मैं मिलिट्री का बूढ़ा घोड़ा : नागार्जुन
Main Military Ka Budha Godha : Nagarjun
इस संग्रह में बंगला कविता का देवनागरी रूप
और हिन्दी अनुवाद साथ-साथ दिये गये हैं।
1. अचानक हुआ भाग्योदय
कल या कि परसों
हुआ एकाएक भाग्योदय
पकड़ लिया मल्का-ए-तरन्नुम
नूरजहाँ को
रेडियो पाकिस्तान से प्रसारित प्रोग्राम में
सुनाई पड़ी उस सुकण्ठी की स्वर लहरी
‘कजरारी अँखियों में निदिया न आए
जिया घबराए
पिया नहिं आए
कजरारी अँखियाँ में ......’
सारा दिन सारी रात
गूँजती रहीं
मेरे कर्ण-कुहरों में
गीत की कड़ियाँ
हुआ अचानक भाग्योदय
कई वर्षों बाद
कल या कि परसों !
आचमका होलो भाग्योदय (देवनागरी रूप)
काल नाकि परशु
आचमका होलो भाग्योदय
धोरो फेललुम मक्का-ए-तारन्नुम
नूरजहॉन के
रेडियो पाकिस्तान प्रसारित प्रोग्रामे
शुना गेला ओइ सुकण्ठिर स्वर लहरी-
‘कजरारि अँखियाँ में निंदिया न आये
जिया घबराए
पिया नहिं आए
कजरारि अंखियाँ में......,
सारा दिन सारा रात्रि
अनुरणित होते थाकलो
कर्णें-कुहरे आमार
ओर गानेर ओइ कोलिगुलि
आचमका होए गेलो भाग्योदय
अनेक बछरेर परे
काल नाकि परशु !
(19-2-78)
2. सभी कहते उसे सन्त महाराज
मना किया था मुझे
उस महीन दाना वाले रुद्राक्ष की माला ने-
अपव्यवहार मत करना मेरा
अकाल काल कवलित हो गये
जिसने भी अपव्यवहार किया मेरा
तुम्हें भी यदि चाहिए
कभी अपमृत्यु
केवल तभी करना मेरा दुरुपयोग
अगर तुम होना चाहो ब्रह्मराक्षस
तो पूर्ण होगी तुम्हारी मनोरथ
हो जाओगे महाब्रह्मराक्षस
दूषित चित्त से
अपवित्र कर पल्लव से जभी कर दोगे मेरा स्पर्श
वह बना हुआ था साक्षात् योगेश्वर
सभी कहते थे उसे सन्त महाराज
जब राजधानी के हवाई अड्डे पर
पकड़ा गया
सारा दिन उसे रहना पड़ा
सिक्यूरिटी के आव-भगत में....
सबाइ बलतो ओके सन्त महाराज (देवनागरी रूप)
आमाके बॉरन कोरलो
रुद्राक्षेर सेइ मिहिदाना वाला माला-
अपव्यवहार कोरो ना आमार
ओरा होए छे अकालेइ काल कवलित
आमार अपव्यवहार कोरे छिलो
तोमार ओ यदि वांछित हये
कखनो अपमृत्य
शुधु तखनइ दुरुपयोग कोरबे आमार
कि तुमि ब्रह्मराक्षस हते चाओ
ता जदि ताइ हए तोमार साध
पूर्ण हबे मनोरथ
आस्त बड़ो ब्रह्मराक्षस हते पारबे तुमि
दुषित चित्त निए जदि
अपवित्र कर पल्लवे स्पर्श कोरो आमार
ओ एके बारेइ योगेश्वर सेजे छिलो
सबाइ बलतो ओके सन्त महाराज
राजधानिर विमान बदरे
धरा पड़ले
सारा दिन ओके थाकते होलो
सिक्यूरिटिर आओताए....
(4.10.78)
3. निर्लज्ज नाटक
राजनीति हो गयी है सम्प्रति निर्लज्ज नाटक
मैं भी किया करता हूँ यत्र तत्र अनेक त्राटक
कहीं होता हूँ अध्यक्ष, कहीं उद्घाटक
खोल चुका हूँ शत शत महामुक्ति के फाटक
निर्लज्य नाटक (देवनागरी रूप)
राजनीति होयेछे सम्प्रति निर्लज्यो नाटक
आमियो कोरेछि यत्र-तत्र अनेक त्राटक
कोथाओ अध्यक्ष एवं कोथाओ उद्घाटक
खुले दियेछि शत शत महामुक्तिर फाटक
(5.11.78)
4. यह रथ
सामान्य नहीं है यह रथ
पूरा का पूरा गन्धमादन
पूरा का पूरा ऋष्य मूक
अन्दर प्रवेश मात्र से ही
लुप्त हो गयी गन्ध चेतना
कैसे लौटा पाऊँगा फिर
अपनी वह घ्राणशक्ति
एइ रथ (देवनागरी रूप)
एइ रथ सामान्यो नेइ
एके बारे गन्ध मादन
एके बार ऋष्य मूक
ऐर भेतरे प्रविष्ट हओवा मात्रे
लुप्त होलो आमार गन्ध चेतना
कि कोरे फिरे पाबो
पुनराय आमार प्राण शक्ति ?
(18.2.79)
5. भगौड़े शिशिर का पुनरागमन
मध्य फागुन के मेघाच्छादित निशीथ में
बस होने ही वाला है
भगौड़े शिशिर का पुनरागमन
अभी शुरू होगी
टिपिर-टिपिर बरसात की
बोलेंगे वे सुबह-सुबह
उल्लसित स्वर, उन्नमित भ्रू भंगिमा लिए
गहन रात्रि में करुणामय प्रभु ने
बरसाया है कंचन !
और
बोलेंगे ये सुबह-सुबह
उदास स्वर आँखें झुकाए
इस बार तो महामारी हुई ही हुई हैं !
पलातक शिशिरेर द्विरागमन (देवनागरी रूप)
मध्य फाल्गुनेर मेघला निशिथे
एकटु परेइ हबे
पलातक शिशिरेर द्विरागमन
एरवनि हबे आरम्भो
बृष्टिर टापुर-टुपुर
सकाले-सकाल ओरा बोलबे
उल्लसित कण्ठे, उन्नमित भ्रूभंगिमाय
निशुति राते कोरे छेन करुणामय भगवान
कांचनेर वर्षा !
सकाले-सकाल एरा बोलबे
विषन्न कण्ठे, अवनमित भ्रू-पाते
एबार महामारी हबेइ हबे !
(19.2.79)
6. प्यार का आदान-प्रदान
नैवेद्य के नाम पर
बासी जलेबी के आधे टुकड़े में
कैसा अपूर्व स्वाद
निर्माल्य के नाम पर
म्लान गुलाब की शीर्ण पंखुड़ियों में
कैसा अनुपम सौरभ
एक था तेरह साल का
पहला-पहला हृदयेश्वर
और दूसरी थी नौ साल की
पहली-पहली प्राण वल्लभा
उनके बीच
नित्य-नियमित चलता रहा
प्यार का आदान-प्रदान
छ-एक माह
या फिर चार-एक
साक्षी बनी रहती
एक जोड़ी हर सिंगार की बूढ़ी झाड़ी
ग्रीष्म की प्रलंबित निशीथ में
भालोबासार आदान-प्रदान (देवनागरी रूप)
नैवेद्य बले
बासी जिलिपिर खण्डित अर्द्धांशे
से जे कि अपुर्व आस्वाद
निर्माल्य बले
म्लान गोलापेर शीर्ण पापड़िगुलिते
से जे कि निरूपम सौरभ
एकजन तेरो बछर वयसेर
प्रथम प्रथम हृदयेश्वर
एवं अपर एक जन नए बछरेर
प्रथम प्रथम प्राण बल्लभा
ओदेर मध्ये
नित्य नियमित चलते थाकलो
भालोबासार आदान-प्रदान
मास छः-एक
किंवा मास चारेक
साक्षी हुए थाकते
जोड़ा शेफालिर/वयस्क झोप शुधु
ग्रीष्मेर प्रलंबित निशीथे !
(19 2.79)
7. छल का नाम गन्ध भी कहाँ
प्रीति स्निग्ध, बुद्धिदीप्त, दो आँखें यहाँ
यहाँ किसी छल का नाम गन्ध भी कहाँ
सुठाम सुविस्तृत सुभाल पर सिन्दूरी गोलक
नासिकाग्र पर दुलित कलित लघु कंचन लोलक
ध्यान आते ही घूमन्तर माथे की व्यथा
खिल उठती है अन्तर तल में रूपकथा
कहाँ रही अब तक तुम मेरी तिलोत्तमे
भुला कहाँ पाया कभी, तुमको सुमध्यमे
प्रीति स्निग्ध, बुद्धिदीप्त दो आँखें यहाँ
यहाँ किसी छल का नाम गन्ध भी कहाँ
छलनार नामगन्ध नेइ (देवनागरी रूप)
प्रीति स्निग्ध, बुद्धि दीप्त, जोड़ा चोख एइ
एखाने तो छलनार नाम गन्ध नेइ
सुठाम सुविस्तृत कपाले सिन्दूरी गोलक
नासाग्रे दुलछे कलित लघु कनक लोलक
तोमार ध्याने सेरे जाय माथा व्यथा
स्फुरित हये थाके अन्तरे रूप कथा
कोथाय छिलि तुइ आमार तिलोतमे
भूलिनि तो कखनो तोमाके सुमध्य मे
प्रीति स्निग्ध बुद्धि दीप्त जोड़ा चोख एइ
एखाने तो छलनार नाभ गन्ध नेइ
(13.7.78)
8. विप्लव विलास
कुण्ठित होता हूँ कभी होता कभी हताश
करते रहते वितर्क वे मैं फेल हुआ या पास
कांप रहा थर थर थर थर दुर्बल हाथों ताश
नहीं सुहाया वृद्ध वयस में विप्लव भरा विलास
विप्लव विलास (देवनागरी रूप)
कुण्ठित होइ कखनो एवं कखनो हताश
ओरा कोरूक वितर्को, आमि फेल ना कि पाश
थर थर काँपिते छे, दुर्बल हाथेर ताश
बुड़ो वयसे खाप खाएनि विप्लव विलास
(20.8.78)
9. मैं मिलिट्री का बूढ़ा घोड़ा
मैं
मिलिट्री का बूढ़ा घोड़ा
करेंगे वे मुझे नीलाम
कोई चतुर ताँगावाला
ले जायेगा मुझे
चढ़ा देगा आँखों के किनारे
रंगीन आवरण
और कहता रहेगा :
सामने चल बेटा
सामने चल....
सामने....
आमि मिलिटारिर बुड़ो घोड़ा (देवनागरी रूप)
आमि
मिलिटारिर बुड़ो घोड़ा
आमाके ओरा कोरबे निलाम
कोनो चतुर ताँगाबाला
निये जाबे आमाके
बोसिए देबे चोखेर धारे
रंगीन खोलश
बलते धाकबे :
सामने चल बेटा
सामने चल
सामने....
(27.9.78)
10. भुतहा पेड़ इमली का
यह वही भुतहा पेड़ इमली का
वृद्ध प्रपितामह-वृद्ध प्रमातामह
वनस्पतियों का
डेढ़ सौ-सवा सौ साल की
अवस्था तो होगी ही
कहीं उससे अधिक ही हो !
वैशाखी-तूफान के प्रलयंकारी ताण्डव से
धराशायी हो गया अभी-अभी
आह, कैसा मर्मान्तक परिदृश्य है
जीवन का यह अन्त !
भूतुड़े तेतुलेर गाछ (देवनागरी रूप)
से ये एई भूतुड़े गाछ तेतुलरे
से ये एई वृद्ध प्रपितामह-वृद्ध प्रमातामह
वनस्पति देर
'डेढ़ श सवा श' बछरेर आयु हबे
ततो धिक ना कि !
काल बोशेखिर प्रल्यंकर ताण्डवे
हये गैलो धराशायी सबेमात्र
आहा, जीवनान्ते कि ये
मर्मन्तुद परिदृश्य हये गैछे
(11.7.78)
11. दीप्त सीमन्त
अब तो कुछ पता नहीं
तुम्हारी उस दीप्त माँग का
कैसे करूँ उस जगह का सन्धान
जहाँ पहले-पहल
लगाया था सिन्दूर
तुम्हारा वह कुंतलित भाल
अब तो हो रहा मात्र
पुरातत्त्व-स्मृति
जबकि इस चेतना पटल पर
अब भी है झिलमिल
तुम्हारी वह सद्य-सन्दूरित माँग
जबकि अब रेख वह नहीं मिलती
उस एक किशोरी की उस दीप्त माँग की !
दीपितो सीमन्त (देवनागरी रूप)
एखन तो कोनो पात्ता नेइ
तोमार ऐइ दीपितो सीमन्तेर
सन्धान पावो कि कोरे जाय गाटिर
कोथाए ये प्रथम प्रथम
सिन्दूर लागिए छिलाम
तोमार सेइ कुंतल कपाल
पुरातत्वेर स्मृतिते परिणत सम्प्रति
अथच एइ चेतना पटले
ओ ज्वल-ज्वल करिते छे
तोमार सेइ सद्य सिन्दूरित सीमन्त खानि
अथच एखन तो होदिस पाइनि
एकजन किशोरीर सेइ दीप्त सीमन्तेर....
(21.7.78)
12. रहता उद्यत
रहता था उद्यत प्रतिपल
भर लेने को मित्र सुलभ बाहु-पाश में
रहता था उद्यत प्रतिपल
धनुष की प्रत्यंचा पर साधे तीर
शत्रु के सन्धान में
रहता था उद्यत प्रतिपल
सद्गुरु निदेशित
यौगिक अनुष्ठान की खातिर
वही मेरे ये बाहु-युगल
सम्प्रति यों ही झूल रहे हैं
अनेक प्रयत्न करने पर भी
मैं इसे उठा नहीं पाता
हिला-डुला नहीं पाता
मेरे बाहु-युगल को इस क्षण
पूरा का पूरा लकवा मार गया है
उद्यत रहता था प्रतिपल
उफनते भादों में उद्दाम
भागीरथी की बाढ़ में विलुप्त कूल-कछार में
लगाकर छलाँग, तैर जाने के लिए इस पार से उस पार
रहता था उद्यत प्रतिपल
उफनाते भादों में लगाकर छलाँग !
थाकतो उद्यत (देवनागरी रूप)
प्रतिपल थाकतो उद्यत
बन्धु सुलभ कोला कुलिर जन्यो
प्रतिपल थाकतो उद्यत
धनुषेर प्रत्यंचाए बोसिए शिलीमुख
शत्रुर सन्धाने
प्रतिपल थाकतो उद्यत
सद्गुरु निर्देशित
यौगिक अनुष्ठानेर जन्यो
सेइ जे आमार एइ बाहु युगल
सम्प्रति एमनि झुलछे
अनेक चेष्टा कोरे ओ
एखन आमि एके उठाते पारिनि
दुलाते पारिनि
आमार बाहुयुगल एखन
ग्रसत सम्पूर्ण पक्षाघाते
प्रतिपल थाकतो उद्यत
भरा भाद्रा उद्दाम
भागिरथिर वन्या विलुप्त कुलांचले
झापि दिए पारापार सन्तरणेर जन्यो
प्रतिपल थाकतो उद्यत
भरा भाद्रे झाँपि दिए !
(8.8.78)
13. युग-पुरुष
भ्रस्ट भ्रस्ट महाभ्रस्ट
कष्ट कष्ट महाकष्ट
स्पष्ट स्पष्ट महास्पष्ट
भ्रस्ट भ्रस्ट महाभ्रस्ट
महामिलन-महामलिन
गहन पंकलिप्त नलिन
लघु प्रकाश गुरू तिमिर
गलित पंगु अन्ध वधिर
शर शयन हिम शिविर
युग पुरुष द्विज दिविर
लघु प्रकाश गुरू तिमिर
युग-युरुष (देवनागरी रूप)
भ्रस्टो भ्रस्टो महाभ्रस्टो
कष्टो कष्टो महाकष्टो
पष्टो पष्टो महापष्टो
भ्रस्टो भ्रस्टो महाभ्रस्टो
महामिलन-महामलिन
गहन पंक-लिप्त नलिन
लघु प्रकाश गुरू तिमिर
गलित पंगु अन्ध वधिर
शर शयन हिम शिविर
युग पुरुष द्विज-दिविर
लघु प्रकाश गुरू तिमिर
(27.9.78)