शकुन की कुण्डलियाँ-बच्चों की कुण्डलियाँ : शकुंतला अग्रवाल 'शकुन'


1 *तिरंगा* थाम तिरंगा बढ़ चले,लेकर स्वप्न हजार। छोटे-छोटे पाँव से,नाप रहे संसार। नाप रहे संसार,इन्हें मत कोई रोको। यही देश की शान,इन्हें मत कोई टोको। इनको बच्चा मान,कभी मत लेना पंगा। यह भारत की जान,चले हैं थाम तिरंगा। 2 *पेड़* छाया मिलती पेड़ से,संग मिलें फल-फूल। शुद्ध हवा देते हमें,यह जीवन का मूल। यह जीवन का मूल,इन्हें मत काटो कोई। जिसने काटे पेड़,उसी की किस्मत सोई। खुद को कर बर्बाद,एक दिन वह पछताया। जिसने रोपा पेड़,उसी को मिलती छाया। 3 *मोहे* चंदा देता चाँदनी,सबको एक समान। सूरज देता रोशनी, करता नहीं गुमान। करता नहीं गुमान,पुष्प खुशबू देकर भी। मुस्काते हैं खूब,जिन्दगी लघु लेकर भी। रौंदी जाती दूब,नहीं करती मन गन्दा। रत्नाकर में डूब,सभी को मोहे चंदा। 4 *प्यारा-गाँव* दादू चलते हैं चलो,अपने प्यारे गाँव। खेत लुभाते संग में,वट-पीपल की छाँव। वट-पीपल की छाँव, वायु नित निर्मल बहती। मिलता है आनन्द,देख हरियाली धरती। गाँवों का यह सत्य,नहीं है कोई जादू। पोते का मन जान,बहुत खुश होते दादू। 5 *सुन पम्मी* पम्मी बैठी मुँह फुला,सुने न कोई बात। खाने से कट्टी करी,नयन करें बरसात। नयन करें बरसात,चाहिए उसे पास्ता। सब करते मनुहार,नहीं वह करे नास्ता। दादा-दादी संग,बताती उसको मम्मी। समझो पेट खराब,करे पिज्जा सुन पम्मी। 6 *धमाल* चुन्नू मम्मी से कहे,ला दो रंग-गुलाल। होली खेलेंगे सभी,होगा खूब धमाल। होगा खूब धमाल, जश्न फिर खूब मनेगा। होकर लल्लम लाल,खुशी का चंग बजेगा। सुन रंगों की बात,नाचता खुश हो मुन्नू। गुझिया लाना संग,कहे मम्मी से चुन्नू। 7 *पतंग* दादू दिलवा दो मुझे,नीली एक पतंग। नापेगी जब वह गगन,सब रह जाएँ दंग। सब रह जाएँ दंग,मलेंगे अपनी आँखें। खूब जमेगा रंग,उड़ेगी खोले पाँखें। श्रम से मिलती जीत,नहीं यह कोई जादू। पकड़ डोर की छोर,उड़ूँ मैं नभ में दादू। 8 *पर्यावरण* आओ बच्चों हम सभी,पेड़ लगाएँ एक। हम सब मिलकर आज ही,काम करें यह नेक। काम करें यह नेक,तभी वसुधा महकेगी। पर्यावरण विशुद्ध,वाटिका भी चहकेगी। जीवन का आधार,पेड़ हैं इन्हें बचाओ। कटे न कोई पेड़,करें प्रण हम सब आओ। 9 *जीवन धानी* एक जुलाई आ गई,हो जाओ तैयार। बहुत मना ली मौज भी,नाप लिया संसार। नाप लिया संसार,बहुत करली मनमानी। पढ़ता-लिखता नित्य,उसी का जीवन धानी। चमके ज्यों आदित्य,करे जो खूब पढ़ाई। छोड़ो बाकी कृत्य,आ गई एक जुलाई। 10 *सच्चे-बच्चे* हम बच्चे भगवान को,करते नित्य प्रणाम। उनके ही आशीष से,बन जाता हर काम। बन जाता हर-काम,प्रश्न भी हो जाते हल। पढ़ते-लिखते आज,पुष्प-से खिल पाते कल। इतना रखना ध्यान,जुबां के होते सच्चे। मात-पिता का मान,बढ़ाते हैं हम बच्चे। 11 *आँगन की शोभा* बालक की मुस्कान से,गम जाते हैं हार। आँगन की शोभा यही,इनसे घर गुलजार इनसे घर गुलजार,जिंदगी खिल-खिल जाती। आती मधुर बहार,प्रेम संदेशा लाती। बच्चे का मुख देख,झूमने लगता पालक। सुख की जीवन रेख,उकेरे देता बालक। 12 *चाँद-सा* रवि कहता हर दिन हमें,रखना इतना ज्ञान। रोशन कर संसार को,मत करना अभिमान। मत करना अभिमान,चाँद-सा शीतल रहना। कर मुश्किल पथ पार,सरित-सा अविरल बहना। जिसका है मन पाक,उसी की मनमोहक छवि। कहे शकुन सुन बात,चलो ऐसे जैसे रवि। 13 *सार्थक जीवन* अविचल चलने का हमें,देता सूरज ज्ञान। मंजिल पाकर तुम कभी,मत करना अभिमान। मत करना अभिमान,तभी सार्थक है जीवन। रखना इतना ध्यान,महक जाएगा तन-मन। कहे शकुन सुन मीत,रहे जिसका मन अविकल। दुनिया लेता जीत,सतत चलता जो अविचल। 14 *सत्पथ* भगवन हमको आप तो,दें ऐसा वरदान। पढ़-लिखकर ज्ञानी बनें,दूर रहे अभिमान। दूर रहे अभिमान,चलें बच्चे सत्पथ पर। नित नापें आकाश,बैठ सद्गुण के रथ पर। महकें जैसे फूल,हमारा महके तन-मन। मात-पिता के नित्य,करें पदवंदन भगवन। 15 *मीठी-किलकारी* बालक से रहता सदा,घर-आँगन गुलजार। इनकी मृदु-मुस्कान ही,खुशियों का आधार। खुशियों का आधार,बने मीठी-किलकारी। हो जाते जब रुष्ट,सभी पर पड़ते भारी। इनको देख उदास,व्यथित हो जाता पालक। खुशियों की सौगात,'शकुन' होते है बालक। 16 *पापा कहते* पापा कहते वक्त का,समझा जिसने मोल। बच्चो जग में वो नहीं,रहता डांवाडोल। रहता डांवाडोल,काम जो कल पर छोड़े। निर्णय उसके गोल,सफलता भी मुख मोड़े। करे वक्त पर काम,उसी ने जग को नापा। समय बहुत अनमोल,हमें समझाते पापा।