हे मेरी तुम : केदारनाथ अग्रवाल
He Meri Tum : Kedarnath Agarwal
एक खिले फूल से
एक खिले फूल से झाड़ी के एक खिले फूल ने नीली पंखुरियों के एक खिले फूल ने आज मुझे काट लिया ओठ से, और मैं अचेत रहा धूप में
लिपट गयी जो धूल
लिपट गयी जो धूल पांव से वह गोरी है इसी गांव की जिसे उठाया नहीं किसी ने इस कुठांव से। ऐसे जैसे किरण ओस के मोती छू ले तुम मुझको चुंबन से छू लो मैं रसमय हो जाऊँ!
तुम भी कुछ हो
तुम भी कुछ हो लेकिन जो हो, वह कलियों में रूप-गन्ध की लगी गांठ है जिसे उजाला धीरे धीरे खोल रहा है। यह जो नग दिये के नीचे चुप बैठा है, इसने मुझको काट लिया है, इस काटे का मंत्र तुम्हारे चुंबन में है, तुम चुंबन से मुझे जिला दो।
वह पठार जो जड़ बीहड़ था
कटते-कटते ध्वस्त हो गया, धूल हो गया, सिंचते-सिंचते, दूब हो गया, और दूब पर वन के मन के- रंग -रूप के, फूल खिल उठे, वन फूलों से गंध-गंध संसार हो गया।
समुद्र वह है
समुद्र वह है जिसका धैर्य छूट गया है दिककाल में रहे-रहे ! समुद्र वह है जिसका मौन टूट गया है, चोट पर चोट सहे-सहे !
वह चिड़िया जो
वह चिड़िया जो- चोंच मार कर दूध-भरे जुंडी के दाने रुचि से, रस से खा लेती है वह छोटी संतोषी चिड़िया नीले पंखों वाली मैं हूँ मुझे अन्न से बहुत प्यार है। वह चिड़िया जो- कंठ खोल कर बूढ़े वन-बाबा के खातिर रस उँडेल कर गा लेती है वह छोटी मुँह बोली चिड़िया नीले पंखों वाली मैं हूँ मुझे विजन से बहुत प्यार है। वह चिड़िया जो- चोंच मार कर चढ़ी नदी का दिल टटोल कर जल का मोती ले जाती है वह छोटी गरबीली चिड़िया नीले पंखों वाली मैं हूँ मुझे नदी से बहुत प्यार है।
पूंजीवादी व्यवस्था
हे मेरी तुम डंकमार संसार न बदला प्राणहीन पतझार न बदला बदला शासन, देश न बदला राजतंत्र का भेष न बदला, भाव बोध उन्मेष न बदला, हाड़-तोड़ भू भार न बदला कैसे जियें? यही है मसला नाचे कौन बजाये तबला?
मार्क्सवाद की रोशनी में
दोषी हाथ हाथ जो चट्टान को तोडे़ नहीं वह टूट जाये, लोहे को मोड़े नहीं सौ तार को जोड़े नहीं वह टूट जाये।
प्रक्रति चित्र
जिसने सोने को खोदा, लोहा मोड़ा है जो रवि के रथ का घोड़ा है वह जन मारे नहीं मरेगा