हिन्दी ग़ज़लें : गुलशन मदान
Hindi Ghazals : Gulshan Madan


दिखने में जो प्यार संभाले बैठे हैं

दिखने में जो प्यार संभाले बैठे हैं अंदर से अंगार संभाले बैठे हैं सच तो ये है सच से है परहेज़ हमें हम झूठा व्यापार संभाले बैठे हैं अपने छोटे छोटे सुख की खातिर हम दुखों का अंबार संभाले बैठे हैं एक खबर कल आई थी खुशहाली की अब तक वो अख़बार संभाले बैठे हैं बेटों ने जायदाद लुटा दी है लेकिन पुरखों की तलवार संभाले बैठे हैं अब मीठा एहसास कहाँ है रिश्तों में संबंधों का भार संभाले बैठे हैं

तेरी महफिल भी ख़ूबसूरत है

तेरी महफिल भी ख़ूबसूरत है उसका हासिल भी ख़ूबसूरत है कितना आसान हो गया जीना लगती मुश्किल भी ख़ूबसूरत है कत्ल की खूबियां बताती हैं मेरा क़ातिल भी ख़ूबसूरत है ख़ूबसूरत है आपकी सूरत होंठ पे तिल भी ख़ूबसूरत है आपसे मिल के यूँ लगा मुझको आपका दिल भी ख़ूबसूरत है तेरा रस्ता भी ख़ूब है कितना तेरी मन्ज़िल भी ख़ूबसूरत है

उसे होता है यह आभास घर में

उसे होता है यह आभास घर में नहीं आया है कुछ भी रास घर में कहीं जंगल में है आसान शायद बहुत मुश्किल है पर बनवास घर में किसी पर वह भरोसा क्या करेगा कि जिसका टूटा हो विश्वास घर में कोई त्यौहार हो, कोई खुशी हो कभी होता नहीं उल्लास घर में व्यथा रोटी की है या आस्था है किसी कारण तो है उपवास घर में मुझे बच्चों की किलकारी बताए कोई मेहमान आया खासकर में पुरुष वह लिख नहीं सकता कभी भी लिखा नारी ने जो इतिहास घर में मुझे ऐसा लगा तुम आ गए हो हुआ खुशबू का जब एहसास कर में

ज़िन्दगी में ग़म अगर आया नहीं

ज़िन्दगी में ग़म अगर आया नहीं समझो जीने का हुनर आया नहीं कब से है सूरज सफर में रात दिन आज तक भी उसका घर आया नहीं शहर से गुज़रा तो वह घर आएगा उसका वादा था मगर आया नहीं लौ बुझी, आख़िर सहर भी हो गयी आने वाला रात भर आया नहीं तय किया तन्हा सफ़र का रास्ता साथ कोई हमसफर आया नहीं ज़ख्म अपने खुद ही सहलाने पड़े अपना कोई चारागर आया नहीं जब मिली मुझको अचानक रोशनी देर तक कुछ भी नज़र आया नहीं

इक कबूतर भी हमारे बाम तक आया नहीं

इक कबूतर भी हमारे बाम तक आया नहीं हो गयी है मुद्दतें, पैग़ाम तक आया नहीं इस कदर महफूज़ रक्खा है तुझे दिल में सनम आज तक होठों पे तेरा नाम तक आया नहीं इस जहाँ में गूंजते हैं उनके किस्से आज भी जिनका अफसाना कभी अंजाम तक आया नहीं कत्ल जिसने कर दिया था रात सारे शहर का दिन में उसके सर पर इक इल्ज़ाम तक आया नहीं वो ही प्यासा रह गया है आज के इस दौर में बढ़ के जिसका हाथ खुद ही जाम तक आया नहीं

दुनिया से कुछ ध्यान हटाकर देखो तो

दुनिया से कुछ ध्यान हटाकर देखो तो खुद को इक आवाज़ लगाकर देखो तो जीने का अन्दाज़ नया मिल जाएगा दिल में कोई दर्द सजाकर देखो तो मिल जाएगी ख़्वाबों को ताबीर नई जो सोये हैं उन्हें जगाकर देखो तो भूल से भी भूल नहीं पाओगे तुम दिल से अपने मुझे भुलाकर देखो तो कुछ तो बदलेगा देखो माहौल यहां लफ़्ज़ों का तूफान उठाकर देखो तो

बन के मेरा हमकदम, तू साथ चल

बन के मेरा हमकदम, तू साथ चल कुछ तो हो तन्हाई कम, तू साथ चल दे न मंज़रं यूँ उदासी का मुझे यूँ न कर आँखों को नम, तू साथ चल यूँ तो हैं कितने ही हमराही मगर हैं सफर में दोस्त कम, तू साथ चल रास्ता हूँ या कोई मन्जिल हूँ मैं खुल ही जाएगा भरम, तू साथ चल यह सफ़र जनमों से लम्बा है अगर आरज़ू है, हर जनम तू साथ चल खुश नहीं तू भी बिछड़ने से मेरे मेरे भी दिल में है ग़म, तू साथ चल

खुशी का धंधा मन्दा चल रहा है हंसी का धंधा मन्दा चल रहा है जिसे कल ब्याज पर पैसे दिए थे उसी का धंधा मन्दा चल रहा है हैं अम्बानी के वारे न्यारे, बाकी सभी का धंधा मन्दा चल रहा है किसी को दे गया चांदी कोरोना किसी का धंधा मन्दा चल रहा है बहुत बिकती है तलवारें, कटारें सुई का धंधा मन्दा चल रहा है खुली हैं मॉल में जब से दुकानें गली का धंधा मन्दा चल रहा है नहीं यह बात इक दो दिन की 'गुलशन' कभी का धंधा मन्दा चल रहा है

ख़त लिक्खा चाहत के साथ

ख़त लिक्खा चाहत के साथ लेकिन कुछ शिद्दत के साथ कोई अच्छी ख़बर नहीं है तुम पढ़ना हिम्मत के साथ माँ की हालत भी पतली है बापू की हालत के साथ देवर धूत पड़ा रहता है जाएगा इस लत के साथ डिग्री तो लाया है बड़का नौकरियाँ रिश्वत के साथ छुटका अब रहता है हरदम आवारा दलपत के साथ लाखों ऐब चले आते हैं एक बुरी आदत के साथ मुनिया फस्ट रही बस्ती में अट्ठासी प्रतिशत के साथ सोचूं इसकी शादी कर दूँ लड़का देख बखत के साथ