हिंदी कविताएँ : बाल कृष्ण मिश्रा

Hindi Poetry : Bal Krishna Mishra


मातृभूमि (माँ) तुझे प्रणाम

उगता सूरज तिलक लगाता उज्जवल चंद्र किरण की वर्षा , नतमस्तक हूँ तेरे चरणों में तेरे चरणों में चारों धाम । मातृभूमि ( माँ ) तुझे प्रणाम ।। तेरी माटी शीतल चंदन , जिसमें खेले खुद रघुनन्दन । जिसमें कान्हा ने जन्म लिया , कभी खाई , कभी लेप किया । सीता की मर्यादा यहाँ , यहाँ मीरा का प्रेम । मन के दर्पण का तू दर्शन तेरे आँचल में संस्कृति का मान। मातृभूमि ( माँ ) तुझे प्रणाम ।। कल कल करती नदियां अपनी संगीत सुनाए। चू चू करती चिड़िया अपनी गीत सुनाए। मातृभूमि की पावन धरा , हर हृदय में प्रेम संजोए काशी विश्वनाथ की आरती, हर मन में दीप जलाए । आध्यात्म की गहराई यहाँ और विज्ञान की उड़ान । मातृभूमि ( माँ ) तुझे प्रणाम ।। दिव्य अलौकिक अजर अमर कंकर भी बन जाता यहाँ शंकर । बलिदानों की गाथा तू , तू वीरों की पहचान । जय-जय माँ भारती, जय यह पवित्र धरा महान मातृभूमि ( माँ ) तुझे प्रणाम ।।

दंश ले जो तू मुझे, तो नींद आ जाए

बीते लम्हों का सूनापन तेरी यादों का महकता चंदन आँखों में थमी तेरी परछाई, रोशनी बनकर बूंदों में घुल जाए । दंश ले जो तू मुझे, तो नींद आ जाए । कहां मुमकिन है मोहब्बत को लफ्ज़ों में बयां कर पाना । आसान नहीं भुला, यादें सुकून की नींद में सो जाना । ज़िस्म से रूह तलक, बस सुकून छा जाए । दंश ले जो तू मुझे, तो नींद आ जाए । जीवन के पावन ‘निर्झर’ को, तुम यूँ ही बह जाने दो । एक पल, बस एक पल, नीले अँधेरे में गुम हो जाने दो । तारों की चादर ओढ़, चाँद की रोशनी में खो जाऊं । तेरी मोहब्बत की खुशबू में, खुद को फिर से पा जाऊं । ज़िस्म से रूह तलक, बस सुकून छा जाए । दंश ले जो तू मुझे, तो नींद आ जाए । तेरे बिना सारा जहाँ, सूना सा लगता है, जैसे एक सिसकी.… जैसे एक सिसकी । ये कैसा अधूरापन ? ये कैसा सूनापन ? शायद यही है इश्क़ अपना… एक मीठा सा पागलपन । हर खुशी बेमानी, हर नशा अधूरा, तेरे बिन ये जीवन, एक ख़्वाब ना पूरा । तुझसे ही शुरू, तुझपे ही फ़ना, तेरे बिना अब नहीं , कहीं ठिकाना । ज़िस्म से रूह तलक, बस सुकून छा जाए, दंश ले जो तू मुझे, तो नींद आ जाए । ये रात ठहर जाए, पलकों पे ठहर जाए । होठों पे तेरा नाम हो, और सुबह ना आए । हर ख्वाहिश मिट जाए, बस तू ही तू रह जाए । दंश ले जो तू मुझे, तो नींद आ जाए । ज़िस्म से रूह तलक, बस सुकून छा जाए । दंश ले जो तू मुझे, तो नींद आ जाए ।

मैं बेचारा तन्हा अकेला

मैं बेचारा तन्हा अकेला भीगी राहों पर ढूँढ रहा, खुद को, कहीं । सड़कें भीगीं, शहर धुंधला, आसमान में घना कोहरा । भीगे आँखों से छलके यादों की धार, हर बूँद में गूँजे तेरा प्यार। शहर की भीड़ में, मैं खुद से पूछता, अपनी परछाई से ही अब मैं रूठता। पत्थरों में चमक, पर दिल में अँधेरा, टूटे सपनों सा लगता जीवन । खोया है कुछ, या पाया सवेरा ? मैं मुस्कुराता नहीं मगर, हार भी मानता नहीं । सपनों की राख से, गढ़ता कोई सितारा।

हां तुम !

हां तुम ! मैंने चाहा है तुमको मेरी चाहतों में तुम । गुजरे कल में तुम उगते सूरज में तुम । बहती हवाओं में तुम बरसते बादलों में तुम । खिलते फूलों में तुम ढलती शामों में तुम । हां तुम ! मन की सुंदरता तन का सुंदर रूप । लब तेरे मधुशाला हर अंग पुष्प की माला । स्वप्न की परी तुम हो यौवन रस का अमृत प्याला । तुम जीवन ज्योति तुम करुणा तुम भक्ति तुम ही मेरा बंधन । मेरा इश्क तुम मेरी जान तुम मेरा हर लम्हा तुमसे तुम ही मेरा दर्पण । बेचैन दिल तन्हा मन तस्वीर तेरी चूमते नयन । मिलकर तुमसे लिपटूँ मैं ऐसे जैसे चंदन से लिपटे भुजंग । मेरा ख्वाब मेरी हकीकत मेरी चाहत मेरा जूनू हां तुम !

सन्नाटा

सूरज छुपा धुँध के पीछे, आँखों में ठहरा आसमान। इस अकेलेपन की रात में, दिल ढूँढ रहा तेरे निशाँ। शहर सो गया, नींद के आगोश में, मेरा जहाँ बस तेरी यादों में सिमटा। चीख़ रहा अंदर सन्नाटा, बाहर का मौसम बदला। हर साँस में बस तेरी खुशबू, हर धड़कन पे तेरा पहरा। सन्नाटों में तेरा साया, नींद के आगोश में, शहर समाया ।। धुंधले हुए हैं रास्ते सारे, कैसे ढूँढूँ मैं अपनी डगर? खो गए हैं सारे सहारे, कहाँ ले जाएगा यह सफ़र? ख़ामोशी ने शोर मचाया, दिल ने फिर खुद से की उलझन। टूटे सपनों की राख तले, दबी हुई है मेरी चुभन। क्यों थम न जाता ये जीवन, थक-सा गया हर एक क्षण। चाँद भी आज बादलों का, ओढ़कर आया है कफ़न।

शिव-शक्ति संकल्प

शिवालयों से शंखनाद हुआ, गूंजा यह संदेश, हर नारी में दुर्गा जागे, हर पुरुष शिव रूप बन जाए। हर थिरकन में सृष्टि की लय, साँसों में ओमकार समाए। हर नारी में दुर्गा जागे, हर पुरुष शिव रूप बन जाए। सृष्टि का हर कण है पावन, शक्ति का हर रूप अनमोल, नारी जब सँवारे घर-आँगन, और रण में भरती हुँकार। दुर्गा बन संहारे दानव, काली बन मिटाए अंधकार, उसकी ममता में विष्णु बसें, संहार में बसा महेश का सार। ब्रह्मा-विष्णु-महेश की शक्ति हर थिरकन में सृष्टि की लय हर नारी में दुर्गा जागे, हर पुरुष शिव रूप बन जाए। पुरुष जब ध्यान में लीन हो, जटा में गंग बहे अविरल, डमरू की थाप पर नाचता, काल भी बन जाए शांत और सरल। मिट जाए असुरत्व जगत से, सतयुग सा उजियारा आए। हर नारी में दुर्गा जागे, हर पुरुष शिव रूप बन जाए। पार्वती संग प्रेम है उसका, अर्धनारीश्वर रूप महान, हर पुरुष में वही शिवत्व है, जो त्याग और तप का है ज्ञान।

नारी शक्ति

नारी तू शक्ति है , श्रद्धा सुमन भक्ति है तू गौरी, तू लक्ष्मी, तू सरस्वती है ।। तू करुणा है, तू ममता है, तू जननी है, तू माया है तू शक्तिस्वरुपिणी दुर्गा, सत्यस्वरुपिणी राधा है ।। तू भाव है, तू भावना है, तू लज्जा है, तू सज्जा है तू नंदिनी, तू कामिनी, तू सद्गुण वैभव शालिनी है ।। तू इत्र है , तू मित्र है , तू चित्र है , तू चरित्र है तू दृष्टि , तू चेतना , तू सृष्टि , तू बंदना है ।। मीरा की भक्ति तुझमें , मां अहिल्या का धैर्य पद्मावती सी साहस तुम में, लक्ष्मीबाई का शौर्य तेरे ज्ञान से है जीवन तेरे कर्मो से है पहचान ऋृणी रहेगी ये धरती तू है हाड़ी रानी का बलिदान ।।

पिता

वो तप है, धर्म है, विवेक है, कर्म है वो विद्या है, बुद्धि है, बल है, श्रम है ।। वो श्री है, शक्ति है, श्रेष्ठ है, संबल है, वो जनक है, पालक है, पोषक है वो जल , धरा , गगन, वायु , अग्नि, सूर्य , चंद्र है , वो मेरे स्वर्ग हैं ।। वो कर्तव्य है, प्रतिष्ठा है, उपासना है, वो धन है, धर्म है ,सुख है, प्रार्थना है वो वेद है, उपनिषद है, भक्ति है वो कृष्ण के श्लोक, राम की चौपाई है वो मेरे पिता हैं ।।

श्री महाकाल तांडव स्तुति

सदाशिव शंकर महेश्वर महेश, परमेश्वर त्रिलोचन त्रयंबक त्रिनेत्र। ॐ नमः शिवाय, ॐ नमः शिवाय, भव-भय हरन भोलेनाथ, जय जय शिव शंकराय॥ प्रचंड-तांडव-नृत्य-रत, दिगंबर-विश्वरूपम्, शून्य-हृदय-निवासी, पूर्ण-ब्रह्म-अनुपमम्। अनादि-अनंत-कालचक्र-अधिपति, महादेव-महंतम्, क्षण-भंगुर-लीलाधारी, विभु-अविनाशी-अनंतम्॥ जटा-कटाह-संभ्रम-भ्रमन्-निलिम्प-निर्झरी, शीश-शशांक-धवल-दीप्ति, अमृत-रस-झरी। व्याल-कराल-माल-कंठ, भस्म-विलेपन-धारी, वैराग्य-पुंज-महायोगी, त्रिपुर-अरि-विनाशकारी॥ त्रिशूल-धारिणी-शक्ति, न्याय-वज्र-प्रहारम्, डमरू-नाद-गुंजित-ब्रह्मांड, सृजन-स्वर-सारम्। महानाश-कुक्षि-स्थित, नूतन-सृष्टि-विधानम्, रुद्र-भीषण-संहार, शिव-सौम्य-निर्माणम्॥ काल-काल-महाकाल, काल-जयी-अनामी, चराचर-जगत-रक्षक, विश्वेश्वर-स्वामी। करुणा-पारावार-शंभू, तारन-तरन-हारी, शरण्य-चरण-कमल-अर्पित, जय-जय-पुरारी॥ ॐ नमः शिवाय, ॐ नमः शिवाय, हर हर महादेव, जय शिव शंकराय॥

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