एक जन्म में सब : अनीता वर्मा

Ek Janm Mein Sab : Anita Verma


प्रार्थना

भेद मैं तुम्हारे भीतर जाना चाहती हूँ रहस्य घुंघराले केश हटा कर मैं तुम्हारा मुंह देखना चाहती हूँ ज्ञान मैं तुमसे दूर जाना चाहती हूँ निर्बोध निस्पंदता तक अनुभूति मुझे मुक्त करो आकर्षण मैं तुम्हारा विरोध करती हूँ जीवन मैं तुम्हारे भीतर से चलकर आती हूँ।

सृजन

मैं लिखती हूँ एक शरीर जिसकी आत्मा मेरे भीतर अकुला रही है पानी की बूँद सी जिसकी चमक कौंध जाती है शब्दों के शरीर पर एक कविता बनते-बनते एक आत्मा छोड़ देती है शरीर ।

देह

एक देह को चलते या जागते देखना किसी आश्चर्य से कम नहीं जो गंध और स्पर्श का घर होते हुए भी उसके पार का माध्यम है देह रूप है इसकी एक अलग भीतरी भाषा है बीतते दिनों के चलित व्यापार में यह सिर्फ़ ऊपर से जागती है इसकी आत्मा उस समय भी खोज रही होती है अपना स्पंदन यह एक विकल प्रतीक्षा है जिसकी निरंतरता में सोई पड़ी रहती है देह इसके भीतर निवास करते हैं कई जंगल, गुफ़ाएँ निविड़ जगहें बहुत भीतर कहीं मंद प्रकाश में पड़ा होता है प्रेम कई जगहें हैं जहाँ प्रवेश वर्जित है इन तक पहुँचने का पता भी हमें मालूम नहीं होता पुनर्जन्म को न भी मानें तो इसी जन्म में सत्य हो सकती है देह जब यह स्फुरित हो कोमल हो जाए पँखुरियों की तरह प्रक्षेपित हो कहीं समूची उसी क्षण यह जन्म लेती है और उसी क्षण होती है इसकी मृत्यु

घर

यहाँ कई आत्माएँ निवास करती हैं यह उनके इकट्ठा होने का एक ग़ैर-पूँजीवादी तरीक़ा है जो ख़ून के नमक ने पैदा किया है यहाँ सेंधमारी और टूटन के भी अलग ढंग हैं वे बाहर से ज़्यादा भीतर से पैदा होती हैं बहुत पहले घर नहीं थे तब लोग विश्वास का घर बनाते थे पेड़ों के भी हुआ करते थे घर फिर एक कल्पना ऐसी आई कि घर नदी किनारे बना होगा उसके पीछे पहाड़ होंगे कुछ चिड़ियाँ बोलेंगी एक नाव नदी में दूर जाती दिखेगी अब हमने इस घर की तस्वीर बना ली है जो अपनी जड़ता में दीवारों पर सोती है बच्चे अक्सर चित्रांकन की शुरुआत में इसमें रंग भरते हैं जो धीरे-धीरे भूरे या काले रंग में बदलता जाता है पहाड़ों पर उतर आया है गाढ़ा अंधकार चिड़ियों की चीख़ युद्ध और समझौतों के बीच कभी-कभी सुनाई देती है इसी बीच कई विस्फोट हुए और नदी हमारे भीतर प्रवेश करती सूखती चली गई नाव अब भी है जिसे सख़्त ज़मीन पर चलाना आसान नहीं रह गया है पृथ्वी पर रहने आए थे हम और यह हमारा घर थी इसकी छत आकाश थी सूरज और चाँद की बत्तियाँ अब भी याद दिलाती हैं किसी पुराने प्रेम की अब समझौतों का घर बनता है जहाँ संस्कार के तहत हम प्रेम करते हैं या फिर नहीं करते

प्रेम

समुद्र की एक लहर ने मुझे घेर लिया कहा मैं हूँ पानी का प्रेम बादल कहाँ रहने वाले थे पीछे भर गए वे पूरी देह में हवा के हाथों ने उठा दिया आकाश तक मैं शून्य की बारिश प्रेम की पहाड़ों ने सीने से लगाया सूरज का चुंबन माथे पर देकर बर्फ़ जैसी एक नींद प्रेम की जंगल के सन्नाटे ने तोड़ा सघन काँटेदार कोहराम का जाल बेगवान नदी के कठोर तटों ने फिर घेरा एक बार फिर प्रेम के लिए मैं इन सबके पास गई

व्यर्थ

प्रेम के भीतर एक व्यर्थ होती हुई स्त्री स्वप्न और यथार्थ को लपेटे चलती जाती है चाँद की बर्फ़ीली बारिश का बोझ उठाए हुए चलती जाती है सन्नाटे की नोक पर अब वह इस तरह है कि बहुत-सी बीहड़ ऋतुएँ हैं और देती हुई आँखें हैं मन ही मन अनंत बातों का एक जाल बुनती रहती है वह पाँवों में चुभती हैं चप्पलें सड़क पर चलते छतरी उलझ जाती है वह रहती है लगातार व्यस्त और मौन सोचती हुई यातनामय विषादमय उसकी चोटी पीठ के नीचे गड़ती है सफ़ेद मृत्यु की चादर पर दूर किसी छोर से आती हवा उसे ढँक लेती है

नींद

नींद में हम सबसे पवित्र होते हैं पतित कुछ नहीं होता पतित अनुभव गोद में झुके होते हैं गंधक पारे के पीले सफ़ेद फूलों में एक लड़की है नींद उसके केशों से गिरता है प्यार जीवन के दृश्य क्षमा लेते हैं उदासी पोंछने का एक झाड़न टँगा रहता है सुबह के फीके बल्ब पर अपना कोई प्रिय वर्तमान हम अतीत से माँग लाते हैं पाँच लाख फूलों पाँच हज़ार नदियों के बीच शांत बहती हैं साँसें नींद कहती है आओ गिरो।

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आप दूध पिएँगे तो पहले देखिए उसके तरीक़े और दिन भर करने को रह गए हैं बस दो काम या तो नहा लीजिए या फिर धो लीजिए कपड़े बहुत ख़ुश हों तो चार बार कर सकते हैं ब्रश वह जो चाय के बारे में बता रही है नई-नई बहू उसने भी आज़माए हैं उम्र कम करने के नुस्ख़े एक क्रांति अभी-अभी बस होनी है धोबियों के बाज़ार में उन्हें पता है कि ऊपर चढ़ने से आसान है नीचे जाना इसलिए वे बताते हैं पड़ोसियों से ईर्ष्या के गुर फोड़ देते हैं पर्दे पर चायदानी वह निषेध का विस्फ़ोट है सब कुछ दिखता है कहकर भी पर्दे के पीछे का सच नहीं दिखाया जाता जहाँ नोटों की बिजलियाँ गिरती हैं और ऊपर ही ऊपर लोक ली जाती हैं आप इधर ब्रश करते रह जाते हैं उधर यहाँ की हवा वहाँ की फ़िज़ा को कर आती है सब्ज़ कुछ दिनों बाद शायद बनाए जाएँ विज्ञापन ख़रीदिए एक पूरा आदमी भाव प्रेम और संवेदना से भरपूर

टूटता मकान

घर के सामने जो मकान टूटता है उसका दुख मुझ तक नहीं आता लगातार शोर से बहरे हैं मेरे कान किसी के अफ़सोस ज़ाहिर करने पर मैं हिला देती हूँ सर नहीं जानती किन लोगों ने इसे छोड़ा जो घटित हुआ वह ठीक-ठीक क्या था टूट कर अपने पर ही गिरता हुआ अतीत या किसी विवशता का भयावह भविष्य मज़दूर परेशान थे कहते आसान नहीं है इसे तोड़ना बड़ी मज़बूती है और ईंटे भी कुछ कम नहीं कइयों को तो साबुत बचा लाए हम वे आराम करते थे और तोड़ते थे बिना छत सिर्फ़ दरवाज़ों में खड़ा था मकान दिखती थीं भीतर कुछ साइकिलें ख़ाने के डिब्बे एक खड़ा पाया तिरछा अभी-अभी टूटा था झुके छज्जे पर रोड़ों का अंबार अटका था सूराख़ों से धीरे-धीरे गिरती थी धूल घर की विपदाएँ खुली हुई थीं हवा और धूप को परेशानी नहीं थी अँधेरे को भी हो गई थी आसानी भिखारी भी अब उधर नहीं देखते थे कभी कोई बकरी फाटक पर रुक लेती उसे शायद याद थी पुरानी हरियाली मुझे याद आए वे हाथ जो सूरज को जला देते थे बारिश में उठाते थे कपड़े सुबह जो अख़बार बरामदे में पड़ा होता था उसे उठाकर कोई भीतर पुकारता चला जाता था घर की गृहिणी जब मछली ख़रीदती एक कौआ रहता था ताक में रात गए एक ट्रक आता था उठा ले जाता था ईंटें

अभी

अभी मैं प्रेम से भरी हुई हूँ पूरी दुनिया शिशु-सी लगती है मैं दे सकती हूँ किसी को कुछ भी रात-दिन वर्ष-पल अनंत अभी तारे मेरी आँखों में चमकते हैं मर्म से उठते हैं कपास के फूल अंधकार अभी सिर्फ़ मेरे केशों में है अभी जब मैं प्रेम करती हूँ दुनिया में भरती हूँ रंग जंगलों पर बिखेरती हूँ हँसी समुद्र को सौंपती हूँ उछाल पत्थरों में भरती हूँ शांति

इस्तेमाल

पहले स्त्री बाज़ार नहीं जाती थी वह फैली हुई थी समूचे घर में उसका ख़ालीपन भरा रहता था हर कोने में कुछ नहीं माँगता था उसका प्रेम कल्पना के टूटते सच उसकी गोद में गिरते जाते थे दूर कहीं हवा में वह बनाती थी घर सर झुकाए छिपी हुई वह लगती थी सुंदर अब बाज़ार स्त्री के क़दमों में है उसके केश सहलाता उतारता कपड़े सामान कोई भी हो बेची जाती है हमेशा स्त्री वह बाज़ार को ले आती है घर में बच्चे से प्यार करती हुई वह खिलाती है उसे आधुनिक कोई उत्पाद एक दवा उसे कमर दर्द से बचाती है वह कई घरों को इसी तरह रखती है दुरुस्त बेहिचक दिखते हैं उसके छिपे हुए अंग बनते हैं सुंदरियों के इतिहास ख़रीदनी है अगर दवा तो देखो स्त्री को दर्द से ज़्यादा असरदार है उसकी कमर तेल से ज़्यादा सुंदर हैं केश कपड़ों से ज़्यादा देह देखो चमकीली आँखें चिकनी त्वचा काली करो कल्पना अगर ख़रीदनी हो ग़ज़ल शुक्र करो कि ख़ूबसूरत माँएँ बच्चे नहीं बेचतीं यह काम बदसूरत माँओं के लिए तय किया गया है सुखी घर के लिए हर सामान बिकता है यह बात सब छिपाते हैं कि उनसे जीवन का क्या बनता है

ज़ाहिद अली का पन्ना

यह पन्ना जिस पर मैं लिखती हूँ ज़ाहिद अली की कॉपी का है इम्तिहान में जिसे दस में से छह अंक आए हैं यह पन्ना बीच का पुल है जो ज़ाहिद अली के गुज़रते समय तक जाता है इसके अक्षर उसकी रोशनी में नहीं चमकते उसकी सुबह और गोधूलि में इनसे कोई आग नहीं जलती उसके तारों और फूलों से बहुत दूर अस्पताल और दवाओं से दूर कविता अपनी यातनाओं के रास्ते चलती है यहाँ उसके समय की निराशा नहीं है क्षीण होते विचारों के अवशेष नहीं हैं जीवन में प्रवेश करता हुआ समय नहीं है विचलन समझौते और आशंकाएँ नहीं हैं अगे चलकर ज़ाहिद अली को मिल सकते हैं अंक दस में दस या बारह या सिफ़र फ़र्क़ नहीं पड़ता कि उसे सोचना पड़ सकता है भविष्य सपनों और आत्महत्या के बारे में देखने पड़ सकते हैं अमानवीय दृश्य स्मृतियों को ज़िंदा रखने की कोशिश और जीवन की अधूरी तहक़ीक़ात के बीच ख़त्म होती है यह कविता इससे पहले कि ज़ाहिद अली मर जाए बूढ़ा होकर

वान गॉग के अन्तिम आत्मचित्र से बातचीत

एक पुराने परिचित चेहरे पर न टूटने की पुरानी चाह थी आंखें बेधक तनी हुई नाक छिपने की कोशिश करता था कटा हुआ कान दूसरा कान सुनता था दुनिया की बेरहमी को व्यापार की दुनिया में वह आदमी प्यार का इन्तज़ार करता था मैंने जंगल की आग जैसी उसकी दाढ़ी को छुआ उसे थोड़ा सा क्या नहीं किया जा सकता था काला आंखें कुछ कोमल कुछ तरल तनी हुई एक हरी नस ज़रा सा हिली जैसे कहती हो जीवन के जलते अनुभवों के बारे में क्या जानती हो तुम हम वहां चल कर नहीं जा सकते वहां आंखों को चौंधियाता हुआ यथार्थ है और अन्धेरी हवा है जन्म लेते हैं सच आत्मा अपने कपड़े उतारती है और हम गिरते हैं वहीं बेदम ये आंखें कितनी अलग हैं इनकी चमक भीतर तक उतरती हुई कहती है प्यार मांगना मूर्खता है वह सिर्फ किया जा सकता है भूख और दुख सिर्फ सहने के लिए हैं मुझे याद आईं विन्सेन्ट वान गॉग की तस्वीरें विन्सेन्ट नीले या लाल रंग में विन्सेन्ट बुखार में विन्सेन्ट बिना सिगार या सिगार के साथ विन्सेन्ट दुखों के बीच या हरी लपटों वाली आंखों के साथ या उसका समुद्र का चेहरा मैंने देखा उसके सोने का कमरा वहां दो दरवाज़े थे एक से आता था जीवन दूसरे से गुज़रता निकल जाता था वे दोनों कुर्सियां अन्तत: खाली रहीं एक काली मुस्कान उसकी तितलियों गेहूं के खेतों तारों भरे आकाश फूलों और चिमनियों पर मंडराती थी और एक भ्रम जैसी बेचैनी जो पूरी हो जाती थी और बनी रहती थी जिसमें कुछ जोड़ा या घटाया नहीं जा सकता था एक शान्त पागलपन तारों की तरह चमकता रहा कुछ देर विन्सेन्ट बोला मेरा रास्ता आसान नहीं था मैं चाहता था उसे जो गहराई और कठिनाई है जो सचमुच प्यार है अपनी पवित्रता में इसलिए मैंने खुद को अकेला किया मुझे यातना देते रहे मेरे अपने रंग इन लकीरों में अन्याय छिपे हैं यह सब एक कठिन शान्ति तक पहुंचना था पनचक्कियां मेरी कमजोरी रहीं ज़रूरी है कि हवा उन्हें चलाती रहे मैं गिड़गिड़ाना नहीं चाहता आलू खाने वालों* और शराब पीने वालों** के लिए भी नहीं मैंने उन्हें जीवन की तरह चाहा है अलविदा मैंने हाथ मिलाया उससे कहो कुछ कुछ हमारे लिए करो कटे होंठों में भी मुस्कराते विन्सेन्ट बोला समय तब भी तारों की तरह बिखरा हुआ था इस नरक में भी नृत्य करती रही मेरी आत्मा फ़सल काटने वाली मशीन की तरह मैं काटता रहा दुख की फ़सल आत्मा भी एक रंग है एक प्रकाश भूरा नीला और दुख उसे फैलाता जाता है। *'पोटैटो ईटर्स', **'ड्रिंकर्स'—वान गॉग के प्रसिद्ध चित्र।

मंच

सब कुछ देख लेने से रहस्य ख़त्म हो जाता है और सब कुछ दिखाया नहीं जा सकता इसलिए मंच के पास होता है नेपथ्य आवाज़ें फैलती हैं दर्शक दीर्घा में दृश्य थम जाता है कोई क्रूरता प्यार या चमक वहाँ पूरे नहीं अँटते उनकी आत्माएँ तैरती रहती हैं आस-पास दर्शक अपने आँसू और पश्चात्ताप गिराकर उन्हें थामने की कोशिश करते हैं पूरा दिखाने की बाबत सपने पकड़ में नहीं आते इच्छाओं की पहचान नहीं हो पाती हम दृश्य में रुके रहते हैं मंच आगे चला जाता है

रिक्त

मैंने आवाज़ हवा को दी वह बह सके रूप जंगल को दिया वह कुछ कह सके साँसें समुद्र को दीं वह रहे तरंगित पंख पहाड़ों को दिए वे आएँ सपनों में चलकर प्रेम को दी आत्मा इस तरह हुई मैं रिक्त

पुरानी हंसी

मुझे अच्छी लगती है पुरानी कलम पुरानी कापी पर उल्टी तरफ़ से लिखना शायद मेरा दिमाग पुराना है या मैं हूं आदिम मैं खोजती हूं पुरानापन तुरत आयी एक पुरानी हंसी मुझे हल्का कर देती है मुझे अच्छे लगते हैं नए बने हुए पुराने संबंध पुरानी हंसी और दुख और चप्पलों के फ़ीते नयी परिभाषाओं की भीड़ में संभाले जाने चाहिए पुराने संबंध नदी और जंगल के रेत और आकाश के प्यार और प्रकाश के।

तर्पण

जब नहीं थे राम बुद्ध ईसा मोहम्मद तब भी थे धरती पर मनुष्य जंगलों में विचरते आग पानी हवा के आगे झुकते किसी विश्वास पर ही टिका होता था उनका जीवन फिर आए अनुयायी आया एक नया अधिकार युद्ध घृणा और पाखण्ड के नए रिवाज़ आए धरती धर्म से बोझिल थी उसके अगंभीर भार से दबती हुई सभ्यता के साथ अजीब नाता है बर्बरता का जैसे फूलों को घूरती हिंसक आंख हमने रंग से नफ़रत पैदा की सिर्फ़ उन दो रंगों से जो हमारे पास थे उन्हें पूरक नहीं बना सके दिन और रात की तरह सभ्यता की बढ़ती रोशनी में प्रवेश करती रही अंधेरे की लहर विज्ञान की चमकती सीढ़ियां आदमी के रक्त की बनावट हम मस्तिष्क के बारे में पढ़ते रहे सोच और विचार को अलग करते रहे मनुष्य ने संदेह किया मनुष्य पर उसे बदल डाला एक जंतु में विश्वास की एक नदी जाती थी मनुष्यता के समुद्र तक उसी में घोलते रहे अपना अविश्वास अब गंगा की तरह इसे भी साफ़ करना मुश्किल कब तक बचे रहेंगे हम इस जल से करते हुए तर्पण

स्त्रियों से

जब कुछ ही समय बाद डूब जाएगी यह पूरी सदी बीज और घास की क़िस्में हमें पुख़्ता कर लेनी हैं भूली हुई कोमलता की गोद कितनी बड़ी करनी है इसे देखना है शुरू के दिन से जब सही थीं न मालूम कितनी यातनाएँ कई तरह के आँसू बहाए थे जब उनके नियमों से ख़ास स्त्री थी अभी शायद साँस लेने का और मुक्त होने का फ़र्क़ भी नहीं कर पाए हम अगर यह वही है जो है उनके पास तब तो वे हैं चिरकाल से मुक्त पर स्थितियों का बदलना क्या इतने बड़े शब्द को अर्थवान कर सकता है रखनी होगी हवाओं के घर में हमें वह पारदर्शी सुनहरी नदी जिसके तट पर प्यार खड़ा है अपने भीतर गुम न होते हुए टीले पर से पकड़नी होगी बच्चे की छोटी अँगुली एक समूह जो जीवित है दर्द में उसका एक हिस्सा बनकर अपनी निविड़ताओं से निकाल लानी होगी उजली हँसी नदियों का साफ़ बहता पानी आईने-सी धूप यह लौटना सचमुच लौटना हो अपने घर घर जो बहुत बड़ा है

एक और प्रार्थना

प्रभु मेरी दिव्यता में सुबह-सवेरे ठंड में काँपते रिक्शेवाले की फटी क़मीज़ ख़लल डालती है मुझे दुख होता है यह लिखते हुए क्योंकि यह कहीं से नहीं हो सकती कविता उसकी क़मीज़ मेरी नींद मे सिहरती है बन जाती है टेबुल साफ़ करने का कपड़ा या घर का पोंछा मैं तब उस महँगी शॉल के बारे में सोचती हूँ जो मैं उसे नहीं दे पाई प्रभु मुझे मुक्त करो एक प्रसन्न संसार के लिए उस ग्लनि से कि मैं महँगी शॉल ओढ़ सकूँ और मेरी नींद रिक्शे पर पड़ी रहे

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