अंग्रेजी से अनुवादित कविताएँ : भुवनेश्वर प्रसाद श्रीवास्तव
English Poetry in Hindi : Bhuvneshwar Prasad Shrivastav



1. बौछार पे बौछार

बौछार पे बौछार सनसनाते हुए सीसे की बारिश का ऐसा जोश गुलाबों के तख़्ते के तख़्ते बिछ गए क़दमों में कायदे से अपना रंग फैलाए मेंह में कुम्हलाए हुए आग आवश्यकता से अधिक पीड़ा का बदला चुकाने की पीड़ा निर्जीव करने वाली उस आग से भी अधिक दल के दल बादल कि हौले-हौले कानाफूसियाँ हैं अफ़वाह की जो अपशकुन बनकर फैली है किसी... दीर्घ आगत भयानक यातना की फ़ौजी धावा हो जैसे, ऐसा अंधड़ बादलों को परे के परे बुहार कर एक ओर कर रहा ऐसी-ऐसी शक्लों में छोड़ते हुए उनको कि भुलाए न भूलें आदमी पर आदमी का ताँता और हरेक के पास बड़े ही मार्मिक जतन से अलगाई हुई अपनी एक अलग कहानी उसी व्यक्ति को लेकर जो सदा वही कुर्ता पहने उसी एक दिशा में चला जाता रहा रहम पर रहम की मार मरदूद करार देने उसी व्यक्ति को और साथ उसके मठ के पुजारी को भी जो शपथ ले-ले कर जीता मुर्दों की और कम से कम आधे पखवाड़े में एक बार तो झूठ बोलता ही है अनुवाद : शमशेर बहादुर सिंह

2. आँखों की धुँध में

आँखों की धुँध में उड़ती-सी अफ़वाह का एक अजब मज़ाक है यह पिघलते हुए दिल और नमाई हुई रोटी का हीरा तो खान में एक प्यारा-सा फ़साना है किसी पत्थर दिल और नमाई हुई रोटी का ग़रीबी के पछोड़ में ग़म के दानों की रुत है सब्र का बँधा हुआ मुँह खुल जाएगा कल के अख़बारों में बस और कुछ नहीं अनुवाद : शमशेर बहादुर सिंह

आँखों की नमी

आँखों की नमी एक अजीब अफ़वाह फैलाती है पिघलते हुए दिल की और पसीजती रोटी की... पत्थर में एक हीरा जनप्रिय कहानी है और पत्थर दिल में से उपजती पसीजती नम आँखों वाली रोटी की... ग़रीबी का मूसल मौसम का मौसम है ? और सहनशीलता की शान्ति नई सुबह की शुरूआत अनुवाद : रमेश बक्षी

3. खुल सीसामा !

खुल सीसामा ! और खुल गया द्वार वह जिसकी मुहरबंद शक्ति में धन था धन! अतिरिक्त और हो भी क्या सकता भला उस अलीबाबा के लिए कि जिसका धनी हुए बिना ही धन पर अधिकार हो गया था... तो क्या वह बीमार हो गया था? अनुवाद : शमशेर बहादुर सिंह

4. नदी के दोनों पाट

नदी के दोनों पाट लहराते हैं आग की लपटों में दो दिवालिए सूदख़ोरों का सीना जैसे फुँक रहा हो शाम हुई कि रंग धूप तापने लगे अपनी यादों की और नींद में डूब गई वह नदी वह आग वह दोनों पाट, सब कुछ समेत क्योंकि जो सहते हैं यह जागरन जिसका कि नाम दुनिया है वह तो नींद के ही अधिकारी हैं और यह भी कौन जाने उन्हें सचमुच नींद आती भी है या नहीं। अनुवाद : शमशेर बहादुर सिंह

5. रूथ के लिए

मगन मन पंख झड़ जाते हैं यदि और देखने वाली आँखें झप जाती हैं शाहीं के अंदर पानी नहीं रहता उस अमृत जल को पी के भी जो आँसुओं की धार है। दूसरे पहर की चमक में यदि अगली रात की झलक है और रात की कोख भी सूनी जैसे मछुवे का झाबा ये सारा मातम है यदि इसीलिए कि मर जाएँ पर सच ही सच बताएँ तो मर जाना ही बेहतर है उसे बताकर कान में रूथ के। अनुवाद : शमशेर बहादुर सिंह

रुथ के प्रति

यदि प्रसन्न पंख गिर जाएँ और दॄष्टि आँखें मूँद ले बाज़ दम तोड़ दे और मकरंद की आँखों में आँसू आ जाएँ यदि दोपहर चमकने लगे आगामी कल के उजाले से रातों में सन्नाटा छा जाए मछुवारों की पतवारों से यदि वह झूठ बोलने के लिए भी (शोक मनाना चाहता है) और सच बोलने के लिए मरना चाहता है तो उसके लिए बोलने के साथ मर जाना बेहतर है रुथ के कान में कुछ कहने के बजाय। अनुवाद : रमेश बक्षी

6. दिमाग़ की सुरंगों में

कभी अविस्मृत चीज़ें तक नहीं फुसफुसातीं तो कभी दरकार होती हैं कानाफूसियाँ जो सोती वनात्मा को जगा दें वनात्मा उसके डैने उसकी अलौकिकता प्रतीक हैं उस शग़ल का जिसमें हम लगे रहें अब तक हम ग़ौर से देखें अपने दिमाग़ की सुरंगों में तो वनात्मा हमारी अपनी ख़ुदी ही है बयाबानी अलिखित अगणित। अनुवाद : असद ज़ैदी

दिमाग़ी तारों के बीच

दिमाग़ी तारों के बीच जो अब बीती-अनबिसरी बातों की कनफूसी बीने भी नहीं समझते अब उन अफ़वाहों की तरफ़ देखते हैं जो किसी वन-प्रांतर के जन्तु में जीवित है... वह तो एक उपमा, रुपक है जो पंख, दृष्टि और उन सब चीज़ों से परेशान है... जहाँ से हमने यात्रा-बिन्दु शुरू किया है इसी जन्तु को अगर हम अपना आपा जिसकी मर्दमशुमारी नहीं हुई और जो बर्बर जंगली है। अँग्रेज़ी से अनुवाद : रमेश बक्षी

7. ईसा का जन्म

चेहरा पीला आँखें निस्तेज एड़ियों से रिसता था ख़ून चरागाह में रेंग रही थी ईश्वर की वधू यानी दुल्हन उस भद्र पुरुष की सृजन करना है जिसका ईश्वरीय धंधा उस बाला के गर्भ में था दुनिया का तारनहार प्रभु की नाजायज़ औलाद वह ग़रीब बढ़ई आगे चलता जाता था विचारशून्य बालक की तरह मुड़-मुड़कर उस औरत को देखता था एक मज़लूम बच्चे के दुख और ग़ुस्से के साथ उस औरत के पैर लड़खड़ाए फैलीं निष्प्रभ आँखें मुफ़लिस बढ़ई ने मुड़कर देखा और बिलखने लगा एक बच्चे की तरह— बल्कि प्यार में धोखा खाए पशु की तरह यक़ीनन वह एक दुष्ट ईश्वर होगा जिसने एक मुफ़लिस बढ़ई की औरत के साथ ऐसा खेल इसलिए किया कि पैदा हो सके दुनिया का उद्धारक अपनी माँ की शर्म बनकर। अनुवाद : असद ज़ैदी

जन्म एक बच्चे का

चेहरा ज़र्द, आँखें डूबी पाँव ठण्डे ख़ून था उसकी एड़ियों पर और पालने में वह रो रही थी प्रभु की कृपा । यह उस सज्जन की कृपा है जिसके पास सृजन की प्रभु-कृपा है और उसके गर्भ में है विश्व की यादगार लेकिन एक शर्मनाक बच्चा उस ग़रीब सुतार की तरह जो कि एक बच्चे की तरह अकेला बग़ैर आभास के घूमता रहा घूमकर देखा और वह परेशान थी एक गुस्सैल दुःखी बच्चे की तरह। उसके पाँव कँपकँपा गए और उसकी आँखें सूज गईं वह बेचारा सुतार यह सब देखकर परेशान रो दिया एक बच्चे की तरह नहीं; एक पशु की तरह प्यार से वहशी एक दुष्ट ईश्वर की तरह उसने उस ग़रीब सुतार की पत्नी के साथ ब्लात्कार किया इस विश्व के ईसा को पैदा करने के लिए शर्मनाक बात थी। अगस्त 5, 1936 अँग्रेज़ी से अनुवाद : रमेश बक्षी

8. कहीं

कहीं सितारों ने पा ली है अपनी वाणी और उनके क़दमों में लिपटते हैं सारे तत्त्व कहीं रात है धुली हुई और पाक-साफ़ मेरे हृदय की गहरी लाली में मलबूस गो कि वुजूद की यह दौड़ रायगाँ है कि हम हैं ही क्या एक सर्द बिसात पर रखे बेजान मोहरों के सिवा लेकिन ख़ुशनुमा है एक ख़ाबीदा बच्चे की तरह ये ख़याल कि कहीं हमारे सपने हमारा इंतिज़ार करते होंगे चाँदनी के सुकूत में। अनुवाद : असद ज़ैदी

9. शोकगीत

एक हसीन वादी में एक हसीन लड़की उसके हुस्न से झरता था प्यार मैंने उसे आग़ोश में कस लिया चूमे उसके लब आह, यो शीरीं लब! राजपुरुष, योद्धा, सम्राट इस धरती के स्वामी लोग सिंहासनारूढ़ ऊँचे-ऊँचे, दुबकी जनता नीचे-नीचे लेकिन मैंने अपनी सरज़मीन के लवणों के बीच आज़माई अपनी ख़ुदाई मैं असली ख़ुदा बनकर खेला बरख़ुरदार नीलगूँ गुंबद के प्याले से पी शराब और दीवानावार हँसते हुए ढाला अपना जाम गो कि ख़ाब देखना भी मुझ पर मुज़िर है मुफ़लिसी पीसे डालती है दैन्य ही है मेरा जीवन मुझ पर लानत भेजो। अनुवाद : असद ज़ैदी

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