सम्पूर्ण ग़ज़लें : फ़ैज़ अहमद फ़ैज़
Complete Ghazals in Hindi Faiz Ahmed Faiz
- अबके बरस दस्तूरे-सितम में क्या-क्या बाब ईज़ाद हुए
- अब बज़्मे-सुख़न सुहबते-सोख़्तगाँ है
- अब वही हर्फ़े-जुनूं सबकी ज़बां ठहरी है
- आए कुछ अब्र कुछ शराब आए
- आज यूं मौज-दर-मौज ग़म थम गया
- आपकी याद आती रही रात-भर
- इज्ज़े अहले-सितम की बात करो
- इश्क़ मिन्नतकशे-क़रार नहीं
- कई बार इसका दामन भर दिया हुस्ने-दो-आलम से
- कब ठहरेगा दर्द-ए-दिल, कब रात बसर होगी
- कब तक दिल की ख़ैर मनाएँ, कब तक रह दिखलाओगे
- कब याद में तेरा साथ नहीं, कब हात में तेरा हात नहीं
- कभी-कभी याद में उभरते हैं, नक़्शे-माज़ी मिटे-मिटे से
- कहीं तो कारवाने-दर्द की मंज़िल ठहर जाये
- किये आरजू से पैमां, जो मआल तक न पहुंचे
- किस शह्र न शोहरा हुआ नादानी-ए-दिल का
- किस हरफ़ पे तूने गोशा-ए-लब ऐ जाने-जहां ग़म्माज किया
- किसी गुमाँ पे तवक़्क़ो ज़ियादा रखते हैं
- कुछ दिन से इंतज़ारे-सवाले-दिगर में है
- कुछ पहले इन आँखों आगे क्या-क्या न नज़ारा गुज़रे था
- कुछ मुहतसिबों की ख़ल्बत में, कुछ वाइज़ के घर जाती है
- क़र्जे-निगाहे-यार अदा कर चुके हैं हम
- गर्मी-ए-शौक़े-नज़ारा का असर तो देखो
- गरानी-ए-शबे-हिज्राँ दुचंद क्या करते
- गुलों में रंग भरे बाद-ए-नौबहार चले
- गो सबको बहम साग़रो-बादः तो नहीं था
- ग़म-ब-दिल, शुक्र-ब-लब, मस्तो-ग़ज़लख़्वाँ चलिए
- चश्मे-मयगूँ ज़रा इधर कर दे
- चाँद निकले किसी जानिब तेरी ज़ेबाई का
- जमेगी कैसे बिसाते-याराँ कि शीशा-ओ-जाम बुझ गये हैं
- जैसे हम-बज़्म हैं फिर यारे-तरहदार से हम
- तिरी उमीद, तिरा इंतज़ार जब से है
- तुझे पुकारा है बेइरादा
- तुम आए हो न शबे-इन्तिज़ार गुज़री है
- तुम्हारी याद के जब ज़ख़्म भरने लगते हैं
- तेरी सूरत जो दिलनशीं की है
- तेरे ग़म को जाँ की तलाश थी तेरे जाँ-निसार चले गए
- दरबार में अब सत्वते-शाही की अलामत
- दिल में अब, यूँ तिरे भूले हुए ग़म आते हैं
- दोनों जहान तेरी मोहब्बत मे हार के
- न अब रकीब न नासेह न ग़मगुसार कोई
- न किसी पे ज़ख़म अयां कोई, न किसी को फ़िकर रफ़ू की है
- न गवाँओ नावके-नीमकश दिले-रेज़ा-रेज़ा गवां दिया
- नहीं निगाह में मंज़िल तो जुस्तजू ही सही
- नसीब आज़माने के दिन आ रहे हैं
- नासेहम गुफ़त बजुज़ ग़म चे हुनर दारद इश्क
- फिर आईना-ए-आलम शायद कि निखर जाये
- फिर लौटा है ख़ुरशीदे-जहाँताब सफ़र से
- फिर हरीफ़े-बहार हो बैठे
- फूल मस्ले गये फ़र्शे-गुलज़ार पर
- फ़िक्रे-दिलदारी-ए-गुलज़ार करूं या न करूं
- बहुत मिला न मिला ज़िन्दगी से-फ़ैज़ का आख़िरी कलाम
- बात बस से निकल चली है
- बिसाते-रक़्स पे साद शर्क़ो-गरब से सरे शाम
- बेदम हुए बीमार दवा क्यों नही देते
- बेबसी का कोई दरमाँ नहीं करने देते
- यक-ब-यक शोरिशे-फुगाँ की तरह
- य' किस ख़लिश ने फिर इस दिल में आशियाना किया
- यह मौसमे-गुल गर चे तरबख़ेज़ बहुत है
- याद का फिर कोई दरवाज़ा खुला आख़िरे-शब
- यादे-ग़ज़ालचश्मां, ज़िक्रे-समनइज़ारां
- यूँ बहार आई है इस बार कि जैसे क़ासिद
- यूँ सजा चांद कि झलका तिरे अन्दाज़ का रंग
- ये जफ़ा-ए-ग़म का चारा, वो नजाते-दिल का आलम
- रहे ख़िज़ां में तलाशे-बहार करते रहे
- रंग पैराहन का, ख़ुशबू जुल्फ़ लहराने का नाम
- राज़े-उल्फ़त छुपा के देख लिया
- वक़्फ़े-उमीदे-दीदे-यार है दिल
- वफ़ा-ए-वा'दः नहीं, वा'दः-ए-दिगर भी नहीं
- वहीं हैं, दिल के क़राइन तमाम कहते हैं
- वो अह्दे-ग़म की काहिशहा-ए-बेहासिल को क्या समझे
- वो बुतों ने डाले हैं वस्वसे कि दिलों से ख़ौफ़-ए-ख़ुदा गया
- शफ़क़ की राख में जल-बुझ गया सितारः-ए-शाम
- शरहे-फ़िराक, मदहे-लबे-मुशकबू करें
- शरहे-बेदर्दी-ए-हालात न होने पाई
- शाख़ पर ख़ूने-गुल रवाँ है वही
- शामे-फिराक़ अब न पूछ आई और आ के टल गयी
- शैख साहब से रस्मो-राह न की
- सब क़त्ल होके तेरे मुक़ाबिल से आये हैं
- सभी कुछ है तेरा दिया हुआ, सभी राहतें सभी कुलफतें
- सहल यूं राहे-ज़िन्दगी की है
- सितम की रस्में बहुत थीं लेकिन, न थी तेरी अंजुमन से पहले
- सितम सिखलाएगा रस्मे-वफ़ा ऐसे नहीं होता
- सुब्ह की आज जो रंगत है वो पहले तो न थी
- हमने सब शे’र में सँवारे थे
- हम पर तुम्हारी चाह का इल्ज़ाम ही तो है
- हम मुसाफ़िर यूँ ही मसरूफ़े सफ़र जाएँगे
- हम सादा ही ऐसे थे की यूं ही पज़ीराई
- हमीं से अपनी नवा हमकलाम होती रही
- हर घड़ी अक्से-रुख़े-यार लिए फिरती है
- हर सम्त परीशाँ तेरी आमद के क़रीने
- हर हक़ीक़त मजाज़ हो जाए
- हवसे-मंज़िले-लैला न तुझे है न मुझे
- हसरते दीद में गुज़राँ है ज़माने कब से
- हिम्मते-इल्तिजा नहीं बाक़ी
- हुस्न-मरहूने-जोशे-बादः-ए-नाज़
- हैरां है जबीं आज किधर सजदा रवां है
