एखलाक ग़ाज़ीपुरी की रचनाएँ
अंतर्द्वंद्व : कविता अनुक्रमणिका
- अन्तर्द्वन्द
- भारत भाग्य संवारो तुम
- सब मिल कर इनको नमन करो
- कब तक लहू लजायेगा
- अब राजधर्म का पालन हो
- मैं माटी का पुतला मेरा प्यार माटी
- टुकड़े टुकड़े पहरों में
- जाने क्या क्या छूटेगा
- ऑनलाइन अब शोर बहुत है
- सबके हों ये काबा काशी
- कैसी दुनिया हमारी अजब रंग है
- नयी नसल का फितूर है ये
- देखो मैं ही प्रथम प्रतिनिधि
- गरिमा खण्डित होती है
- इन्सान हो तुम सीखो
- जयचंद नहीं हूँ
- बुरी है रीत दुनियां की
- फर्क न होगा अंतिम क्षण में
- अब तो ऐसा अक्सर होता है
- मानव के अवतार में आ
- वहाँ तुम्हारी कलम जगे
- भ्रष्ट व्यवस्था के शायद हम सब ही कर्ता धर्ता हैं
- क्या अधिकार हमें है बोलो
- सेना में भारत बसता है
- सेना का अभिमान रहे
- सब मील के पत्थर उखड़ गए
- दुःशासन के अवतार बहुत
- कुछ मोल गंवाने ही होंगे
- अब राष्ट्रध्वजा फहराने दो
- उनके जीवन का सुख राम के पास हो
- बस एक जटायु के जैसा
- यहाँ बेईमानी दुष्कर्म नहीं
- बस इसको अविरल रहने दो
- ये फिर तुमको फुसला लेंगे
- खेल तुम्हारा ठीक नहीं
- पत्थर का बदला गोली हो
- अब गोविंद न आएंगे
- तुम्हें लड़ने का अधिकार नहीं
- सच्चा धर्म वही होता है
- देश हमारा लूट लियो
- अब आज का भारत ऐसा है
- उनका शोषण होता है
- फिर अपना झण्डा गड़ा रहेगा
- याद वही रह जाएगा
- सुनो राधिका अब कन्हैया नहीं हैं
- अपना हिंदुस्तान लिखो
- समुचित मोल चुकाया जाए
- उससे बढ़कर कौन भला है
- अपना कोई मोल नहीं
- तेरे इश्क में वफा की ऐसी मिसाल दूँ मैं
- हम किसके क्या क्या होते थे
- मुझे आदमी का ख़िताब दे
- मुझको तुम मजदूर रख लो
- तुमसे बेहतर कौन करे है
- मैं तेरा दीवाना नहीं रहा
- कोई जुर्म नहीं क़ातिल का अब
- मैं कैस तुम्हारा हूँ
- है शौक बहुत मंहगा हमने जिसे पाला है
- यहाँ मुहब्बत में रहजनी है
- हमारी उल्फ़त की पाक चादर
- तुम मुझसे मिलने आ जाना
- तेरे मुकाबिल खड़ा हूँ मैं
