Insha Allah Khan Insha : Ghazals in Hindi

ग़ज़लें : इंशा अल्ला खाँ 'इंशा'



कमर बाँधे हुए चलने को

कमर बाँधे हुए चलने को याँ सब यार बैठे हैं बहुत आगे गए बाक़ी जो हैं तय्यार बैठे हैं न छेड़ ऐ निकहत-ए-बाद-ए-बहारी राह लग अपनी तुझे अटखेलियाँ सूझी हैं हम बे-ज़ार बैठे हैं ख़याल उन का परे है अर्श-ए-आज़म से कहीं साक़ी ग़रज़ कुछ और धुन में इस घड़ी मय-ख़्वार बैठे हैं बसान-ए-नक़्श-ए-पा-ए-रह-रवाँ कू-ए-तमन्ना में नहीं उठने की ताक़त क्या करें लाचार बैठे हैं ये अपनी चाल है उफ़्तादगी से इन दिनों पहरों नज़र आया जहाँ पर साया-ए-दीवार बैठे हैं कहें हैं सब्र किस को आह नंग ओ नाम है क्या शय ग़रज़ रो पीट कर उन सब को हम यक बार बैठे हैं कहीं बोसे की मत जुरअत दिला कर बैठियो उन से अभी इस हद को वो कैफ़ी नहीं हुश्यार बैठे हैं नजीबों का अजब कुछ हाल है इस दौर में यारो जिसे पूछो यही कहते हैं हम बेकार बैठे हैं नई ये वज़्अ शरमाने की सीखी आज है तुम ने हमारे पास साहब वर्ना यूँ सौ बार बैठे हैं कहाँ गर्दिश फ़लक की चैन देती है सुना 'इंशा' ग़नीमत है कि हम सूरत यहाँ दो-चार बैठे हैं

है तिरा गाल माल बोसे का

है तिरा गाल माल बोसे का क्यूँ न कीजे सवाल बोसे का मुँह लगाते ही होंठ पर तेरे पड़ गया नक़्श लाल बोसे का ज़ुल्फ़ कहती है उस के मुखड़े पर हम ने मारा है जाल बोसे का सुब्ह रुख़्सार उस के नीले थे शब जो गुज़रा ख़याल बोसे का अँखड़ियाँ सुर्ख़ हो गईं चट से देख लीजे कमाल बोसे का जान निकले है और मियाँ दे डाल आज वा'दा न टाल बोसे का गालियाँ आप शौक़ से दीजे रफ़अ' कीजे मलाल बोसे का है ये ताज़ा शगूफ़ा और सुनो फूल लाया निहाल बोसे का अक्स से आइने में कहता है खींच कर इंफ़िआल बोसे का बर्ग-ए-गुल से जो चीज़ नाज़ुक है वाँ कहाँ एहतिमाल बोसे का देख 'इंशा' ने क्या किया है क़हर मुतहम्मिल ये गाल बोसे का

अच्छा जो ख़फ़ा हम से हो तुम

अच्छा जो ख़फ़ा हम से हो तुम ऐ सनम अच्छा लो हम भी न बोलेंगे ख़ुदा की क़सम अच्छा मशग़ूल किया चाहिए इस दिल को किसी तौर ले लेवेंगे ढूँड और कोई यार हम अच्छा गर्मी ने कुछ आग और भी सीने में लगाई हर तौर ग़रज़ आप से मिलना ही कम अच्छा अग़्यार से करते हो मिरे सामने बातें मुझ पर ये लगे करने नया तुम सितम अच्छा हम मोतकिफ़-ए-ख़ल्वत-ए-बुत-ख़ाना हैं ऐ शैख़ जाता है तो जा तू पए-तौफ़-ए-हरम अच्छा जो शख़्स मुक़ीम-ए-रह-ए-दिलदार हैं ज़ाहिद फ़िरदौस लगे उन को न बाग़-ए-इरम अच्छा कह कर गए आता हूँ कोई दम को अभी मैं फिर दे चले कल की सी तरह मुझ को दम अच्छा इस हस्ती-ए-मौहूम से मैं तंग हूँ 'इंशा' वल्लाह कि इस से ब-मरातब अदम अच्छा

मिल मुझ से ऐ परी तुझे

मिल मुझ से ऐ परी तुझे क़ुरआन की क़सम देता हूँ तुझ को तख़्त-ए-सुलैमान की क़सम कर्र-ओ-बयों की तुझ को क़सम और अर्श की जिबरील की क़सम तुझे रिज़वान की क़सम तूबा की सलसबील की कौसर के जाम की हूर-ओ-क़ुसूर-ओ-जन्नत-ओ-ग़िलमान की क़सम रूहुल-क़ुदुस की तुझ को क़सम और मसीह की मरियम के तुझ को इफ़्फ़त-ए-दामान की क़सम तौरेत की क़सम क़सम इंजील की तुझे तुझ को क़सम ज़बूर की फुर्क़ान की क़सम तुझ को मोहम्मद-ए-अरबी की क़सम है और मौला-अली की शाह-ए-ख़ुरासान की क़सम मिल्लत में जिस की तू हुई उस की क़सम तुझे और अपने दीन मज़हब-ओ-ईमान की क़सम दामाँ को मेरी हाथ से उस रात मत झटक तुझ को सहर के चाक-ए-गरेबाँ की क़सम मुद्दत से तेरी चाह-ए-ज़क़न में ग़रीक़ हूँ बिल्लाह मुझ को यूसुफ़-ए-कनआ'न की क़सम क़ैदी हूँ मैं तिरा ब-ख़ुदा-वंदी-ए-ख़ुदा और उस अज़ीज़-ए-मिस्र के ज़िंदान की क़सम मूसा की है क़सम तुझे और कोह-ए-तूर की नूर-ओ-फ़रोग़-ए-जल्वा-ए-लमआ'न की क़सम नर्गिस की आँख की क़सम और गुल के कान की तुझ को सर-ए-अज़ीज़-ए-गुलिस्तान की क़सम तुझ को क़सम है ग़ुंचा-ए-ज़म्बक़ के नाक की और शोर-ए-अंदलीब-ए-ग़ज़ल-ख़्वान की क़सम सोने की गाए की क़सम और रूद-ए-नील की फ़िरऔन की क़सम तुझे हामान की क़सम बिस्तर मिरा है ख़ार-ए-मुग़ीलाँ बसान-ए-क़ैस लैला की है तुझे सफ़-ए-मिज़्गान की क़सम ऐसी बड़ी क़सम भी न माने तो है तुझे तुझ को उसी के शौकत-ए-ज़ीशान की क़सम देव-ए-सफ़ेद की क़सम और कोह-ए-क़ाफ़ की बाग़-ए-इरम की और परिस्तान की क़सम लोना-चमारी की क़सम और कल्लू-अबीर की काली-बला की ग़ूल-ए-बयाबान की क़सम क़स्में तो सारी हो चुकीं बाक़ी रही है अब पीपल तले के भुतने की शैतान की क़सम हाँ फिर तू कहियो हाए वो किस तरह होए ग़ज़ब 'इंशा' न छेड़ मुझ को मिरी जान की क़सम

नींद मस्तों को कहाँ

नींद मस्तों को कहाँ और किधर का तकिया ख़िश्त-ए-ख़ुम-ख़ाना है याँ अपने तो सर का तकिया लख़्त-ए-दिल आ के मुसाफ़िर से ठहरते हैं यहाँ चश्म है हम से गदाओं की गुज़र का तकिया जिस तरफ़ आँख उठा देखिए हो जाए असर हम तो रखते हैं फ़क़त अपनी नज़र का तकिया चैन हरगिज़ नहीं मख़मल के उसे तकिए पर उस परी के लिए हो हूर के पर का तकिया हाथ अपने के सिवा और तो क्या हो हैहात वालिह ओ दर-ब-दर ओ ख़ाक-बसर का तकिया सर तो चाहे है मिरा होवे मयस्सर तेरे हाथ का बाज़ू का ज़ानू का कमर का तकिया ये तो हासिल है कहाँ भेज दे लेकिन मुझ को जिस में बालों की हो बू तेरे हो सर का तकिया तीखे-पन के तिरे क़ुर्बान अकड़ के सदक़े क्या ही बैठा है लगा कर के सिपर का तकिया गरचे हम सख़्त गुनहगार हैं लेकिन वल्लाह दिल में जो डर है हमें है उसी डर का तकिया गिर्या ओ आह-ओ-फ़ुग़ाँ नाला ओ या रब फ़रियाद सब को है हर शब-ओ-रोज़ अपने असर का तकिया रिंद ओ आज़ाद हुए छोड़ इलाक़ा सब का ढूँढते कब हैं पिदर और पिसर का तकिया गर भरोसा है हमें अब तो भरोसा तेरा और तकिया है अगर तेरे ही दर का तकिया शौक़ से सोइए सर रख के मिरे ज़ानू पर उस को मत समझिए कुछ ख़ौफ़-ओ-ख़तर का तकिया जब तलक आप न जागेंगे रहेगा यूँ ही सरकेगा तब ही कि जब कहियेगा सरका तकिया लुत्फ़-ए-इज़दी ही से उम्मीद है इंशा-अल्लाह कुछ नहीं रखते हैं हम फ़ज़्ल ओ हुनर का तकिया

गाली सही अदा सही

गाली सही अदा सही चीन-ए-जबीं सही ये सब सही पर एक नहीं की नहीं सही मरना मिरा जो चाहे तो लग जा गले से टुक अटका है दम मिरा ये दम-ए-वापसीं सही गर नाज़नीं के कहने से माना बुरा हो कुछ मेरी तरफ़ को देखिए मैं नाज़नीं सही कुछ पड़ गया है आँख में रोना कहे है तू क्यूँ मैं अबस को बहसूँ यही दिल-नशीं सही आगे बढ़े जो जाते हो क्यूँ कौन है यहाँ जो बात हम को कहनी है तुम से यहीं सही मंज़ूर दोस्ती जो तुम्हें है हर एक से अच्छा तो क्या मुज़ाएक़ा 'इंशा' से कीं सही

तब से आशिक़ हैं हम

तब से आशिक़ हैं हम ऐ तिफ़्ल-ए-परी-वश तेरे जब से मकतब में तू कहता था अलिफ़ बे ते से याद आता है वो हर्फ़ों का उठाना अब तक जीम के पेट में एक नुक्ता है और ख़ाली हे हे की पर शक्ल हवासिल की सी आती है नज़र नुक़्ता इस पर जो लगा ख़े हुआ ये वाह बे ख़े दाल भी छोटी बहन उस की है जूँ आतूजे एक परकाला सा बेटा भी है घर में उन के रे भी ख़ाली है और ज़े पे है वो नुक्ता एक कि मुशाबह है जो तिल से मिरी रुख़्सारे के सीन ख़ाली है बड़ी शीन पे हैं नुक़्ता तीन साद और ज़ाद में बस फ़र्क़ है इक नुक़्ते से तोय बिन तुर्रा है और ज़ोय पर इक नुक़्ता फिर ऐन बे-ऐब है और काने मियाँ ग़ेन हुए फ़े पे इक नुक़्ता है और क़ाफ़ पे हैं नुक़्ता दो काफ़ भी ख़ाली है और लाम भी ख़ाली, ये ले मीम भी यूँ ही है और नून के अंदर नुक़्ता मुफ़लिसा बेग है ये वाव भी और छोटी हे क्या ख़लीफ़ा जी ये है है है नहीं से निकले आगे छुट्टी दो ऐ लो लाम अलिफ़ हमज़ा ये गालियाँ तेरी ही सुनता है अब 'इंशा' वर्ना किस की ताक़त है अलिफ़ से जो कहे उस को बे

मुझे क्यूँ न आवे साक़ी नज़र

मुझे क्यूँ न आवे साक़ी नज़र आफ़्ताब उल्टा कि पड़ा है आज ख़ुम में क़दह-ए-शराब उल्टा अजब उल्टे मुल्क के हैं अजी आप भी कि तुम से कभी बात की जो सीधी तो मिला जवाब उल्टा चले थे हरम को रह में हुए इक सनम के आशिक़ न हुआ सवाब हासिल ये मिला अज़ाब उल्टा ये शब-ए-गुज़िश्ता देखा वो ख़फ़ा से कुछ हैं गोया कहें हक़ करे कि होवे ये हमारा ख़्वाब उल्टा अभी झड़ लगा दे बारिश कोई मस्त बढ़ के ना'रा जो ज़मीन पे फेंक मारे क़दह-ए-शराब उल्टा ये अजीब माजरा है कि ब-रोज़-ए-ईद-ए-क़ुर्बां वही ज़ब्ह भी करे है वही ले सवाब उल्टा यूँही वा'दा पर जो झूटे तो नहीं मिलाते तेवर ऐ लो और भी तमाशा ये सुनो जवाब उल्टा खड़े चुप हो देखते क्या मिरे दिल उजड़ गए को वो गुनह तो कह दो जिस से ये दह-ए-ख़राब उल्टा ग़ज़ल और क़ाफ़ियों में न कही सो क्यूँकि 'इंशा' कि हवा ने ख़ुद-बख़ुद आ वरक़-ए-किताब उल्टा

चाहता हूँ तुझे नबी की क़सम

चाहता हूँ तुझे नबी की क़सम हज़रत-ए-मुर्तज़ा-अली की क़सम मुझे ग़मगीं न छोड़ रोता आज तुझे अपनी हँसी-ख़ुशी की क़सम साफ़ कह बैठिए न जी में जो हो आप को अपनी सादगी की क़सम मैं दिलाई क़सम तो कहने लगे हम नहीं मानते किसी की क़सम सदक़ा होता हूँ जिस घड़ी मुझ को याद आती है उस परी की क़सम हाए कहना वो उस का चुपके से तुझे 'इंशा' हमारी जी की क़सम

है मुझ को रब्त बस-कि

है मुझ को रब्त बस-कि ग़ज़ालान-ए-रम के साथ चौकूँ हूँ देख साए को अपने क़दम के साथ है ज़ात-ए-हक़ जवाहिर ओ अग़राज़ से बरी तश्बीह क्या है उस को वजूद ओ अदम के साथ क्या ऐन ओ मुल्क ओ वज़्अ ओ इज़ाफ़त का दख़्ल वाँ है इंफ़िआल ओ फ़ेल मता कैफ़-ओ-कम के साथ देखा मैं साथ ढोल के सूली पर उन का सर फ़ख़्रिय्या वो जो फिरते थे तब्ल-ओ-अलम के साथ देखी ये चाह उन की अंधेरे कुएँ के बीच फेंका लपेट कुश्ते को अपने गुलम के साथ कू-ए-बुताँ से तौफ़-ए-हरम को चले तो हम लेकिन कमाल-ए-हसरत ओ हिरमान ओ ग़म के साथ थीं अपनी आँखें हल्क़ा-ए-ज़ंजीर की नमत पैवस्ता हिल रही दर-ए-बैतुस-सनम के साथ कहते हो वूँ से होके इधर आओ वूँ चलें क्या ख़ूब क्यूँ न दौड़ पड़ूँ ऐसे दम के साथ तुम और बात मानो अजी सब नज़र में है दाँतों तले ज़बान दबानी क़सम के साथ अब छेड़ छाड़ की ग़ज़ल 'इंशा' इक और लिख हैं लाख शोख़ियाँ तिरी नोक-ए-क़लम के साथ

ज़मीं से उट्ठी है या चर्ख़ पर

ज़मीं से उट्ठी है या चर्ख़ पर से उतरी है ये आग इश्क़ की यारब किधर से उतरी है उतरती नज्द में कब थी सवारी-ए-लैला टुक आह क़ैस के जज़्ब-ए-असर से उतरी है नहीं नसीम-ए-बहारी ये है परी कोई उड़न-खटोले को ठहरा जो फ़र से उतरी है न जान इस को शब-ए-मह ये चाँदनी-ख़ानम कमंद-ए-नूर पे औज-ए-क़मर से उतरी है चलो न देखें तो कहते हैं दश्त-ए-वहशत में जुनूँ की फ़ौज बड़े कर्र-ओ-फ़र्र से उतरी है नहीं ये इश्क़ तजल्ली है हक़-तआला की जो राह ज़ीना-ए-बाम-ए-नज़र से उतरी है लिबास-ए-आह में लिखने के वास्ते 'इंशा' क़लम दवात तुझे अर्श पर से उतरी है

दिल-ए-सितम-ज़दा बेताबियों ने

दिल-ए-सितम-ज़दा बेताबियों ने लूट लिया हमारे क़िबले को वहहाबियों ने लूट लिया कहानी एक सुनाई जो हीर-राँझा की तो अहल-ए-दर्द को पंजाबियों ने लूट लिया ये मौज-ए-लाला-ए-ख़ुद-रौ नसीम से बोले कि कोह-ओ-दश्त को सैराबियों ने लूट लिया सबा क़बीला-ए-लैला में उड़ गई ये ख़बर कि नाक़ा नज्द के आराबियों ने लूट लिया किसी तरह से नहीं नींद आती 'इंशा' को इसी ख़याल में बे-ख़्वाबियों ने लूट लिया

लग जा तू मिरे सीना से

लग जा तू मिरे सीना से दरवाज़ा को कर बंद दे खोल क़बा अपनी की बे-ख़ौफ़-ओ-ख़तर बंद अफ़्सून-ए-निगह से तिरी ऐ साक़ी-ए-बद-मस्त शीशे में हुई मिस्ल-ए-परी अपनी नज़र-बंद मकड़ाते हुए फिरते हैं हम कूचे में उस के क्या कीजिए दरवाज़ा इधर बंद उधर बंद या शाह-ए-नजफ़ नाम इशारे में तिरा लूँ हो जाए दम-ए-नज़अ ज़बाँ मेरे अगर बंद आवे वो अगर यार-ए-सफ़र-कर्दा तो 'इंशा' मैं दौड़ के किस लुत्फ़ से खुलवाऊँ क़मर-बंद

या वस्ल में रखिए मुझे

या वस्ल में रखिए मुझे या अपनी हवस में जो चाहिए सो कीजिए हूँ आप के बस में ये जा-ए-तरह्हुम है अगर समझे तू सय्याद मैं और फँसूँ इस तरह इस कुंज-ए-क़फ़स में आती है नज़र उस की तजल्ली हमें ज़ाहिद हर चीज़ में हर संग में हर ख़ार में ख़स में हर रात मचाते फिरें हैं शौक़ से धूमें ये मस्त-ए-मय-ए-इश्क़ हैं कब ख़ौफ़-ए-असस में क्या पूछते हो उम्र कटी किस तरह अपनी जुज़ दर्द न देखा कभू इस तीस बरस में हर बात में ये जल्दी है हर नुक्ते में इसरार दुनिया से निराली हैं ग़रज़ तेरी तो रस्में दुश्मन को तिरे गाड़ूँ मैं ऐ जान-ए-जहाँ बस तू मुझ को दिलाया न कर इस तौर की क़स्में 'इंशा' तिरे गर गोश असम हों न तो आवे आवाज़ तिरे यार की हर बाँग-ए-जरस में

अमरद हुए हैं तेरे ख़रीदार चार पाँच

अमरद हुए हैं तेरे ख़रीदार चार पाँच दे ऐसे और हक़ मुझे अग़्यार चार पाँच जब गुदगुदाते हैं तुझे हम और ढब से तब सहते हैं गालियाँ तिरी ना-चार चार पाँच कल यूँ कहा कि टुक तू ठहर ले तो बोले आप हैं मुंतज़िर मिरे सर-ए-बाज़ार चार पाँच ओ जाने वाले शख़्स टुक इक मुड़ के देख ले याँ भी तड़प रहे हैं गुनाहगार चार पाँच सय्याद ले ख़बर कि दिया चाहते हैं जान कुंज-ए-क़फ़स में ताज़ा गिरफ़्तार चार पाँच म्याँ हम भी कोई क़हर हैं जब देखो तब लिए बैठे हैं अपने पास तरहदार चार पाँच चुपके से तुम जो कहते हो हैं अपने आश्ना शोला भभूके और धुआँ-धार चार पाँच हर एक उन से शोख़ है क्या ख़ूब बात हो लग जाएँ तेरे हाथ जो यक-बार चार पाँच तू उन को चाह छोड़ मुझे वाछड़े चे-ख़ुश रक्खे हैं मेरे वास्ते दिलदार चार पाँच है काम एक ही से वो चूल्हे में सब पड़ें सदक़े किए थे ऐसे वो फ़िन्नार चार पाँच साहिब तुम्हीं तुम्हीं नहीं हरगिज़ नहीं नहीं मुझ को नहीं नहीं नहीं दरकार चार पाँच 'मीर' ओ 'क़तील' ओ 'मुसहफ़ी' ओ 'जुरअत' ओ 'मकीं' हैं शायरों में ये जो नुमूदार चार पाँच सो ख़ूब जानते हैं कि हर एक रंग के 'इंशा' की हर ग़ज़ल में हैं अशआर चार पाँच

क्या मिला हम को तेरी यारी में

क्या मिला हम को तेरी यारी में रहे अब तक उमीद-वारी में हाथ गहरा लगा कू-ए-क़ातिल ज़ोर-ए-लज़्ज़त है ज़ख़्म-ए-कारी में दिल जो बे-ख़ुद हुआ सबा लाई किस की बू निगहत-ए-बहारी में टुक उधर देख तू भला ऐ चश्म फ़ाएदा ऐसी अश्क-बारी में चट लगा देते हैं मिरे आँसू सिल्क-ए-गौहर के आब-दारी में रूठ कर उस से मैं जो कल भागा ना-गहाँ दिल की बे-क़रारी में आ लिया उस ने दौड़ कर मुझ को ताक के ओछल एक क्यारी में यूँ लगा कहने बस दिवाना न बन पावँ रख अपना होशियारी में कब तलक मैं भला रहूँ शब-ओ-रोज़ तेरी ऐसी मज़ाज-दारी में है समाया हुआ जो लड़का-पन आप की वज़्अ' प्यारी प्यारी में अपनी बकरी का मुँह चिड़ाते वक़्त क्या ख़ुश आती है ये तुम्हारी ''में'' बंदा-ए-बू-तुराब है 'इंशा' शक नहीं उस की ख़ाकसारी में

मियाँ चश्म-ए-जादू पे इतना घमंड

मियाँ चश्म-ए-जादू पे इतना घमंड ख़त-ओ-ख़ाल ओ गेसू पे इतना घमंड अजी सर उठा कर इधर देखना इसी चश्म ओ अबरू पे इतना घमंड नसीम-ए-गुल इस ज़ुल्फ़ में हो तो आ न कर अपनी ख़ुशबू पे इतना घमंड शब-ए-मह में कहता है वो माह से रकाबी से इस रू पे इतना घमंड बस ऐ शम्अ कर फ़िक्र अपनी ज़रा इन्ही चार आँसू पे इतना घमंड अकड़ता है क्या देख देख आइना हसीं गरचे है तू प इतना घमंड वो कर पंजा 'इंशा' से बोले कि वाह इसी ज़ोर-ए-बाज़ू पे इतना घमंड

भले आदमी कहीं बाज़ आ अरे

भले आदमी कहीं बाज़ आ अरे उस परी के सुहाग से कि बना हुआ हो जो ख़ाक से उसे क्या मुनासिबत आग से बहुत अपनी ताक बुलंद थी कोई बीस गज़ की कमंद थी पर उछाल फाँदा वो बंद थी तिरे चौकी-दारों की जाग से बहुत आए मोहरे कड़े कड़े वो जो मुंड-जी थे बड़े बड़े वले ऐसे तो न नज़र पड़े कि जो साफ़ पाक हों लाग से वो सियाह-बख़्त जो रात को तिरे दाम-ए-ज़ुल्फ़ में फँस गया उसे आ के वहम-ओ-ख़याल के लगे डसने सैकड़ों नाग से भरा मैं ने बिंदराबन में जो अरे किश्न होप का नारा तो महाराज नाचते कूदते चले आए लट-पटी पाग से लगे कहने खेम-कुसल उसे जो 'अली' के ध्यान के बीच है तोरे दुख-दलिद्दर जित्ते थे गए भाग आप के भाग से होए आशिक़ उन के हैं मर्द ओ ज़न ये अनोखी उन की भी कुछ नहीं कोई ताज़ा आए हैं बरहमन ये जो काशी और पराग से तुझे चाहते नहीं हम हैं बस उन्हों को भी तो तिरी हवस वो जो भकड़े बेर से सौ बरस के पुराने बूढ़े हैं दाग से ऐ लो आए आए सिवाए कुछ नहीं बात ध्यान में चढ़ती कुछ कुछ इक इन फ़क़ीरों की मजलिसें भी तो मिलती-जुलती हैं भाग से मुझे काम उन के जमाल से न तो टप्पे से न ख़याल से न तो वज्द से न तो हाल से न तो नाच से न तो राग से ये सआदत उस को 'अली' ने दी जो वज़ीर-ए-आज़म-ए-हिन्द है कि बदौलत उस की जहान में नहीं ख़ौफ़ बकरी को बाग से मुझे रहम आता है ऐसों पर बसर अपने करते हैं वक़्त जो किसी फल से या किसी फूल से किसी पात से किसी साग से गुथी इन सुरों ही में आ गई मुझे इक उरूस के बास से अभी 'इंशा' अपना हो बस अगर तो लिपट ही जाऊँ बहाग से

आने अटक अटक के लगी साँस रात से

आने अटक अटक के लगी साँस रात से अब है उमीद सिर्फ़ ख़ुदा ही की ज़ात से साक़ी हवा-ए-सर्द को तू सरसरी न जान कैफ़िय्यत उस की पूछ नबात-ए-नबात से अपना सनम वो क़हर है ऐ बरहमन कि गर देखे मनात को तो गिरा देवे लात से कल से तो इख़्तिलात में ताज़ा है इख़तिराअ' रुकने लगी हैं आप मिरी बात बात से पेश आइए ब-शफ़क़त-ओ-लुत्फ़ उस से शैख़ जी बिंत-उल-अनब को जानिए अपने नबात से हासिल किया जो हम ने क़दम-बोस-ए-पीर-ए-दैर आई सदा-ए-इश्क़ दर-ए-सोमनात से हैं वाजिब-उल-वजूद के अनवार इश्क़ में उस की सिफ़ात-ए-ज़ात नहीं मुम्किनात से अशआ'र-ए-तब्अ'-ज़ाद मिरी सुन के शोख़ वो कहने लगा कि फ़ाएदा इस मोहमलात से मुतलक़ मिला के आँख इधर देखते नहीं आते नज़र हो आज भी कम इल्तिफ़ात से 'इंशा' ने आ लगा ही लिया तुम को बात में ज़ालिम वो चूकता है कोई अपनी घात से

टुक आँख मिलाते ही किया काम हमारा

टुक आँख मिलाते ही किया काम हमारा तिस पर ये ग़ज़ब पूछते हो नाम हमारा तुम ने तो नहीं ख़ैर ये फ़रमाइए बारे फिर किन ने लिया राहत-ओ-आराम हमारा मैं ने जो कहा आइए मुझ पास तो बोले क्यूँ किस लिए किस वास्ते क्या काम हमारा रखते हैं कहीं पाँव तो पड़ते हैं कहीं और साक़ी तू ज़रा हाथ तो ले थाम हमारा टुक देख इधर ग़ौर कर इंसाफ़ ये है वाह हो जुर्म ओ गुनह ग़ैर से और नाम हमारा ऐ बाद-ए-सबा महफ़िल-ए-अहबाब में कहियो देखा है जो कुछ हाल तह-ए-दाम हमारा गर वक़्त-ए-सहर जाइए होता है ये इरशाद है वक़्त-ए-मुलाक़ात सर-ए-शाम हमारा फिर शाम को आए तो कहा सुब्ह को यूँही रहता है सदा आप पर इल्ज़ाम हमारा सर-गश्तगी-ए-मरहला-ए-शौक़ में ऐ इश्क़ पड़ता है नई वज़्अ से हर गाम हमारा ऐ बरहमन-ए-दैर मोहब्बत में सनम की अल्लाह ही बाक़ी रखे इस्लाम हमारा हम कूचा-ए-दिलदार के होते हैं तसद्दुक़ ऐ शेख़-ए-हरम है यही एहराम हमारा बेताबी-ए-दिल के सबब उस शोख़ तक 'इंशा' पहुँचे है बिला वास्ता पैग़ाम हमारा

देखना जब मुझे कर शान ये गाली देना

देखना जब मुझे कर शान ये गाली देना किस से तुम सीखे हो हर आन ये गाली देना इख़्तिलात आप से और मुझ से कहाँ का ऐसा वाह जी जान न पहचान ये गाली देना अब तो नादाँ हो सुना चाहो सो प्यारे कह लो पर तुम्हें होवेगा नुक़सान ये गाली देना आख़िरश होगी जो उन पर तो किसे भावेगा चंद रोज़ और ही मेहमान ये गाली देना तोहमत-ए-बोसा अबस देती हो मंज़ूर जो हो कर के बे-फ़ाएदा बोहतान ये गाली देना दीजिए दीजिए है ऐन सआ'दत अपनी आशिक़ों पर तो है एहसान ये गाली देना तेरे ग़ुस्सा से जो 'इंशा' हो ख़फ़ा नाहक़ है हाँ तुझे चाहिए नादान ये गाली देना

बस्ती तुझ बिन उजाड़ सी है

बस्ती तुझ बिन उजाड़ सी है कम-बख़्त ये शब पहाड़ सी है शायद कि हुई सरायत-ए-इश्क़ कुछ सीने में चीर-फाड़ सी है हर-चंद कि बोलते नहीं वो बाहम पर छेड़-छाड़ सी है सो रहते हैं एक साथ लेकिन तलवार के बीच आड़ सी है इंशा-अल्लाह शायद आया इस कूचे में भीड़-भाड़ सी है

तुम्हारे हाथों की उँगलियों की ये देखो पोरें

तुम्हारे हाथों की उँगलियों की ये देखो पोरें ग़ुलाम तीसों ग़रज़ कि ग़श है अगर न मानो तो झट उठा ले कलाम तीसों इमाम बारा बुरूज बारा अनासिर-ओ-जिस्म-ओ-रूह ऐ दिल यही तो सरकार-ए-हक़-तआला की हैं मुदारुलमहाम तीसों नहीं अजाइब कुछ आँख ही में रूतूबतें तीन सात पर्दे ओक़ूल दस मुद्रिकात दस हैं सो करते रहते हैं काम तीसों उलूम चौदह मक़ूला दस और जिहात सित्ता बनाए उस ने उमूर-ए-दुनिया को ताकि पहुंचाएँ ख़ूब सा इंसिराम तीसों बलाएँ काली हैं उस परी बिन ये तीसों रातें कुछ ऐसी 'इंशा' कि हर महीने के दिन भी जिन को करे हैं झुक कर सलाम तीसों

बंदगी हम ने तो जी से अपनी ठानी

बंदगी हम ने तो जी से अपनी ठानी आप की बंदा-पर्वर ख़ैर आगे क़द्र-दानी आप की थी जो वो लाही की टोपी ज़ाफ़रानी आप की सो हमारे पास है अब तक निशानी आप की दम-ब-दम कह बैठना बस जाओ अपनी उन के पास क्यूँ नहीं जाती वो अब तक बद-गुमानी आप की क्या कहूँ मारे ख़ुशी के हाल मेरा क्या हुआ आमद आमद जो हुई कल ना-गहानी आप की है किसी से आज वा'दा कुछ अजी ख़ाली नहीं ये धड़े मिस्सी की होंटों पर जमानी आप की हम ने सौ रातें जगाईं तब हुआ ये इत्तिफ़ाक़ सो उसी दिन को धरी थी नींद आनी आप की मेरे हक़ में अब जो ये इरशाद फ़रमाया कि है ख़ूब याँ मनक़ूश-ख़ातिर जाँ-फ़िशानी आप की लेक मैं ओढूँ बिछाऊँ या लपेटूँ क्या करूँ रूखी फीकी ऐसी सूखी मेहरबानी आप की क्यूँ न इश्क़-अल्लाह बोलूँ हज़रत-ए-दिल आप को पेशवाओं ने भी अपनी आन मानी आप की दीद कर डाला बस उन से आलम-ए-लाहूत सब्त जिस ने लगदी बंक की साफ़ी में छानी आप की अपनी आँखों में पड़ी फिरती है अब तक रोज़-ओ-शब अर्श पर दाता वही सूरत दिखानी आप की ऐ जुनूँ उस्ताद बस ख़म ठोंक कर आ जाइए हाँ ख़लीफ़ा हम भी देखें पहलवानी आप की सदक़ा सदक़ा क्यूँ न हो जाऊँ भला ग़श खा के मैं देख गदराई हुई उठती जवानी आप की सब्ज़ा-आग़ाज़ी सो ये कुछ तिसपे आफ़त सादगी क़हर फिर उस बात पर गर्दन हिलानी आप की अपनी आँखों में तरावट आ गई यक-बारगी देख कर ये लहलहे पोशाक धानी आप की क्यूँ न लड़की सब कहें हव्वा तुम्हें ऐ शैख़ जियू है जमूख़ी की सी सूरत ये डरानी आप की गोल पगड़ी नीली लुंगी मूंछ मुंडी तकिया रीश फिर वो रूमाल और वो अख़-थू नासदानी आप की दो गुलाबी ला के साक़ी ने कहा 'इंशा' को रात ज़ाफ़रानी मेरा हिस्सा अर्ग़वानी आप की

लब पे आई हुई ये जान फिरे

लब पे आई हुई ये जान फिरे यार गर इस तरफ़ को आन फिरे चैन क्या हो हमें जब आठ पहर अपने आँखों में वो जवान फिरे ख़ून-ए-आशिक़ छुटा कि है लाज़िम तेरे तलवार पर ये सान फिरे साक़िया आज जाम-ए-सहबा पर क्यूँ न लहराती अपनी जान फिरे हिचकियाँ ली है इस तरह बत-ए-मय जिस तरह गटकरी में तान फिरे या तो वो अहद थे कि हम हरगिज़ न फिरेंगे अगर जहान फिरे आए अब रोके हो मआ'ज़-अल्लाह आप से शख़्स की ज़बान फिरे रूठ कर उठ चले थे 'इंशा' से बारे फिर हो के मेहरबान फिरे

धूम इतनी तिरे दीवाने मचा सकते हैं

धूम इतनी तिरे दीवाने मचा सकते हैं कि अभी अर्श को चाहें तो हिला सकते हैं मुझ से अग़्यार कोई आँख मिला सकते हैं मुँह तो देखो वो मिरे सामने आ सकते हैं याँ वो आतिश-ए-नफ़साँ हैं कि भरें आह तो झट आग दामान-ए-शफ़क़ को भी लगा सकते हैं सोचिए तो सही हट-धर्मी न कीजे साहब चुटकियों में मुझे कब आप उड़ा सकते हैं हज़रत-ए-दिल तो बिगाड़ आए हैं इस से लेकिन अब भी हम चाहें तो फिर बात बना सकते हैं शैख़ी इतनी न कर ऐ शैख़ कि रिंदान-ए-जहाँ उँगलियों पर तुझे चाहें तो नचा सकते हैं तू गिरोह-ए-फ़ुक़रा को न समझ बे-जबरूत ज़ात-ए-मौला में यही लोग समा सकते हैं दम ज़रा साध के लेते हैं फरेरी तो अभी सून खींची हुई लाहूत को जा सकते हैं गरचे हैं मूनिस-ओ-ग़म-ख़्वार तग-ओ-दौ में सही पर तिरी तब्अ को कब राह पे ला सकते हैं चारासाज़ अपने तो मसरूफ़-ए-बदल हैं लेकिन कोई तक़दीर के लिक्खे को मिटा सकते हैं है मोहब्बत जो तिरे दिल में वो इक तौर पे है हम घटा सकते हैं इस को न बढ़ा सकते हैं कर के झूटा न दिया जाम अगर तू ने तो चल मारे ग़ैरत के हम अफ़यून तो खा सकते हैं हम-नशीं तू जो ये कहता है कि क़दग़न है बहुत अब वो आवाज़ भी कब तुझ को सुना सकते हैं ऐ न आवाज़ सुनावें मुझे दर तक आ कर अपने पाँव के कड़ों को तो बजा सकते हैं हम तो हँसते नहीं पर आप के हँसने के लिए और अगर साँग नहीं कोई बना सकते हैं काली काग़ज़ की अभी एक कतर कर बेचा ज़ाहिद-ए-बज़्म के मुँह पर तो लगा सकते हैं घर से बाहर तुम्हें आना है अगर मनअ तो आप अपने कोठे पे कबूतर तो उड़ा सकते हैं झूलते हैं ये जो झोली में सो कहते हैं मुझे एक व'अदे पे तुझे बरसों झुला सकते हैं एक ढब के जो क़्वाफ़ी हैं हम उन में 'इंशा' इक ग़ज़ल और भी चाहें तो सुना सकते हैं

जाड़े में क्या मज़ा हो

जाड़े में क्या मज़ा हो वो तो सिमट रहे हों और खोल कर रज़ाई हम भी लिपट रहे हों अब आप की दमों में हम आ चुके हटो भी ख़ुश आवे प्यारे किस को जब दिल ही कट रहे हों क्यूँकर ज़बाँ से उन की अपना बचाव होवे ज़ात-ओ-सिफ़ात सब के जब वो उकट रहे हों आते थे साथ मेरे देखो तो क्या हुए वो ऐसा न हो कि पीछे रिश्ते में कट रहे हों तब सैर देखे कोई बाहम लड़ाईयों के खींचे हों वो तो तेग़ा और हम भी डट रहे हों क्या कर सकें दिवाने हाल-ए-दिल-ए-परेशाँ ज़ुल्फ़ों के बाल उन के जब आप लट रहे हों आपस में रूठने का अंदाज़ हो तो ये हो वो हम से फट रहे हों हम उन से फट रहे हों जी चाहता है ऐ दिल इक ऐसी रात आवे मतला हो साफ़ शहरा बादल भी फट रहे हों सोते हों चाँदनी में वो मुँह लपेटे और हम शबनम का वो दुपट्टा पट्ठे उलट रहे हों पंजम ग़ज़ल अब 'इंशा' अंदाज़ की सुना दी आग़ोश में मआ'नी जिस के लिपट रहे हों

मुझे छेड़ने को साक़ी ने दिया

मुझे छेड़ने को साक़ी ने दिया जो जाम उल्टा तो किया बहक के मैं ने उसे इक सलाम उल्टा सहर एक माश फेंका मुझे जो दिखा के उन ने तो इशारा मैं ने ताड़ा कि है लफ़्ज़-ए-शाम उल्टा ये बला धुआँ नशा है मुझे इस घड़ी तो साक़ी कि नज़र पड़े है सारा दर-ओ-सहन-ओ-बाम उल्टा बढ़ूँ उस गली से क्यूँकर कि वहाँ तो मेरे दिल को कोई खींचता है ऐसा कि पड़े है गाम उल्टा दर-ए-मय-कदा से आई महक ऐसी ही मज़े की कि पिछाड़ खा गिरा वाँ दिल-ए-तिश्ना-काम उल्टा नहीं अब जो देते बोसा तो सलाम क्यूँ लिया था मुझे आप फेर दीजे वो मिरा सलाम उल्टा लगे कहने आब माया तुझे हम कहा करेंगे कहीं उन के घर से बढ़ कर जो फिरा ग़ुलाम उल्टा मुझे क्यूँ न मार डाले तिरी ज़ुल्फ़ उलट के काफ़िर कि सिखा रखा है तू ने उसे लफ़्ज़-ए-राम उल्टा निरे सीधे-सादे हम तो भले आदमी हैं यारो हमें कज जो समझे सो ख़ुद वलद-उल-हराम उल्टा तू जो बातों में रुकेगा तो ये जानूँगा कि समझा मिरे जान-ओ-दिल के मालिक ने मिरा कलाम उल्टा फ़क़त इस लिफ़ाफ़े पर है कि ख़त आश्ना को पहुँचे तो लिखा है उस ने 'इंशा' ये तिरा ही नाम उल्टा

गाहे गाहे जो इधर आप करम करते हैं

गाहे गाहे जो इधर आप करम करते हैं वो हैं उठ जाते हैं ये और सितम करते हैं जी न लग जाए कहीं तुझ से इसी वास्ते बस रफ़्ता रफ़्ता तिरे हम मिलने को कम करते हैं वाक़ई यूँ तो ज़रा देखियो सुब्हान-अल्लाह तेरे दिखलाने को हम चश्म ये नम करते हैं इश्क़ में शर्म कहाँ नासेह-ए-मुशफ़िक़ ये बजा आप को क्या है जो इस बात का ग़म करते हैं गालियाँ खाने को उस शोख़ से मिलते हैं हाँ कोई करता नहीं जो काम सो हम करते हैं हैं तलबगार मोहब्बत के मियाँ जो अश्ख़ास वो भला कब तलब-ए-दाम-ओ-दिरम करते हैं ऐन मस्ती में हमें दीद-ए-फ़ना है 'इंशा' आँख जब मूँदते हैं सैर-ए-अदम करते हैं

वो जो शख़्स अपने ही ताड़ में सो छुपा है

वो जो शख़्स अपने ही ताड़ में सो छुपा है दिल ही की आड़ में न वो बस्ती में न उजाड़ में न वो झाड़ में न पहाड़ में मुझे काम तुझ से है ऐ जुनूँ न कहूँ किसी से न कुछ सुनूँ न किसी की रद्द-ओ-क़दह में हूँ न उखाड़ में न पछाड़ में ये सबा ने क़ैस से आ कहा कि सुना कुछ और भी माजरा तिरे पास से जो चला गया तो खड़ा है नाक़ा उजाड़ में अरे आह तू ने ग़ज़ब किया मिरे दिल को मुझ से तुड़ा लिया मिरी जी को ले के जला दिया पड़ी इख़्तिलात ये पहाड़ में ख़फ़गी भी तुर्फ़ा है एक शय पड़े क़िस्से होते हैं लाखों तय वो कहाँ मिलाप में लुत्फ़ है जो मज़ा है उन की बिगाड़ में मिज़ा पर है पारा-ए-दिल थंबा वो मसल हुई है अब ऐ ख़ुदा कि दरख़्त से जो कभी गिरा तो वो अटका उन के ही झाड़ में कहीं खिड़कियों की तरफ़ बंधी मिरी टिकटिकी तो ऐ लो अभी गुल-ए-नर्गिस आ के लगा गई वो परी हर एक दराड़ में मिरी दिल में नश्शे का है मकाँ मुझे सूझती हैं वो मस्तियाँ कि खजूरी चोटियों वालियाँ पड़ी फिरती हैं मिरे ताड़ में बड़ी दाढ़ियों पे न जा दिला ये सब आहूओं की हैं मुब्तला ये शिकार कैसे हैं बरमला इन्हीं टट्टियों की तो आड़ में खड़ी झाँकती है वही परी नहीं शुबह इस में तो वाक़ई वो जो इत्र-ए-फ़ित्ना की बास थी सो रची हुई है किवाड़ में न कर अपनी जान को मुज़्महिल अरे 'इंशा' उन से लगा न दिल तू दिगर न होवेगा मुन्फ़इल कहीं आ गया जो लताड़ में

मिल गए पर हिजाब बाक़ी है

मिल गए पर हिजाब बाक़ी है फ़िक्र-ए-नाज़-ओ-इताब बाक़ी है बात सब ठीक-ठाक है प अभी कुछ सवाल-ओ-जवाब बाक़ी है गरचे माजून खा चुके लेकिन दौर-ए-जाम-ए-शराब बाक़ी है झूटे वादे से उन के याँ अब तक शिकवा-ए-बे-हिसाब बाक़ी है गाह कहते हैं शाम हूई अभी ज़र्रा-ए-आफ़्ताब बाक़ी है फिर कभी ये कि अब्र में कुछ-कुछ परतव-ए-माहताब बाक़ी है है कभी ये कि तुझ पे छिड़केंगे जो लगन में शहाब बाक़ी है और भड़के है इश्तियाक़ की आग अब किसे सब्र-ओ-ताब बाक़ी है उड़ गई नींद आँख से किस की लज़्ज़त-ए-ख़ुर्द-ओ-ख़्वाब बाक़ी है है ख़ुशी सब तरह की, नाहक़ का ख़तरा-ए-इंक़लाब बाक़ी है है वो दिल की धड़क सो जूँ की तूँ जी पर उस का अज़ाब बाक़ी है जो भरा शीशा था हुआ ख़ाली पर वो बू-ए-गुलाब बाक़ी है अपनी उम्मीद थी सो बर आई यास शक्ल-ए-सराब बाक़ी है है यही डोल जब तक आँखों में दम बसान-ए-हबाब बाक़ी है मिस्ल-ए-फ़र्मूदा-ए-हुज़ूर 'इंशा' फिर वही इज़्तिराब बाक़ी है

ज़ुल्फ़ को था ख़याल बोसे का

ज़ुल्फ़ को था ख़याल बोसे का ख़त ने लिक्खा सवाल बोसे का दोहरे पत्तों के ज़ेर-ए-साया हुआ सब क़लम-बंद हाल बोसे का चश्मक-ए-ख़ाल-ए-रुख़ ने साफ़ कहा है तबस्सुम मआल बोसे का सब्ज़ा-ए-नौ-दमीदा ने मारा गिर्द-ए-रुख़्सार जाल बोसे का रह गया तेरे मुखड़े पर बाक़ी अब मकाँ ख़ाल ख़ाल बोसे का हो ग़ज़ब अपने बाल नोच लिए है ये सारा वबाल बोसे का तेरे ग़ुस्से से अब कोई 'इंशा' छोड़ता है ख़याल बोसे का

दीवार फाँदने में देखोगे काम मेरा

दीवार फाँदने में देखोगे काम मेरा जब धम से आ कहूँगा साहब सलाम मेरा हम-साए आप के मैं लेता हूँ इक हवेली इस शहर में हुआ जो चंदे क़याम मेरा जो कुछ कि अर्ज़ की है सो कर दिखाऊँगा मैं वाही न बात समझो यूँही कलाम मेरा अच्छा मुझे सताओ जितना कि चाहो मैं भी समझूँगा गर है इंशा-अल्लाह नाम मेरा मैं ग़श हुआ कहा जूँ साक़ी ने मुझ से हँस कर ये सब्ज़ जाम तेरा और सुर्ख़ जाम मेरा पूछा किसी ने मुझ को उन से कि कौन है ये तो बोले हँस के ये भी है इक ग़ुलाम मेरा महशर की तिश्नगी से क्या ख़ौफ़ सय्यद 'इंशा' कौसर का जाम देगा मुझ को इमाम मेरा

जब तक कि ख़ूब वाक़िफ़-ए-राज़-ए-निहाँ न हूँ

जब तक कि ख़ूब वाक़िफ़-ए-राज़-ए-निहाँ न हूँ मैं तो सुख़न में इश्क़ के बोलूँ न हाँ न हूँ ख़ल्वत में तेरी बार न जल्वत में मुझ को हाए बातें जो दिल में भर रही हैं सो कहाँ कहूँ गाहे जो उस की याद से ग़ाफ़िल हो एक दम मुझ को दहन में अपने लगी है ज़बाँ ज़ुबूँ शत्त-ए-अमीक़-ए-इश्क़ को ये चाहता हूँ मैं अब्र-ए-मिज़ा से रो के उसे बे-कराँ करूँ तूफ़ान-ए-नूह आँख न हम से मिला सके आती नज़र हैं चश्म से हर पल अयाँ उयूँ नासेह ख़याल-ए-ख़ाम से क्या इस से फ़ाएदा कब मेरे दिल से हो हवस-ए-दिल-बराँ बरूँ ये इख़्तिलात कीजिए मौक़ूफ़ नासेहा माक़ूल यानी दिल उसे ऐ क़द्र-दाँ न दूँ 'इंशा' करूँ जो पैरवी-ए-शैख़-ओ-बरहमन मैं भी उन्हों की तरह से जूँ गुमरहाँ रहूँ ख़ल्वत-सरा-ए-दिल में है हो कर के मोतकिफ़ बैठा हूँ क्या ग़रज़ कहीं ऐ जाहिलाँ हिलूँ

जो बात तुझ से चाही है

जो बात तुझ से चाही है अपना मिज़ाज आज क़ुर्बान तेरी कल पे न टाल आज आज आज दहकी है आग दिल में पड़े इश्तियाक़ की तेरे सिवाए किस से हो इस का इलाज आज है फ़ौज फ़ौज-ए-ग़म्ज़ा-ओ-अंदाज़ तेरे साथ अक़्लीम-ए-नाज़ का है तुझे तख़्त-ओ-ताज आज तेरा वो हुस्न है कि जो होता तो भेजता यूसुफ़ ज़मीन-ए-मिस्र से तुझ को ख़िराज आज ख़ूबान-ए-रोज़गार मुक़ल्लिद तिरे हैं सब जो चीज़ तू करे सो वो पावे रिवाज आज आब-ए-ज़ुलाल-ए-वस्ल से अंदोह-ए-दर्द-ओ-हिज्र नापैद घुल के होता है क्या मिस्ल-ए-ज़ाज आज 'इंशा' से अपने और ये इंकार हैफ़ है लाया है वो कभी न कभी एहतियाज आज

फ़क़ीराना है दिल मुक़ीम उस की रह का

फ़क़ीराना है दिल मुक़ीम उस की रह का ग़रज़ क्या कि मुहताज हो बादशह का ख़दंग आह का ऐ फ़लक बे-तरह है भरोसा तू तारों की मत कर ज़िरह का ख़राबात की जब से लज़्ज़त पड़ी है छुटा बैठना मस्जिद-ओ-ख़ानक़ह का तवाफ़-ए-हरम तुझ को ज़ाहिद मुबारक मिरा और तेरा नहीं साथ रह का सनम-ख़ाना जाता हूँ तू मुझ को नाहक़ न बहका न बहका न बहका न बहका तिरे मुँह से कुछ बू जो आती है मय की दिमाग़-ए-दिल उस वक़्त जाता है महका रक़ीबों के दिल चाक मिस्ल-ए-कताँ हों गुज़ार उस तरफ़ हो अगर अपने रह का तिरी आश्नाई में क्या हम ने पाया दिया नक़्द-ए-दिल और अपनी गिरह का चमक कर तू ऐ बर्क़ मत मार चश्मक तो मस्तों की आतिश को मत और दहका तभी लुत्फ़ है साक़िया मय-कशी का कि तू भी बहक और मुझ को भी बहका कभी तुझ से 'इंशा' ने बोसा न माँगा गुनाहगार है वो फ़क़त इक निगह का

लो फ़क़ीरों की दुआ हर तरह आबाद रहो

लो फ़क़ीरों की दुआ हर तरह आबाद रहो ख़ुद रहो मौजें करो ताज़े रहो शाद रहो ऐरे-ग़ैरे वो जो हों शौक़ से चट कर लो उन्हें पर ख़ुदा वालों की करते हुए इमदाद रहो कुमरी-ए-बाग़-ए-बहिश्त अब जो ये बे-फ़ाख़ता हैं उन्हें भी कह दो कि तुम सर्व से आज़ाद रहो दीद उस की है करो जिस ने बनाया सब कुछ न कि हर लहज़ा फ़िदा-ए-गुल-ओ-शमशाद रहो दाम में से जो छुटे हैं उन्हें ये हुक्म हुआ कि बस अब गर्द-ए-दर-ए-ख़ाना-ए-सय्याद रहो जा के औरों से बदो याद-फ़रामोश वले ख़ु़द-फ़रामोशों को मौला मिरी तुम याद रहो सूरत आवे जो नज़र खींच लो उस की तस्वीर अपने इस वक़्त के तुम मानी-ओ-बहज़ाद रहो चमन-ए-अम्न-ओ-अमाँ के तुम्हें हो सैर-नसीब साईं अल्लाह सदा बर-सर-ए-इरशाद रहो ऐश-ओ-इशरत करो हर वक़्त तुम 'इंशा-अल्लाह' हुस्न चमकाए फिरो सब में परी-ज़ाद रहो

इक फरेरी जो तिरा ख़ाक-बसर लेता है

इक फरेरी जो तिरा ख़ाक-बसर लेता है थाम जिबरील-ए-अमीं अपना जिगर लेता है साथ अपने कोई असबाब-ए-सफ़र लेता है तो फ़क़ीर उस घड़ी सर ज़ानू पे धर लेता है छेड़-छाड़ अपने उड़ा कौन सके ऐ क़िबला बर्क़ से दाम कोई मुश्त-ए-शरर लेता है देखिए क्या हो चले जाओ मियाँ अपनी राह कौन याँ हम से ग़रीबों की ख़बर लेता है बाग़बाँ का ये नहीं जुर्म नसीब अपने कि वो छाँट कर सब में पकड़ मेरी कमर लेता है कोई सरकार जुनूँ की नहीं लाज़िम नाएब काम जितने हैं वो सब आप ही कर लेता है कह लिए क्यूँ न हो सब्ज़े कि सुख़न मेरा सीख दाया-ए-अब्र-ए-बहारी के हुनर लेता है सीना-ए-नख़्ल से आती है उबल दूध की धार खींच इस का जो कोई तिफ़्ल तबर लेता है होवे परलोक उदयभान तो लाला-घनशाम उन के फुकने के लिए मोल अगर लेता है नौनिहालान-ए-चमन को हो भला क्यूँकर चैन तोड़ गुल उन के कोई कोई समर लेता है उन की क़ाज़ें भी तराना ये सुना जाती हैं कि तबर लेता तबर लेता तबर लेता है इस ज़मीं में वो है इक बाग़ लगा ऐ 'इंशा' जो कि तूबा की भी चोटी को कुतर लेता है

नादाँ कहाँ तरब का सर-अंजाम

नादाँ कहाँ तरब का सर-अंजाम और इश्क़ कुछ भी तुझे शुऊर है आराम और इश्क़ लेने न देवेंगे मुझे टुक चैन जीते जी दुश्मन ये दोनो गर्दिश-ए-अय्याम और इश्क़ याँ ग़श हैं शौक़-ए-तौफ़ हैं यारान-ए-काबा को ऐ नामा-बर तू कहियो ये पैग़ाम और इश्क़ क्या नाम ले के उस का पुकारा करूँ कि याँ रखता है हर ज़बान में इक नाम और इश्क़ पूछा किसी ने क़ैस से तू है मोहम्मदी बोला वो भर के आह कि इस्लाम और इश्क़ अस्बाब-ए-काएनात से बस हो के बे-नवा 'इंशा' ने इंतिख़ाब किया जाम और इश्क़

यास-ओ-उमीद-ओ-शादी-ओ-ग़म ने

यास-ओ-उमीद-ओ-शादी-ओ-ग़म ने धूम उठाई सीने में ख़ूब मुझे है आज धमा-धम मार-कुटाई सीने में दीद किया जो वादी-ए-मजनूँ हम ने धुन में वहशत के शक्ल मुजस्सम हो के जुनूँ की आन समाई सीने में शैख़-ओ-बरहमन दैर-ओ-हरम में ढूँढते हो क्या ला-हासिल मूँद के आँखें देखो तो है सारी ख़ुदाई सीने में क़हर किया ये तुम ने साहब आँख लड़ाना आफ़त था झट-पट दिल को फूँक दिया और आग लगाई सीने में हज़रत-ए-दिल तो कब के सिधारे ख़ूब जो ढूँडा 'इंशा' ने एक धुआँ सा आह का उट्ठा ख़ाक न पाई सीना में

तर्क कर अपने नंग-ओ-नाम को हम

तर्क कर अपने नंग-ओ-नाम को हम जाते हैं वाँ फ़क़त सलाम को हम ख़ुम के ख़ुम तो लुढ़ाई यूँ साक़ी और यूँ तरसें एक जाम को हम मैं कहा मैं ग़ुलाम हूँ बोला जानें हैं ख़ूब इस ग़ुलाम को हम दैर ओ काबा के बीच हैं हँसते ख़ल्क़ के देख इज़्दिहाम को हम मुतकल्लिम हैं ख़ास लोगों से करते हैं कब ख़िताब आम से हम रूठने में भी लुत्फ़ है 'इंशा' सुब्ह गर रूठे वो तो शाम को हम

ये जो मुझ से और जुनूँ से याँ बड़ी जंग

ये जो मुझ से और जुनूँ से याँ बड़ी जंग होती है देर से सो कुछ ऐसी ढब से लड़ाई है लड़े शेर जैसे कि शेर से बनी शक्ल लैला-ए-नौ-जवाँ मिरे दाता क्या कहूँ अल-अमाँ वो तजल्ली एक जो हुई अयाँ किसी रात क़ैस के ढेर से अभी दो महीने से हूँ जुदा न तो ख़्वाब में भी नज़र पड़ा भला और अंधेर ज़ियादा क्या कहीं होगा ऐसे अंधेर से मुझे शामियाना तले से क्या मिरा दिल तो कहता है मुझ से आ सर-ए-राह कोठे पे बैठ जा यहीं तकिया दे के मुंडेर से तिरी बादले की ये ओढ़नी अरे बर्क़ कौंदे नज़र में तब करे ये घटा जो मुक़ाबला किसी पेशवाज़ के घेर से नहीं इंतिज़ार के हौसले मुझे सूझे सैकड़ों अरतले क़सम उन ने खाई तो है वले मिरा जी डरे है अधेर से भला मुझ से देव के सामने कोई ठोंक सकते हैं ख़म भला अरे ये अंगूठे से आदमी तो बिचारे ख़ुद हैं बटेर से ''वही पी कहाँ वही पी कहाँ'' यही एक रट सी जो है सो है महाराज चोट सी लगती है मुझे इस पपीहे की टेर से ग़ज़ल 'इंशा' और भी एक लिख इसी बहर और रदीफ़ की कि ज़बर की क़ाफ़िए जिस में हों मुझे नफ़रत आ गई ज़ेर से

याँ ज़ख़्मी-ए-निगाह के जीने पे हर्फ़ है

याँ ज़ख़्मी-ए-निगाह के जीने पे हर्फ़ है है दिल पर अपने ज़ख़्म कि सीने पे हर्फ़ है ज़र-ख़र्चियाँ कहाँ तलक अपनी बयाँ करें क़ारून की भी याँ तो ख़ज़ीने पे हर्फ़ है मिलते थे चौथे पाँचवें वो वक़्त तो गया अब ये कि चार पाँच महीने पे हर्फ़ है क्या दख़्ल वो जो हाथ से मेरे पिएँ शराब वाँ कहते कहते बात भी पीने पे हर्फ़ है तूफ़ान-ए-अश्क 'नूह'-अलैहिस्सलाम से बोला कि आप के भी सफ़ीने पे हर्फ़ है ना-चीज़ आप जानते हैं इस क़दर मुझे उल्फ़त तो जावे भाड़ में कीने पे हर्फ़ है नासेह जिगर के ज़ख़्म को जर्राह क्या सिए याँ सोज़न-ए-मसीह के सीने पे हर्फ़ है याँ हर बुन-ए-मसाम में ख़ूनाबा है रवाँ निकले तो ख़ूँ ही निकले पसीने पे हर्फ़ है 'इंशा' की मोहर पढ़िए भला आश्ना हुआ कंदीदा कोई इस के नगीने पे हर्फ़ है अब ध्यान कर के देखिए क्या है गठा हुआ इस का हर एक अपने क़रीने पे हर्फ़ है

तफ़ज़्जुलात नहीं लुत्फ़ की निगाह नहीं

तफ़ज़्जुलात नहीं लुत्फ़ की निगाह नहीं मुआमला अभी मुतलक़ वो रू-ब-राह नहीं ग़लत है आह कि है दिल को दिल से राह नहीं कि तेरी चाह मुझे तुझ को मेरी चाह नहीं ग़ुलाम हम तो हैं ऐसे मिज़ाज वालों के किसी के साथ किसी ढब की जिन को राह नहीं हमारी चोरी जो साबित हुई दलील भी कुछ मुक़िर नहीं कोई शाहिद नहीं गवाह नहीं तवाज़ो आप की हम क्या करें भला साहिब ब-क़ौल शख़्से इस अपने जिगर में आह नहीं रुखाइयाँ जो यही हैं तो इस तरह अपना नहीं नहीं नहीं हरगिज़ नहीं निबाह नहीं हरम से दैर में याँ आब-ओ-दाना ले आया ब-रब्ब-ए-क'अबा मिरा इस में कुछ गुनाह नहीं न कुछ जिहत न सबब क़ाह-क़ाह हँसते हो तुम्हारी ख़ुश मुझे आती ये क़ाह-क़ाह नहीं कहूँ ब-क़ैद-ए-क़सम ला-इलाहा इल-लल्लाह कि ताब-ए-हिज्र बस अब मुझ में ऐ इलाह नहीं

जी चाहता है शैख़ की पगड़ी उतारिए

जी चाहता है शैख़ की पगड़ी उतारिए और तान कर चटाख़ से एक धोल मारिए सोतों को पिछले पहर भला क्यूँ पुकारिए दरवाज़ा खुलने का नहीं घर को सिधारिए क्या सर्व अकड़ रहा है खड़ा जूएबार पर टुक आप भी तो इस घड़ी सीना उभारिए ये कारख़ाना देखिए टुक आप ध्यान से बस सून खींच जाए यहाँ दम न मारिए नासेह ने मेरे हक़ में कहा अहल-ए-बज़्म से बिगड़ी हुई को आह कहाँ तक सँवारिए 'इंशा' ख़ुदा के फ़ज़्ल पे रखिए निगाह और दिन हँस के काट डालिए हिम्मत न हारिए

जिस को कुछ धन हो करे हम से हक़ीक़त की बहस

जिस को कुछ धन हो करे हम से हक़ीक़त की बहस कि हमीं जानते हैं अहल-ए-तरीक़त की बहस क़ाज़िया हाथ बढ़ा शीशा-ए-सहबा तो उतार ताक़-ए-निस्याँ पे तू रहने दे शरीअत की बहस कर दिया मुज्तहिद-ए-वक़्त को क़ातिल झट-पट हम ने मस्जिद में कल ऐसे ही क़यामत की बहस बज़्म-ए-रिंदाना में क्या रिंद-ओ-वर'अ का चर्चा शैख़-साहिब है बहुत ये तो हिमाक़त की बहस बू-अली साथ कोई बोलते 'इंशा' को सुने रोज़ होती है बहम अहल-ए-बलाग़त की बहस

टुक इक ऐ नसीम सँभाल ले

टुक इक ऐ नसीम सँभाल ले कि बहार मस्त-ए-शराब है वो जो हुस्न-ए-आलम-ए-नश्शा है उसे अब की ऐन-शबाब है वो घटाएँ छाईं जो कालियाँ जो हरी-भरी हुईं डालियाँ उभर आईं फूलों की लालियाँ तो बजाए आब-ए-शहाब है ये दो-रोज़ा नश्व-ओ-नुमा को तू न समझ कि नक़्श-ए-पुर-आब से ये सराब है ये हबाब है फ़क़त एक क़िस्सा-ए-ख़्वाब है अरक़-ए-बहार-ए-शराब है वो ही आज छिड़केंगे आप पर न तो बेद-ए-मुश्क है इस घड़ी न तो केवड़ा न गुलाब है उन्हें कहने सुनने से बैर है जो ख़ुद आएँ सो तो ब-ख़ैर है ये ग़रज़ कि ज़ोर ही सैर है न सवाल है न जवाब है किधर आऊँ जाऊँ करूँ सो क्या मिरा जी ही नाक में आ गया न तो अर्ज़-ए-हाल की ताब है न तो सब्र-ए-ख़ाना-ख़राब है मुझे वहश-ओ-तैर से रश्क है कि कभी उन्हों को किसी नमत न सवाल है न जवाब है न अज़ाब है न इक़ाब है मिरी बात मान सुना दिला न तो अर्ज़ ओ फ़र्ज़ पे जी चला कोई उन को टोके सो क्या भला कि वो आली उन की जनाब है अरे 'इंशा' अब जो ये दौर है तिरी वज़्अ इन दिनों और है ये भी कोई ज़ीस्त का तौर है न शराब है न कबाब है

मल ख़ून-ए-जिगर मेरा हाथों से हिना समझे

मल ख़ून-ए-जिगर मेरा हाथों से हिना समझे मैं और तो क्या कोसूँ पर तुम से ख़ुदा समझे समझाने की जो बातें कीं मैं ने दिला तुझ से ऐ अक़्ल की दुश्मन सो तेरी तो बला समझे दिल में मिरे चुटकी ली ऐसी है कि दर्द उट्ठा माक़ूल चे ख़ुश ऐ वाह आप इस को अदा समझे ऐ बू-लहब-ए-नख़वत सीधे हैं अगर सच-मुच तो आज से साहब को हम अपना चचा समझे साहब ने न की यारी वहशत से परी से तो ऐ शैख़-ए-जुनूँ तुम को हम ख़्वाजा-सरा समझे हँगामा-ए-महशर भी गर सामने आया तो उस को भी तमाशाई एक साँग नया समझे वो दश्त-ए-मोहब्बत में रक्खे क़दम ऐ 'इंशा' सर अपने को आगे ही जो तन से जुदा समझे

तू ने लगाई अब की ये क्या आग ऐ बसंत

तू ने लगाई अब की ये क्या आग ऐ बसंत जिस से कि दिल की आग उठे जाग ऐ बसंत कैफ़िय्यत-ए-बहार के तू उस को दे ख़बर मौज-ए-नसीम की तरह उड़ लाग ऐ बसंत हर शाख़ ज़र्द ओ सुर्ख़ ओ सियह हिज्र-ए-यार में डसते हैं दिल को आन के जूँ नाग ऐ बसंत मुँह देखो आशिक़ों के मुक़ाबिल हूँ रंग में बाँधी है मुझ से किस लिए तू लाग ऐ बसंत तुझ में कहाँ ये बूक़लमूनी कहाँ ये संग दश्त-ओ-जबल को ख़ैर से अब भाग ऐ बसंत जूँ तार-ए-चँग छेड़ न 'इंशा' को बात में तेरा सुना हुआ है ये घटराग ऐ बसंत

अश्क मिज़्गान-ए-तर की पूँजी है

अश्क मिज़्गान-ए-तर की पूँजी है ये समर उस शजर की पूँजी है आह को मत हक़ीर जान यही दूदमान-ए-असर की पूँजी है जो घड़ी याद में तिरी कट जाए वो ही आठों पहर की पूँजी है जल्वा-ए-यार है अज़ीज़ बहुत यही अहल-ए-नज़र की पूँजी है जल्द अच्छा हो ये तआ'लल्लाह यही 'इंशा' के घर की पूँजी है तेरी बख़्शी हुइ ख़ुदावंदा मेरी ये उम्र भर के पूँजी है मैं तिरे सदक़े बस यही मेरे दिल-ओ-जान-ओ-जिगर की पूँजी है

न तो काम रखिए शिकार से

न तो काम रखिए शिकार से न तो दिल लगाइए सैर से बस अब आगे हज़रत-ए-इश्क़-जी चले जाइए घर ही को ख़ैर से वो जो गुटका पारे का मुँह में ले पड़े उड़ते फिरते हैं जोगी-जी सो तो भर्तपुर से उदास हो चले आए क़िला-ए-दैर से नहीं होते आम के रू-ब-रू हमें क़िबला ख़ास है आरज़ू कि ख़ुदा करे पड़े गुफ़्तुगू किसी पीर-ओ-मुर्शिद-ए-दैर से कहो किस वसीले से शैख़ के शक-ओ-शुबह होवे कमाल में कि जो नेमत आप को पहुँची है सो मियाँ-ग़ुलाम-ज़ुबैर से जो ख़फ़ा हुए तो हुए अजी जो लड़े-भिड़े तो लड़े सही गिला है सो यार-ए-अज़ीज़ से न कि शिकवा सूरत-ए-ग़ैर से मुझे इक हयात दोबारा दे उसी क़ुदरत अपनी से ऐ ख़ुदा कि ख़िताब-ए-फ़िक़रा-ए-कम-लिबस्त किया था जिन ने उज़ैर से वो जो है अली-ए-वली वसी है मोहम्मद-ए-अरबी अख़ी सो तू अब्द-ए-ख़ास-ए-करीम है उसे दुश्मनी है नुसैर से यही चाल अपनी है 'इंशा' अब कभी तो दरख़्तों से ख़लते हैं कभी है सबा से ख़िताब कुछ कभी वहश से कभी तैर से

तुझ से यूँ यक-बार तोड़ूँ किस तरह

तुझ से यूँ यक-बार तोड़ूँ किस तरह मैं क़दम तेरे ये छोड़ूँ किस तरह घर से बाबर तू न निकला ता-हनूज़ तेरे दर पर सर न फोड़ूँ किस तरह मय से ताइब था व-लेकिन आज पी हाथ लग जावे तो छोड़ूँ किस तरह आबरू-ए-अब्र याँ मंज़ूर है आह मैं दामन निचोड़ूँ किस तरह साफ़ दिल क्यूँ-कर करूँ तुझ से भला टूटी उल्फ़त फिर के जोड़ूँ किस तरह शौक़ से तू हाथ को मेरे मरोड़ मैं तिरा पंजा मरोड़ूँ किस तरह वक़्त बोसा के ये 'इंशा' से कहा तुझ से मैं फिर मुँह न मोड़ूँ किस तरह

हज़रत-ए-इश्क़ इधर कीजे करम या माबूद

हज़रत-ए-इश्क़ इधर कीजे करम या माबूद बाल-गोपाल हैं याँ आप के हम या माबूद बंदा-ख़ाना में अजी लाइए तशरीफ़-ए-शरीफ़ आ के रख दीजे इन आँखों पे क़दम या माबूद नफ़ी इसबात की शाग़िल जो क़लंदर हैं सो वो अपनी गर्दन को नहीं करते हैं ख़म या माबूद अपने दाता की हक़ीक़त के हैं जल्वा तुम में लमआ-ए-नूर-ए-तजल्ली की क़सम या माबूद जल्द फटकारिए सब्ज़े के नशे को कोड़ा खींचिए और कोई सुलफ़े का दम या माबूद आप ही आप हैं वो आप ने सच फ़रमाया यूँ भी कुछ धोके से थे नाम को हम या माबूद वर्ना ये आरियतन है जो वजूद अपना सो गुज़राँ वो तो है जूँ मौजा-ए-यम या माबूद वाक़ई बोलने से अपने लड़ा बैठे जो आँख क्यूँ ख़ुदी से न करे फेर वो रम या माबूद आँख को कहते अरब ऐन हैं सो ऐन अगर दम पर आ जाए तो हो ऐन-ए-अदम या माबूद रात तिरयाक नशा ने तो उलट डाला वाह कोई घोला तो वो था कासा-ए-सम या माबूद सिदरा तक आन तो पहुँचा हूँ दिली क़स्द है ये कि बढ़ूँ और भी दो-चार क़दम या माबूद चार ज़ानू हो अब 'इंशा' भी ज़मीं से ऊँचा यक व जब रहने लगा सादा की दम या माबूद

ये नहीं बर्क़ इक फ़रंगी है

ये नहीं बर्क़ इक फ़रंगी है र'अद-ओ-बाराँ फ़ुसून-ए-जंगी है कोई दुनिया से क्या भला माँगे वो तो बेचारी आप नंगी है वाह दिल्ली की मस्जिद-ए-जामे जिस में बुर्राक़ फ़र्श-ए-संगी है हौसला है फ़राख़ रिंदों का ख़र्च की पर बहुत सी तंगी है लग गए ऐब सारे उस के साथ यूँ कहा जिस को मर्द बंगी है डरो वहशत के धूम-धाम से तुम वो तो इक देवनी दबंगी है जोगी-जी साहिब आप की भी वाह धर्म मूरत अजब को ढंगी है आप ही आप है पुकार उठता दिल भी जैसे घड़ी फ़रंगी है चश्म-ए-बद-दूर शैख़-जी साहिब क्या इज़ार आप के उटंगी है शैख़-सादी-ए-वक़्त है 'इंशा' तू 'अबू-बक्र-साद' ज़ंगी है

शब ख़्वाब में देखा था मजनूँ को

शब ख़्वाब में देखा था मजनूँ को कहीं अपने दिल से जो कराह उट्ठी लैला को लिया तप ने देखे तिरे जल्वा को बाम्हन की जो बेटी भी मुँह से वहीं कलमे को यकबार लगे जपने है जिंस परी सा कुछ आदम तो नहीं असलन इक आग लगा दी है उस अमर्द-ए-ख़ुश-गप ने इस तरह के मिलने में क्या लुत्फ़ रहा बाक़ी हम उस से लगे रुकने वो हम से लगा छपने हंगाम-ए-सुख़न-संजी आतिश की ज़बानी को शर्मिंदा किया ऐ दिल उस शोख़ के गप-शप ने हर अम्र में दुनिया के मौजूद जिधर देखो आदम को किया हैराँ शैतान की लप-झप ने गर्मी से मिरे दिल की इस मौसम-ए-सर्मा में ये गुम्बद-ए-गर्दूं भी यकबार लगा तपने रह वादी-ए-ऐमन की लेता हूँ कि घबराया इस दिल की बदौलत याँ मुझ को तरफ़-ए-चप ने है हम से भी हो सकता जो कुछ न किया होगा मजनूँ से जफ़ा-कश ने फ़रहाद से सर-खप ने चल हट भी परे बिजली दल बादलों को ले कर दहला है दिया तेरी तलवारों की शप शप ने कब तक न कराहूँ मैं नाला न भरूँ क्यूँ-कर मैं क्या करूँ ऐ 'इंशा' अब जी ही लगा खपने

तोडूँगा ख़ुम-ए-बादा-ए-अंगूर की गर्दन

तोडूँगा ख़ुम-ए-बादा-ए-अंगूर की गर्दन रख दूँगा वहाँ काट के इक हूर की गर्दन ख़ुद्दार की बन शक्ल अलिफ़ हाए अनल-हक़ नित चाहती हैं इक नई मंसूर की गर्दन क्यूँ साक़ी-ए-ख़ुर्शीद-ए-जबीं क्या है नशा हूँ सब यूँही चढ़ा जाऊँ मय-ए-नूर की गर्दन उछली हुइ वर्ज़िश से तरी डंड पे मछली है नाम-ए-ख़ुदा जैसी सक़नक़ूर की गर्दन था शख़्स जो गर्दन-ज़दनी उस से ये बोले अब दीजिए है देनी जो मंज़ूर की गर्दन आईने की गर सैर करे शैख़ ये देखे सर ख़ुर्स का मुँह ख़ूक का लंगूर की गर्दन यूँ पंजा-ए-मिज़्गाँ में पड़ा है ये मरा दिल जूँ चंगुल-ए-शहबाज़ में उस्फ़ूर की गर्दन तब आलम-ए-मस्ती का मज़ा है कि पड़ी हो गर्दन पे मिरी उस बुत-ए-मख़मूर की गर्दन बैठा हो जहाँ पास सुलैमान के आसिफ़ वाँ क्यूँ न झुकी क़ैसर ओ फ़ग़्फ़ूर की गर्दन भेंची है बग़ल अपनी मैं इस ज़ोर से जो इश्क़ तो तोड़ने पर है किसी मजबूर की गर्दन ऐ मस्त ये क्या क़हर है ख़िश्त-ए-सर-ए-ख़ुम से क्यूँ तू ने'' सुराही की भला चूर की गर्दन महफ़िल में तरी शम्अ बनी मोम की मर्यम पिघली पड़ी है उस की वो काफ़ूर की गर्दन ऐ देव-ए-सफ़ेद-ए-सहरी काश तू तोड़े इक मुक्के से ख़ुर के शब-ए-दीजूर की गर्दन जब कुश्त-ए-उल्फ़त को उठाया तो अलम से बस हिल गई उस क़ातिल-ए-मग़रूर की गर्दन बे-साख़्ता बोला कि अरे हाथ तो टुक दो ढलके न मिरे आशिक़-ए-मग़्फ़ूर की गर्दन हासिद तो है क्या चीज़ करे क़स्द जो 'इंशा' तू तोड़ दे झट बल्ग़म-ए-बाऊर की गर्दन

सद-बर्ग गह दिखाई है गह अर्ग़वाँ बसंत

सद-बर्ग गह दिखाई है गह अर्ग़वाँ बसंत लाई है एक ताज़ा शगूफ़ा यहाँ बसंत भर भर के गुलिस्ताँ में मय-ए-ऐश-ओ-जश्न से देती है हर घड़ी मुझे रित्ल-ए-गराँ बसंत तू उठ चला तो ज़र्द हुए सब के रंग-ए-रू कल आ गई बहार में ये ना-गहाँ बसंत आते नज़र हैं दश्त-ओ-जबल ज़र्द हर तरफ़ है अब के साल ऐसी है ऐ दोस्ताँ बसंत शादाबी-ए-नसीम से बहर-ए-सुरूर को करती है जोश मार के अब बे-कराँ बसंत गर फ़िल-मसल मलाइका हों अहल-ए-ज़ोहद सब ले आवे बहर-ए-सैर उन्हें मू-कशाँ बसंत पत्ते नहीं चमन में खड़कते तिरे बग़ैर करती है इस लिबास में हर-दम फ़ुग़ाँ बसंत गर शाख़-ए-ज़ाफ़राँ उसे कहिए तो है रवा है फ़रह-बख़्श वाक़ई इस हद कोहाँ बसंत गुरवा बना के रीश-ए-मोख़ज़्ज़ब से मोहतसिब जाता है उस मक़ाम में जावे जहाँ बसंत 'इंशा' से शैख़ पूछता है क्या सलाह है तर्ग़ीब-ए-बादा दी है मुझे ऐ जवाँ बसंत

एक दिन रात की सोहबत में

एक दिन रात की सोहबत में नहीं होते शरीक हम को क्या फ़ाएदा गर आप बहुत हैं नज़दीक अब तो टुक हो के खड़े बात हमारी सुन लो रात है कूचा-ओ-बाज़ार पड़े हैं तारीक पान जो हाथ से कल ग़ैर के तू ने खाया पी के लोहू को ग़रज़ घूँट रहे हम जूँ पीक दूर हो वादी-ए-मजनूँ से निकल ऐ वहशत किस वसीले से मिली तुझ को जहाँ की तमलीक वादी-ए-इश्क़ में 'इंशा' तू सँभल कर जाता हाँ ख़बर-दार कि ये राह बहुत है तारीक

उस बंदे की चाह देखिएगा

उस बंदे की चाह देखिएगा और उस का निबाह देखिएगा मैं कैसे निबाहता हूँ तुम से इंशा-अल्लाह देखिएगा फ़ौजें अश्कों की तुल रही हैं ये हशमत-ओ-जाह देखिएगा आशिक़ मुझे जान करते हैं क़त्ल तक़्सीर ओ गुनाह देखिएगा 'इंशा' से आप अब ख़फ़ा हैं यूँ भर के निगाह देखिएगा

टुक क़ैस को छेड़-छाड़ कर इश्क़

टुक क़ैस को छेड़-छाड़ कर इश्क़ लिपटा मुझे पंजे झाड़ कर इश्क़ ख़म ठोंक मिरी हुआ मुक़ाबिल फ़रहाद को दूँ पछाड़ कर इश्क़ आया कज ओ वा-कज इस तरफ़ को वामिक़ का घर उजाड़ कर इश्क़ बे-फ़ौज-ए-सरिश्क ओ परचम-ए-आह झपटा यूँ भीड़-भाड़ कर इश्क़ अल-क़िस्सा सभों के हो मुक़ाबिल पहुँचा अब हम को ताड़ कर इश्क़ ता-दामन-ए-कोह खेंच लाया जंगल में उन्हों को गाड़ कर इश्क़ हम इश्क़ अल्लाह बोले तो भी चिंघाड़ के आए फाड़ कर इश्क़ है है 'इंशा' हमारे दिल को बे-तरह गया लताड़ कर इश्क़

दस अक़्ल दस मक़ूले दस मुद्रिकात तीसों

दस अक़्ल दस मक़ूले दस मुद्रिकात तीसों तेरे ही ज़िक्र में हैं ऐ पाक-ज़ात तीसों नो आसमाँ ख़ुर-ओ-मह सातों तबक़ ज़मीं के रूह-ओ-हवास-ए-ख़मसा और शश-जहात तीसों बारा बुरूज चौदह मासूम चार उंसुर ज़ाहिर करें हैं तेरी लाखों सिफ़ात तीसों सी-पारहा-ए-दिल को रखियो मुहाफ़िज़त से ऐ मेरी जाँ हैं तेरी हिफ़्ज़-ए-हयात तीसों माह-ए-गुज़िश्ता का हाल 'इंशा' कहूँ सो क्यूँकर मर मर बसर किए हैं दिन और रात तीसों

सर चश्म सब्र दिल दीं तन माल जान आठों

सर चश्म सब्र दिल दीं तन माल जान आठों सदक़ा कई हैं तुम पर लो मेहरबान आठों सज-धज निगह अकड़ छब हुस्न-ओ-अदा-ओ-शोख़ी नाम-ए-ख़ुदा हैं तुझ में ऐ नौजवान आठों फ़र्दंग-ओ-चंग-ओ-नय दफ़ बीन-ओ-रुबाब-ओ-सुरनी हम-साज़-ओ-हम-नवा हैं लेते हैं तान आठों सातों सुरों में मुतरिब गत भी ये गुथ रहे हैं हैं सम पे आ ठहरते यकजा नदान आठों रुख़ ख़ाल-ओ-ज़ुल्फ़-ओ-ख़त लब दंदाँ ज़क़न ज़नख़दाँ उस के हैं अपने दुश्मन 'इंशा' हर आन आठों

काश अब्र करे चादर-ए-महताब की चोरी

काश अब्र करे चादर-ए-महताब की चोरी ता मुझ से भी हो जाम-ए-मय-ए-नाब की चोरी टुक तकिया पे सर धर के रहा सो तो लगाई साहब ने हमें मसनद-ए-कम-ख़्वाब की चोरी सीमाब के आँसू वो सदा रोए इलाही की जिस ने हो मेरे दिल-ए-बेताब की चोरी वो इश्क़ कि सच आँखों से काजल को चुरा ले किस तरह न आशिक़ के करे ख़्वाब की चोरी मुझ को सर-ए-बाज़ार घिसटवा के निकाला की उस ने ही कुछ ख़ाना-ए-नव्वाब की चोरी जिस ने कि मिरे चेहरे से आब आह उड़ा ले साबित हुई उस पर दुर-ए-नायाब की चोरी शब सेंध जो दी दाग़ की एक चोर ने 'इंशा' तो हो गई सब सब्र के अस्बाब की चोरी

वो देखा ख़्वाब क़ासिर जिस से है

वो देखा ख़्वाब क़ासिर जिस से है अपनी ज़बाँ और हम कि गोया एक जा है उस में है वो नौजवाँ और हम वो रो रो मुझ से कहता है ख़ुदा की बातें हैं वर्ना भला टुक दिल में अपने ग़ौर कर तू ये मकाँ और हम जो पूछा क़ैस से लैला ने जंगल में अकेले हो तो बोले ऐ नहीं वहशत है और आह-ओ-फ़ुग़ाँ और हम अजी गड़बड़ रही है अक़्ल अपने सब फ़रिश्तों से पड़े फिरते हैं बाहम सैर करते क़ुदसियाँ और हम नशा है आलम-ए-मस्ती है बे-क़ैदी है रिंदी है कहाँ अब ज़ोहद-ओ-तक़्वा है ख़राबात-ए-मुग़ाँ और हम नियाबत हम को रिज़वाँ की मिली मौला के सदक़े से वगर्ना ओहदा-ए-दरबानी-ए-बाग़-ए-जिनाँ और हम अजब रंगीनियाँ बातों में कुछ होती हैं ऐ 'इंशा' बहम हो बैठते हैं जब सआदत-यार-ख़ाँ और हम

बात के साथ ही मौजूद है

बात के साथ ही मौजूद है टाल एक न एक है ख़िलाफ़ अपने सदा आप के चाल एक न एक हम भी इस वास्ते बैठे हैं कि हो रहता है तुझ सही सर्व के साये में निहाल एक न एक यार है पास पर अब फ़र्त-ए-तरद्दुद के सबब आ ही रहता है मिरे दिल को मलाल एक न एक मैं तो हर-चंद बचाता हूँ व-लेकिन हैहात खुब ही जाता है इन आँखों में जमाल एक न एक तुझे कुछ हुस्न-परस्ती से नहीं काम वले हो ही रहता है मिरे जी का ज़वाल एक न एक क्या करूँ गरचे भुलाता हूँ बहुत मैं लेकिन आ ही रहता है तिरा मुझ को ख़याल एक न एक मज्लिस-ए-वज्द में पढ़ अपनी ग़ज़ल तू 'इंशा' कर ही बैठेगा अभी सुनते ही हाल एक न एक

गली से तेरी जो टुक हो के आदमी निकले

गली से तेरी जो टुक हो के आदमी निकले तो उस के साया से झट बन के इक परी निकले ख़याल में तिरे चेहरे की मर गया हो जो शख़्स तो उस की ख़ाक से सोने की आरसी निकले बईद शान से आशिक़ के आह भरनी थी वली वो क्या करे जब उस की जान ही निकले किसी के होश को कह दो अगर चला चाहे तो अपने घर से कमर बाँध कर अभी निकले निशान-ए-आह लिए छाँव छाँव तारों के चलेगी फ़ौज-ए-सरिश्क आज चाँदनी निकले कजी तबीअत-ए-कज-फ़हम से हो तब मुंफ़क किसी दवा से दुम-ए-सग के गर कजी निकले हज़ार शुक्र कि 'इंशा' किसी की महफ़िल में ख़फ़ा से आए थे पर हो हँसी-ख़ुशी निकले

है जिस में क़ुफ़्ल-ए-ख़ाना-ए-ख़ुम्मार तोड़िए

है जिस में क़ुफ़्ल-ए-ख़ाना-ए-ख़ुम्मार तोड़िए या'नी दर-ए-बहिश्त को यकबार तोड़िए क्यूँ क़ैद-ए-ख़ुम में दुख़्तर-ए-रज़ ही पड़ी रहे ये मोहर-ए-रेसमान-ए-सरोकार तोड़िए शागिर्द अमीर-हम्ज़ा-ए-साहिब-क़िराँ के हैं क्यूँकर भला न क़िलअ'-ए-अशरार तोड़िए कीजे लक़ा-ए-बाख़तर-ए-बे-बक़ा को क़ैद नजतक के सर पे गुर्ज़-ए-गराँ-बार तोड़िए चोटी पकड़ के नर्गिस-ए-जादू की खींचिए कल्ले को उस के मारिए ललकार तोड़िए रुस्तम से छीन लीजिए देव-ए-सफ़ेद को और इस की दह मरोड़ के तलवार तोड़िए सद्द-ए-सिकंदरी भी जो चढ़ जाए ध्यान तो वोहीं तुफ़ैल-ए-हैदर-ए-कर्रार तोड़िए आ जावें हफ़्त-ख़्वान-ए-तिलिस्मात सामने तो ख़ैर से उन्हें भी ब-तकरार तोड़िए हिस्न-ए-ज़मुर्रदैन-ए-अदु कोह-ए-क़ाफ़ पर होवे तो उस को भेज के अय्यार तोड़िए ज़म्बील है अमर की दिल-ए-फ़िक्र-ख़ेज़ ये इस को किसी तरह से न ज़िन्हार तोड़िए है अज़्म-जज़्म ये कि ज़बरदस्ती आज तो बंद-ए-क़बा है मौसम-ए-गुलज़ार तोड़िए या छेड़ने को अब्र के इक झटका मार कर शलवार-बंद बर्क़-ए-शरर-बार तोड़िए जी चाहता है ले के बलाएँ तुम्हारी आज पोरें इन उँगलियों को सब ऐ यार तोड़िए 'इंशा' दिखा के और भी इक जल्वा-ए-ग़ज़ल बंद-ए-नक़ाब-ए-शाहिद-ए-असरार तोड़िए

जो हाथ अपने सब्ज़े का घोड़ा लगा

जो हाथ अपने सब्ज़े का घोड़ा लगा तो सुलफ़े का और उस को कोड़ा लगा मिरे ही जो बाज़ू में इक नील सा सो तेरे है पाँव का तोड़ा लगा अजी चश्म-ए-बद-दूर नाम-ए-ख़ुदा तुम्हें क्या भला सुर्ख़ जोड़ा लगा भला आप शरमाए किस वास्ते कबूतर का बाहम जो जोड़ा लगा ये दुखती निगाहों से घूरा मुझे कि दुखने मिरे दिल का फोड़ा लगा लगी कहने 'इंशा' को शब वो परी मुझे भूत हो ये निगोड़ा लगा

ज़िन्हार हिम्मत अपने से हरगिज़ न हारिए

ज़िन्हार हिम्मत अपने से हरगिज़ न हारिए शीशे में उस परी को न जब तक उतारिए औज़ा ढूँढ-ढाड के यारों से सीखिए होते नहीं जहान में हम से नियारिए ऐ अश्क-ए-गर्म कर मिरे दिल का इलाज कुछ मशहूर है कि चोट को पानी से धारिए जो अहल-ए-फ़क़्र-ओ-शाह कुम्हारे के हैं मुरीद पाले हैं इन सभों ने कबूतर कुमहारिए गलने की दाल याँ नहीं बस ख़ुश्का खाइए ऐ शैख़ साहब आप न शेख़ी बघारिए कल जिन को खीरे ककड़ी क्या कोस काट कर आज उस परी ने इन को दिए नर्म आरिए हो आब में कदर तो ठहर जाइए टुक एक दिल में कुदूरत आवे तो क्यूँकर निथारिए है कौन सी ये वज़्अ भला सोचिए तो आप बातें उधर को कीजे इधर आँख मारिए पूछे हक़ीक़त एक ने जो अम्न-ए-राह की तो बोले सर झुका के बचा वो मदारिए ख़तरा न आप कीजे बस अब ख़ैर शौक़ से सोना उछालते हुए घर को सिधारिए है जो बुलंद-हौसला उन की ये चाल है क्या फिर उन्हें बिगाड़िए जिन को सँवारिए पंडित जी हम में उन में भला कैसे होने के पोथी को अपने खोलिए कुछ तो बिचारिए 'इंशा' कोई जवाब भी देना नहीं हमें बाँग-ए-जरस की तरह कहाँ तक पुकारिए

ज़ोफ़ आता है दिल को थाम तो लो

ज़ोफ़ आता है दिल को थाम तो लो बोलियो मत भला सलाम तो लो कौन कहता है बोलो मत बोलो हाथ से मेरे एक जाम तो लो हम-सफ़ीरो छुटोगे मत तड़पो दम अभी आ के ज़ेर-ए-दाम तो लो इन्हीं बातों पे लोटता हूँ मैं गाली फिर दे के मेरा नाम तो लो इक निगह पर बिके है 'इंशा' आज मुफ़्त में मोल इक ग़ुलाम तो लो

पकड़ी किसी से जावे नसीम और सबा बंधे

पकड़ी किसी से जावे नसीम और सबा बंधे मौला करे कुछ अपनी भी अब तो हवा बंधे आशिक़ को बोग़-बंद में बाँधा है उस ने यूँ ता हो के दस्त-ए-बुक़चा में जैसे क़बा बंधे यूँ दूद आह का मिरी गुम्बद बँधा है याँ छत जैसे अब्र-ए-तीरा की तहतस्समा बंधे टुक आलम ऐ जुनूँ तू दिखा वो कि जिस से साफ़ लाहूत का समाँ मिरी आँखों में आ बंधे सरमा घुला के आँखों में निकला न कीजिए ऐसा न हो कि आप पे कुछ तूतिया बंधे क़ुदरत ख़ुदा के देखो कि चोरी तो हम करें और उल्टे दस्त-गीर हो दुज़द-ए-हिना बंधे अलझेड़े में फँसे थे तिरी ज़ुल्फ़ के सो वो उल्टे टँगे असीर हुए बारहा बंधे 'इंशा' सद-आफ़रीं तिरे ज़ेहन-ए-सलीम को मज़मूँ ज़ियादा इस से भला और क्या बंधे

क्या भला शैख़-जी थे दैर में थोड़े पत्थर

क्या भला शैख़-जी थे दैर में थोड़े पत्थर कि चले काबा के तुम देखने रोड़े पत्थर ऐ बसा कोहना इमारात-ए-मक़ाबिर जिन के लोगों ने चोब-ओ-चगल के लिए तोड़े पत्थर जाओ ऐ शैख़ ओ बरहमन हरम-ओ-दैर को तुम भाई बेज़ार हैं हम हम ने ये छोड़े पत्थर कभी दिल-हा-ए-बुताँ तुझ से पसीजें ऐ अश्क तो ये हम जानें कि बस तू ने निचोड़े पत्थर न चिरे नोक से नश्तर के आयाज़म-बिल्लह कोई उश्शाक़ के थे छाती के फोड़े पत्थर कोस बैठें फ़ुक़रा अहल-ए-दुवल को तो अभी उन के हाथी हों पहाड़ और ये घोड़े पत्थर गर सग-ए-गुरसिना ले शूम के मतबख़ की बास तो भला हड्डी की जा क्या वो भंबोड़े पत्थर न हिंसा मैं जो हँसाने से शब उन की तो कहा तुझे क़ुर्बान करूँ हाए निगोड़े पत्थर एक ग़ज़ल और सुना दे हमें 'इंशा' हर-चंद तू ने इस में भी किसी ढब के न छोड़े पत्थर

बंक की जल्वा-गरी पर ग़श हूँ

बंक की जल्वा-गरी पर ग़श हूँ या'नी उस सब्ज़ परी पर ग़श हूँ गरचे दुनिया के हुनर हैं लेकिन अपने मैं बे-हुनरी पर ग़श हूँ बर्क़ की तरह न तड़पूँ क्यूँकर तेरी पोशाक-ए-ज़री पर ग़श हूँ उस की पिशवाज़ की से लाई बास उस की मैं गोद-भरी पर ग़श हूँ ग़श नसीम-ए-सहरी है मुझ पर मैं नसीम-ए-सहरी पर ग़श हूँ उसे कुछ हो न सका 'इंशा' मैं आह की बे-असरी पर ग़श हूँ

हैं जो मुरव्वज मेहर-ओ-वफ़ा के सब

हैं जो मुरव्वज मेहर-ओ-वफ़ा के सब सर-रिश्ते भूल गए फिर गए तुम तो क़ौल-ओ-क़सम से अपने नविश्ते भूल गए जब देखो तब लाठी ठेंगे खट खट करते फिरते हैं उड़ते हैं कोई शैख़-जी साहब उन को फ़रिश्ते भूल गए अहले-गहले फिरते हो साहब सैर-ए-चमन में और तुम्हें अपने तड़पते ज़ख़्मी सब ख़ूँ में आग़ुशते भूल गए क़ाज़ी-जियो के दोनों बेटे हम से कहेंगे है वो मसल घर में फ़रिश्ते के ख़ारिशते सो ख़ारिशते भूल गए नस्ल बड़ी आदम की 'इंशा' कौन किसी को पहचाने बाइस-ए-कसरत हम दीगर के नाते-रिश्ते भूल गए

किनाया और ढब का इस मिरी मज्लिस में

किनाया और ढब का इस मिरी मज्लिस में कम कीजे अजी सब ताड़ जावेंगे न ऐसा तो सितम कीजे तुम्हारे वास्ते सहरा-नशीं हूँ एक मुद्दत से बसान-ए-आहू-ए-वहशी न मुझ से आप रम कीजे महाराजों के राजा ऐ जुनूँ ङंङवत है तुम को यही अब दिल में आता है कोई पोथी रक़म कीजे गले में डाल कर ज़ुन्नार क़श्क़ा खींच माथे पर बरहमन बनिए और तौफ़-ए-दर-ए-बैतुस्सनम कीजे कहीं दिल की लगावट को जो यूँ सूझे कि तक जा कर क़दीमी यार से अपने भी ख़ल्ता कोई दम कीजिए तू उँगली काट दाँतों में फुला नथुने रुहांदी हो लगा कहने बस अब मेरे बुढ़ापे पर करम कीजे फड़कता आज भी हम को न परसों की तरह रखिए ख़ुदा के वास्ते कुछ याद वो अगली क़सम कीजे मलंग आपस में कहते थे कि ज़ाहिद कुछ जो बोले तो इशारा उस को झट सू-ए-नर-अंगुश्त-ए-शिकम कीजे कभी ख़त भी न लिख पहुँचा पढ़ाया आप को किस ने कि अलक़त दोस्ती 'इंशा' से ऐसी यक-क़लम कीजिए

ये किस से चाँदनी में हम

ये किस से चाँदनी में हम ब-ज़ेर-ए-आसमाँ लिपटे कि बाहम अर्श पर मारे ख़ुशी के क़ुदसियाँ लिपटे हुदी-ख़्वाँ वादी-ए-मजनूँ में नाक़े को न ले जाना मबादा इक बगूला सा ब-पा-ए-सारबाँ लिपटे अदब गर हज़रत-ए-जिब्रील का माने न हो मुझ को तो शाख़-ए-सिद्रा से मेरे ये आह-ए-ना-तवाँ लिपटे सिकंदर और दारा क्या करोड़ों और भी उन से पड़े हैं गोर के तख़्ते से ज़ेर-ए-ख़ाकदाँ लिपटे किसी ढब से तबीअत सैर होती ही नहीं उन से अभी दालान से लाए ब-ज़ेर-ए-साएबाँ लिपटे हँसे बोले रहे मशग़ूल अपने जिस तरह चाहा उधर लिपटे उधर सोए यहाँ चिमटे वहाँ लिपटे व-लेकिन पास कहती है कि होंगी ख़्वाब की बातें तुम्हें कुछ ख़ैर है साहब बताओ तो जहाँ लिपटे किधर लोटे किधर पोटे हँसे बोले किधर जा कर कहाँ लिपटे कहाँ सोए कहाँ चिमटे कहाँ लिपटे ग़ज़ल मस्ती में लिख इक और भी 'इंशा' कि ता तेरे बलाएँ आ के साक़ी ले तुझे पीर-ए-मुग़ाँ लिपटे

साहब के हर्ज़ा-पन से हर एक को गिला है

साहब के हर्ज़ा-पन से हर एक को गिला है मैं जो निबाहता हूँ मेरा है हौसला है चौदह ये ख़ानवादे हैं चार पीर-तन में चिश्तिय्या सब से अच्छे ये ज़ोर सिलसिला है फिर कुछ गए हुओं की मुतलक़ ख़बर न पाए क्या जानिए किधर को जाता ये क़ाफ़िला है बार-ए-गराँ उठाना किस वास्ते अज़ीज़ो हस्ती से कुछ अदम तक थोड़ा ही फ़ासला है दे गालियाँ हज़ारों सुन मतला इस ग़ज़ल का कहने लगे कि 'इंशा' इस का ये सिला है

वो परी ही नहीं कुछ हो के कड़ी

वो परी ही नहीं कुछ हो के कड़ी मुझ से लड़ी आँख नर्गिस से भी दो-चार घड़ी मुझ से लड़ी वास्ते तेरे मिरा रंग-महल है दुश्मन तेरी ख़ातिर तो हर इक छोटी बड़ी मुझ से लड़ी झड़ लगा दी मिरी आँखों ने तो लो और सुनो टुकटुकी बाँध के क्यूँ मुँह की झड़ी मुझ से लड़ी रात लड़-भिड़ वो जो चुप हो रही तो उन के एवज़ बोलते थे वो जो सोने की घड़ी मुझ से लड़ी बैठे बैठे कहीं बुलबुल को जो छेड़ा मैं ने तो नसीम उस की बदल हो के खड़ी मुझ से लड़ी कौन सी हूर यहाँ खेलने चौथी आई बू-ए-गुल ले के जो फूलों की छड़ी मुझ से लड़ी रूठ कर उन की गली में जो लगा तू 'इंशा' हर इक उस दो लड़ी मोती की लड़ी मुझ से लड़ी

जिगर की आग बुझे जिस से जल्द वो शय ला

जिगर की आग बुझे जिस से जल्द वो शय ला लगा के बर्फ़ में साक़ी सुराही-ए-मय ला क़दम को हाथ लगाता हूँ उठ कहीं घर चल ख़ुदा के वास्ते इतने तो पाँव मत फैला निकल के वादी-ए-वहशत से देख ऐ मजनूँ कि कैसी धूम से आता है नाक़ा-ए-लैला गिरा जो हाथ से फ़रहाद के कहीं तेशा दरून-ए-कोह से निकली सदा-ए-वावैला नज़ाकत इस गुल-ए-रा'ना की देखियो 'इंशा' नसीम-ए-सुब्ह जो छू जाए रंग हो मैला

खोल आग़ोश न तू मुझ से रुकावट से लिपट

खोल आग़ोश न तू मुझ से रुकावट से लिपट अब जो लिपटा है तो आ प्यार की करवट से लिपट उस ने सर अपना धुना देख शिगाफ़-ए-दर से कर के ग़श रह गए हम उस की जो चौखट से लिपट धूम ये बादा-कशों की है कि मय-ख़ाने में मस्त जाते हैं सुराही की ग़टा-ग़ट से लिपट जों गली में मुझे आते हुए देखा तो वो शोख़ अपनी चौखट से उचक झट से गया पट से लिपट शैख़ से ईद को क्यूँ आप हम-आग़ोश हुए गोया जाता है भला ऐसे भी खूसट से लिपट जिस को कहते हैं तराक़ी की फबन सो ज़ालिम रह गई है तिरी चोली की फ़ँसावट से लिपट पीस डाल आज तू मेरे भी फफूले दिल के आ न आ मुझ से टुक ऐसी ही सजावट से लिपट धम से हम दोनो गिरे फ़र्श पे हैं रूप कि रात रह गया उन का दुपट्टा भी छपर-खट से लिपट चोट खा कर लगी कहने कि अगर ऐसा है है गला खेलना तुझ को तो किसी नट से लिपट रा'द के साथ है 'इंशा' मिरे नाले का वो रूप जैसे गुठ जाती हैं सुम दून में तिर्वट से लिपट

बे-मदद हक़ के करें क्या

बे-मदद हक़ के करें क्या मर्दुम-ए-दुनिया मदद कब तलक बाला मदद ऐ आलम-ए-बाला मदद खींचता हूँ ना'रा-ए-हक़ खेलता धमाल हूँ ऐ मिरे साईं मदद दाता मदद मौला मदद अब किसी मूज़ी को जुड़ता हूँ फिर एक भंग घोटना हो मदद हक़ हो मदद हो हो मदद हाहा मदद फ़िर्क़ा-ए-याजूज-ओ-माजूज आ बहम लड़ते हैं जब वहाँ करे है आशिक़ों की भंग का सोंटा मदद जितने हैं नासूत की अबद होत भागें हो के भूत एक चुटकी भर जो कर बैठे भबूत अपना मदद थी निगह-मस्तों की जून रजब हथेली की चेहरे हज़रत-ए-वहशत मदद ऐ जोशिश-ए-सौदा मदद जी में है बन कर ज़राई ले आप भी ललकारिये की न मर्द आदमी-पन ने गिरा ऐ 'इंशा' मदद नाम पर सालार-ए-दिल के इश्क़-ए-कूड़ा फिर कोई गा हिना दोला मदद जल्वा मदद सेहरा मदद

मियाँ चश्म-ए-जादू पे इतना घमंड

मियाँ चश्म-ए-जादू पे इतना घमंड ख़त-ओ-ख़ाल-ओ-गेसू पे इतना घमंड अजी सर उठा कर इधर देखना इसी चश्म-ओ-अबरू पे इतना घमंड नसीम-ए-गुल इस ज़ुल्फ़ में हो तो आ न कर अपनी ख़ुशबू प इतना घमंड शब-ए-मह में कहता है वो माह से रकाबी से इस रू पे इतना घमंड बस ऐ शम्अ' कर फ़िक्र अपनी ज़रा इन्ही चार आँसू पे इतना घमंड अकड़ता है क्या देख देख आइना हसीं गरचे है तू पे इतना घमंड वो कर पंजा 'इंशा' से बोले कि वाह इसी ज़ोर-ए-बाज़ू पे इतना घमंड

लाहूत पर न देखें जो क़ुदसियाँ तमाशा

लाहूत पर न देखें जो क़ुदसियाँ तमाशा सो हम को है दिखाता इश्क़-ए-बुताँ तमाशा टुक कीजे चश्म-ए-दिल से याँ सैर मय-कदे की हैगा अजब मज़े का पीर-ए-मुग़ाँ तमाशा जिस ने सुने ये मेरे अशआ'र ख़ुश हो बोला नाम-ए-ख़ुदा है तो कुछ ऐ नौजवाँ तमाशा अल्लाह री फ़साहत अल्लाह री बलाग़त ऐसा कहाँ झमकड़ा ऐसा कहाँ तमाशा शोख़ी अदा सो ऐसी जोश-ओ-ख़रोश इतना बंदिश धुआँ सो ये और तर्ज़-ए-बयाँ तमाशा दीवान सैंकड़ों हैं हम ने तो देखे लेकिन इन में नज़र पड़ा कब पाया जो याँ तमाशा क्या ख़ूब वाह माशा-अल्लाह है अजब कुछ दीवान-ए-मीर इन्शाअल्लाह ख़ाँ तमाशा

 
 
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