुस्कान, अपने जैसे पुत्रों के समीप पहुंचने और ईश्वर-स्तुति के प्रतीक रूप में ढल जाने के लिए एक आंसू, टूटे दिलों के विलाप से जोड़ता एक मुस्कान, संकेत मेरे अस्तित्व की प्रसन्नता का मैं चाहूंगा मर जाऊं, उत्कंठा और तृष्णा में पर न जीऊं, थकान और निराशा में बसी रहे सौंदर्य और प्रेम की क्षुधा मेरे अंतर आत्मा की गहराईयों में क्योंकि संतुष्ट व्यक्ति सबसे व्यथित होता है तड़प और लालसा में लिप्त लोगों की आहें सुनी हैं मैंने और उससे ज़्यादा मधुर कोई गीत नहीं है संध्या समय कुसुम अपनी पंखुड़ियां समेट अपनी चाहत को गले लगाए सो जाती है और भोर की पहली आहट पर अपने अधर खोल सूर्य का चुम्बन लेती है पुष्प का जीवन केवल लालसा और पूर्ति एक आंसू और एक मुस्कान सागर का जल वाष्प बनकर उठता है एकत्र हो मेघ बन धरती को घेर लेता है पहाड़ियों और घाटियों में बादल बन मंडराता है बस, जब तक मखमली हवा छू न ले उसे तब रूदन करता धराशायी होता है खेतों में और मिल जाता है नदी-नालों में फिर से सागर में विलीन होने, अपने घर लौटने बादल का जीवन केवल वियोग और मिलन एक आंसू और एक मुस्कान और ऐसी ही है, परम आत्मा से पृथक हो विश्व-तत्वों में भटकती आत्मा बादलों की भांति दुखों के पर्वत पार करती है और खुशियों के मैदानों में वायुरूपी मृत्यु का आलिंगन कर लौट जाती है वहीं, जहां से उद्गम हुआ था इसका प्रेम और सौंदर्य के सागर – परमात्मा में ! (अनुवाद- अनुपमा सरकार)
4. पराजय
(Defeat) पराजय, ओ मेरे पराजय मेरे एकांत, मेरे अलगाव तुम मुझे प्रिय हो, हज़ारों जीत की खुशियों से पराजय, ओ मेरे पराजय मेरे आत्म ज्ञान, मेरे विद्रोह तुम मुझे अहसास दिलाते हो कि मैं अब भी ज़िंदा हूँ कि मेरे पैर अब भी चपल हैं और हम बंदी नहीं है कुम्हलाते जीत की तुमुल ध्वनियों के तुममें पाया है मैने एकांत नकारे जाने का उल्लास और तिरस्कृत किए जाने का आह्लाद पराजय, ओ मेरे पराजय मेरी चमकती तलवार और मेरे कवच तुम्हारी आँखों में मैने पढ़ा है विजयी होना गुलाम होना है और समझे जाना सीमाओं में बंधना एक पके फल की तरह डाली से टूट संभावनाओ से विलग हो जाना है पराजय, ओ मेरे निडर पराजय तुमने मेरा गीत सुना है मेरे आँसू और मेरी चुप्पी देखी है तुम, सिर्फ़ तुम मुझे पंखों पे लगी चोट की कहानी कहते हो हहराते समुद्र की, काली रात और जलते हुए पहाड़ों की और सिर्फ़ तुम्हारी वजह से मैं अपनी आत्मा की ऊँची और पथरीली सीढ़ियाँ चढ़ता हूँ पराजय, ओ मेरे पराजय मेरे शाश्वत साहस मैं और तुम अट्टहास करेंगे झंझावतों के साथ और साथ साथ ही हम कब्र खोदेंगे उनकी जो हमारे साथ और हमारे भीतर ही मृत्यु को प्राप्त होगा और सूरज के साथ खड़े होकर अपराजेय हो जाएँगे. (अनुवाद: रंजना मिश्र)
5. कविता
कविता एक कवि से मैंने एक बार कहा, "तुम्हारी मौत से पहले हम तुम्हारे शब्दों का मूल्य नहीं जान पाएंगे" उसने कहा, "ठीक कहते हो। रहस्यों पर से परदा मौत ही उठा पाती है। और अगर वास्तव में तुम मेरे बारे में जानना चाहते हो तो सुनो, जितना बोल चुका हूं उससे ज्यादा कविता मेरे हृदय में हैं और जितना लिख चुका हूं उससे कहीं ज्यादा मेरे खयालों में है।"
6. आनंद क्या है?
तब एक अरण्यवासी साधु ने, जो वर्ष में एक बार नगर में जाता था, जिज्ञासा प्रकट की : आनंद क्या है? उत्तर मिला : आनंद एक स्वतंत्र गीत है, किंतु आनंद ही स्वतंत्रता नहीं है। वह तुम्हारी कामनाओं का पृष्ठ है, तथापि वह कामनाओं से भिन्न नहीं। वह है एक गहराई जो शिखर छूने को आतुर है, तथापि वह न गहराई है न उँचाई। वह एक पंजरबद्ध पक्षी के पंखों की फड़फड़ाहट है, तथापि वह सोमा में बंधा आकाश नहीं। सचमुच आनंद एक स्वातंत्र्य-गीत है। उचित है कि तुम भी इसे पूर्ण तन्मय होकर गाओ, किंतु इस गायन-व्यापार में अपने-आपको खो देने का मैं निर्देश नहीं दूँगा। तुममें से से कुछ नवयुवक आनंद की शोध में सब कुछ भूल जाते हैं, तब उनकी आलोचना और निंदा होती है। परंतु मैं उनकी आलोचना अथवा निंदा नहीं करूँगा, बल्कि उनके सफल मनोरथ होने की प्रार्थना करूँगा। ऐसे शोधकों को सुख की प्राप्ति तो होगी, किंतु आनंद की ही नहीं। आनंद की सात बहिनें हैं, किंतु जो सबसे कम सुंदर है वह भी आनंद से अधिक रमणीय है। वे सब उसे प्राप्त हो जाती हैं, जैसे कंद-मूल के लिए ज़मीन खोदने वाले को कदाचित् धनकोष मिल जाए। तुममें से कुछ पुराण पुरुष अतीत के आनंदमय उपभोगों को यौवन में किए गए पाप समझकर खेद मानते हैं। यह खेद मनरूपी आकाश पर मेघ बनकर छा जाता है, प्रायश्चित नहीं बनता। उन्हें अपने आनंदमय उपभोगों का स्मरण कृतज्ञता भरे दिल से करना चाहिए, जैसे ग्रीष्म की फ़सल का किया जाता है। यदि किसी को इस खेद-प्रकाश में ही समाधान मिलता है तो वे खेद करने में स्वतंत्र हैं। तुममें से कुछ ऐसे हैं, जो इतने युवक नहीं कि आनंद की खोज कर सकें, और इतने वृद्ध भी नहीं कि अतीत के आनंद का स्मरण करें। वे इस शोध और स्मृति के भय से बचने के लिए ही आनंद का त्याग कर देते हैं, ताकि कहीं उनसे आत्मा की उपेक्षा का अपराध न हो जाए। परंतु उनके इस त्याग में भी आनंद की एक झलक है। वे निरंतर काँपते हाथों से कंद-मूल खोदते हुए भी आनंदकोष प्राप्त कर लेते हैं। भला, आत्मा के प्रति अपराध कौन कर सकता है? क्या रात्रि की नीरवता को भंग करके कोयल अपराध करती है? और क्या जुगनू रात्रि के अंधकार में चमक कर नक्षत्रों की अवहेलना करते हैं? और क्या तुम्हारे ईंधन का धुआँ पवन के परिवहन के लिए बोझिल हो जाता है? क्या तुम यह समझते हो कि आत्मा एक शांत सरोवर के समान प्रशांत है जो हाथ की छड़ी से अशांत हो सकती है? प्रायः आनंद का विर्सजन करते हुए तुम अपनी इच्छाओं को हृदय की गहराई में भर लेते हो। कौन जाने, आज तुमने जिसका त्याग किया है, वह कल उठने की प्रतीक्षा कर रहा हो? इस शरीर को अपनी उत्तराधिकार में प्राप्त भूमि और प्रकृतिगत आवश्यकताओं का ज्ञान है, उसे ठगा नहीं जा सकता। तुम्हारा शरीर तुम्हारी आत्मा की वीणा है। उसके तारों में मधुर संगीत या अस्वरहीन कोलाहल भरना तुम्हारे हाथ है। तुम मन-ही-मन सोचते होंगे, हम सुख की शोध में श्रेय का अश्रेय से भेद स्थापित कैसे करेंगे? मैं उसका उपाय बतलाता हूँ। अपने खेतों और उपवनों में जाओ, तब तुम्हें पता लगेगा कि फूलों से मधु एकत्र करने में ही मधुमक्खी को आनंद मिलता है। परंतु फूलों को भी इसी बात से आनंद मिलता है कि वे अपना मधुकोष मधुमक्षिका को अर्पण कर दें। क्योंकि मधुमक्षिका के लिए फूल ही जीवन-स्रोत है, मधुमक्षिका प्रणय-दूत भी है। और दोनों के लिए आनंद को ग्रहण करना और आनंद का प्रदान करना आवश्यक जीवन-धर्म भी है और आनंद का स्रोत भी। ऐ आर्फ़लीज-निवासियो! तुम भी आनंद के शोध में पुष्प और मधुमक्षिका का अनुकरण करो। अनुवाद : सत्यकाम विद्यालंकार
7. आत्मज्ञान
एक अन्य मनुष्य ने प्रश्न किया: आत्मज्ञान क्या है? अलमुस्तफ़ा ने उत्तर दिया: तुम्हारा मौन हृदय दिन और रात के सब रहस्य जानता है। लेकिन तुम्हारे कान उस ज्ञान की अभिश्रुति को व्याकुल ही रहते हैं। तुम उसी ज्ञान को, जो विचारों के रूप में तुम्हारा हृदय जानता है, शब्दों में सुनना चाहते हो। तुम अपने स्वप्नों की मूर्त काया का स्पर्श करना चाहते हो, अपनी अँगुलियों से। यही अभीष्ट भी है। तुम्हारे आत्मानिहित निर्भर कूप के लिए अनिवार्य है कि वह बाहर फूटकर समुद्रगामी बने। तभी तुम्हारी अथाह गहराई का ज्ञान-कोष चक्षुगत होगा। परंतु इस ज्ञानकोष को कभी तराज़ू पर न तोलना। और न कभी इस अतल आत्मज्ञान की गहनता को मापदंड से मापने का यत्न करना। क्योंकि आत्मा अथाह और अनंत सागर के समान है। कभी यह न कहना कि 'मैंने समस्त सत्य पा लिया है' बल्कि कहना 'मैंने एक सत्य' पाया है।' यह न कहना कि 'मैंने आत्मा का मार्ग जान लिया है। बल्कि यह कि 'अपने मार्ग पर चलते हुए आत्मा से भेंट की है।' क्योंकि आत्मा प्रत्येक मार्ग पर अभियान करती है। वह किन्हीं बंधी रेखाओं पर नहीं चलती, न ही वह सरू वृक्ष की तरह आसमान को भेदती हुई ऊँचा उठती है। आत्मा अपने को स्वयं अनावृत करती है—जैसे अंसख्य पंखों वाला कमल। अनुवाद : सत्यकाम विद्यालंकार
8. अपराध और दंड
तब शहर के न्यायाधीशों में से एक सामने आकर बोला 'अपराध और दंड' के विषय में कुछ कहिए! उत्तर मिला : जब तुम्हारा मन हवा के पंखों पर निर्बाध उड़ता है, तभी तुम अकेले और अनियंत्रित होकर दूसरों का अहित करते हो, अपना भी। उसी अतिक्रमण का यह दंड है कि तुम देवता के द्वार पर कुछ देर तक उपेक्षित खड़े रहकर द्वार खटखटाओ। तुम्हारा अंतर्वासी प्रभु सागर के समान है। वह सदा शुद्ध-निर्मल रहता है। वह पवन की तरह है जो पक्षहीनों को ऊपर उठाता है। तुम्हारा अंतर्वासी प्रभु सूर्य के समान भी है। न उसे साँपों के बिलों का अभिज्ञान है और न चीटियों के क्षुद्र छिद्रों की ही वह तलाश करता है। किंतु वह अंतर्वासी अकेला तुम्हारे भीतर ही नहीं रहता। अब भी तुममें अधिकांश मानव ही हैं और साथ ही अमानव भी। अंतर्वासी अपनी निद्रा में ही पर्यटन करता है—अपने जागृत रूप को खोजने के लिए। मैं उसके नहीं, बल्कि तुम्हारे अंतर के मानव के संबंध में ही कहूँगा। क्योंकि वह मानव है, जो अपराध और दंड का विवेक रखता है; न कि तुम्हारे भीतर का सूक्ष्म और अस्पष्ट रूप से विद्यमान अतिमानव। अपराधी के विषय में मैंने तुम्हें प्रायः यह कहते सुना है कि वह तुम्हारे मध्य का नहीं, बल्कि कोई अजनबी और तुम्हारी दुनिया में अनधिकार प्रवेश करने वाला है। किंतु, मैं कहता हूँ, जैसे तुम्हारे मध्य परमपवित्र मानव अपनी शक्ति भर ऊँचा उठकर भी उस शिखर पर नहीं पहुँचता जो मानव मात्र के अंतर में विद्यमान है; वैसे ही अधम से अधम मानव भी गहरी से गहरी खाई में गिरकर भी उस गहराई तक नहीं गिरता, जो मानवमात्र के अंतर में विद्यमान है। और जैसे वृक्ष के एक पत्ते का पीला पड़ना पूरे वृक्ष के मौन समर्थन के साथ होता है, वैसे ही समाज के किसी व्यक्ति का अपराधी होना समाज के मौन समर्थन के बिना संभव नहीं। उत्सव की महायात्रा के समान यह संपूर्ण मानव-समाज एक ही मार्ग का सहयात्री है। तुम्हीं पथ हो और तुम ही पथिक। जब तुम्हारे साथ का कोई पथिक राह में ठोकर खाकर गिरता है, तो गिरकर भी वह अपने पीछे आने वालों को ठोकर खाने से सावधान करके अपना कर्त्तव्य पूरा करता है। गिरने वाला पथिक उन द्रुतगामी साथियों के प्रमाद के कारण ही गिरता है जो ठोकर खाकर भी मार्ग के पत्थर नहीं चुनते। और यह भी एक कटु सत्य है कि, —हत्या के लिए वह भी उत्तरदायी है, जिसकी हत्या हुई है। —ठगा हुआ आदमी भी ठगी के अपराध से सर्वथा निर्दोष नहीं होता। —अधम कार्यों के दायित्व से सज्जन भी सर्वथा मुक्त नहीं रह सकते। —पापियों के कलुष काम निष्पाप व्यक्तियों के भी हाथ रंग देते हैं। अधिक क्या, अपराधी प्रायः समाज-पीड़ित व्यक्ति का ही सताया होता है। और यह देखा गया है कि दंडित अपराधी प्रायः निर्दोष होता है और उन व्यक्तियों का पाप-भार वहन करता है जो स्वयं को निष्पाप-निष्कलंक कहते हैं। श्वेत-अश्वेत, भले-बुरे और साधु-असाधु को पृथक् कक्षाओं में विभक्त नहीं किया जा सकता। क्योंकि वे दोनों श्वेताश्वेत सूर्य के समक्ष एक ही पंक्ति में खड़े हैं, ठीक उसी प्रकार जिस प्रकार सफ़ेद और काले सूत से बुना हुआ वस्त्र। जब वस्त्र का काला सूत टूटता है, तो जुलाहे को केवल काले सूत की ही नहीं बल्कि समस्त तंतुवाय की छान-बीन करनी पड़ती है। तंतुवाय की ही नहीं कपड़ा बुनने वाले करघे की भी परीक्षा करनी होती है। यदि तुममें से कोई असाध्वी पत्नी के पाप को न्याय की तुला पर तोले तो उसे चाहिए कि वह उसके पति के हृदय को भी उसी तराज़ू से तोले और उसकी आत्मा को भी पलड़ों में रखकर उसकी परीक्षा करे। अपराधी को दंडित करने वाले व्यक्ति को चाहिए कि वह दंड देने से पहले अपराधी की आत्मा पर भी दृष्टि डाले। यदि तुममें से कोई धर्म के नाम पर दंड देता है और अधर्म के वृक्ष पर कुल्हाड़ी चलाता है, तो उसे चाहिए कि वह वृक्ष की जड़ पर प्रहार करे। तब निश्चय ही वह यही जानेगा कि वृक्ष की साधु-असाधु, उपयोगी-अनुपयोगी वस्तुएँ पृथ्वी के मौन अंतःकरण में एक-दूसरे की भुजाओं में गुँथी हुई हैं। तुममें से कौन है जो निर्दोष न्याय कर सकता है। तुम उस व्यक्ति को क्या दंड दोगे जो बाह्याचरणों से पापरहित प्रतीत होता है किंतु अंतर्मन से पापी है? और उसे कौन सा दंड दोगे, जो दूसरों का वध करने के साथ स्वयं अपनी आत्मा का भी हनन कर लेता है? और उस पर कौन-सा दंड-विधान लागू करोगे, जो प्रत्यक्ष में ठग और लुटेरा है; किंतु परोक्ष में स्वयं भी, दूसरों से सताया और ठगा गया है? और जिनकी अंतर्वेदना उनके दुष्कृत्यों से कहीं अधिक बढ़ चुकी है, उन्हें कौन-सा दंड दोगे? क्या वह अनुसंताप ही न्याय नहीं, जो उसी विधान की परिणति है, जिससे तुम सदा अनुशासित हो? न तुम निरपराध व्यक्ति के मन में अनुसंताप भर सकते हो और न ही अपराधी की आत्मा को संताप-मुक्त कर सकते हो। वह मनस्ताप स्वयं अनाहूत मन में प्रवेश करता है, ताकि अपराधी मनुष्य अपनी अंतरात्मा को पैनी नज़र से देख सके और आत्मनिरीक्षण कर सके। तुम, जो न्याय का दावा भरते हो, तब तक किस प्रकार न्याय को समझ सकोगे—जब तक कि तुम समग्र प्रकाश में सत्य को न देख सको? तभी तुम बहू समदृष्टि पाओगे जिसके लिए उन्नत और पतित, अहंभाव पूर्ण अंधकार और दिव्यभाव पूर्ण प्रकाश, दोनों ही, गोधूलि बेला में खड़ी एक ही छायामूर्ति के दो पहलू हैं। उस समय तुम्हारे समक्ष यह प्रकट हो जाएगा कि देवस्थान के शिखर का पत्थर उसकी नींव की सबसे नीची सतह में गड़े पत्थर से किसी प्रकार भी अधिक ऊँचा नहीं होता। अनुवाद : सत्यकाम विद्यालंकार
9. अच्छाई और बुराई
नगर के एक वरिष्ठ नागरिक ने अच्छाई और बुराई के संबंध में जिज्ञासा प्रकट की। उत्तर मिला : मैं केवल तुम्हारे अंतःस्थित अच्छाई के संबंध में कह सकता हूँ—बुराई के संबंध में नहीं। कारण, बुराई क्या है? अच्छाई अपनी ही भूख-प्यास से संतप्त होती है तो बुराई का रूप ले लेती है। जब अच्छाई की क्षुधा जाग उठती है तो वह अंधकारपूर्ण कंदराओं में भी तृप्ति के अर्थ जाता है, और जब वह प्यासा होता है तो वह गंदला जल पीने को भी आतुर हो जाता है। तुम तभी तक अच्छे रह सकते हो, जब तक तुम अपने में स्थित रहते हो। किंतु जब तुम अपने में स्थित नहीं रहते, तब भी तुम निकृष्ट नहीं हो जाते, विभक्त ही होते हो। और, केवल विभक्त होने में ही कोई घर चोरों का अड्डा नहीं बन जाता। पतवार रहित नौका द्वीपों में निरुद्देश्य घूमती अवश्य है, डूबती नहीं। तुम तभी अच्छे होते हो, जब अपने अंतर से दूसरे की झोली भरते हो। किंतु अपने लाभ का लोभ भी तुम्हें बुरा नहीं बना देता। जब तुम स्वहित-संपादन करते हो, तो तुम उस वृक्ष की जड़ के समान हो जो स्वार्थवश पृथ्वी के वक्ष पर अपना पूर्ण स्वत्व समझ लेता है। सच तो यह है कि फल कभी जड़ों से नहीं कह सकता कि तुम भी मेरे ही समान बनकर पको और भरपूर होकर प्रदान करो। क्योंकि फल का हित इसी में है कि वह दान करे और जड़ का हित इसी में है कि वह ग्रहण करे। तुम तब अच्छे होते हो, जब तुम पूर्ण जागरण में बोलते हो। लेकिन जब सोते हुए तुम्हारी जिह्वा लड़खड़ाती है तब भी तुम अधम नहीं बन जाते। कई बार वह हकलाती जिह्वा का भाषण भी निर्बल वाणी का पोषक बन जाता है। तुम अच्छे होते हो, जब तुम अपने ध्येय की ओर दृढ़ता और साहस के साथ बढ़ते हो। लेकिन यदि लंगड़ाते हुए बढ़ते हो, तो भी तुम नीच नहीं बन जाते। लंगड़ा कर चलने वाले भी आगे ही बढ़ते हैं, पीछे तो नहीं मुड़ते। परंतु, तुम जो अच्छे और शीघ्रगामी हो, इस बात का ध्यान रखो कि तुम लंगड़ों के साथ दयापूर्ण सहानुभूति दिखलाने को ही लंगड़ाने न लग जाओ। तुम अंसख्य रीतियों से श्रेष्ठ हो—और जब तुम श्रेष्ठ नहीं होते तो भी अधम नहीं हो जाते। तब तुम केवल प्रमाद और पलायन के शिकार मात्र होते हो। दुःख यही है कि मृग कछुए को द्रुतगामी बनने की शिक्षा नहीं दे सकता। अपने महान 'स्व' को पाने की तुम्हारी अनवरत अभिलाषा में ही तुम्हारी श्रेष्ठता निहित है। और वह अभिलाषा तुम सबमें एक समान है। किंतु तुममें कुछ ऐसे हैं, जिनमें इस आत्मशोध की कामना उस जलधारा के समान है, जो हिमावृत्त गिरिशिखरों के रहस्य और विस्तृत अरण्यों के संगीतों को झोली में छिपाए सदा समुद्र की ओर दौड़ा करती है। और कुछ ऐसे हैं, जिनमें यह कामना उस मैदानी नदी का रूप ले लेती है, जो समुद्र तक पहुँचने से पूर्व ही अनेक धाराओं में बंटकर मंद होते-होते धरती में हो खो जाती है। लेकिन ऐ पहुँचे हुए साधको! तुम अपने इन मंदगामी आत्मशोधकों से यह न कहना कि तुम इतने मंद और श्लथ किसलिए हो? क्योंकि जो सचमुच श्रेष्ठ होते हैं वे कभी नग्न व्यक्ति से यह नहीं पूछते कि तुम्हारे वस्त्र कहाँ हैं? न ही वे किसी अभागे निराश्रित से पूछते हैं कि तुम्हारे घर का क्या हुआ? अनुवाद : सत्यकाम विद्यालंकार
10. क्रय-विक्रय
एक व्यापारी ने क्रय-विक्रय के स्वरूप के संबंध में जिज्ञासा प्रकट की। अलमुस्तफ़ा ने उत्तर दिया : पृथ्वी तुम्हें स्वयं अपना कोष प्रदान करती है, उस अमित कोष को अंजलियों में कैसे भरा जाता है, यह जान लो तो तुम्हें कभी कोई कमी न रहे। पृथ्वी के इस दान-प्रतिदान से ही तुम अक्षय धन के स्वामी और सदा संतुष्ट रह सकते हो। किंतु यदि यह दान-प्रतिदान प्रेम और न्याय के आधार पर न हो, तो यह विनिमय कुछ को लोभी और कुछ को भिखारी बना देगा। समुद्रों, खेतों और द्राक्षोद्यानों में परिश्रम करने वालो! तुम जब कपड़ा बुनने और मिट्टी घढ़ने वाले शिल्पियों से बाज़ार में मिलो तब, —धरती माता की आत्मा का स्मरण करके अपनी तराज़ू के उन पलड़ों को शुद्ध कर लेना—जिनसे तुम्हें माल तोलना है। —और, अपने व्यापार में उन रिक्तहस्त व्यापारियों को हस्तक्षेप न करने देना, जो केवल मीठे शब्द बोलकर तुम्हारे श्रम का फल लूटना चाहते हैं। उन्हें कहना : हमारे साथ खेतों में आओ या हमारे साथी श्रमिकों के साथ समुद्र-तट पर जाकर संचय के साझीदार बनो। क्योंकि धरती और समुद्र का अक्षय कोष हमारे ही लिए नहीं, तुम्हारे लिए भी विपुल उदार है। यदि तुम्हारे व्यवहार-व्यापार के अंतराय में नाचने-गाने या बंसी बजाने वाले आएँ, तो उनके गुणों का भी मूल्य लगाना। क्योंकि उन्होंने भी इसी पृथ्वी के गर्भ-कोष से अपनी झोली भरी है। उनकी झोली में जो द्रव्य हैं, वे कोमल सपनों से बने हैं। वे रत्न तुम्हारी अंतरात्मा के वरदान हैं! और उस हाट को छोड़ने से पहले यह देख लेना कि उस बाज़ार से कोई अपनी राह ख़ाली हाथ तो नहीं गया। क्योंकि ब्रह्माण्ड का पोषक भगवान् तब तक पवन के झोंकों पर चैन से नहीं सोएगा, जब तक तुम्हारे मध्य क्षुद्र से क्षुद्र जीव की भी कामना पूर्ण नहीं हो जाएगी। अनुवाद : सत्यकाम विद्यालंकार
11. कष्ट और आनंद
एक महिला ने प्रश्न किया : कष्ट क्या है? अलमुस्तफ़ा ने कहा : तुम्हारे कष्ट सीपी के उन परदों के खुल जाने की प्रक्रिया हैं जो परदे तुम्हारे ज्ञान रूपी मोती को बंद किए रखते हैं। जैसे किसी फल को सूर्य के प्रकाश में आने के लिए बीज के प्रस्फुटन-कष्ट को सहन करना पड़ता है वैसे ही तुम्हें विकास के पूर्व कष्ट सहन करना पड़ेगा। और यदि तुम जीवन के अन्य अनुदिन घटने वाले आश्वयों को सहर्ष देखते हो तो तुम्हें यह कष्ट भी किसी आनंद से कम आश्चर्यप्रद प्रतीत न होंगे। और तब तुम अपने हृदय की विविध ऋतुओं को उसी प्रकार प्रसन्नतापूर्वक स्वीकार करोगे, जिस प्रकार तुम अपने खेतों के ऋतु-परिवर्तनों को करते हो। तभी तुम शोकग्रस्त हृदय के शिशिर शीत को भी प्रशांत मन से कह सकोगे। कष्ट का अधिकांशत्व तुम्हारा स्वयं शापित ही होता है। कष्ट एक कड़वी औषधि है। तुम्हारा अंतर्वासी वैद्य तुम्हारी रोगार्त आत्मा को कष्ट की कड़वी औषधि से ही नीरोग करता है। उस वैद्य पर श्रद्धा रखो और मौन-प्रशांत मन से उसकी औषधि का सेवन करो। उसका हाथ प्रत्यक्ष रूप से कितना ही कठोर क्यों न हो, उसका संचालन अत्यंत कोमल हृदय द्वारा ही होता है। उसका औषधि-पात्र यद्यपि तुम्हारे होंठों को गरम लगती है; किंतु स्मरण रहे, वह मृत्पात्र विधाता के अश्रुजल से सिक्त मिट्टी से बना है। अनुवाद : सत्यकाम विद्यालंकार
